हिन्दी ने हमारे लोकतंत्र को प्रजा दी। प्रजा ने राजा दिये। राजा ने नगर सेठ बनाए। नगरसेठों ने हिन्दी दिवस पर स्कूलों में लड्डू बाँटवाए। लड्डू ले कर हिन्दी वाले खुश हुए। स्कूलों में राजा अमर रहे के नारे लगाए गए। आचार्य ने फुसफुसा कर राजा को बताया कि सात पीढ़ियों तक आपका राज चलेगा। राजा के मन में छप्पन लड्डू फूटे। राजा ने आचार्य से पूछा - इसके लिए मुझे क्या करना होगा? आचार्य ने कहा - कुछ विशेष नहीं, बस समय-असमय- कुसमय लड्डू बंटवाते रहिए। तब से देश को लड्डू मिल रहे हैं, मिलते ही जा रहे हैं ।
आचार्य जी जाहिरतौर पर हिन्दीप्रेमी हैं और छुपेतौर पर अंगे्रजी प्रेमी। ऐसा है भई मजबूरी में सब करना पड़ता है। देश आचार्यों और समझदार मजबूर लोगों से भरा पड़ा है। एक बार कोई मजबूरी का पल्ला पकड़ ले तो फिर उसे कुछ भी करने की छूट होती है। मजबूर कितनी भी हिंसा कर ले वह अहिंसक ही माना जाएगा क्योंकि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है। अब आप ही बताएं कि महात्मा जी नाम जुड़ा हो तो कोई कैसे मजबूर होने से इंकार करे। मजबूरी हमारी राष्ट्रिय अघोषित नीति है। सो आचार्य जी को मजबूरी में अपने बच्चों को अंगेजी स्कूलों में पढ़वाना पड़ रहा है तो मान लीजिए कि कुर्बानी ही कर रहे हैं देश की खातिर। रीत है जी दुनिया की, शार्ट में बोलें तो दुनियादारी है। सामाजिक स्तर पर जो हिन्दी प्रेमी हैं वे निजी स्तर पर अंग्रेजी प्रेमी पाए जाते हैं। समझदार आदमी सार्वजनिक रूप से हिन्दी का प्रचार प्रसार करता है, मोहल्ले मोहल्ले घूम कर माता-पिताओं को समझाता है, प्रेरित करता है कि भइया रे अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम की पाठशाला में पढने के लिए भेजो और देश को अच्छी प्रजा दो, लड्डू मिलेगा । इस बात में किसी को शक नहीं होना चाहिए कि हिन्दी को प्रेम करना वास्तव में देश को प्रेम करना है। और देश को प्रेम करना हर आम आदमी का परम कर्तव्य है। जिसे कुछ भी करने का मौका नहीं मिलता हो उसे देशप्रेम का मौका तो अवश्य मिलना चाहिए। सितंबर के महीने में देश भर में हिन्दी के लड्डू बंटवाए जाते हैं। राजा के हाथ में लड्डू के अलावा कुछ होता भी नहीं है। साल में एक बार लड्डू नीचे तक पहुंच जाए तो हिन्दी की जय हो ।
इनदिनों आचार्य जी की चिंता यह है कि तमाम हिन्दी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होती जा रही है। गली गली में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल ऐसे खुल रहे हैं जैसे मोहल्ले के चेहरे पर चेचक के निशान हों। वे इस कल्पना से ही पगलाने लगते हैं कि क्या होगा अगर सारे बच्चे अंग्रेजी पढ़े निकलने लगेंगे। देश जेनजियों से भर जाएगा तो कितनी दिककत होगी। आखिर राज करने के लिए प्रजा भी चाहिए होगी। हिन्दी नहीं होगी तो प्रजा कहां से आएगी। राजाओं के लिए प्रजा और प्रजा के अस्तित्व के लिए हिन्दी को प्रेम करना जरूरी है। सरकार में मंतरी से संतरी तक इतने सारे हिन्दी प्रेमी भरे पड़े हैं कि पूछो मत। लेकिन एक भी आदमी आपको ऐसा नहीं मिलेगा जो अपने बच्चों को मंहगे अंग्रेजी स्कूल में न पढ़ा रहा हो। सरकारी नौकर जनता का सेवक होता है। जनता मालिक है, मालिक ही बनी रहे, ठाठ से अपनी सरकार चुने और ठप्पे से राज करे हिन्दी में।
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