रविवार, 25 जनवरी 2026

पार्क में जिम्मेदार बकरियाँ






जिम्मेदारी इन दिनों एक छूत की बीमारी है। जो लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं, वे प्रायः ठीक नहीं हो पाते हैं । डॉक्टरनुमा लोगों का मत है कि जिम्मेदारों को पकड़कर 'जिम्मेदार-खाने' में बंद कर देना चाहिए। लेकिन दिक्कत यह है कि देश में पागलखाने तो बहुत हैं, पर जिम्मेदार-खाने अभी तक बने नहीं हैं। डर यह है कि मौजूदा जिम्मेदार, दूसरे भले-चंगे लोगों में भी इन्फेक्शन फैला रहे हैं। अभी तक जिम्मेदारी की कोई वैक्सीन भी नहीं बन पाई है। गली-गली में जिम्मेदारी के 'मरीज' घूरते मिल रहे हैं। ज्यादातर तो देश और धर्म की जिम्मेदारी से पीड़ित हैं । बूढ़े कंधों पर चूल्हे की आग का दायित्व है; वे गृहस्थी में पहले से ज्यादा खट रहे हैं। मेराज फैजाबादी ने लिखा है- मुझको थकने नहीं देता यह ज़रूरतों का पहाड़, मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते । जिम्मेदारों का दर्शन है ‘हमसे है जमाना, जमाने से हम नहीं।' वे जानते हैं दुनिया में आदमी मात्र चार दिनों के लिए आता है, सो काम-धंधे में कुछ नहीं रखा है । मैं बाप का, दादा का, परदादा का, लकड़ दादा का, सब का बदल लेगा । संत कहते हैंसंसार मिथ्या है, सो इसको तोड़ो मरोड़ पावडर बना डालो कोई फर्क नहीं पड़ेगा । परिस्थितियाँ कैसी भी हों, मनमानी का मजा कुछ और है।अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम...पीछे क्यों रहें मस्तराम । मालवा की माटी में तो गजब की मस्ती है। आदमी दाल-बाटी खाकर 'कुंभकरण' का सगा भाई हो जाता है। भगवान ने मालवी आदमी का 'डिजाइन' ही ऐसा बनाया है कि डटकर खा ले और मस्त फैल जाए। ऐसे में जिम्मेदारी पास फटकती ही नहीं; अगर पहले से सिर चढ़ी हो, तो फौरन रफा-दफा हो जाती है।

अब मुझे ही लीजिए, मुझे खुद नहीं पता कि भर भर के टेक्स देने के अलावा मेरी जिम्मेदारी क्या है। महंगाई कम हो या ज्यादा, इसमें मेरा क्या जोर? रुपया गिर रहा है तो मैं क्या कर सकता हूँ ! लाठी लेकर उसे सहारा देने तो जाऊंगा नहीं ! वैसे तो मेरी कोई खास गरिमा नहीं है लेकिन रुपया जब गिरता है तो मेरी जरा सी भी गरिमा नहीं गिरती है । सुना है रुपये के गिरने से अब किसी कि गरिमा नहीं गिरती है । जानकार बताते हैं कि अब गरिमा कहीं बची ही नहीं है । मैं तो जेब में गांधीजी वाला रुपया लेकर चलता हूं, डॉलर नहीं। सच तो यह है कि मैंने डॉलर देखा तक नहीं है । अगर वह चढ़ता है तो चढ़ जाए, अपने गाँधी का क्या जाता है? देखो भाई, अपन तो 'संख्या' को जानते हैं और लोकतंत्र को आत्मा में बसा रखा है। इधर एक डॉलर, उधर नब्बे रुपए। लोकतंत्र के हिसाब से बताइए कौन बड़ा है? एक या नब्बे! जिसकी संख्या भारी, उसकी जीत पक्की। अब बात को ज्यादा साफ करने की जरूरत नहीं, आपकी समझ पर मुझे यकीन है।

गणपत राव के बेटे की शादी नहीं हो पा रही है। कल वह पीछे पड़ गए— 'करवाओ यार!' हमने कहाकोशिश करेंगे, लेकिन हमारी जिम्मेदारी नहीं है। वह बोलेजिम्मेदारी की चिंता मत करो, आजकल यह किसी की नहीं है। बेटे मां-बाप के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, नेता जनता के लिए नहीं, डॉक्टर मरीज के लिए नहीं और भगवान अंधभक्तों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। आजकल तो लोग बिना शादी के, यानी बिना जिम्मेदारी के जीना पसंद करते हैं। दिक्कत यह है कि औरत के बिना जिंदगी कितनी सुकून भरी है, यह आदमी को शादी के बाद ही समझ आता है। सब कुछ लूट के होश में आए तो क्या किया ! हरकोई  इतना हिम्मतवाला भी नहीं होता है । मेरी शादी को चालीस साल होने वाले हैं। 'कैद में है बुलबुल और सैयाद मुस्कुराए।' चौदह साल में तो हत्यारों की सजा पूरी हो जाती है और वे शान से बाहर आ जाते हैं, पर हमारे लिए कोई 'पैरोल' की व्यवस्था तक नहीं है ।

गणपत अपने बेटों के रोजगार के लिए भी सबको घूरता रहता है। कहता है जनता मालिक है, सरकार बनाती है । देश में बेरोजगारी का जो माहौल है उसके लिए जनता जिम्मेदार है ! उसके तीनों बेटे उसे फटकारते हैं— 'हमें पैदा ही क्यों किया?' बेरोजगारी की जिम्मेदारी अब पैदाइश तक जा पहुंची है। आजकल बच्चे बात बात पर जन दे देते हैं । गणपत को डर है कि कहीं लड़के आत्महत्या न कर लें। अगर कर ली, तो जिम्मेदारी किसकी? सरकार दो लाख का मुआवजा देगी, लेकिन जिम्मेदारी का क्या? गणपत के तीन लड़के हैं, मतलब कुल छह लाख के हाथी । जिम्मेदारों के पास नौकरी नहीं है, चेक है; वह लेकर दफा हो जाओ। आखिर कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है।

इधर एक सार्वजनिक उद्यान है नेहरू पार्क। लाठीधारी कुछ बंदे पूरी जिम्मेदारी के साथ वहां बकरियां छोड़ देते हैं। जवाब यह है कि नेहरू पार्क को अब 'गांधी पार्क' बनाया जाएगा, इसलिए बकरियां जरूरी हैं। सेकुलर बकरियां दिन भर अपना 'काम' करती हैं। महीने भर में ही फूलों के पौधे 'लेंडियों' में बदल गए। महकने वाला बाग बदबू मारने लगा। चलिए, एक और जिम्मेदारी पूरी हुई ! मजबूत इरादे से काम करो तो अंजाम तक पहुँचता ही है। बस मीडिया में खबर नहीं आई, क्योंकि बाजार की भी अपनी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं।

पार्क में सुबह-शाम कुछ बूढ़े अपने दुखडों के साथ आते हैं। बकरियों के काम में हस्तक्षेप करने की अपेक्षा उन्हें 'गांधी चर्चा' में लग जाना सुरक्षित लगता है । गांधी को याद करो तो सहनशीलता बढ़ ही जाती है। इन बूढ़ों को आश्चर्य है कि बकरी के पेट में फूल-पत्ती जाकर 'लेंडी' कैसे बन जाती है? ईश्वर चमत्कारी है कुछ भी बना सकता है । आजकल लोग गोबर खा रहे हैं, अगर जिम्मेदारों के ध्यान में यह बात लाई जाए तो यह 'सम्मान' बकरी की लेंडियों को भी मिल सकता है।

 एक जमाना था जब बाप की जूती बेटे के पैर में आने पर उसे जिम्मेदार मान लिया जाता था। तब बुजुर्गों के लिए घर में आंगन और तखत की व्यवस्था होती थी । अब जमाना बदल गया है। ज्यादातर बूढ़े 'शरशय्या' पर लेटे सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में होते हैं। पेंशनिया बूढ़ों को नवंबर आते ही धूल झाड़कर खड़ा होना होता है। उनके लिए यही एक जिम्मेदारी बची होती है । इसमें लापरवाही न घर वाले सहते हैं, न बाहर वाले। बात उनकी भी जो जिम्मेदारी की जंग से दूर हैं । वे क्या तो करें कि तस्वीर बदले । वे भी मुट्ठीभर दिन ले कर आए हैं । कैफ़ी आजमी कहते हैं – “कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले उस इंकलाब का, जो आज तक उधार सा है” ।

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