राजनीति की दुनिया में बड़े-बड़े रहस्य छुपे हुए
हैं। हम में से बहुत से लोग नहीं जानते कि अंग्रेज बड़े दुष्ट थे। व्यापारी बनकर
आए थे और हुकूमत करने लगे। जब सत्ता उनके हाथ में आ गई तो उन्होंने लूट का नाम बदल
कर व्यापार कर दिया । भारत का वैभव उन्हें सोने की खदान के समान दिखा तो लंबे समय
तक खुदाई का इरादा हो गया। देश में मतभेदों की, ऊँच- नीच की,
जाति- धर्म की नफरत की फसल लहलहा रही थी। उन्होंने लोगों में पल रही
नफरत को और बड़ा किया। एक धरम के लोग दूसरे से दुश्मनी पालने लगे। लोगों को बताया
गया कि उनका धरम खतरे में है । सभी धर्म वालों को उन्होंने गुपचुप मदद की। कान में
फुसफुसा कर हर एक को दूसरे से अच्छा और श्रेष्ठ कहा। धरम के लोग मूर्ख बनते रहे । यही
नीति जातियों को लेकर भी रही। पूरा समाज बँटते बँटते उनके सामने भेड़ बकरी की तरह
हो गया। उन्होंने पुलिस बनाई, लेकिन जनता को डराने के लिए । अंग्रेज अपनी मर्जी से इस विशाल देश को हाँकने
लगे। अंग्रेज बड़े चालाक थे। अंग्रेज जानते थे कि जब पेट खाली हो तो जनता को भव्य
आयोजनों और भविष्य के सपनों में उलझा देना चाहिए ।
राजनीति में समाज को सिर्फ बांटने लड़ाने
से ही काम नहीं चलता है। कलाई खुल जाने का डर भी होता है । कुछ अच्छे काम भी इसलिए
करना होते हैं कि लगे सरकार विकास करना चाहती है। अंग्रेज भेड़िये थे लेकिन
उन्होंने बहुत से अच्छे काम भी किये, या यह कहना ठीक होगा कि करना पड़े । सड़के
नहीं थी तो सड़के बनवाई। रेलवे शुरू की, डाक व्यवस्था बनाई,
स्कूल बनाए, अस्पताल भी बनाए । कुछ अच्छे
कामों का परिणाम यह हुआ कि एक दूसरे से नफरत करने वाला समाज अंग्रेजों को महान
मानने लगा। लेकिन बहुत से लोग अंग्रेजों की इस चालाकी को समझ रहे थे। वे जब भी
मौका मिलता सरकार की आलोचना करते और बताते कि अंग्रेज बगुला भगत हैं । अंग्रेजों
ने आलोचना को राजद्रोह घोषित किया और कइयों को लाठी से पिटवा कर मरवा दिया। सरकार के
खिलाफ बोलने वालों को जेल में डाल देना आम बात थी। अंग्रेज बड़े लोमड़ थे। उन्होंने
देखा कि दलित और आदिवासियों की बड़ी संख्या है। वे शासन की जरूरत में काम आ सकते
थे तो उनके लिए चर्च के दरवाजे, स्कूल के दरवाजे, और सेना के दरवाजे खोल दिये। महिलाओं के लिए भी उन्होंने कुछ काम किये। अंग्रेज
बड़े चालू थे । उन्होंने सती प्रथा के खिलाफ कानून बनाया, उन्हें
शिक्षित करने का प्रयास किया। अब अंग्रेज महिलाओं दलितों और पिछड़ों के हितैषी हो
गए। लेकिन अंदर ही अंदर लोग मानते थे कि अंग्रेज बड़े कमीने हैं। अंग्रेज भी जानते
थे कि लोग उन्हें कमीना मानते हैं। लेकिन कुछ वर्षों की सत्ता में वे बड़े ढीठ हो
गए थे। शासन करने वालों को आमतौर पर लज्जा नहीं आती है। अंग्रेज अपनी दाढ़ी मूंछ और
परिधान पर बहुत ध्यान देते थे। वे बड़ी-बड़ी कोठियों में रहते थे लेकिन उनकी अपनी
निजी कोठी नहीं होती थी। वे लूट का माल विदेशों में जमा
करके रखते थे ।
देश
में बहुत से राजा नवाब तब भी थे। उन्हें हैंगर की तरह अंग्रेजों ने इस्तेमाल किया।
जैसे हैंगर में कपड़े टांगे जाते हैं वैसे ही उन पर बहुत कुछ लाद रखते थे । राजा
नवाब भी जानते थे कि अंग्रेज बड़े कमीने हैं, लेकिन वह मजबूर
थे। जमीदार, जागीरदार और बुद्धिजीवियों को उन्होंने राय
बहादुर और सर जैसी उपाधियाँ देकर अपने पक्ष में किया। पुराना जमाना था उस समय
पद्मश्रियाँ नहीं होती थी। पूरा देश अंग्रेजों से नफरत
करता था लेकिन अब उनकी ताकत पहले से बढ़ गई थी। सरकार का खजाना खचाखच भरा हुआ था।
उनके पास बड़ी सेना और लाखों मुलाजिम थे, और अपने कानून भी। इतने बड़े संगठन के साथ
जमी हुई सरकार को हिलाना नामुमकिन था। लेकिन आम राय यही थी कि अंग्रेज बड़े कमीने
हैं। अंग्रेजों के प्रति इस धारणा ने धीरे-धीरे अपना काम शुरू किया और देश की गरीब
अनपढ़ और संगठित जनता ने एक स्वर में कहा कि अंग्रेजों भारत छोड़ो। इतिहास गवाह है,
संघर्ष लंबा चला लेकिन कमीनों को भारत छोड़ना पड़ा। एक बार भागे अंग्रेज फिर कभी
सत्ता में नहीं आ सके लेकिन उनका कमीनापन यहीं छूट गया । जय हिन्द ।
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