शुक्रवार, 29 मई 2026

झोलाछाप बुद्धिजीवी






 


पुराने समय में बुद्धिजीवी प्रायः बुद्धिमान होते थे । वे उतना ही मुँह खोलते थे जितना जरूरी होता था। कम बोलते थे लेकिन उनका एक एक शब्द पत्थर की लकीर था।  उस जमाने में भी बंधी मुट्ठी लाख की होती थी। धीरे धीरे बुद्धिजीवी वाचाल हुआ। उन्हें पता नहीं था कि ज्यादा मुँह खोलने से बुद्धि का रायता फैल जाता है। दूसरे रायते समेटे जा सकते हैं लेकिन बुध्दि का रायता बरसाती नालों की तरह बढ़ता ही जाता है। बुद्धिजीवीयों की कुछ परम्परागत नस्लें होती थीं। परम्पराओं की अपनी धाक होती है। इसमें किन्तु, परन्तु या प्रश्न पूछने की मनाही है। जिसके कारण बुद्धिजीवी बाप के बुद्धिहीन बच्चे भी बुद्धिजीवी माने जाने लगे । फिर बुद्धिजीवियों की संकर नस्लें आईं तो घालमेल और बढ़ा ।  एक एक बुद्धिजीवी के आठ बच्चों में से पाँच छः बुद्धिहीन निकलने लगे। फसलें तो खूब उतरने लगीं, लेकिन गुणवत्ता जाती रही। बहुत शीघ्र उन्हें समझते में आ गया कि जैसा मजा विचार में है वैसा बुद्धि में नहीं है। मौका देख कर बुद्धिजीवी उपलब्ध विचारधाराओं से जुड़ने लगे। परिणाम यह हुआ की जो बुद्धि के लिए जाने जाते थे वे अब विचारधारा के लिए पहचाने जाने लगे।

जल्द ही बुद्धिजीवियों का बाजार तैयार हो गया, दाम मिलने लगे । बाजार ने सबसे पहले उनकी स्वतंत्रता रखवा ली। स्वतंत्रता के बिना विवेक का कोई उपयोग नहीं था इसलिए उन्हें विवेक भी छोड़ना देना पड़ा । बदले में उन्हें लक्ष दिखाए गए, आज की भाषा में कहें तो 'टारगेट' । कहा इन्हें हासिल करो इनाम मिलेगा। अच्छा करोगे तो पद भी मिल सकते हैं। बुद्धिजीवी बुद्धि को ताख में रख कर काम में भिड़ गए। कुछ टीवी एंकर बने,  कुछ अखबार के संपादक हुए, कुछ को पार्टी प्रवक्ता बनाया गया, बहुत से अनुवादक बने, कुछ दनादन भाषण और लेख लिखने लगे। बहुत सारे युवा कम्प्यूटरजीवी थे उन्हें फेक-न्यूज़ और हेट-रील बनाने की जिम्मेदारी मिली। सम्भावनाओं के द्वार इतनी तेजी से खुले कि आठवीं फेल प्रतिभाओं को भी झोलाछाप बुद्धिजीवी का दर्जा मिल गया ।  इधर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी को मान्यता मिलने से घर-घर झोलाछाप  बुद्धिजीवी हो गए। लोग इतना संक्रमित हुए कि पान वाला भी अपने को बुद्धिजीवी मानने लगा। दिन भर कत्था-चूना लगाते हुए ज्ञान बाँटने वाला अब बुद्धिजीवी है । केश कतरने वाले तो बुद्धिजीवी की श्रेणी में आते ही थे। कुछ ने रैदास और कबीर को आगे करके बुद्धिजीवी होने का दावा ठोक दिया । बुद्धिजीवी किसी प्रधान सेवक की फोटो की तरह हर जगह दिखाई देने लगे। कोई माने न माने समाज के हर घर में बुद्धि के बीमार मिलने लगे । हालात ये हुए कि कोई आँख मीँच कर भी माला फेंके तो वह किसी बुद्धिजीवी के गले में ही पड़ेगी इसकी गारंटी है । माहौल बढ़िया था लेकिन किसी नजर लग गई। जल्द ही रुपए के साथ बुद्धिजीवियों की कीमत भी गिरी, लेकिन कहीं चर्चा नहीं हुई। 

  बुद्धिजीवियों का स्नेहल स्वाभाव है कि वो दूसरे बुद्धिजीवी को पसंद नहीं करते। चूंकि बुद्धिजीवी तेजी से बढ़े, समाज में नफ़रत और प्रतिस्पर्धा भी फैलने लगी। चढ़ते हुओं को नीचे गिराना जरूरी लगने लगा। बुद्धिजीवियों को धर्म, जाति और गोत्र याद आने लगे। धर्म की किताबें और इतिहास खंगालना रोज का काम हो गया ।  हर दिन लोगों को पता चलने लगा कि कौन बुद्धिजीवी नीच और कौन अधम हैं। जवाब में पता चला कि नीच और अधम बताने वाले कितने पापी हैं और नरक के द्वार के कितने निकट खड़े हैं। कोई किसी को कूढ़-मगज बता रहा है तो किसी को सड़ी-सोच वाला। पहले कहा गया कि फलां के साथ रोटी बेटी का व्यवहार नहीं करेंगे बाद में छूने या पास बैठाने से मना कर दिया। कुछ ने समय की चाल को देख कर लाठी थाम ली तो कुछ ने गुंडे पाल लिये। बुद्धिजीवियों के कारण समज कई खेमों में बँट गया ।

हुकूमत-ए-रवानी खुश है, उसे यही चाहिए था।

 

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