गुरुवार, 30 जनवरी 2025
नाच मेरी जान तुझे पैसा मिलेगा
हमारे यहां बहुत तरह के मौसम होते हैं। जैसे शादी का मौसम, चुनाव का मौसम, गबन घोटाले का मौसम, पीने खाने का मौसम। मौसम के हिसाब से बाजार अपनी कमर कसता और ढीली करता है। बाजार और मौसम में मौसेरा रिश्ता है। ऊपर से अलग-अलग है अंदर से एक हैं। मौसी माँ बराबर होती है चाहे किसी की भी हो।
इन दिनों बसंत है, फूल खिल रहे हैं। मीडिया बता रहा है सब ओर हरा हरा है। चरने वाले चर रहे हैं। जो ना चर पाए वही आदमी है। मौसम की कहें तो रेवड़ियों का है। जी हां वही जो गुड़ तिल से बनती है। छोटी-छोटी मीठी मीठी। जिसे अंधा बाँटता है और अपने अपनों को देता है। रेवड़ियां जितनी मीठी होती है उतनी ही बदनाम भी। जो विरोध करते हैं वह भी बांटने लगते हैं, अगर मौसम रेवड़ियों का हो। लोग मुंह खोलकर बाहर निकलते हैं, पता नहीं कौन मुट्ठी भर डाल दे। मौसम है इसलिए गैंग बंदूक लेकर नहीं रेवड़ियां लेकर निकलती हैं। आज एक के मुंह में डालेंगे कल दूसरे के हलक से निकाल लेंगे। जन सेवा का काला जादू है। कहते हैं रेवड़ियाँ बांटने से कोई कटता नहीं, जुड़ता है। महिलाएं समझदार और जिम्मेदार होती हैं। टीका लगाकर माइक्रो-पात्र में पांच रेवड़ियां रखकर एक दूसरे को देती है और जुड़ जाती हैं। पुरुष ऐसा नहीं करते हैं। जोड़ने तोड़ने के मामले में वे प्रायः नेताओं की सुनते हैं और साधु संतों का मुंह तकते हैं।
खैर, मनोहर सातपुते बहुत भरे हुए हैं। वे रेवड़ियों के बहुत विरोधी हैं। आते ही बोले - " तुम तो आजकल मुंह खोलते नहीं हो अपना! राजनीति में लोकतंत्र को रेवाड़ी-तंत्र बना दिया है! पुराने लोग जनता को जनार्दन मानते थे। यह लोग पतुरिया बनाने पर तुले हुए हैं। नाच मेरी जान तुझे पैसा मिलेगा! पवित्र लोकतंत्र का आक्शन हो रहा है क्या ! बोली लगाई जा रही है ! अच्छा भला सिस्टम बेगम का कोठा होता जा रहा है। तीन-चार जमीदार थैली दिखा दिखा कर घुंघरू गिन रहे हैं! तुम्हें क्या लगता है लोग समझेंगे नहीं!? "
मनोहर सातपुते का गुस्सा जायज है। दुनिया बाजार हो गई है। सब बिकता है। रिश्ते-नाते, जमीर, शरीर, क्या नहीं है बाजार में। एक जगह के बिके हुए लोग दूसरी जगह खरीददार हो जाते हैं। लोकतंत्र की भी बोली लग रही है तो बड़ी बात नहीं है। वह दिन दूर नहीं जब सातपुते का मुँह भी रेवड़ियों से भर के बंद कर दिया जाएगा।
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