अगर आप लोकतंत्र में विश्वास करते हैं, तो मानना पड़ेगा कि संकट हमारे जीवन की आवश्यक बुराई है। ज्यादातर संकट बेकाम होते हैं, इसलिए आते-जाते रहने के अलावा उनके पास कोई काम नहीं होता है। आज के समय में संकट कब आकर सामने खड़ा हो जाए, कहा नहीं जा सकता। समझदार लोग संकट का सामना शांति, धैर्य और हनुमान चालीसा के साथ करते हैं। संकटों की खूबसूरती यह है कि उनके सम्मान में दो-चार बातें बोल दो, तो वे टल भी जाते हैं। हालांकि, कुछ संकट ढीठ किस्म के भी होते हैं। एक बार अगर पीछे पड़ जाएं, तो किसी बड़े संकट के हस्तक्षेप के बिना आपको छोड़ते नहीं हैं। आमजन का और संकट का रिश्ता विक्रम और बेताल की तरह अखंड और अनंत है। अच्छे नागरिक कानून से डरते हैं, लेकिन सुना है संकट की कानून से बड़ी यारी होती है। अगर यह सच है, तो आपके सामने दोहरा-तिहरा संकट है। वकील, दलील, कचहरी, थाना, जेल—यह संकटों का वर्किंग एरिया यानी कार्यक्षेत्र है। आम नागरिक इस कार्यक्षेत्र की तरफ देखता भी नहीं है।
वैसे
संकट दो तरह के होते हैं—एक स्थानीय और दूसरे बाहरी। तकनीकी रूप से स्थानीय संकट छोटे और बाहरी
बड़े होते हैं। केंद्रीय और वैश्विक संकट तो और भी बड़े होते हैं, और उनकी चपेट का दायरा भी उसी अनुसार बड़ा होता है। व्यावहारिक रूप से
देखें, तो मोहल्ला-स्तरीय व्यक्ति के लिए बाहरी, केंद्रीय या वैश्विक संकट करीब-करीब No-संकट होते
हैं। इन्हें लोग कितना भी गरियाएं, वह नक्कारखाने में तूती
की आवाज के समान होता है। बड़ा होने के बावजूद लोगों को उनसे उतना डर नहीं लगता,
जितना स्थानीय यानी छोटे संकटों से लगता है। इसका कारण यह है कि
छोटा संकट सीधे लोगों के संपर्क में होता है। आप अपने आंगन में बैठे अखबार पढ़ रहे
हैं कि अचानक "बाउजी" कहते हुए वह सामने आ टपकता है। अब आप
तुरंत-से-पेश्तर जोर से "भइया जी, जय हो आपकी"
कहकर उन्हें टाल सकते हैं। अगर चूक गए, तो वह इस उपेक्षा को
दिल पर ले सकता है। छोटे संकटों के दिल भी छोटे होते हैं। छोटा दिल नैनो कार की
तरह होता है, यू-टर्न लेने में उसे जरा भी दिक्कत नहीं होती
है।
संत, महात्मा और
समाजसेवी कभी-कभी कहते हैं कि देश चौतरफा संकटों से घिरा हुआ है, जिसे सुनकर लोगों को विश्वास नहीं होता। संकट की पहचान सबको नहीं होती है,
क्योंकि संकट किसी का नहीं होता है। आपने सुना होगा, जानकार कहते हैं—"विश्वास का संकट है।" अब
आप उस विश्वास को ढूंढिए, जिसे खत्म हुए अरसा हो गया है। पर्याप्त
संख्या में संकट जुटा लेने के बाद लोग नई पार्टी बना लेते हैं, जिससे संकट संगठित हो जाता है। चुनाव का समय संकटों की सक्रियता का समय
होता है। झंडा-बैनर लेकर जब सारे एक साथ निकलते हैं, तो
लोगों की आंखें खुली रह जाती हैं—एक तो संकट, ऊपर से संगठित भी! बल्क में डर लगता है । लेकिन चुनाव है, किसी-न-किसी
को चुनना तो पड़ेगा। नागरिकों को अपनी पसंद का संकट चुनना नीट की परीक्षा जैसा
लगता है। अस्पताल, अदालत और नरक के दरवाजे अगर एक साथ खुले
दिख जाएं तो दिमाग के दवाजे बंद हो जाते हैं । प्रायः आदमी डरकर महामृत्युंजय जाप
करने बैठ जाता है। संविधान बनाने वालों को यह बात पता थी, इसलिए
उन्होंने मतदान को गुप्त रखकर जीवनरक्षक उपाय किए। एक तरीका और है, अगली बार कोई
संकट आए तो फौरन कंबल औढ़ कर सो जाइए और चालीसा पथ कीजिए ।“ भूतपिसाच निकट नहीं
आवै, महाबीर जब नाम सुनावै । नासै रोग हरे सब पीरा; जपत निरंतर हनुमत बीरा।।“
वो
कुछ देर आवाज देगा, उसके बाद निकल जाएगा ।
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