गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

जब मेहनती मूषक जमीन खोदेंगे


 



जब जहाज डूबता है या युद्ध गले की हड्डी बन जाता है, तो मोटा चूहा पहले भागता है । मीडिया ने यह बात फैला रखी है, लेकिन चूहों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वे अब बदनामी को मस्त ओढ़ते-बिछाते हैं। वैसे भी, जनता अब बदनामी को ही लोकप्रियता मानने लगी है। जानकार बताते हैं कि दुनिया भर में चूहे ही राज कर रहे है। वे ज़माने लद गए जब चूहों को सिर्फ चूहा समझा जाता था । आज के दौर में जब दो चूहे वैश्विक मंच पर मिलते हैं, तो 'कुतरन एग्रीमेंट' पर हस्ताक्षर होते हैं— "तुम मेरे यहाँ कुतरो, मैं तुम्हारे यहाँ कुतरूँगा।" ये समझौते और सहमतियाँ फाइलों में दर्ज होती हैं, क्योंकि जहाँ कुतरने की डील होती है, वहाँ फाइलें अनिवार्य होती हैं।

फाइलों से चूहों का नाता बहुत पुराना है। चूहों के असली नाम कभी सार्वजनिक नहीं होते; बस फाइलें ही उनका 'आधार' जानती हैं। यही फाइलों की असली ताकत है। कुछ फाइलें तो 'नगरवधू' की तरह होती हैं, जिनको  सूंघते हुए चूहे सात समंदर पार से गाते हुए खिंचे चले आते हैं "सलामे इश्क मेरी जान जरा कबूल कर लो, तुम हमको प्यार करवाने की जरा सी भूल कर लो।"  फाइल के करीब आने के बाद देसी और विदेशी चूहों को अहसास होता है कि वे तो 'ब्रदर-इन-आर्म्स' हैं। फाइल के हमाम में सारे नंगू चूहे और नंगू होते हैं। बिल्ली के डर से चूहे फाइलों को इस कदर कुतर देते हैं कि सबूत की  'अस्थियाँ' भी न बचे। जब कभी कोई फाइल बाहर आती है, तो देखने वाले समझ जाते हैं कि चूहों ने अपना मुंह काला कर लिया है। जो मामला वर्षों से टल रहा होता है, वह कुतरी फाइलों के कारण मजे में दबा रह जाता है।

इधर बिल्लियाँ खा-खाकर 'मोटापे' और 'आलस' का शिकार हैं। वे ज्यादातर समय आँखें बंद किए 'सिस्टम' की गोद गरम किये रहती हैं। लोग गोदी मीडिया का आरोप लगाते हैं उन्हें जान कर खुशी होगी कि गोदी सिस्टम भी मौजूद है । बावजूद इसके चूहे अब बिल्ली से नहीं बल्कि फाइलों से डरते हैं। एक चूहा दूसरे को फाइल के हवाले से डराता है, और कुछ बुद्धिजीवी इसी 'डराने-धमकाने' के खेल को राजनीति कह देते हैं। जिसे हम 'दफ्तर' कहते हैं, वह असल में चूहों का 'बैटलफील्ड' है। यहाँ चूहे 'ऑर्गनाइज्ड गैंग' बनाकर कुतरते हैं।

चतुर चूहे बहुत फुर्तीले होते हैं। जब कोई अलमारी खोलता है, तो उसे फाइलें कम और करतूतों की कुतरन ज्यादा मिलती है। फाइलों में कारोबार और लेन-देन का ब्यौरा होता है। ज्यादातर चूहे कारोबार में कम, लेन-देन में ज्यादा यकीन रखते हैं। यदि किसी जहाज में ये चूहे लग जाएँ, तो उसे डुबोकर ही दम लेते हैं। पिछले दिनों एक राज्य में करोड़ों का भारी-भरकम पुल चूहे खा गए और बिल्लियाँ सोती रहीं। हद तो तब हो गई जब जप्त की गई लाखों शराब की बोतलों के ढक्कन कुतरकर चूहे सारी शराब गटक गए और बिल्लियाँ सोती रहीं। अस्पतालों से करोड़ों की दवाएं बॉक्स समेत खा गए और तब भी बिल्लियाँ सोते हुए सबका साथ सबका विकास नामक सपना देखती रहीं । चूहे अब जादूगर हो गए हैं; वे कभी सूट पहनकर, कभी टाई लगा कर तो कभी गलें में दुपट्टे डाल कर आते-जाते हैं। बिल्लियाँ सो रही हैं, इसलिए चूहों को लगता है कि राज उनका ही है। वे मानते हैं कि 'संगठन ही शक्ति' है। अगर वे शक्ति प्रदर्शन पर आ जाएं, तो पूरा शहर कुतर सकते हैं । किसी दिन संगठित चूहे कानून की पूरी किताब को ही कुतरकर कूड़ा कर सकते हैं। जब मेहनती मूषक जमीन खोदेंगे, एक गाँव नहीं, एक शहर नहीं, एक देश नहीं, पूरी दुनिया खोदेंगे ।

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बुधवार, 1 अप्रैल 2026

आउटर पर जिंदगी


 



वीर विक्रम सिंह को लोग 'वीवीएस' के नाम से पुकारते हैं। 65 पार कर रहे वीवीएस को रह-रहकर लगता है कि न जाने इस रात की सुबह होगी या नहीं। 'जिंदगी पानी का बुलबुला है'—अब वे यह जानते हैं। और यह भी कि बुलबुला तो बुलबुला है, बुलबुले का क्या! आजकल काले कपड़े पहनना फैशन है, किंतु काला सूट पहना हर आदमी उन्हें 'यमराज' का दूत मालूम पड़ता है। काले लिबास वालों से निगाहें मिल जाएं, तो उनकी रूह कांप जाती है। मोटी बीमा पॉलिसी अब उन्हें निरर्थक लग रही है। वे जानते हैं कि मरना एक दिन अटल है, पर मन है कि मानता नहीं। जीने की जिद इतनी है कि वह जिंदगी से आगे निकली जा रही है।

उन्होंने अपने लिए कुछ कड़े अनुशासन तय कर लिए हैं; मसलन, कोई काले स्कूटर या बाइक वाला लिफ्ट दे, तो किसी भी सूरत में नहीं बैठना है। फुटपाथ कितना भी चौड़ा और खाली क्यों न हो, हमेशा किनारे-किनारे ही चलना है। एक दिन मुकेश का गाया वह गीत कान में पड़ गया"न हाथी है न घोड़ा है, वहां पैदल ही जाना है..." बस, हफ्ता भर हो गया, वीवीएस मॉर्निंग वॉक पर नहीं निकले।

एक दिन खबर मिली कि पहली गली वाले चंद्रकांत तीसमारे बाथरूम में फिसलकर 'सिधार' गए। कमबख्त बाथरूम न हुआ, दूसरी दुनिया का 'वेलकम गेट' हो गया! तब से छोटी-मोटी हाजत को भी वे तब तक दबाए बैठे रहते हैं, जब तक कि वह दबाव मौत के डर के बराबर न हो जाए। वे अक्सर सोचते हैं कि पुराने लोग जो लोटा लेकर जंगल की ओर दौड़ते थे, वही ठीक था। पाँच-दस मच्छर जरूर काटते होंगे, पर कम से कम जान का खतरा तो नहीं था। पास में नगर निगम का पार्क है, वहाँ गुंजाइश निकल सकती है, लेकिन मजबूरी है— 'कमोड' की आदत जो है। उनके भीतर यह विचार गहराता जा रहा है कि आधुनिक सुविधाएं और विकास ही आदमी को यमराज के करीब ले जा रहे हैं।

अखबार खोलते ही वीवीएस फ्रंट पेज की हेडलाइन्स छोड़कर सबसे पहले 'शोक समाचार' वाला पृष्ठ पढ़ते हैंकौन-कौन गया! आसपास के साठ-पैंसठ पार वालों को अब वे बड़ी गौर से देखते हैं कि पता नहीं, ये कल मिलेंगे या नहीं? मन ही मन अटकलें लगाते— "लगता तो ठीक है, जरूर शिलाजीत खाता होगा। लेकिन कमबख्त हार्ट-अटैक तो आजकल किसी को भी आए जा रहा है!" जवानी के दिनों से ही वे अपने दिल को काबू नहीं कर पाए, अब उसमें दो 'स्प्रिंग' (स्टेंट) डली हुई हैं। उन्हें लगता है कि इस दिल से बड़ा धोखेबाज कोई दूसरा संसार में नहीं है।

आज वे सोच रहे हैं कि उन्हें भी कुछ करना चाहिए। शिलाजीत न सही, च्यवनप्राश लेने में क्या हर्ज है? सुना है दिल के मामलों में हकीमी नुस्खे भी बड़े कारगर होते हैं, पर सनातनी मन नहीं मानता। आयुर्वेदिक रसायन जो कभी राजा-रजवाड़े लिया करते थे, अब संत-महात्मा, तांत्रिक और मंत्री-वंत्री ले रहे हैं। सच तो यह है कि अय्याशियाँ केवल हाड़-मांस के बल पर संभव नहीं! फिर सोचते हैं— "छोड़ो यार, अपने से नहीं होगा। इतने महंगे रसायन मेहनत की कमाई से तो खरीदे नहीं जा सकते।" कहीं पढ़ा था कि खाली पेट लहसुन की दो कलियाँ खाने से दिल मजबूत होता है। वही ठीक है, दवाओं के पचड़े में कौन पड़े? जिंदगी कीमती है, पर इस महंगाई में 'बजट' भी तो देखना पड़ता है। कबीर कह गए हैं'पीर मरीहैं पैगम्बर मरीहैं, मरिहैं जिन्दा जोगी; राजा मरीहैं परजा मरिहैं, मरिहैं बैध और रोगी।'  लेकिन उनके भीतर बैठा कोई जिद्दी जीव कहता है— "भले सब मरें, बस हम बचे रहें।"

जैसे-जैसे स्टेशन करीब आता है, बोगी के सवार अपना फैला हुआ सामान समेटने लगते हैं। कोई कहता है— "आ गया", दूसरा टोकता है— "अभी देर है", तीसरा ज्ञान देता है— "ट्रेन आउटर पर बहुत देर खड़ी रहती है।" वीवीएस की नींद भी बिना किसी अलार्म के सुबह 5:30 बजे खुल जाती है। सुबह का सपना अभी भी दिमाग में गूँज रहा है— "ट्रेन आउटर पर खड़ी रहती है, उसके बाद स्टेशन आएगा।" मॉर्निंग वॉक तो कर रहे हैं, पर लग रहा है जैसे 'आउटर' पर टहल रहे हों। दुनिया में आने वाला बच्चा भी नौ महीने आउटर पर ही होता है, शायद जाने वाले के लिए भी यह 'आउटर सिस्टम' हो। इस रिसती हुई जिंदगी को थामे रखना भी तो पुरुषार्थ है! अंदर से आवाज आती है— "वॉक से कुछ नहीं होगा, डॉक्टर कहते हैं तेज चलो।" अब वे तेज चल रहे हैं, साँसें खींच-खींच कर ले रहे हैं, मानो पीछे यमराज का भैंसा रस्सी तुड़ाकर दौड़ा आ रहा हो। जरा धीमे हुए नहीं कि उसने दबोचा!

जान सबको प्यारी है, भले ही पता हो कि अब जिंदा रहकर कौन से झंडे गाड़ लेंगे? राजनीति में होते तो समझ आता कि 'कुछ' कर लेंगे। वहाँ तो पिचहत्तर पार वाला भी फावड़े से 'माल' खींच लेता है। लेकिन साधारण नौकरी से रिटायर होने वाला व्यक्ति महज एक 'बॉडी' बनकर रह जाता है। खाने की प्लेट छोटी होती जा रही है; भोजन कम, दवाएँ ज्यादा हो रही हैं। कल की उम्मीद में आज सजा पा रहा है। जानकार कहते हैं— "कम खाओ, आधा पेट खाओ।" यह सुनकर घरवाले प्रसन्न होते हैं, लेकिन बुढ़ापे की चटोरी जुबान अक्सर विद्रोह कर देती है।

अब उन्हें खाना 'रातिब' की तरह मिलने लगा है। (रातिब समझते हैं न? बँधा-बँधाया नपा-तुला भोजन)। हिदायत है कि— "लंबा जीना है तो प्यारेलाल, खिचड़ी खाओ। नमक कम, तेल-घी बंद, मीठा वर्जित, तला-भुना जहर है।" उन्हें लगता है कि जब इतनी पाबंदियाँ हैं, तो जीने का हासिल क्या है? इस चटोरे संसार में भला खिचड़ी खा-खा कर कौन जीना चाहेगा? मौका पाकर जब वे किचन में घुसते हैं, तो हवाएँ मुखबिरी करने लगती हैं, दीवारें चीख पड़ती हैं— "क्या चाहिए? क्यों आए हो?" अगर भूल से कह दिया कि "जरा सा घी-गुड़ लेना था", तो समझो मुफ्त की नसीहतों की बौछार शुरू। ऐसे में वीवीएस अनुभवी की तरह बात पलट देते हैं— "कुछ नहीं जी, बस दो लौंग लेनी थी, जरा आप ही दे दो।"

एक पांडे जी हैं, डरे-डरे से। हाल ही में पैंसठ पार हुए, तो खास दोस्तों ने पट्टी पढ़ाई— "गोश्त खाओगे तो सेहत बनी रहेगी। जान है तो जहान है।" पांडे जी और डर गए। उन्हें 'घास-फूस' की तरह फुर्र से जल मरने की कल्पना से ही डर लगने लगा। सोचने लगे— "जान ही नहीं रही तो धर्म का क्या करेंगे? और अब यह धर्म है भी कितने दिन का? अगले जन्म में क्या पता किस धर्म में पैदा हों, क्या पता कसाई के घर ही जन्म हो जाए!" जैसे सब्जी वाला शाम को घर लौटते समय दाम की परवाह नहीं करता, वैसे ही जब हमें भी 'घर' ही जाना है, तो मीठा-फीका क्या और वेज-नॉनवेज क्या!

लेकिन 'गोश्त' से पहले 'होश' पर पहरे बिठाने होंगे। पीने और खाने का मामला इतना आसान नहीं कि मुँह खोला और गटक लिया। पांडे जी अभी भी इसी द्वंद्व में हैं। सच है, आखिरी किस्तें अक्सर थकाऊ हो जाती हैंचाहे बैंक की हों या जिंदगी की।

इधर खाकसार के हाल जुदा नहीं हैं। सनातनी रिवाज के अनुसार तो संन्यास आश्रम में चले जाना चाहिए। सोचता हूँ तो पता चलता है कि जिंदगी के अलावा सब छोड़ते चले जाना ही संन्यास है। बड़ा कठिन है, जिन चीजों से जिंदगी है उन्हें कौन छोड़ेगा! पुराने लोगों के पास जिम्मेदारियों के अलावा कुछ खास था नहीं छोड़ने के लिए, तो वे छोड़ देते थे। लता मंगेशकर गा रही हैंसंसार से भागे फिरते हो, भगवान को क्या पाओगे। इस लोक को अपना न सके, उस लोक में भी पछताओगे।

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गुरुवार, 26 मार्च 2026

एक सायकिल का मोक्ष


 

 

माखन सिंग के अंगम में सायकिल रखी थी । सायकिल रखने का स्थान सुनिश्चित है । जबसे आई है यानी करीब पचास सालों से वह इसी जगह पर खड़ी रहती है । इतने बरसों में न माखन सिंह की नेमप्लेट की जगह बदली और न सायकिल की । आज दोपहर की बात है, खाना खा कर माखन सिंह लेटने वाले थे कि हाजत महसूस हो गई । हाथ में लिया हुआ टावेल सायकिल पर रखा और संडास में चले गए । लौटे तो देखा सायकिल गायब है ! माखन सिंह के हाथ से तोते उड़ गए । तुरंत मुँह धोया, पानी के छींटे मारे और आँखें फाड़ कर उस जगह को देखा जहाँ कुछ क्षणों पहले तक सायकिल मौजूद थी । आँगन से सायकिल ऐसे निकाल गई जैसे शरीर से आत्मा निकाल जाती है । पता ही नहीं चला ! बाप रे ! इतना विकास हो जाएगा ये तो सोच ही नहीं था । चोरियाँ ऐसे होने लगी हैं जैसे सरकारी खजाना हो, उठाओ और चल दो ! न पुलिस का डर, न कानून का और न ही सरकार का ! हर कोई तिलक लगाए, हाथों पर धार्मिक धागा बंधे घूम रहा है तो कम से कम पाप-पुण्य का विचार होना ही चाहिए ! ज्ञानी कह गए हैं “इस दुनिया में सब चोर, कोई छोटा चोर कोई बड़ा चोर ... “  सुना  है चोरों में व्यावहारिक समाजवाद होता है । लेकिन एक सायकिल से किस किस को कितना हिस्सा मिल पाएगा । क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा !

पुराने समय में भी एक से एक चोरियाँ होती थीं । नाम चलता था चोरों का । चौपालों पर चोरियों के किस्से सुनाए जाते थे । एक कला चोर था, कहते हैं वह आँखों से काजल भी चुरा ले जाता था । राजकुमारी तक उसपे फ़िदा थी । बगदाद का चोर, अलीबाबा चालीस चोर, चतुर चोर की कहानी, चोर मचाए शोर, बाम्बे का चोर वगैरह । जानकार बताते हैं कि पुराने समय में चोरी कुछ ही लोग किया करते थे । जैसे जैसे सभ्यता का विकास हुआ चोरी की कला नीचे से ऊपर जाने लगी । अब तो बैंक से मस्त लोन लो और मजे में विदेश भाग जाओ । लोन ले कर भागना एक बड़ा उद्योग है । विदेश में बैठ कर जाम दिखते हुए मुँह चिढ़ाने का अपना ही सुख है । इन लोगों के कारण लोकल पुलिस छोटे चोरों को गंभीरता से नहीं ले पाती है । थाने में बैठे सिपाहियों को पजल गेम खेलना पड़ता है । चोर के आगे दो चोर, चोर के पीछे दो चोर, आगे चोर पीछे चोर, बताओ कुल कितने  चोर ?

यही सब देख सोच कर माखन सिंग को कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी । उनकी सायकिल कोई मामूली सायकिल नहीं थी । चालीस साल पहले उन्हें बाकायदा तब मिली थी जब वे दूल्हा बने बरातियों के साथ पहली बार ससुराल में खाना खाने बैठे थे । ससुर जी ने खवाई में घंटी डायनमा लगी सायकिल दिखते हुए हाथ जोड़ कर कहा था – खाना खाओ बेटा, ये हरकुलिस सायकिल आपके लिए है । बगल में बैठे चाचा बोले – दूल्हा नहीं खाएगा । दोनों पहियों में पचरंगी गजरे तो डाले ही नहीं हैं ! इसके बाद कैसी तो दौड़भाग मची थी । आनन फानन में गजरे लाए गए और चाचा से रंग पसंद करवा के पहियों में लगाए गए । चाचा ने धीरे से कहा – अब खाओ बेटा, गजरे लगाव दिए हैं हमने । लेकिन माखन सिंग नहीं माने, बोले -  पहले घंटी और डायनमा चेक करा दीजिए, काम कर रहे हैं या नहीं ।  चाचा ने घंटी बजाई थी तीन चार बार । माखन सिंग के अंदर कहाँ कहाँ घंटी बज उठी थी उन्हें आज भी याद है । पैदल मार कर डायनमा भी चेक किया, बराबर है । चाचा ने इस बार पीठ पर हाथ रखते हुए कहा – सब ठीक है, खाओ बेटा । और दूल्हे सहित पूरी बारात ने कहना शुरू किया । माखन सिंग का सपना पूरा हो गया । उस जमाने में इस एकमात्र मौके पर दूल्हों को बस यही चाहिए होता था ।

समय के साथ सायकिल के पुर्जे बदलते गए । जैसे हमारा शरीर सेल्स से बना होता है । सेल्स मरते रहते है, उनकी जगह नए सेल्स लेते जाते हैं । डाक्टर बताते हैं आठ दस साल में अमर शरीर पूरा बदल जाता है । समय के साथ माखन सिंग की सायकिल भी पूरी बदल गई । पाँच साल पहले फ्रेम भी बदलवा ली थी । तकनीकि रूप से देखा जाए तो अब वो सायकिल संसार में नहीं थी जो ससुराल से मिली थी । इस भावना के कारण माखन सिंग सायकिल से पहले जैसा प्रेम नहीं कर पा रहे थे । चाचा ने सुना तो बोले – बूढ़े हो गए हो पर बचपना नहीं गया तुम्हारा । अरे नेहरू जी नहीं हैं तो क्या संसद नहीं है !? चलाते रहो जैसी चले । ... और माखन सिंग ने उस दिन शाम को पत्नी से कहा – तुम बहुत दिनों से पोपला मुँह लिए हो । कल चलना नई बत्तीसी लगवा लेंगे ।

दो दिन बाद चाचा आए, बोले – का माखन ! ... ये क्या सुन रए हें हम !! सायकिल चोरी चली गई !... थाने में रपट लिखाए हो या नहीं ?

“तो कहना था ना कि ससुराल से मिली है खवाई में ।“

“कहा था .... बोलता है दहेज का केस बन सकता है ।“

“फिर !?”

“ फिर क्या .... अब दहेज का केस नहीं बनाने का पैसा माँग रहा है ... रिश्वत ।“

“ये तो लेने के देने पड़ गए !!”

“लेना किससे है, देना ही पड़ेंगे ।“

“ऐसे नहीं चलेगा, उनके पास क्या सबूत है कि दहेज लिया था ।“ चाचा वकील बने ।

“ सबूत का ही तो पेंच है । सिपाही पूछता है कि सायकिल चोरी हुई इसका क्या सबूत है !”

“अरे !! ....  फिर क्या सोचा है ?”

“ अब क्या सोचें ... ससुर सिधार गए हैं नहीं तो उनसे दूसरी माँगते ।“

“सालों से माँग लो । दे नहीं सकते क्या !”

“बात हुई थी उनसे भी । बोलते हैं वही वाली पुरानी दे जाओ और नई ले जाओ । ... चाचा फँस गए हम तो !”

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ईमानदारी से बचो


 


जैसे ही पता चलता है कि कोई आदमी सच्चा और ईमानदार है तो लोग ऐसे आँखें फाड़ कर देखते हैं मानो किसी एलियन की बात हो रही हो । जो सैकड़ों जुमलों और हजारों झूठ पर पर भरोसा कर लेते हैं उन्हें एक छोटे से सच को पचाने में स्कूल के दिन याद आ जाते हैं । हाँ साहब, हमारे एक टीचर थे कालूराम मालवी । बड़े ईमानदार थे । ज्ञान बहुत था, पढ़ाते अच्छा थे । फटी चप्पल पहन कर स्कूल आते थे । कपड़े इतने सलीके से पहनते थे कि फटा या रफ़ू किसी को दिखता नहीं था । सुना था कि काली चाय में नामक डाल कर पीते थे । उन्हें  कभी टिफिन लाते नहीं देखा, चूना-तंबाकू की डिब्बी जरूर रखते थे । जब कभी भूख लगती थी तो तंबाकू मसल कर दबा लेते थे । मुँह को चबाने का सुख मिल जाता था, भूख लजा कर रह जाती थी । अब न वो समय है और ना वैसे लोग । सरकार ने भी मुफ़्त अनाज दे दे कर किसी को ईमानदार नहीं रहने दिया । भगवान तो ऊपर से हर आदमी को कालूराम बना कर ही भेजता है, लेकिन सिस्टम उसे चालूराम बना देता है ।

कल्पना कीजिए अगर देश में सारे लोग सच्चे और ईमानदार हो जाएं तो !? चालूराम बोले - राजनीति में कौन जाएगा ! सरकार कैसे बनेगी ! सोचिए जरा इस बुरी अवस्था में कोई ईमानदार प्रधानमंत्री लाल किले से कितने सेकेंड सच बोल पाएगा ! तमाम मंत्री जनता को अपना और सरकार का सच बताएंगे तो क्या वो जीत पाएंगे ! ऊपर से नीचे तक सच्चे और ईमानदार लोग भरे होंगे तो मंत्रालयों और दूसरे दफ्तरों का क्या होगा ! पुलिस थानों में तो ईमानदारी मानो कुर्सी पर रखे अंगारे होंगे । जो बैठेगा उसकी जल जाएगी । ईमानदारी से न अस्पताल चल पाएंगे ना ही प्रायवेट स्कूल । अभी तो टीवी और अखबार जमाने भर के विज्ञापनों से भरे रहते हैं । अगर विज्ञापनों में प्रोडक्ट का सच बताएंगे तो बिक पाएंगे क्या ! बाजार की जान झूठ में बसती है । सदी के नायक अभी जो समान बेच रहे हैं, ईमानदारी और सच के साथ खुद ठंडे और कूल नहीं हो जाएंगे ! सुबह सुबह ग्रहणियों को ताजी सब्जियों का सच बरदाश्त हो पाएगा ? देर से लौटे मियाँ सच के साथ घर में घुस पाएंगे ! हर सवाल जवाब है नहीं ।

बात साफ है कि सभ्य समाज में सच्चाई और ईमानदारी सबसे बड़ा अवगुण है । देश के स्तर पर देखें तो ईमानदारी विकास में बाधक है । लोगों से ही पूछा जाए कि उन्हें विकास चाहिए या ईमानदारी ? तुरंत मुख्यधारा का पता चल जाएगा । यही कारण है कि हमारे यहाँ कोई कालूराम किसी का आदर्श नहीं है । कालूराम हापुस आम की तरह सीजन पर आते हैं और हम उन्हें चूस कर फैंक देते हैं ।

बेईमानी शब्द किसे अच्छा लगेगा ! हम चाहे न हों पर ईमानदार ही कहलाना चाहेंगे । अच्छे शब्दों का बड़ा महत्व होता है, ईमानदारी का भी है ही । शुद्ध सोने से गहने नहीं बनते हैं । उसमें तांबा मिलाना जरूरी होता है, पचासों टांके लगाना भी जरूरी होता है । मिलावट के साथ ईमानदारी भी गहना है । पानी में यूरिया और केमिकल डाल बना दो तो वह दूध के नाम पर ही बिकता है । दूध वाला कहता है – भले ही पानी मिला है पर मैं ईमानदारी से भैंस का दूध दे रहा हूँ । ये नए जमाने की ईमानदारी है । दफ़तर में अफसर बाबू पैसा ले कर यदि काम कर दें तो यह ईमानदारी है । चुनाव के समय वोटर जिस पार्टी से दारू और नगदी ले ले और उसी को वोट दे दे तो वह ईमानदार है । पुल या सड़क बनाने वाला ठेकेदार तीस प्रतिशत मंत्री को दे दे तो पुल टूटने के बावजूद वह सच्चा और ईमानदार है । क्या सभ्यता को इस बात की जरूरत है कि अब झूठ को मुख विलास और बेईमानी को चरित्र विलास कहते हुए गरिमा का सृजन किया जाए !

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युद्ध, शेयर मार्केट और हमारा चिंटू


 



 जब से युद्ध शुरू हुआ है शेयर मार्केट जीवियों का दिल धकाधक हो रहा है। जो इस धंधे के कीड़े हैं वह भी हाथ पैर हाथ धरे बैठे हैं । कीड़े चाहे राजनीति के हों चाहे धर्म के, वे मजबूत स्थिति में होते हैं। अपने मनीराम तिजोरी शेयर मार्केट में तितली या भौरे की हैसियत से हैं। मतलब जब भी कोई फूल खिला देखते हैं तो उसका रस चाट कर अलग हो जाते हैं । कहते हैं कि युद्ध के करण शेयर बाजार लगातार लुढ़क रहा है। मनीराम तिजोरी को यही चिंता खाए जा रही है कि बाजार लीधक रहा है। युद्ध में लोग मर रहे हैं, शहर तबाह हो रहे हैं । लेकिन जानों की कीमत से बाजार को क्या, शेयर्स की कीमत नहीं गिरना चाहिए। उधर मिसाइल चलती है और इधर शेयर फट्ट से गिर पड़ते हैं। दुखी मनीराम बोले -- शेयर बाजार बड़ा ही संवेदनशील है। जरा सी फाँ-फूँ या धाँ-धूँ से हिल जाता है। संवेदनशीलता कहीं की भी हो अच्छी नहीं होती है।

" हाँ, जहां भी संवेदनशीलता होती है पुलिस को गश्त लगाते रहना पड़ता है।" दीनानाथ बोले।

" अरे हम शेयर मार्केट की बात कर रहे हैं।... आदमियों के लिए तो डॉक्टर है अस्पताल है। शेयरों के लिए कुछ भी नहीं है। पिछले कई महीनों से मार्केट उछल रहा था। युद्ध शुरू हुआ तो धड़ाम से गिर गया!! "

" यार उछल कूद में थोड़ा बहुत गिरना पड़ना तो चलता है। हमारा चिंटू रोज गिरता पड़ता रहता है लेकिन उसकी उछल कूद बंद नहीं होती है। " दीनानाथ फिर आउट ऑफ़ कोर्स बोले।

" आप समझ नहीं रहे हैं दीनानाथ जी,  चिंटू अपनी मौज में उछलता है। शेयर बाजार बाहरी कारणों से उछलता और गिरता है।  दोनों में अंतर है। "

" वही तो कह रहा हूं चिंटू आत्मनिर्भर है। मन हुआ तो उछल लिए नहीं हुआ तो नहीं उछले । प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर होने के लिए कहा है, तो शेयर मार्केट को भी हो जाना चाहिए। हमारा चिंटू तो हो गया।"

" शेयर बाजार का मामला चिंटू से अलग है आप समझते क्यों नहीं। दुनिया में शांति हो तब शेयर मार्केट अच्छा चलता है वरना गिरने लगता है। कभी-कभी तो टूट कर बिखर जाता है। " मनीराम बोले।

" पिछली बार जब शांति थी तब तो आप कह रहे थे कि बाजार ठंडा है!! फ्रिज में रखा था क्या!? "

" ऐसा नहीं है यार। शेयर मार्केट में  'बुल ' होते हैं। वे लोग बाजार को उठाते गिराते रहते हैं तो बाजार ठंडा गरम होने लगता है। "

" युद्ध काल में गिर जाता है!! शांति काल में ठंडा गर्म होता है!! यह कोई बुखार होगा इलाज कराओ इसका। हमारे चिंटू को बुखार होता है तो हम फौरन डाक्टर को दिखते हैं ।"

" शेयर बाजार का इलाज नहीं होता दादा दीनानाथ। यो समझिए कि इलाज आदमी का होता है थर्मामीटर का नहीं। "

" पहले बताना था कि शेयर मार्केट एक थर्मामीटर है। तो इस थर्मामीटर के लिए आप क्यों चिंतित होते रहते हो! मुझे लगता है कि आप ही बीमार हो। इलाज कराओ अपना जल्दी से। "

" छोड़िए दीनानाथ जी, शेयर मार्केट के बारे में आप कुछ समझ नहीं सकेंगे। आप सब्जी मार्केट देखते हैं और समझते हैं यही बहुत है। "

" अरे सब्जी मार्केट की अच्छी कही यार। वहां  'बुल ' यानी सांड घुसता है तो लोग डंडा मार कर भगा देते हैं। सुना है शेयर मार्केट में बियर और पिग भी होते हैं!? डंडा ले कर जय करो शेयर मार्केट में । "

" अरे क्या बताएं आपको ! बुल, बीयर और पिग, यही सब लोग खेल करते हैं मार्केट में। "

" अभी तो आप कह रहे थे कि युद्ध के कारण मार्केट धंस गया है !!"

" धंसा नहीं है... गिरा है, लुढ़का है। "

" पहले तय कर लो कि गिरा है या लुढ़का है। हमारा चिंटू .... "

" अब मुझे शुतुरमुर्ग हो जाना चाहिए। शेयर मार्केट में चतुर सियार खास मौकों पर शुतुरमुर्ग हो जाते हैं। " मनीराम बोले।

" सियार और शुतुरमुर्ग भी!!... मनीराम तुम शेयर मार्केट में काम करते हो या चिड़ियाघर में !?"

 

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रविवार, 8 मार्च 2026

अभी भी वक्त है चोर के हाथ में दे दो चाबी







" हम तो पहले ही कह रहे थे कि युद्ध होगा। पर किसीने हमारी बात पर ध्यान ही नहीं दिया। " उस्ताद ने बैठते ही अपने दावे को शिकायत के साथ पुनः पेश किया। 

" अरे हम ये थोड़ी जानते थे कि आप जानते हैं! आप तो यह बताओ कि अब आगे क्या होगा? " चेले ने शिकायत को किनारे कर नए दावे का रास्ता साफ किया। 

" आगे का भी पूरा पता है हमें। युद्ध चल रहा है चलता रहेगा, बम गिराए जाएंगे शहर बर्बाद होंगे, लोग मरेंगे, टीवी वाले चीखेंगे नेता लोग चुप्पी रखेंगे और क्या। "

" अच्छा!! युद्ध में ऐसा होता है क्या!!" 

"और नहीं तो क्या! समझदार आपकी तरह हंसी नहीं उड़ाते हैं। ज्ञान मिल जाए तो खुद सावधान हो जाते हैं। "

" आप सावधान हो गए क्या उस्ताद ? "

" हां, हो गए।... हमारी गाड़ियों में पेट्रोल भरा लिया है फुल-टेंक, दो तीन केन भर भी ली हैं । घर में राशन भर लिया है छः महीने का। गैस की दो टंकी एक्स्ट्रा भर ली है। जरूरी दवाएं भर ली हैं। मिल्क पावडर और घी भर लिया है। साबुन-सोडा, मच्छर अगरबत्ती वगैरा भी भर लिए हैं।"

" बिजली-पानी भी भर लेते। "

" पानी तो भर लिया है। नगर निगम से दो टैंकर डलवा लिए हैं टंकी में। हमारी तो टंकी बड़ी है ना, फुल भर ली है। हम बहुत आगे का सोच कर चलते हैं। 

"बिजली रह गई होगी?" चेले ने चटकी ली।

" बिजली की भर सकते तो भर ही लेते। फिर भी टॉर्च और सेल भर लिए हैं। दो तीन दर्जन पैकेट मोमबत्ती के भी भर लिए हैं। "

" मतलब चार-पांच महीने का इंतजाम हो गया है। "

" इतना तो चलेगा युद्ध। हमें तो पता है ट्रम्प की मानसिकता। इंग्लिस अख़बार पढ़ते हैं हम तो।" 

" सुना है कि इंग्लिश अखबार में ऐसा आ रहा है कि ट्रम्प मान जाएंगे और युद्ध लम्बा नहीं करेंगे।"

" हां हां ऐसा भी हो सकता है। सामने वाला मान जाएगा तो ट्रम्प क्यों लड़ेगा। "

" कौन सामने वाला?... ईरान? "

" ईरान नहीं नोबल वाले।... एक जरा से नोबेल के लिए देख लो कितनी जानें चली गई,  कितने बसे हुए शहर उजड़ गए!" उस्ताद ने करुणा से भरा डब्बा खोला। 

" हां यह बात तो सही है आपकी। ट्रंप को नोबल दे देना चाहिए था। "

" दे देते तो वह दो साल तक नोबेल पहने आईने के सामने से नहीं हटता। अभी भी वक्त है, दे देना चाहिए फटाफट। रूस और चीन अगर युद्ध में उतर गए तो सालों तक चलेगा युद्ध। "

" सालों तक कैसे चलेगा!! इंग्लिस अखबार तो कह रहे हैं कि ट्रंप दोबारा चुना नहीं जाएगा। " चेले ने चमक बताई।

" चलो मान लिया, अगर दूसरा प्रेजिडेंट आया और वह भी नोबेल  के लिए जिद्दी हो गया तो क्या होगा!"

" बात सही है। समय आ गया है कि हर साल दो-चार नोबेल शांति बनाए रखने के लिए सनकियों को देना चाहिए। वैसे कितने का पड़ता होगा एक नोबेल! "

" छोटा सा होता है। बड़े गोल सिक्के जैसा।... एक मशीनगन से भी कम का पड़ता होगा।"

" अरे नहीं इतना सस्ता थोड़ी होगा। "

" एक टैंक से तो सस्ता होगा ना। युद्ध में कितने टैंक, कितने फाइटर प्लेन, कितने जहाज, कितने शहर नष्ट हो जाते हैं!" 

" लोग भी तो मरते हैं। "

" अरे लोगों का क्या है लोग तो मरने के लिए ही पैदा होते हैं। युद्ध नहीं हुआ तो नहीं मरेंगे क्या?! आया है सो जाएगा, राजा रंक फकीर।" उस्ताद थोड़ा निर्ममता कि ओर मुड़े। 

" लोग मरने के लिए ही पैदा होते हैं तो फिर आपने इतना सारा सामान क्यों भर लिया!! जबकि अपने यहाँ तो युद्ध भी नहीं हो रहा है। "

" चेला हो चेला ही रहो समझे।... जो भी भरा है जीने के लिए भरा है। मरते तो सब है लेकिन बचते वही हैं जो सावधान रहते हैं। "

" आपने तो बहुत कुछ भर लिया है, अगर हमें जरूरत पड़ी तो थोड़ा बहुत दे दोगे ना? "

" अजीब ट्रमपिये हो यार! मांगने से नोबेल नहीं मिलता है !  हम सामान कैसे दे देंगे!!"


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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

भाँग की तरंग और नंगे आदमी से होली

 


 

गनेसी काका कल शाम से ही छान रहे थे । समझे नहीं क्या !? भाई भँगेड़ी लोग भाँग पीने को भाँग छानना कहते है । मंडली में सभी ने छान रखी है । मस्ती का आलम है । सब हवा में उड़ रहे हैं । भाँग छाने आदमी को लगता


है कि वो हल्का हो गया है और हवा में उड़ रहा है । ये भाँग के नशे की विशेषता है । बिना पासपोर्ट हवाई यात्रा करना हो तो मौका मत चूकना, लपक के छान लेना । होली पर तो दस्तूर भी है । हाँ तो गनेसी ज्यादा ऊंचाई पर उड़ रहे हैं । बोले - हम जा रहे हैं संजीवनी पर्वत से जड़ी बूटी लेने । कोई पीछे मत आना, सीक्रेट मिशन है ।  

“अरे किसके लिए संजीवनी बूटी लेने जा रहे हो काका !?” एक पट्ठे ने पूछा ।

“बब्बा आरामदेव के लिए । लेकिन मिशन सीक्रेट है ।“

“उनको किसने तीर मार दिया ! बेहोस पड़े हैं क्या ?!”

“बेहोश नहीं हैं । नया हेल्थ टॉनिक बनाना है, संजीवनीप्राश । जो खाएगा अमर हो जाएगा ।“

“काका तुम भी सठिया गए हो । इतनी महँगाई में क्या करोगे अमर होके !?”

“हम अपने लिए नहीं कुछ नहीं चाहते हैं । सरकार के लोग, मंत्री लोग, अफसर लोग, सिस्टम के लोग अमर हो जाएं तो चुनाव का झंझट ही खत्म हो । जो जिस कुर्सी पर बैठ हो वह सदियों तक बैठ रहे । मजे में राज करो ।“

“और जनता का क्या ? काका रुक जाओ । ये नहीं होने देंगे हम ।“ सारे पट्ठे गनेसी काका को पकड़ कर खींचते हैं और दबोच लेते हैं । भाँग के बाद रबड़ी ऑक्सीजन का काम करती है । काका को कटोरा भर रबड़ी पीला दी जाती है ।

मीठे से भाँग ने और जोर मारा । काका अगली पायदान पर पहुँच गए, बोले - “बुलाओ रे ससुरे टम्प को, उसी से होली खेलेंगे। टेरीफ़ टेरीफ़ बोल के बहुतै रंगबाज़ी मचा रखी है दुनिया भर में। बिना भाँग के इतना पगलाता है ! समझते में नहीं आता है कि अन्नानास है या अंगूर, रतालू कहीं का । .... फोन लगाओ और बोलो कि फौरन आए काका होली खेलेंगे ।“

दो तीन लोग फोन लगते हैं । एक बोल  - लग गया काका, तुम बात करो ।

“हैलो, आजा टॅम्पू अपन होली खेलेंगे । हाँ हाँ रंग लगाएंगे । ...  अबे तुम लगाओगे पचास परसेंट तो हम भी लगाएंगे पचास परसेंट । बराबरी से चलेगा, ... होली बिजनेस नहीं है । होली युद्ध भी नहीं है । होली पर बड़ा छोटा कोई नहीं होता है । ... ... ठीक है आजा जल्दी से ।“

“क्या हुआ काका ?!”

“आ रहा है । कह रहा था मैं पचास परसेंट रंग लगाऊँगा तुम जीरो परसेंट लगाना । ... हमें बेवकूफ समझता है लंगूर कहीं का । होली खेल रहे हैं कोई मजाक नहीं कर रहे हैं । ... आएगा तब बताएंगे ।“

“वो टम्प है काका । क्या करने का सोच रहे हो ?”  

गनेसी काका गंभीर हो गए , बोले - “वो आए उससे पहले दो ट्राली गोबर ले आओ जरा। वो टेरीफ का कीचड़ लगाता है हम गोबर नहीं लगा सकते क्या!! पहले गोमूत्र वाली भाँग पिलाएंगे ससुरे को। जब चढ़ जाएगी तो बरसाने की लट्ठमार होली में ले जाएंगे। मार मार के बैठक लाल न कर दी तो लठ वाली मथुरानियों का नाम नहीं। उसे साफ बता देंगे कि होली पर बुरा मानना मना है।“

“फिर भी बुरा मान जाएगा काका ।“

“नहीं मानेगा, कह देंगे कि शांति से रंगवा लोगे तो हाथोंहाथ नोबल दे देंगे । रखा है घर में ।“

“बड़ी तेज चलती है काका तुम्हारी खोपड़ी ! “

 “पट्ठे तुम उसके कपड़े उतर देना फट्ट से,  हम गोरे को पंचरंगी कर देंगे।“

 कपड़े उतारने की क्या जरूरत है काका । उसका नाम एपीस्टीन फाइल में दर्ज है।“

“फिर क्या करें  ?”

“हम तो कहते हैं जाने दो काका । नंगे आदमी से भगवान भी डरता है। अगली होली पर देखेंगे ।“  कहते हुए पट्ठे ने एक गिलास और भरा काका के लिए ।

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रंगों से छुप जाते हैं सारे ऐब



जो नहीं जानते हैं वो जान लें कि हम राजनीतिक टेक्नोलोजी से समृद्ध  हैं ।  जो कुछ भी ब्लेक एंड व्हाइट था अब रंगीन हो चुका है ।  रंग सारे ऐब छुपा लेते हैं। शिकायतें ब्यूटी पार्लर में जा कर हसीन हो जाती हैं। पहले बदनाम थी अब रंगबाजी सफलता है। दुर्घटना के बाद सड़क पर पड़े घायल का रंगीन विडिओ कमाई करता है। पुरानी सोच ने होली को गरीबों का त्योहार मान रखा था ।  जब दुनिया करोड़ों भारतियों को होली खेलते देखती थी तो माना जाता था कि भारत में गरीबी बहुत है


।  अब तय किया गया है कि होली की ब्रांडिंग अमीरों के त्योहार के रूप में की जाएगी ।  टीवी मिडिया को कह दिया गया है कि बड़े बड़े उधोगपतियों, व्यापारियों, दलालों, फिल्म स्टारों, सम्मानित घूसखोरों, जेल में बंद संतों वगैरह को मस्त होली खेलते दिखाए ।  बैंकों को भी निर्देश दे दिए हैं कि वे करोड़ों के रंग-लोन इन्हें दनादन दें, ताकि इस तबके की रंगबाजी को सम्मानजनक उड़ान मिले ।  होली के जरिये विदेशों में हमारी छबि 'रिच' होना चाहिए ।  राजनीती में छायाचित्र ही छबि है और छबि ही सफलता है। 


होली के त्योहार में एक दूसरे पर कीचड़ डालने और गोबर में घसीटने की सनातन परंपरा है ।  इसे उचित गरिमा प्रदान की जाएगी।  इस काम के लिए छबि मैनेजरों ने देशभर की छोटी बड़ी पार्टियों को छबि निर्माण के लिए साथ आने को कहा है । इस मामले में पार्टियों का प्रदर्शन पूरे साल अच्छा रहता है ।  खेल कूद बंद हैं,  स्कूलों में  खेल के मैदान खाली पड़े हैं ।  सप्ताह भर पहले वहां गाय भैंसें बांध दी जाएँगी ताकि शुद्ध, विश्वसनीय और ताजा गोबर सभी पार्टियों को उपलब्ध हो सके ।  गौ-मूत्र और भैं(स)-मूत्र के कारण आर्गेनिक कीचड़ भी वहां तैयार हो जायेगा ।  सारी पार्टियाँ जब गोबर कीचड़ में सन जाएँगी तो किसी की अलग पहचान नहीं रहेगी ।  दुनिया लोकतंत्र की इस खूबसूरती को फटी आँखों से देखेगी ।  हम कह सकेंगे मतभेदों के बावजूद सारे दल एकरंग हैं ।  राजनीतिक एकता को प्रमाणित करने का इससे शानदर मौका दूसरा नहीं होगा। 


ज्यादा सोचने से चिंता को अवसर मिलता है और चिंतित लोग सिस्टम को घूरने लगते हैं ।  होली मस्ती और गले मिलने  का त्योहार है ।  नशे से आदमी की सोच-समझ, विचार व विचारधारा, चेतना वगैरह सब स्थगित हो जाते हैं ।  ज्ञानियों ने भांग को होली की जान बताया है। इसलिए मोहल्ला स्तर पर भांग मुफ्त उपलब्ध करवाई जाएगी ।  पिया हुआ आदमी हिन्दू मुसलमान नहीं केवल एक ऊंघता शरीर भर रह जाता है ।  हाड़ मांस के इसलिए ढेर को  न महंगाई की याद रहती है न बेरोजगारी का दर्द ।  पंचतत्व के इस झूमते पैकेट से समाज में अमन, शांति और अध्यात्म का सन्देश जाता है ।


  कुछ जगहों पर लट्ठमार होली का चलन है ।  महिलाएं लट्ठ से हुलियारों को प्रेम कि चरम शक्ति के साथ पीटती हैं ।  आदमी भांग के या किसी भी नशे में हो तो उसे पिटने में आनंद आता है ।  ऐसा आदमी आगे सालभर पिटते रहने के लिए मन और शरीर से तैयार रहता है। यही काम समय असमय पुलिस भी प्रेम से करती है तो उसका मकसद भी प्रदर्शकारियों को आनंद से सराबोर करने का होता है ।  पिसी छनी भाँग और मदिरा तन को मस्त और मन को रंगीन बनाती है ।  इसका कारण यह है कि बाहर जितनी रंगीनी होती है उतनी अन्दर भी होना चाहिए वरना त्योहार अधूरा है ।  जिम्मेदारों की सोच गहरी और सूक्ष्म है ।   बच्चन कवि कह गए हैं – “दुनिया वालों किन्तु किसी दिन, आ मदिरालय में देखो ; दिन को होली, रात दिवाली, रोज मनाती मधुशाला”।  मदिरा की बढ़ती दुकानों के इस मर्म को समझो ।  राज्य में अमीर गरीब सब मस्त हों ; झोपड़ी, महल या गटर का भेद न हो ; सारे चरम आनंद को प्राप्त हों, यही सुखी राज्य का लक्ष्य है । ... तो बुरा मानो या न मानो.... होली है.....।

 


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सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

वैलेंटाइन डे और चचा की चुल


 


 

" अरे बचुआ यह तो बताओ जरा की एक ठो गुलाब से लड़की जो है अपनी हो जाती है? " चचा ने आसपास देखते हुए धीरे से पूछा। 

" अरे चचा तुम भी ना नई-नई चुल पाल लेते हो! अब तुम कहां जाओगे गुलाब ढूंढने!" 

" जोर से मत बोलो यार और मुंह मत बनाओ। हम लाठी चमकाते अधेड़ हो गए पर अभी तक कोई हमारा नहीं हुआ। इधर लोग गुलाब टीका कर एक से दो और दो से चार हुए जा रहे हैं! बहुत नाइंसाफी है यह तो।"

" लाठी देखकर तो भैंसिया भाग जाती है चचा, लड़की कैसे रुकेगी! आप लोगों में कॉमन सेंस नहीं है यही सबसे बड़ी दिक्कत है। लाठी को ही संसार समझ पकड़े रहते हो।" 

" ठीक है, इस बार ठान लिए हैं और मान लिए हैं कि गुलाब से बड़ा कोई हथियार नहीं है। "

" वह तो ठीक है चचा, लेकिन तुम्हें किसी लड़की का जीवन बर्बाद करने की जरूरत क्यों आ पड़ी है!!" 

" तुम ही बताओ बचुवा, जिंदगी भर नफरत ही करते रहें क्या! थोड़ा बहुत प्रेम में हाथ मारने का हमारा मन नहीं हो सकता है क्या! आखिर हम भी जीवित प्राणी है।" 

" वह तो ठीक है पर हमें नहीं लगता चचा कि आपके लायक कोई मिलेगी। "

" शुभ शुभ बोल बचुवा, प्रेम की ऋतु है भगवान गधों को भी गधी दे देता है। फिर हम  उनसे गएबीते नहीं है। ठीक बात है कि नहीं?"

" इसका मतलब यह हुआ कि मानोगे नहीं। लेकिन जान लेओ कि वैलेंटाइन-डे विदेशी कल्चर है। तुमको सूट नहीं करेगा। पचड़े में ना ही पड़ो तो अच्छा है। "

" देखो सही बात बताएं, सूट तो हमको लाठी भी नहीं करती है। पर पकड़े हैं कि नहीं। लोग देखते हैं कि आदमी लाठी को घुमा रहा है पर हकीकत यह है की लाठी ससुरी आदमी को घूमाती रहती है। "

" तो काहे पकड़े रहते हो!! छोड़ दो ना। " 

" अब मुश्किल है। लाठी पकड़े पकड़े आदमी खुद लट्ठ हो जाता है। "

" वही तो कह रहे हैं । इस इमेज के साथ तुम्हें कोई कैसे मिलेगी। "

" ट्राई कर लेने दो बचुवा, घर वाले भी अब रोटी नहीं देते हैं। भीख मांग कर खाया तो किसी दिन देश को भुगतना पड़ जाएगा। "

" चलो ठीक है, कर लो मन की ।  फूल दोगे किसको चचा ? "

" है एक। हमारी तरफ से तो ओके है, समझो आधा काम तो हो गया। अब अगर वह तैयार हो जाए तो काम पूरा। "

" कोई बातचीत हुई अभी तक या नहीं? "

" बातचीत तो नहीं हुई। साला दिमाग में इतने पाठ भरे पड़े हैं, लेकिन प्रेम का एक भी नहीं।  नफरत से लड़की पट सकती तो हम अब तक लड़ाई जीत चुके होते।  बचुआ अब समझ में आ रहा है कि प्रेम करना नफरत करने से ज्यादा कठिन है। "

" कोई बात नहीं। बढ़िया सा लाल गुलाब लीजिए और मुस्कुराते हुए पहुंच जाइए। गुड लक । "

" लाल गुलाब नहीं रे! वह तो नेहरू लगते थे, और फिर लाल तो कम्युनिस्टों का भी है। लाल नहीं ले जाएंगे । आजकल तो भगवा गुलाब भी मिलने लगे हैं। "

" सफेद ले जाना चचा। भगवा देखकर चची भड़क भी सकती है। "

" तो फिर पीला ले जाएं क्या। हल्दी की रस्म भी हो जाएगी। "

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शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

कुछ भी हो जाए जागने का नहीं


 



नाम, उम्र, शिक्षा, जाति वगैरह लिखने के बाद जनगणना अधिकारी ने पूछा  – “ आप सोये हुए हैं या जागे हुए हैं ?”

“जी मैं रात में ही सोता हूँ ।” भाऊ के कहा ।  

“रात से आपका क्या मतलब है ?“

“रात यानी रात ! रोज होती है । आप नहीं जानते हैं कि रात क्या होती है ?!”

“देखिए हम सरकारी नौकर हैं और इस समय ड्यूटी पर हैं । हम जानते हैं लेकिन नहीं जानते हैं, हम सोचते हैं लेकिन नहीं सोचते हैं, हम नहीं मानते हैं लेकिन मानते हैं, हम दो पाए हैं लेकिन नहीं भी हैं । आपको ही बताना पड़ेगा कि रात क्या है ?”

“जब चारों ओर अंधेरा हो, चूल्हे ठंडे और रसोईघर बंद हो, नौजवान नशे में लुढ़के पड़े हों, जब मोबाइल पर ‘बच्चे चार अच्छे’ के मैसेज आ रहे हों, जब सारा देश सो रहा हो, सिर्फ सरकार और उसकी मंडली जाग रही हो । तो समझिए कि रात  है ।“

“क्या ये इसी देश की रात है !?”

“जी आपने अभी कहा ना कि हम जानते है लेकिन नहीं जानते हैं ।“

“अच्छा ! तो आप रात में सो जाते है ?” क्या आपके घर में सब सो जाते हैं ?”

“हाँ, पूरा मोहल्ला सो जाता है इसलिए हम भी सो जाते हैं । जब सब सो रहे हों तो अकेले जागने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है ।“ भाऊ ने कारण सहित जवाब दिया ।

“इसका मतलब सबको नींद आ जाती है । सब सुखी हैं । यह नया स्टार्ट-अप है । “

“सुख-वुख कुछ नहीं, आँखें बंद करके पड़े रहो तो नींद भी आ ही जाती है ।“

“आपको जान कर खुशी होगी कि जल्द ही निंद्रा सुख-टेक्स लगाया जा सकता है ।“ 

“निंद्रा सुख-टेक्स क्यों !?”

“सरकार का काम है टेक्स लगाना । आपको लाडले-भाऊ टेक्स-पेयर भी बनाना है ।“

“मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं सो रहा हूँ या जाग रहा हूँ !! “

“आप सो रहे हैं । आँख खुली होने से केवल आँख खुली होती है । तमाम देश भक्त आँख खुली रखते है लेकिन असल में सोये हुए होते हैं । आप भी देश भक्त हो ।“

“अगर मैं इस बात से इंकार करूँ तो ?”  भाऊ डर सा गया ।

“अपनी रिस्क पर आप कुछ भी कर सकते हैं । (ईश्वर आपकी रक्षा करे )।“

सच बात यह है कि भाऊ ने लगातार इतना ‘जागो जागो’ सुन लिया कि अब जागना जोखिम का हो गया है । उसे जगाने वालों का षड्यन्त्र समझ में आ गया है । वो जागने को कहते हैं लेकिन चाहते हैं कि लोग आँखे बंद रखें । अधिकारी ठीक कह रहे हैं । हर बात में रिस्क दिखाई देती है । दस ग्राम सोना दो लाख तक पहुँच गया, भाऊ जरा सा चौंका और फिर सो गया । सोने के भाव से उसे क्या मतलब ! शंकराचार्य ने आवाज लगाई ‘आओ बचाओ’ । उसने एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया । शंकराचार्य से उसे क्या लेना देना ! बनारस के घाट पर तोड़फोड़ हुई वह नहीं जागा । अपुन को क्या ! चित्रकूट के मंदिर पर बुलडोजरों ने सेवा की, वह सोया रहा । अब भगवान ही निबटें । मलमूत्र वाला पानी पी कर तमाम लोग मर गए, भाऊ आँखें बंद किये लेटा रहा । सोचा ‘आया है सो जाएगा, राजा रंक फकीर’ ... । मानो उसने तय कर लिया है कि कुछ भी हो जाए वह नहीं जागेगा ।

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रविवार, 25 जनवरी 2026

पार्क में जिम्मेदार बकरियाँ






जिम्मेदारी इन दिनों एक छूत की बीमारी है। जो लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं, वे प्रायः ठीक नहीं हो पाते हैं । डॉक्टरनुमा लोगों का मत है कि जिम्मेदारों को पकड़कर 'जिम्मेदार-खाने' में बंद कर देना चाहिए। लेकिन दिक्कत यह है कि देश में पागलखाने तो बहुत हैं, पर जिम्मेदार-खाने अभी तक बने नहीं हैं। डर यह है कि मौजूदा जिम्मेदार, दूसरे भले-चंगे लोगों में भी इन्फेक्शन फैला रहे हैं। अभी तक जिम्मेदारी की कोई वैक्सीन भी नहीं बन पाई है। गली-गली में जिम्मेदारी के 'मरीज' घूरते मिल रहे हैं। ज्यादातर तो देश और धर्म की जिम्मेदारी से पीड़ित हैं । बूढ़े कंधों पर चूल्हे की आग का दायित्व है; वे गृहस्थी में पहले से ज्यादा खट रहे हैं। मेराज फैजाबादी ने लिखा है- मुझको थकने नहीं देता यह ज़रूरतों का पहाड़, मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते । जिम्मेदारों का दर्शन है ‘हमसे है जमाना, जमाने से हम नहीं।' वे जानते हैं दुनिया में आदमी मात्र चार दिनों के लिए आता है, सो काम-धंधे में कुछ नहीं रखा है । मैं बाप का, दादा का, परदादा का, लकड़ दादा का, सब का बदल लेगा । संत कहते हैंसंसार मिथ्या है, सो इसको तोड़ो मरोड़ पावडर बना डालो कोई फर्क नहीं पड़ेगा । परिस्थितियाँ कैसी भी हों, मनमानी का मजा कुछ और है।अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम...पीछे क्यों रहें मस्तराम । मालवा की माटी में तो गजब की मस्ती है। आदमी दाल-बाटी खाकर 'कुंभकरण' का सगा भाई हो जाता है। भगवान ने मालवी आदमी का 'डिजाइन' ही ऐसा बनाया है कि डटकर खा ले और मस्त फैल जाए। ऐसे में जिम्मेदारी पास फटकती ही नहीं; अगर पहले से सिर चढ़ी हो, तो फौरन रफा-दफा हो जाती है।

अब मुझे ही लीजिए, मुझे खुद नहीं पता कि भर भर के टेक्स देने के अलावा मेरी जिम्मेदारी क्या है। महंगाई कम हो या ज्यादा, इसमें मेरा क्या जोर? रुपया गिर रहा है तो मैं क्या कर सकता हूँ ! लाठी लेकर उसे सहारा देने तो जाऊंगा नहीं ! वैसे तो मेरी कोई खास गरिमा नहीं है लेकिन रुपया जब गिरता है तो मेरी जरा सी भी गरिमा नहीं गिरती है । सुना है रुपये के गिरने से अब किसी कि गरिमा नहीं गिरती है । जानकार बताते हैं कि अब गरिमा कहीं बची ही नहीं है । मैं तो जेब में गांधीजी वाला रुपया लेकर चलता हूं, डॉलर नहीं। सच तो यह है कि मैंने डॉलर देखा तक नहीं है । अगर वह चढ़ता है तो चढ़ जाए, अपने गाँधी का क्या जाता है? देखो भाई, अपन तो 'संख्या' को जानते हैं और लोकतंत्र को आत्मा में बसा रखा है। इधर एक डॉलर, उधर नब्बे रुपए। लोकतंत्र के हिसाब से बताइए कौन बड़ा है? एक या नब्बे! जिसकी संख्या भारी, उसकी जीत पक्की। अब बात को ज्यादा साफ करने की जरूरत नहीं, आपकी समझ पर मुझे यकीन है।

गणपत राव के बेटे की शादी नहीं हो पा रही है। कल वह पीछे पड़ गए— 'करवाओ यार!' हमने कहाकोशिश करेंगे, लेकिन हमारी जिम्मेदारी नहीं है। वह बोलेजिम्मेदारी की चिंता मत करो, आजकल यह किसी की नहीं है। बेटे मां-बाप के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, नेता जनता के लिए नहीं, डॉक्टर मरीज के लिए नहीं और भगवान अंधभक्तों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। आजकल तो लोग बिना शादी के, यानी बिना जिम्मेदारी के जीना पसंद करते हैं। दिक्कत यह है कि औरत के बिना जिंदगी कितनी सुकून भरी है, यह आदमी को शादी के बाद ही समझ आता है। सब कुछ लूट के होश में आए तो क्या किया ! हरकोई  इतना हिम्मतवाला भी नहीं होता है । मेरी शादी को चालीस साल होने वाले हैं। 'कैद में है बुलबुल और सैयाद मुस्कुराए।' चौदह साल में तो हत्यारों की सजा पूरी हो जाती है और वे शान से बाहर आ जाते हैं, पर हमारे लिए कोई 'पैरोल' की व्यवस्था तक नहीं है ।

गणपत अपने बेटों के रोजगार के लिए भी सबको घूरता रहता है। कहता है जनता मालिक है, सरकार बनाती है । देश में बेरोजगारी का जो माहौल है उसके लिए जनता जिम्मेदार है ! उसके तीनों बेटे उसे फटकारते हैं— 'हमें पैदा ही क्यों किया?' बेरोजगारी की जिम्मेदारी अब पैदाइश तक जा पहुंची है। आजकल बच्चे बात बात पर जन दे देते हैं । गणपत को डर है कि कहीं लड़के आत्महत्या न कर लें। अगर कर ली, तो जिम्मेदारी किसकी? सरकार दो लाख का मुआवजा देगी, लेकिन जिम्मेदारी का क्या? गणपत के तीन लड़के हैं, मतलब कुल छह लाख के हाथी । जिम्मेदारों के पास नौकरी नहीं है, चेक है; वह लेकर दफा हो जाओ। आखिर कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है।

इधर एक सार्वजनिक उद्यान है नेहरू पार्क। लाठीधारी कुछ बंदे पूरी जिम्मेदारी के साथ वहां बकरियां छोड़ देते हैं। जवाब यह है कि नेहरू पार्क को अब 'गांधी पार्क' बनाया जाएगा, इसलिए बकरियां जरूरी हैं। सेकुलर बकरियां दिन भर अपना 'काम' करती हैं। महीने भर में ही फूलों के पौधे 'लेंडियों' में बदल गए। महकने वाला बाग बदबू मारने लगा। चलिए, एक और जिम्मेदारी पूरी हुई ! मजबूत इरादे से काम करो तो अंजाम तक पहुँचता ही है। बस मीडिया में खबर नहीं आई, क्योंकि बाजार की भी अपनी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं।

पार्क में सुबह-शाम कुछ बूढ़े अपने दुखडों के साथ आते हैं। बकरियों के काम में हस्तक्षेप करने की अपेक्षा उन्हें 'गांधी चर्चा' में लग जाना सुरक्षित लगता है । गांधी को याद करो तो सहनशीलता बढ़ ही जाती है। इन बूढ़ों को आश्चर्य है कि बकरी के पेट में फूल-पत्ती जाकर 'लेंडी' कैसे बन जाती है? ईश्वर चमत्कारी है कुछ भी बना सकता है । आजकल लोग गोबर खा रहे हैं, अगर जिम्मेदारों के ध्यान में यह बात लाई जाए तो यह 'सम्मान' बकरी की लेंडियों को भी मिल सकता है।

 एक जमाना था जब बाप की जूती बेटे के पैर में आने पर उसे जिम्मेदार मान लिया जाता था। तब बुजुर्गों के लिए घर में आंगन और तखत की व्यवस्था होती थी । अब जमाना बदल गया है। ज्यादातर बूढ़े 'शरशय्या' पर लेटे सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में होते हैं। पेंशनिया बूढ़ों को नवंबर आते ही धूल झाड़कर खड़ा होना होता है। उनके लिए यही एक जिम्मेदारी बची होती है । इसमें लापरवाही न घर वाले सहते हैं, न बाहर वाले। बात उनकी भी जो जिम्मेदारी की जंग से दूर हैं । वे क्या तो करें कि तस्वीर बदले । वे भी मुट्ठीभर दिन ले कर आए हैं । कैफ़ी आजमी कहते हैं – “कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले उस इंकलाब का, जो आज तक उधार सा है” ।

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