" अरे बचुआ यह तो बताओ जरा की एक ठो गुलाब से
लड़की जो है अपनी हो जाती है? " चचा ने आसपास देखते हुए
धीरे से पूछा।
" अरे चचा तुम भी ना नई-नई चुल पाल लेते हो! अब
तुम कहां जाओगे गुलाब ढूंढने!"
" जोर से मत बोलो यार और मुंह मत बनाओ। हम लाठी
चमकाते अधेड़ हो गए पर अभी तक कोई हमारा नहीं हुआ। इधर लोग गुलाब टीका कर एक से दो
और दो से चार हुए जा रहे हैं! बहुत नाइंसाफी है यह तो।"
" लाठी देखकर तो भैंसिया भाग जाती है चचा, लड़की
कैसे रुकेगी! आप लोगों में कॉमन सेंस नहीं है यही सबसे बड़ी दिक्कत है। लाठी को ही
संसार समझ पकड़े रहते हो।"
" ठीक है, इस बार ठान लिए
हैं और मान लिए हैं कि गुलाब से बड़ा कोई हथियार नहीं है। "
" वह तो ठीक है चचा, लेकिन तुम्हें किसी लड़की का
जीवन बर्बाद करने की जरूरत क्यों आ पड़ी है!!"
" तुम ही बताओ बचुवा, जिंदगी
भर नफरत ही करते रहें क्या! थोड़ा बहुत प्रेम में हाथ मारने का हमारा मन नहीं हो
सकता है क्या! आखिर हम भी जीवित प्राणी है।"
" वह तो ठीक है पर हमें नहीं लगता चचा कि आपके
लायक कोई मिलेगी। "
" शुभ शुभ बोल बचुवा, प्रेम
की ऋतु है भगवान गधों को भी गधी दे देता है। फिर हम उनसे
गएबीते नहीं है। ठीक बात है कि नहीं?"
" इसका मतलब यह हुआ कि मानोगे नहीं। लेकिन जान
लेओ कि वैलेंटाइन-डे विदेशी कल्चर है। तुमको सूट नहीं करेगा। पचड़े में ना ही पड़ो
तो अच्छा है। "
" देखो सही बात बताएं, सूट
तो हमको लाठी भी नहीं करती है। पर पकड़े हैं कि नहीं। लोग देखते हैं कि आदमी लाठी
को घुमा रहा है पर हकीकत यह है की लाठी ससुरी आदमी को घूमाती रहती है। "
" तो काहे पकड़े रहते हो!! छोड़ दो ना। "
" अब मुश्किल है। लाठी पकड़े पकड़े आदमी खुद लट्ठ
हो जाता है। "
" वही तो कह रहे हैं । इस इमेज के साथ तुम्हें
कोई कैसे मिलेगी। "
" ट्राई कर लेने दो बचुवा, घर
वाले भी अब रोटी नहीं देते हैं। भीख मांग कर खाया तो किसी दिन देश को भुगतना पड़
जाएगा। "
" चलो ठीक है, कर लो मन की । फूल दोगे किसको चचा ? "
" है एक। हमारी तरफ से तो ओके है, समझो आधा काम तो हो गया। अब अगर वह तैयार हो जाए तो काम पूरा। "
" कोई बातचीत हुई अभी तक या नहीं? "
" बातचीत तो नहीं हुई। साला दिमाग में इतने पाठ
भरे पड़े हैं, लेकिन प्रेम का एक भी नहीं। नफरत से
लड़की पट सकती तो हम अब तक लड़ाई जीत चुके होते। बचुआ
अब समझ में आ रहा है कि प्रेम करना नफरत करने से ज्यादा कठिन है। "
" कोई बात नहीं। बढ़िया सा लाल गुलाब लीजिए और
मुस्कुराते हुए पहुंच जाइए। गुड लक । "
" लाल गुलाब नहीं रे! वह तो नेहरू लगते थे,
और फिर लाल तो कम्युनिस्टों का भी है। लाल नहीं ले जाएंगे । आजकल तो
भगवा गुलाब भी मिलने लगे हैं। "
" सफेद ले जाना चचा। भगवा देखकर चची भड़क भी सकती
है। "
" तो फिर पीला ले जाएं क्या। हल्दी की रस्म भी हो जाएगी। "
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