रविवार, 26 जुलाई 2026

तुम रच्छक तो काहू को डरना


 



अगर आप लोकतंत्र में विश्वास करते हैं, तो मानना पड़ेगा कि संकट हमारे जीवन की आवश्यक बुराई है। ज्यादातर संकट बेकाम होते हैं, इसलिए आते-जाते रहने के अलावा उनके पास कोई काम नहीं होता है। आज के समय में संकट कब आकर सामने खड़ा हो जाए, कहा नहीं जा सकता। समझदार लोग संकट का सामना शांति, धैर्य और हनुमान चालीसा के साथ करते हैं। संकटों की खूबसूरती यह है कि उनके सम्मान में दो-चार बातें बोल दो, तो वे टल भी जाते हैं। हालांकि, कुछ संकट ढीठ किस्म के भी होते हैं। एक बार अगर पीछे पड़ जाएं, तो किसी बड़े संकट के हस्तक्षेप के बिना आपको छोड़ते नहीं हैं। आमजन का और संकट का रिश्ता विक्रम और बेताल की तरह अखंड और अनंत है। अच्छे नागरिक कानून से डरते हैं, लेकिन सुना है संकट की कानून से बड़ी यारी होती है। अगर यह सच है, तो आपके सामने दोहरा-तिहरा संकट है। वकील, दलील, कचहरी, थाना, जेलयह संकटों का वर्किंग एरिया यानी कार्यक्षेत्र है। आम नागरिक इस कार्यक्षेत्र की तरफ देखता भी नहीं है।

वैसे संकट दो तरह के होते हैंएक स्थानीय और दूसरे बाहरी। तकनीकी रूप से स्थानीय संकट छोटे और बाहरी बड़े होते हैं। केंद्रीय और वैश्विक संकट तो और भी बड़े होते हैं, और उनकी चपेट का दायरा भी उसी अनुसार बड़ा होता है। व्यावहारिक रूप से देखें, तो मोहल्ला-स्तरीय व्यक्ति के लिए बाहरी, केंद्रीय या वैश्विक संकट करीब-करीब No-संकट होते हैं। इन्हें लोग कितना भी गरियाएं, वह नक्कारखाने में तूती की आवाज के समान होता है। बड़ा होने के बावजूद लोगों को उनसे उतना डर नहीं लगता, जितना स्थानीय यानी छोटे संकटों से लगता है। इसका कारण यह है कि छोटा संकट सीधे लोगों के संपर्क में होता है। आप अपने आंगन में बैठे अखबार पढ़ रहे हैं कि अचानक "बाउजी" कहते हुए वह सामने आ टपकता है। अब आप तुरंत-से-पेश्तर जोर से "भइया जी, जय हो आपकी" कहकर उन्हें टाल सकते हैं। अगर चूक गए, तो वह इस उपेक्षा को दिल पर ले सकता है। छोटे संकटों के दिल भी छोटे होते हैं। छोटा दिल नैनो कार की तरह होता है, यू-टर्न लेने में उसे जरा भी दिक्कत नहीं होती है।

संत, महात्मा और समाजसेवी कभी-कभी कहते हैं कि देश चौतरफा संकटों से घिरा हुआ है, जिसे सुनकर लोगों को विश्वास नहीं होता। संकट की पहचान सबको नहीं होती है, क्योंकि संकट किसी का नहीं होता है। आपने सुना होगा, जानकार कहते हैं—"विश्वास का संकट है।" अब आप उस विश्वास को ढूंढिए, जिसे खत्म हुए अरसा हो गया है। पर्याप्त संख्या में संकट जुटा लेने के बाद लोग नई पार्टी बना लेते हैं, जिससे संकट संगठित हो जाता है। चुनाव का समय संकटों की सक्रियता का समय होता है। झंडा-बैनर लेकर जब सारे एक साथ निकलते हैं, तो लोगों की आंखें खुली रह जाती हैंएक तो संकट, ऊपर से संगठित भी! बल्क में डर लगता है ।  लेकिन चुनाव है, किसी-न-किसी को चुनना तो पड़ेगा। नागरिकों को अपनी पसंद का संकट चुनना नीट की परीक्षा जैसा लगता है। अस्पताल, अदालत और नरक के दरवाजे अगर एक साथ खुले दिख जाएं तो दिमाग के दवाजे बंद हो जाते हैं । प्रायः आदमी डरकर महामृत्युंजय जाप करने बैठ जाता है। संविधान बनाने वालों को यह बात पता थी, इसलिए उन्होंने मतदान को गुप्त रखकर जीवनरक्षक उपाय किए। एक तरीका और है, अगली बार कोई संकट आए तो फौरन कंबल औढ़ कर सो जाइए और चालीसा पथ कीजिए ।“ भूतपिसाच निकट नहीं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै । नासै रोग हरे सब पीरा; जपत निरंतर हनुमत बीरा।।“

वो कुछ देर आवाज देगा, उसके बाद निकल जाएगा ।

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सोमवार, 20 जुलाई 2026

हग, हगिस्ट और हगेरियंस




 





          चुनाव के चार दिन किसी के लिए कुछ भी हों राजनीति वालों के लिए मानो बेटी का ससुराल होता है। जैसे ही कोई व्यक्ति सामने पड़े फ़ट्ट से झुक जाओ, चट्ट से चरण छू लो या फिर बनता हो तो लपक के हग कर लो। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर योग ज्यादा प्रसिद्ध हुआ या हग यह देखने वाली बात है । हग दो तरफा क्रिया होती है इसलिए इज्जत भी रह जाती है। पता ही नहीं पड़ता कि कौन किसको कर रहा है। दोनों सीना भिड़ाए एक दूसरे कि पीठ थपकारते हैं, मानो आशीर्वाद दे रहे हों । दोनों अपना बड़प्पन क्लेम कर लेते हैं। इसलिए जब भी जरूरत महसूस हो तो झपट कर हग करें और ससम्मान खुश रहें। यह चुनाव के समय की स्थिति है। सामान्य वक्तों में बशीर बद्र का कहना सही है -- "कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से ; ये नये मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो। "

माना जाता है कि लोकतंत्र में चुना हुआ व्यक्ति जनता के प्रति जवाबदार होता है लेकिन हकीकत यह है कि वह किसीको जवाब नहीं देता है। अघोषित सूत्र यह है कि जो सबके प्रति जवाबदार हो वह किसी के प्रति जवाबदार नहीं होता। अगर वह ठान ले कि जवाब नहीं देना है तो कोई भले ही अनशन पर बैठ जाए, उसका मुंह नहीं खुलवा सकता है । जनसंख्या जब करोड़ों में हो तो वादे करना चाहिए। पिछले वादों पर नए वादों की धूल डालना आसान होता है। तमाम वादे हों तो लोग भ्रमित रहते हैं। नए वादों के नीचे पुराने वादे दफन हो जाते हैं। धीरे-धीरे जनता वादों और नेताओं से ऊब कर भजन कीर्तन में लग जाती है। धर्म को अफीम भी कहा गया है। अफीम का नशा सात्विक होता है। इसमें आदमी संसार में रह कर भी संसार का नहीं होता है। राजनीति वाले इस बात की गहराई को समझते हैं ।

                  दुनियादारी का ज्ञान रखने वाले हमारे मित्र सरदार पहाड़सिंह एक ही बात कहते हैं कि - ' राजनीति बड़ी कुत्ती-चीज होती है जी '। अवश्य होती होगी, अभी तक किसी शहरी-गैरशहरी कुत्ती-चीज ने आपत्ति दर्ज नहीं करवाई है। आज की राजनीति का ऐसा है कि वह पट्टे और प्राइज टैग वाली होती जा रही है। जिन्हें आपत्ति दर्ज कराना होती है वे अक्सर  दुम हिलाने लग जाते हैं । लोग उनके नक्शेकदम अपनी पार्टियाँ व निष्ठाएँ तक बदलने में देर नहीं करते हैं। वैश्विक राजनीति में भी इसी प्रकार की कुत्ती-अदाएं दिखाई देती है। कौन कब गुर्राने लगेगा, कब किस पर झपट पड़ेगा कुछ कहा जा सकता है ? दुनिया देख रही है कि शांति का पुरस्कार नहीं मिले तो माय-फ्रेंड किस तरह सफ़ेद कबूतर कि गर्दन मरोड़ कर मिसाइल दागने लगता है।

                 असल बात यह है कि दुनिया में शांति कायम रखना है तो बारूद-युद्ध नहीं हग-युद्ध की जरूरी है । जिसने आगे बढ़ कर हग किया उसे फट्ट से  उतना ही हग मिला। सोचिए अमेरिकी और ईरानी लड़ाके दनादन हग करें तो अखबारों की हेडलाइन इत्र से छपने लगेंगी । देसी राजनीतिक संबंधों में भी हग एक शोध का विषय हो सकता है। जो हग के कीड़े हैं वे हग की ताकत जानते हैं।  अपना देसी वाला हग थोड़ा अलग होता है । बाजार को हग का मुनाफा मालूम है। सुन है एक लाफ्टर शो वाला हग हग के अरबपति और नंबर वन हो गया है । समय का संकेत है कि गले पड़ केधंधा करो । कंपटीशन बहुत है। संस्थान सोच रहे हैं कि अब रिसेप्शनिस्ट के साथ-साथ हगीस्ट भी रखना पड़ेंगे । रिसर्च वाले कह रहे हैं कि मेल-फीमेल दोनों हगेरियंस की मांग में जबरदस्त उछाल आने वाला है । बाजार और राजनीति के उसूलों में ज्यादा अंतर नहीं है। धंधों में काम अलग-अलग हो सकता है लेकिन नियत एक ही होती है। तो चलिए, निकलिए बाहर, हग-मार्केट की ओर चलते हैं।

 

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रविवार, 19 जुलाई 2026

शिक्षा लोकतंत्र के लिये धीमा जहर है


 



अंडा देने वाली मुर्गी और वोट देने वाली जनता पर बहुत प्यार आता है। लेकिन इंसाफ न मुर्गी के साथ होता है न जनता के साथ। अंडा देती है तभी तक मुर्गी है; अंडा खतम तो मुर्गी हजम। दुनिया का यही दस्तूर है। वोट देने वालों ने दिया, लेने वालों ने लिया, बाद में सब घुसपैठिए!

वोटर की पहचान पहले खतम होती है, नागरिकता बाद में। सरकारी पलटन द्वारा जो वोटर मान लिए गए, समझो वे गंगा नहा गए। गंगा पापियों के पाप धोती है और यही काम वोटर का भी है। दोनों में फर्क यह है कि गंगा आरती रोज होती है, जबकि वोटर की आरती नामांकन भरने के बाद शुरू होती है और मतदान के बाद बंद हो जाती है। बहुरूपिये आते हैं और वोटर के सामने इतना झूठ रोते हैं, इतने आँसू बहाते हैं कि गरीब की पतली दाल को भी पानी-पानी कर देते हैं। वोटर दयालु होता है और अपना पेट काटकर बहुरूपियों का पेट भर देता है। मौका पड़ने पर जो वोटर 'बम्पर' है, गरज निकल जाने के बाद वही मक्खी-मच्छर है। इन दिनों तो 'कॉकरोच' का खिताब देकर बोलने की स्वतंत्रता को सार्थक किया जा रहा है।

सब जानते हैं कि वोटर दो तरह का होता है। आस्थावान वोटर लोकतंत्र का एटीएम (ATM) होता है। वह यंत्रवत वोट करता है और बूथ से बाहर निकलते ही सब भूल जाता है। अमेरिका और जापान अपने तरीके से रोबोट बना रहे हैं, इधर हमारा तरीका अलग है और कारगर भी है। हमारे रोबोटों को अंदर-बाहर का पूरा डाटा पता होता है, इसलिए वे केवल वोट डालते हैं और लीडर नहीं, 'सेवक' चुनते हैं। टोकरी भर मेंढक हों या सेवक, सब एक से दिखाई देते हैं—मानो यूनिफॉर्म पहने हों। मेंढकों की कोई शक्ल-सूरत नहीं होती, उनकी केवल गणना की जा सकती है। मेंढक गीले और सूखे, दोनों वातावरण में रह सकते हैं। कौन-सा मेंढक कब उछलकर किस कीचड़ का हो जाएगा, कोई कह नहीं सकता। लोग जिसे एक पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनते हैं, वह जीतने के बाद किसी दूसरे कोठे पर 'सलामे-इश्क' गाने लगता है। बे-आत्मा टीवी वालियाँ इसे लोकतंत्र की खूबसूरती और आत्मा की आवाज कहती हैं।

लोकतंत्र की निरंतरता बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी है कि प्यारी जनता भुलक्कड़ भी हो। संत कहते हैं कि पिछला भूलो और आगे बढ़ो। ईश्वर भी पिछले जन्म की स्मृतियाँ मिटा देता है ताकि मनुष्य उसमें उलझकर अपना नया जन्म नष्ट न करे। जिन्होंने पिछला याद रखा, उनको दुख के अलावा कुछ नहीं मिला। पिछला याद कर छाती कूटते रहिए, कोई नहीं सुनेगा। भूल-भालकर सुखी रहना खुद जनता के हाथ में है। चोर-लुटेरे तक कह रहे हैं कि लोगों को आत्मनिर्भर बनना चाहिए। भूल जाने की इसी कला के दम पर माना गया है कि राजनीति में कोई स्थाई मित्र या स्थाई शत्रु नहीं होता। जो कल तक फूटी आँख नहीं सुहाते थे, आज आँखों का तारा हो जाते हैं।

अच्छा शासक वही होता है जो इतिहास से घृणा करे—चाहे वह अपना हो या दूसरों का। कुछेक जो याद रखते हैं, वे 'जंगली' कहलाते हैं। हमें लोकतंत्र बचाना है तो लोगों को शिक्षा से भी दूर रखना पड़ेगा। शिक्षा लोकतंत्र के लिए धीमा जहर है। पढ़े-लिखे लोग ज्यादा याद रखते हैं। व्यवस्था वही दीर्घजीवी होती है, जिसमें महत्त्वाकांक्षी बहुत कम और समर्पित लोग अधिक हों।

आमतौर पर शिक्षित व्यक्ति ही बेरोजगार होता है और अपनी आधी-पौन जिंदगी नौकरी के विज्ञापन ढूँढने में बिता देता है। अनपढ़ों को देखिए, उनके लिए कामकाज की कोई सीमा नहीं है। मजे में कुएँ बनाओ, तालाब बनाओ, सड़कें बनाओ, गौशालाएँ बनाओ; मौका मिल जाए तो कार बनाओ, पेट्रोल बनाओ, पुल बनाओ! देश डिग्री नहीं, काम देखता है। पढ़ो मत, डरो मत, मौका निकालो और काम करो!

रविवार, 5 जुलाई 2026

छतरी एक सम्भावना है








छुट्टी का दिन है, मुख़्तार सिंग वरांडे में बैठे लाठी को तेल पिला रहे हैं । हमें देखते ही वे बुलडोजर की तरह पलटे और अपना मोटा पेट अंदर खींचते हुए छाती को ज़बरिया चौड़ाया।

  "अरे भिया मुख़्तार सिंग जी !! मरोगे क्या  !?"  हमने डरने की मुद्रा में एक सादा सा सवाल पूछा जो इस समय देश भर में जड़ें जमाए बैठा है। 

"अरे कैसी बातें करते हो! तुमको क्यों मारेंगे!? न तुम कभी धार्मिक मामलों में कुछ बोलते हो और न ही चलती राजनीति में फच्चर मारते हो। तुम जैसे लोग ही तो हमारी ताकत हो । क्या कहते हैं.... बैक बोन हो हमारी। " वे बोले। 

" पड़ोसी भी तो हैं भिया आपके। " 

"पड़ोसी वड़ोसी से कोई मतलब नहीं है, आदमी सई होना चिये बस। गलत पड़ोसी परमानेंट हेडक होता है। आदमी हो या मुल्क।"

" लाठी के साथ आपकी भंगिमा देख कर मुझे लगा कि... "

" भंगिमा तो रखना पड़ती है। भंगिमा का ही जमाना है। गधे अगर घोड़े की भंगिमा रखें तो सामने वाले उसे खच्चर तो मान ही लेते हैं। धीरे धीरे लोकतंत्र भूलो, हम लोग अब भंगिमातंत्र में जी रहे हैं। आधे से ज्यादा काम तो भंगिमा से हो जाता है। आदमी लुच्चा, लफंगा, बेईमान, झूठा-लबार सब चल जाता है बस भंगिमा से सच्चाई और ईमानदारी के फूल झरना  चइये । हत्यारे लोग आजकल बड़े चाणक्य हो गए हैं, आदमी को मार देते हैं और उसकी शोकसभा में फूल भी चढ़ा आते हैं। ये है भंगिमा का मजा। " 

" हम लोग तो आम आदमी है मुख्तार सिंह जी। हम क्या जाने क्या है भंगिमा और क्या है पॉलिटिक्स। "

" यह भी आम आदमी की एक भंगिमा है। ' एड़ा बन के पेड़ा खा लेते हैं' और किसी को पता भी नहीं चलता है । कोई नेता दिखता है तो हाथ जोड़ने की भंगिमा में खड़ा हो जाता है और अंदर से गाली बकता है। किसी भी दफ्तर में चले जाओ तो टेबल के ऊपर ईमानदार का बाप और टेबल के नीचे अपने बाप का भी नहीं। भक्तों की भंगिमा में चोर बैठे होते हैं और भगवान तक को पता ही नहीं चलता। भंगिमा जनता के सेवक होने की और असली काम लूट लूट कर तिजोरी भरने का। दुनिया सदमे में है लेकिन सबको स्वर्ग दिख रहा है। "

अभी वो और भी खरनाक ज्ञान देने के मूड में थे लेकिन हमने बात बदली। " आप ठीक कह रहे हैं लेकिन यह तो बताइए इतनी महंगाई में लाठी को तेल क्यों पिला रहे हैं!? "

" ये क्या लाठी लाठी बोल रहे हो !! लाठी बूढ़े और कमजोर लोगों के पास होती है। इसे दण्ड कहिये। दण्ड हाथ में हो तो भंगिमा शौर्यपूर्ण हो जाती है। और तेल पिलाने से दण्ड समृद्ध होता है। सूखी दुबली लाठी पिछड़े गरीब के समान होती है। देखना एक दिन हर हाथ में समृद्ध दण्ड होगा और हम विश्वगुरु बन जाएंगे।" 

" दण्ड से हम विश्व गुरु कैसे बन जाएंगे !? "

" बताया ना भंगिमा बहुत बड़ी चीज होती है।... तुम्हारे पास दण्ड है? "

" नहीं, मेरे पास छतरी है। "

" छतरी में कोई संभावना नहीं है। जब तेज हवा चलती है तो छतरी तोतों कि तरह उड़ जाती है। इसलिए दण्ड रखा करो । "

" बारिश में दण्ड मुझे भीगने से कैसे बचाएगा!? "

" छुपने प्रवृत्ती कायरता है। तुम्हें मुख्यधारा में आना चईये,  भंगिमा बनाओ, कमर कसो, दण्ड रखो ।"

" रख लेता मुख़्तार सिंग जी, मगर तेल बहुत महँगा है। आपने अभी बताया कि दण्ड को तेल पिलाना पड़ता है। हमें तो बघार में भी कटौती करना पड़ती है। " 

" कोई बात नहीं, तुम ये दण्ड ले जाओ, भंगिमा बनाओ और छतरी यहीं छोड़ जाओ। "

"मुख़्तार सिंग जी आप रहने दीजिये, मुझे दण्ड नहीं चाहिए। मतलब मेरे हाथ में दण्ड शोभा नहीं देगा। और छतरी का आप क्या करोगे! वो तो उड़ जाती है!" 

" जब दण्ड से काम नहीं चलेगा तब छतरी एक सम्भावना है।... तुम नहीं समझोगे। " 


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