अंडा देने वाली मुर्गी और वोट देने वाली जनता पर बहुत प्यार आता है। लेकिन इंसाफ न मुर्गी के साथ होता है न जनता के साथ। अंडा देती है तभी तक मुर्गी है; अंडा खतम तो मुर्गी हजम। दुनिया का यही दस्तूर है। वोट देने वालों ने दिया, लेने वालों ने लिया, बाद में सब घुसपैठिए!
वोटर की पहचान पहले खतम होती है, नागरिकता बाद में। सरकारी पलटन द्वारा जो वोटर मान लिए गए, समझो वे गंगा नहा गए। गंगा पापियों के पाप धोती है और यही काम वोटर का भी है। दोनों में फर्क यह है कि गंगा आरती रोज होती है, जबकि वोटर की आरती नामांकन भरने के बाद शुरू होती है और मतदान के बाद बंद हो जाती है। बहुरूपिये आते हैं और वोटर के सामने इतना झूठ रोते हैं, इतने आँसू बहाते हैं कि गरीब की पतली दाल को भी पानी-पानी कर देते हैं। वोटर दयालु होता है और अपना पेट काटकर बहुरूपियों का पेट भर देता है। मौका पड़ने पर जो वोटर 'बम्पर' है, गरज निकल जाने के बाद वही मक्खी-मच्छर है। इन दिनों तो 'कॉकरोच' का खिताब देकर बोलने की स्वतंत्रता को सार्थक किया जा रहा है।
सब जानते हैं कि वोटर दो तरह का होता है। आस्थावान वोटर लोकतंत्र का एटीएम (ATM) होता है। वह यंत्रवत वोट करता है और बूथ से बाहर निकलते ही सब भूल जाता है। अमेरिका और जापान अपने तरीके से रोबोट बना रहे हैं, इधर हमारा तरीका अलग है और कारगर भी है। हमारे रोबोटों को अंदर-बाहर का पूरा डाटा पता होता है, इसलिए वे केवल वोट डालते हैं और लीडर नहीं, 'सेवक' चुनते हैं। टोकरी भर मेंढक हों या सेवक, सब एक से दिखाई देते हैं—मानो यूनिफॉर्म पहने हों। मेंढकों की कोई शक्ल-सूरत नहीं होती, उनकी केवल गणना की जा सकती है। मेंढक गीले और सूखे, दोनों वातावरण में रह सकते हैं। कौन-सा मेंढक कब उछलकर किस कीचड़ का हो जाएगा, कोई कह नहीं सकता। लोग जिसे एक पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनते हैं, वह जीतने के बाद किसी दूसरे कोठे पर 'सलामे-इश्क' गाने लगता है। बे-आत्मा टीवी वालियाँ इसे लोकतंत्र की खूबसूरती और आत्मा की आवाज कहती हैं।
लोकतंत्र की निरंतरता बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी है कि प्यारी जनता भुलक्कड़ भी हो। संत कहते हैं कि पिछला भूलो और आगे बढ़ो। ईश्वर भी पिछले जन्म की स्मृतियाँ मिटा देता है ताकि मनुष्य उसमें उलझकर अपना नया जन्म नष्ट न करे। जिन्होंने पिछला याद रखा, उनको दुख के अलावा कुछ नहीं मिला। पिछला याद कर छाती कूटते रहिए, कोई नहीं सुनेगा। भूल-भालकर सुखी रहना खुद जनता के हाथ में है। चोर-लुटेरे तक कह रहे हैं कि लोगों को आत्मनिर्भर बनना चाहिए। भूल जाने की इसी कला के दम पर माना गया है कि राजनीति में कोई स्थाई मित्र या स्थाई शत्रु नहीं होता। जो कल तक फूटी आँख नहीं सुहाते थे, आज आँखों का तारा हो जाते हैं।
अच्छा शासक वही होता है जो इतिहास से घृणा करे—चाहे वह अपना हो या दूसरों का। कुछेक जो याद रखते हैं, वे 'जंगली' कहलाते हैं। हमें लोकतंत्र बचाना है तो लोगों को शिक्षा से भी दूर रखना पड़ेगा। शिक्षा लोकतंत्र के लिए धीमा जहर है। पढ़े-लिखे लोग ज्यादा याद रखते हैं। व्यवस्था वही दीर्घजीवी होती है, जिसमें महत्त्वाकांक्षी बहुत कम और समर्पित लोग अधिक हों।
आमतौर पर शिक्षित व्यक्ति ही बेरोजगार होता है और अपनी आधी-पौन जिंदगी नौकरी के विज्ञापन ढूँढने में बिता देता है। अनपढ़ों को देखिए, उनके लिए कामकाज की कोई सीमा नहीं है। मजे में कुएँ बनाओ, तालाब बनाओ, सड़कें बनाओ, गौशालाएँ बनाओ; मौका मिल जाए तो कार बनाओ, पेट्रोल बनाओ, पुल बनाओ! देश डिग्री नहीं, काम देखता है। पढ़ो मत, डरो मत, मौका निकालो और काम करो!
.jpg)
.jpg)
.jpg)

.jpg)
.jpg)
.jpg)



.webp)
.jpg)
.jpg)
.jpg)


