आज के इस स्वर्णयुग में अच्छा नागरिक वही है जो मन, वचन और कर्म से सहमत हो। किससे और क्यों सहमत हों, यह ध्यान रखने की ज़रूरत नहीं है। जो सामने सीना तान कर खड़ा हो जाए, सहमत हो जाओ। आप दुनिया में पूरी ज़िंदगी जीने के लिए आए हैं। माँएं बच्चों को बुड्ढा-डोकरा होने का आशीर्वाद देती हैं तो उनकी दुआओं की हिफ़ाज़त भी ज़रूरी है। सब जानते हैं कि जो सहमत हैं वे सुरक्षित भी हैं, उन्हें नींद चैन की आ जाती है। सहमत होना ही सुखी होना है। घर के अंदर हों या देश के, जो लोग ज़्यादातर सहमत रहते हैं वे ज़्यादातर सुखी रहते हैं। सहमति एक सरगम है जिसकी साधना करनी पड़ती है। कुछ लोग हमेशा सहमत रहते हैं, उन पर बायोलॉजिकल देवता आकाश मार्ग से पुष्प वर्षा करते हैं। धरती पर पुष्प खिल उठते हैं और सुंदर पक्षी चहचहाने लगते हैं। सहमत श्रेष्ठीजन होते हैं, उनके लिए स्वर्ग पृथ्वी पर उतर आता है। सहमति के घाट पर अनेक अप्सराएं किलोल करने लगती हैं। राजा के वर्दी वाले और बिना वर्दी वाले सिपाही अपने लठ पीछे रख कर आदरपूर्वक प्रणाम करते हैं। जो सहमत हैं, उन्हीं का मनुष्य-जन्म धन्य है। कथाओं में कहा गया है कि ये श्रद्धालु बारंबार जन्म लेते रहेंगे और सहमति-सुख के अधिकारी होंगे।
एक कहावत है — "जाट कहे सुन जाटनी, याही गाँव में रहना; ऊँट बिलईया ले गई, हाँ जी हाँ जी कहना"। असहमति जता कर गाँव से बैर लेना कोई बुद्धिमानी नहीं है। वैसे भी सहमत होने में अपनी गाँठ से कुछ जाता तो है नहीं! ज़रा सा 'हाँ जी' या 'वाह जी' कह दो, सिर हिला दो, सब सहमति के रूप हैं। मौन रह जाना बौद्धिक सहमति है। सहमत कबीर के इस कहे को आदर्श मानते हैं — "काल करे सो आज कर, आज करे सो अब; पल में परलय होएगी, बहुरी करेगा कब!" तात्पर्य यह कि सहमत होने में देर नहीं लगानी चाहिए, क्योंकि देर होने पर प्रलय हो सकती है। मतलब साफ़ है कि किसी भी प्रकार के विनाश से बचना हो तो सहमत रहिए। किस बात पर सहमत होना है, इस पर वक़्त बर्बाद करना मूर्खता है। समझदार लोग बिना सोचे-विचारे सहमत रहते हैं। चमन-चतुर कहते हैं सामने वाला मुँह खोले तो तुरंत उसके मुँह में सहमति का लड्डू ठूँस दो और बेफ़िक्र हो जाओ।
यों देखा जाए तो सहमत होना बच्चों का खेल नहीं है। बच्चों को पंखों से आकाश में उड़ने वाली लालपरी की कहानी सुना दो और वे सब सच मान लेते हैं। यह एक कला है। अगर पूरे कॉन्फिडेंस से झूठ बोला जाए तो सुनने वाले भले ही करोड़ों हों, सब उसे सच मान लेंगे। लगातार झूठ बोला जाए तो सुनने वाले दोनों कानों के बीच एक टनल शुरू कर देते हैं। किसी शायर ने कहा है — "एक कान से सुन के दूसरे कान से निकाल दिया करो; कुछ इसी तरह अपने आप को सम्हाल लिया करो"। कवि, शायर बड़े तजुर्बेकार होते हैं, यूँ ही कोई मशविरा नहीं दिया करते हैं। लेकिन टनलबाज़ी में असहमति का ख़तरा होता है। इसलिए व्यावहारिक चेतावनी यह है कि टनल को सुरंग की तरह गुप्त रखा जाए।
जो तमाम कोशिशों के बावजूद असहमत हैं, उनके लिए दुआ है। उठाने के लिए बहुत कुछ था लेकिन उन्होंने सर को उठाना पसंद किया। सर उठाया लेकिन सहमति-सुख नहीं उठा पाए! मतलब सुख ज़्यादा भारी होता है, उठाने में कमर झुक जाती है। अपनी-अपनी समझ है जी, कोई सर का ध्यान रखता है कोई पेट का। मौका निकाल कर थोड़ा खुश भी रहा कीजिए। कोशिश करोगे तो बात समझ में आ जाएगी।


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