रविवार, 5 जुलाई 2026

छतरी एक सम्भावना है








छुट्टी का दिन है, मुख़्तार सिंग वरांडे में बैठे लाठी को तेल पिला रहे हैं । हमें देखते ही वे बुलडोजर की तरह पलटे और अपना मोटा पेट अंदर खींचते हुए छाती को ज़बरिया चौड़ाया।

  "अरे भिया मुख़्तार सिंग जी !! मरोगे क्या  !?"  हमने डरने की मुद्रा में एक सादा सा सवाल पूछा जो इस समय देश भर में जड़ें जमाए बैठा है। 

"अरे कैसी बातें करते हो! तुमको क्यों मारेंगे!? न तुम कभी धार्मिक मामलों में कुछ बोलते हो और न ही चलती राजनीति में फच्चर मारते हो। तुम जैसे लोग ही तो हमारी ताकत हो । क्या कहते हैं.... बैक बोन हो हमारी। " वे बोले। 

" पड़ोसी भी तो हैं भिया आपके। " 

"पड़ोसी वड़ोसी से कोई मतलब नहीं है, आदमी सई होना चिये बस। गलत पड़ोसी परमानेंट हेडक होता है। आदमी हो या मुल्क।"

" लाठी के साथ आपकी भंगिमा देख कर मुझे लगा कि... "

" भंगिमा तो रखना पड़ती है। भंगिमा का ही जमाना है। गधे अगर घोड़े की भंगिमा रखें तो सामने वाले उसे खच्चर तो मान ही लेते हैं। धीरे धीरे लोकतंत्र भूलो, हम लोग अब भंगिमातंत्र में जी रहे हैं। आधे से ज्यादा काम तो भंगिमा से हो जाता है। आदमी लुच्चा, लफंगा, बेईमान, झूठा-लबार सब चल जाता है बस भंगिमा से सच्चाई और ईमानदारी के फूल झरना  चइये । हत्यारे लोग आजकल बड़े चाणक्य हो गए हैं, आदमी को मार देते हैं और उसकी शोकसभा में फूल भी चढ़ा आते हैं। ये है भंगिमा का मजा। " 

" हम लोग तो आम आदमी है मुख्तार सिंह जी। हम क्या जाने क्या है भंगिमा और क्या है पॉलिटिक्स। "

" यह भी आम आदमी की एक भंगिमा है। ' एड़ा बन के पेड़ा खा लेते हैं' और किसी को पता भी नहीं चलता है । कोई नेता दिखता है तो हाथ जोड़ने की भंगिमा में खड़ा हो जाता है और अंदर से गाली बकता है। किसी भी दफ्तर में चले जाओ तो टेबल के ऊपर ईमानदार का बाप और टेबल के नीचे अपने बाप का भी नहीं। भक्तों की भंगिमा में चोर बैठे होते हैं और भगवान तक को पता ही नहीं चलता। भंगिमा जनता के सेवक होने की और असली काम लूट लूट कर तिजोरी भरने का। दुनिया सदमे में है लेकिन सबको स्वर्ग दिख रहा है। "

अभी वो और भी खरनाक ज्ञान देने के मूड में थे लेकिन हमने बात बदली। " आप ठीक कह रहे हैं लेकिन यह तो बताइए इतनी महंगाई में लाठी को तेल क्यों पिला रहे हैं!? "

" ये क्या लाठी लाठी बोल रहे हो !! लाठी बूढ़े और कमजोर लोगों के पास होती है। इसे दण्ड कहिये। दण्ड हाथ में हो तो भंगिमा शौर्यपूर्ण हो जाती है। और तेल पिलाने से दण्ड समृद्ध होता है। सूखी दुबली लाठी पिछड़े गरीब के समान होती है। देखना एक दिन हर हाथ में समृद्ध दण्ड होगा और हम विश्वगुरु बन जाएंगे।" 

" दण्ड से हम विश्व गुरु कैसे बन जाएंगे !? "

" बताया ना भंगिमा बहुत बड़ी चीज होती है।... तुम्हारे पास दण्ड है? "

" नहीं, मेरे पास छतरी है। "

" छतरी में कोई संभावना नहीं है। जब तेज हवा चलती है तो छतरी तोतों कि तरह उड़ जाती है। इसलिए दण्ड रखा करो । "

" बारिश में दण्ड मुझे भीगने से कैसे बचाएगा!? "

" छुपने प्रवृत्ती कायरता है। तुम्हें मुख्यधारा में आना चईये,  भंगिमा बनाओ, कमर कसो, दण्ड रखो ।"

" रख लेता मुख़्तार सिंग जी, मगर तेल बहुत महँगा है। आपने अभी बताया कि दण्ड को तेल पिलाना पड़ता है। हमें तो बघार में भी कटौती करना पड़ती है। " 

" कोई बात नहीं, तुम ये दण्ड ले जाओ, भंगिमा बनाओ और छतरी यहीं छोड़ जाओ। "

"मुख़्तार सिंग जी आप रहने दीजिये, मुझे दण्ड नहीं चाहिए। मतलब मेरे हाथ में दण्ड शोभा नहीं देगा। और छतरी का आप क्या करोगे! वो तो उड़ जाती है!" 

" जब दण्ड से काम नहीं चलेगा तब छतरी एक सम्भावना है।... तुम नहीं समझोगे। " 


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