बुधवार, 10 दिसंबर 2025

दो केले और खुल जा सिम सिम

 




 

          फूलसिंह 'फूल' ने संत जी के चरणों को दबाते हुए प्रार्थना की -  "महाराज की जय हो, आशीर्वाद दीजिए भगवान,.... मैं राजनीति में जाकर जनता की सेवा करना चाहता हूँ । "

" राजनीति का सेवा से अब क्या लेना देना है फूलसिंह 'फूल' !? " संत जी ने कहा। 

 "जाना ही पड़ेगा संत जी, जनता गरीब है, भूखी और बीमार है। " फूलसिंह 'फूल' बोला।

" जनता को गरीब, भूखी और बीमार बनाए रखने में बड़ी युक्ति लगती है ‘फूल’ सिंह ।  लाचार जनता लोकतंत्र की जान होती है। अगर तुम इतना भी नहीं जानते हो तो राजनीति में जाकर क्या करोगे!? " 

" राजनीति में ज्ञान और समझ की क्या जरूरत है महाराज!! आप तो अपना काम कीजिए,...  आशीर्वाद दीजिए फटाफट। " 

 संत ने बिना कुछ बोले फूल सिंह 'फूल' को दो केले दे दिए, कहा - " खुल जा सिम सिम... जा शुरू हो जा....।"

 

  संत जी अंधे हैं लेकिन उन्हें सब दिखता है। उनके बारे में प्रसिद्ध है कि वह तीन:एक के अनुपात में बोलते हैं अर्थात तीन बातें बुरी और एक बहुत बुरी । अगर चोर-उचक्कों, लबार-लफंगों को आशीर्वाद दे दें तो वे खूब तरक्की करते हैं। अनेक चोर उनके आशीर्वाद से डाकू बने और जन नायक कहलाये । उन्होंने डायरेक्ट अपने आशीर्वाद से सैकडों ‘नेतू’ पैदा किए हैं। परिणाम स्वरुप नेता भी दिव्यांग निकले । हालांकि तकनीकी रूप से सबके पास दो आंखें बरामद हो सकती हैं । कुछ ही वर्षों में देश का राजनीतिक परिवेश इच्छाधारी अंधों से भर गया है। ये वही देखते हैं जो देखना चाहते हैं। अपने यहाँ एक बार गरीबों को पुचकार लो, थोड़ा पान-पत्ता कर दो, फिर पाँच साल तक देखने को पूरी दुनिया पड़ी है। बड़े-बूढ़े बताते हैं कि सत्तागिरी और संतगिरी में मौसेरे भाई जैसा रिश्ता होता है। एक जीने नहीं देता दूसरा मरने नहीं देता। दोनों में बड़ी अंडरस्टैंडिंग है। एक दूसरे की मदद करने में वह आगा-पीछा नहीं देखते हैं। इसलिए संत जी ने 'फूल' जी में संभावना देखकर आशीर्वाद दे दिया है।

 

 फूलसिंह 'फूल'  दो केले लेकर निकला तो साथ लगे चमचों ने कहा उस्ताद आधा-आधा खा लो, अभी अपन चार हैं बाद में कम पड़ जाएंगे । लेकिन फूल सिंह को आशीर्वाद प्राप्त था सो उसने कुछ और लोग जुटाए और अस्पताल में एक महादरिद्र को ताड़ा। दोनों केले उसके मुँह आगे किये और फोटो खिंचवा लिया। फिर दूसरे भूखे को देखा और केले दिखाकर फोटो खिंचवा लिए। इसी तरह एक के बाद एक पूरा वार्ड कैमरे में कैद हो गया। केले अभी भी उनके हाथ में किसी पिस्टल की तरह मौजूद थे। 

 

“ केलों का क्या करें? " फूलसिंह से चमचों ने पूछा। 

" किसी एक को देना अन्याय होगा और इसके पच्चीस टुकड़े करके बांट देना केलों के साथ अन्याय होगा। "

"फिर इनका क्या करें !?"

" ऐसा करते हैं इसको बेच देते हैं। कोई भी अमीर इन्हें ले लेगा। संगठन में शक्ति होती है...  उठाओ लाठी और चलो । "

नगर सेठ ने केले नहीं लिए... चंदा दे दिया। 

 फूलसिंह 'फूल' सारा दिन केले लिए घूमता रहा लेकिन किसी ने भी केले नहीं लिए।... चंदा सबने दे दिया। 

 चमचों ने कहा कल शहर में पोस्टर लगेंगे - ' नगर के युवा हृदय सम्राट फूलसिंह 'फूल' का पहला भव्य नागरिक अभिनंदन' आज शाम जनता चौक पर ।

 

------ 

 

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें