रविवार, 19 अप्रैल 2026

टन टना टन टमचू ... द-गॉड !


 


एक बड़ा युद्ध देखने के बाद टमचू को फिर नोबल की याद आ गई। तुरंत उसने अपने को सांत्वना दी  कि नया-नोबल कोई ‘शरीफ ‘  बंदा दे देगा। ज़ख्मों पर पट्टीयां लगवा कर डील के पहले ही उसने युद्ध समाप्ति की घोषणा की । यह युद्ध शांति के लिए था । समझो पटाखे खतम दिवाली खतम ।

 हर पल एक नया झूठ टमचू का सच है । उसने दिन में दस बीस झूठ बोल कर दुनिया भर के दूसरे झूठे नेताओं को पीछे छोड़ दिया है । हाल ही में उसने कहा कि शांति और प्रेम उसकी प्राथमिकता है। गॉड की जगह खुद को चेंपते हुए उसने पोस्टर के जरिए प्रेम और शांति की आक्रामक पेशकश की। उसे लगा कि अगर वह पूरी दुनिया में उथल पुथल मचा सकता है तो किसी गॉड से कम नहीं है। गॉड न युद्ध कर सकता है न रोक सकता है। यह दोनों काम टमचू ने दुनिया को कर दिखाए हैं। उसके दिमाग में इस विचार की कौंध हुई कि वह गॉड से बड़ा है। बल्कि उसे ही गॉड होना चाहिए। पोप वाले हों या तोप वाले हों सबको यह बात मान लेनी पड़ेगी । वैसे गॉड है क्या, पोस्टर ही तो है। भक्तों के लिये तो पोस्टर ही गॉड है। टमचू अब हर पोस्टर में गॉड की जगह खुद आ जाता है। लोगों ने बीमार के सर पर हाथ रखे टमचू को देखा । ज्यादातर लोग  समझ नहीं पा रहे हैं कि उस बेचारे की जान क्यों ले रहा है । सभ्यता को मिटा देने की उसकी पवित्र सनक गॉड को भी डरा सकती है। गॉड के पास तो सेना ही नहीं है ! टमचू बड़ा गॉड है, उसके पास बड़े हथियार और बड़ी सेना है। उम्मीद है कि जिंदाबाद करने वाली जनता अब उसकी पूजा करने लगेगी । वह गॉड होने के करीब हो जाता है। उसके द्वारा किया गया युद्ध और गलतियां अब गॉड की हो जाती है। युद्ध बंद करने की घोषणा वह गॉड बन कर करता है।

ताकतवर देशों में सेना शांति और प्रेम की बुनियाद है। आप जानते हैं कि दो देशों के बीच सैन्य शक्ति की लगातार होड़ होती रहती है। दरअसल हथियारों कि यह होड़ शांति बनाए रखने के लिये होती है। भारत वाले मानते हैं कि “भय बिनु होई न प्रीति “। और यह केवल किसी पवित्र किताब की पंक्ति भर नहीं है। आज जनता किसी पार्टी या नेता को जो प्रेम दिखा रही है तो लगता है वह कहीं गहरे तक पैठे भय के कारण है। देसी देशभक्त मानते हैं कि जितना भय बढ़ेगा उतनी प्रीत बढ़ेगी।  हमारे नींबू पेलवान पिछले दिनों भारी मतों से जीत गए। पता चला कि जिन-जिन को उन्होंने ठोका-पीटा था उन्होंने सबसे पहले जाकर वोट दिया। और भगवान कसम उन्हें ही दिया ।  प्रीत प्रेरित राजनीति हमारा आविष्कार है । यही फार्मूला टमचू को भी ठीक लग रहा है। क्यों नहीं लगेगा ! हम करीब करीब विश्वगुरु जो हैं । दुनिया भर के तमाम देश परस्पर प्रीत बनाए रखने के लिए रात दिन प्रयासरत हैं। अमेरिका और चीन में प्रीतबाजी शुरू हो गई है । जल्द ही दो प्रेसीडेंट झप्पियाँ डालेंगे और अक्कल दाढ़ भी गिनेंगे । आप चाहें तो इसे चमत्कार कह सकते हैं ।

कहा जाता है कि नंगे से गॉड भी डरता है। जिन दिनों टमचू घुड़क रहा हो तो गॉड युद्ध के मैदान से दूर रहता है। पता चला है कि टमचू सनकी नहीं गजब का प्रेमी भी है। मौका मिल जाए तो बिना किसी हिचक के छोटी-बड़ी बच्चियों से प्रेम कर डालता है। फाइलें न भी पड़ी हों तो दुनिया को विश्वास है । वह जानता है कि प्रेम के लिये अंदर की साइड प्रेम होना जरूरी है। वो गरीबों का हमदर्द है । ऊपर से भले ही पूंजीवादी है लेकिन अंदर लाल चड्डी पहनता है । डील के लिए जब वह जाएगा तब हरी चड्डी पहन लेगा । ऐसा सुना गया है कि युद्ध के दौरान लांड्री को पीली चड्डियाँ भी बरामद हुई । लेकिन किसकी थी पता नहीं चला है ।

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लंबी लंबी छोड़, ऊंची ऊंची उड़ा


 


 

पुराने समय में कहा जाता था कि झूठ के पाँव नहीं होते हैं । लेकिन इन्टरनेट के जमाने में अब झूठ के पंख होते हैं ! झूठ मुआ बड़ा स्मार्ट हो गया है । डेढ़ जीबी डाटा में झूठ दिन भर ऐसे छाती ठोक के आता जाता है जैसे सच का बाप हो । चुनाव का मौसम है तो विशेषज्ञ बिना किसी झिझक के मानते हैं कि झूठ का मौसम है । दिल्ली झूठ की राष्ट्रीय मंडी है । पुराने दिल्लीबाज़ कभी किसी पर विश्वास नहीं करते हैं । उनका तजुरबा है कि जो जितनी लंबी लंबी छोड़ता होता है उसकी पतंग उतनी ऊंची ऊंची उड़ती है । कहते हैं झूठ हजार बार बोला जाए तो उसका सिक्का सच की तरह चलने लगता है । तकनीकी विकास ने झूठ के बाज़ार को रॉकेट लगा दिये हैं । इधर से झूठ का ‘भाइयों-बहनों’ डालो और उधर से सचमुच की सत्ता निकाल लो । हर हाथ में झूठ की फेक्ट्री है और हुनर तो दे ही रखा है उप्पर वाले ने । एक झूठ पंद्रह मिनिट में सच की फसल हो जाता है । आज की जनता जिसके अंदर रियाया होने के जींस अभी भी अंगड़ाई ले रहे हैंमानती है कि महाराज न सही महराजनुमा पीढ़ी दर पीढ़ी ईश्वर के प्रतिनिधि हैं । सो महाराजनुमा की ही जय हो । देने वाला श्री भगवान होता हैचाहे वो देने का वादा करे और न भी दे । संत कह गए हैं कि जगत मिथ्या है तो राजपाठ भी मिथ्या हैवोट भी मिथ्या है । जीवन चार दिनों कावह भी समझो भ्रम है । गालिब ने कहा है कि दो आरजू में कट गए दो इंतजार मेंहासिल कुछ भी नहीं हुआ । जब गालिब को नहीं हुआ तो बाकियों को क्या होगा ।

 

जिन खोजा तिन पाइयागहरे पानी पैठ ; मैं बपुरा बूरन डरारहा किनारे बैठ । तो फिर खोजें  सत्य क्या है !आवाज आई ‘बच्चा राम नाम सत्य हैसबसे बड़ा सत्य परलोक है’ । शरीर झूठा है आत्मा सच्चीजब मौका मिले फटाफट निकल्ले । सपनों से बड़ा कोई सुख नहीं और जो सुखदाई है वही सच है । सपना चाहे जन्नत में बहत्तर हूरों का हो या बहत्तर हजार रुपए सालाना मुफ्त खाते में आने का होसुखदाई है । झूठ के व्यापार की जमीन हमेशा हरी होती है । गधे आँखें बंद करके इस इरादे से चरते हैं कि सारी की सारी मैं ही चर लूँगा । और आश्चर्य की बात यह कि बिना चारा वे मोटे भी होते रहते हैं । इधर तो सबकी आँखें बंद हैं । किसी का ये खतरे में है तो किसी का वो खतरे में है । लेकिन खतरे का सच यह है कि कोई खतरे में नहीं है । हर पार्टी डर और विश्वास के बीच अपना अपना इंसुलीन बेच रही है । वह माने बैठी हैं कि उनके प्रति एक भरोसा है सबके दिमाग में । इस फर्जी भरोसे को उन्हें बस जिंदा रखना है चुनाव तक । उसके बाद लोगों की आँखें खुलती हों तो खुल जाएँ कोई फर्क नहीं पड़ने वाला ।

 

 लोहे से लोहा कटता है । फर्जी सामग्री की काट फर्जी सामग्री है । इधर फर्जी तो उधर भी फर्जी । वोटर को जब तक समझ में आएगा तब तक लीडर चुग जाएगा खेत । बस आप खामोश रहिए । जनसंख्या एक सौ चालीस करोड़ है लेकिन यह सच नहीं है । गरीबीमहंगाईबेरोजगारी सच नहीं है । हत्या और बलात्कार भी सच नहीं हैं । बेईमानीभ्रष्टाचार तो कतई सच नहीं हैं । रेडियो पर कोई गा रहा है  “कुछ ना कहोकुछ भी ना कहो ।  क्या कहना हैक्या सुनना है । मुझको पता हैतुमको पता है । समय का ये पलथम सा गया है और इस पल में कोई नहीं है  बस एक मैं हूँ । बस एक तुम हो 

 

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सोमवार, 6 अप्रैल 2026

जगत जीजा की दुनिया में साले ही साले


 



कुंवारा आदमी साला विहीन होता है। शादी करके जो पत्नी को छोड़ देते हैं उनके साले रिश्तेदारी के सम्बोधन से खिसक कर गाली हो जाते हैं। सालों का सुख शादीशुदा को मिल ही जाता हो यह जरूरी नहीं है। कुछ लोगों को साले थानेदारों की तरह मिलते हैं। इसी रौबदाब के चलते सालों का मार्केट बहुत हाई बना रहता है। जिसने भी कहा है कि "सारी खुदाई एक तरफ जोरू का भाई एक तरफ" तो  कुछ सोच समझ कर और बहुत कुछ अनुभव करके ही कहा है।  साले सौ प्रतिशत प्राकृतिक होते हैं। यानी जितने हैं उतने ही मिलेंगे, न एक कम न एक ज्यादा । लालची दूल्हा दहेज में पाँच लाख रुपए कम लेकर दो एक्स्ट्रा सालों की डिमांड करे तो केस बिगड़ सकता है। शादी के मंडप में भगवान खुद मौजूद होते हैं लेकिन उनके लिए भी 'ऑन द स्पॉट' साला सप्लाई संभव नहीं है।  इसलिए होशियार लोग शादी के लिए लड़की बाद में देखते हैं, पहले उसके भाइयों की गिनती कर लेते हैं। यह काम प्रायः मामा यानी बाप के साले करते हैं।  भाई तगड़े हों तो तगड़ी बहन की भी शादी हो जाती है, वरना ऐरे गैरे लड़के अच्छी भली और गुणी लड़कियों को रिजेक्ट करते फिरते हैं।

अब तो जमाना बदल गया है ।  साले एक या दो ही होते हैं जिनकी एलईडी बल्ब की तरह साल भर की गारंटी होती है । उसके बाद वो जीजा को देख कर रौशन हो पड़ें यह जरूरी नहीं है। नए जमाने के सालों को नरम बनाए रखने के लिए जीजा को दुगना नरम होना पड़ता है । बल्कि कई बार तो पिलपीला तक हो जाना पड़ता है। ऐसी कई मिसाइलें हैं जहां जीजा की रीढ़ की हड्डी टेढ़ी थी उसे सालों ने फिजियोथेरेपी दे कर सीधी की। आपने भी लोगों को कहते सुना होगा कि डॉक्टर होते तो अच्छे हैं लेकिन साले जांचें बहुत सारी लिख देते हैं।  रिश्तेदारी के मामले में साले जीजा के बीच 'जांच' का रिश्ता महत्वपूर्ण होता है। आजकल जगह-जगह लिखा होता है कि सावधान आप कैमरे की निगाह में हैं। शादीशुदा आदमी के लिए यह कैमरा साला होता है । साले और जीजा की पूरी उम्र एक दूसरे पर निगाह रखने में गुजर जाती है। दोनों एक ही बात सोचते हैं कि मौका कब मिलेगा । कब आएगा ऊंट पहाड़ के नीचे ।  

इधर एक मांगीलाल माले जी हैं। बताते हैं कि शादी के कुछ बरस बाद उन्होंने एक कार खरीदी थी । बड़े अरमान थे कि खुद शान से चलाएंगे। अरमानों पर किसी का कॉपीराइट नहीं होता है। यही अरमान उनके साले साहब का भी था। साले साहब ने जीजा माले के लिए एक ड्राइविंग स्कूल सेट किया। ड्राइविंग स्कूल वालों का दावा था कि पंद्रह दिन में गाड़ी चलाना सिखा देंगे लेकिन माले को स्टीयरिंग पकड़ने में ही महीना भर लग गया। अभी तो ब्रेक, एक्सीलरेटर, क्लच, गियर और भी बहुत कुछ था जिसमें न जाने कितने महीने लगना तय थे। माले जी का कहना है कि साले कोच ने जानबूझकर नहीं सिखाया। और तो और तीन महीने की फीस एडवांस मांगने लगा, साला कोच कहीं का । लेकिन माले ने फीस नहीं दी और नई कार पोर्च में ख़डी रखने का मन बनाया लिया।  लोग कार देखते और पूछते कि चलाओगे कब! वह एक ही जवाब देते कि साले कोच ने जानबूझकर नहीं सिखाया। उनके मन में एक गुस्सा बैठ गया। जो भी आदमी उनके मन माफिक नहीं होता उसमें अब साला नजर आता । सोचते रहे कि दूसरा कोच साला कब मिलेगा पता नहीं। मौका ताड़ कर उनका अपना निजी साला बोला - " जीजा जी कब तक खड़ी गाड़ी में कपड़ा मारते रहोगे, बेचो बाचो और फुर्सत पाओ। " माले ने वैसे ही सहज भाव से कह दिया कि बेच दूंगा कोई ग्राहक मिला तो। इतना सुनते ही साले साहब डील  ड़न कर ली और एक लाख कम में शानदार कार ले उड़े । माले समझ ही नहीं पाए कि यह क्या हो गया। कार गुजर गईं गुबार देखते रहे।

अब वे बात बात पर साले को चबाते हैं । बोले साला टरम्प बेवकूफी कर रहा है पूरी दुनिया परेशान हो रही है । कल स्कूटर में पेट्रोल लेने गया तो साले ने दिया नहीं बोला खतम हो गया । तुम्हें पता है सालों ने दूध भी महँगा कर दिया ! कल बाजार गया तो सब साले मूँ फाड़ने लगे । इधर शेयर बाजार देखो तो साला गिरता ही जा रहा है । उनके लिए पूरी दुनिया सालों से भरी है और वे जगत जीजा है ।

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गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

जब मेहनती मूषक जमीन खोदेंगे


 



जब जहाज डूबता है या युद्ध गले की हड्डी बन जाता है, तो मोटा चूहा पहले भागता है । मीडिया ने यह बात फैला रखी है, लेकिन चूहों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वे अब बदनामी को मस्त ओढ़ते-बिछाते हैं। वैसे भी, जनता अब बदनामी को ही लोकप्रियता मानने लगी है। जानकार बताते हैं कि दुनिया भर में चूहे ही राज कर रहे है। वे ज़माने लद गए जब चूहों को सिर्फ चूहा समझा जाता था । आज के दौर में जब दो चूहे वैश्विक मंच पर मिलते हैं, तो 'कुतरन एग्रीमेंट' पर हस्ताक्षर होते हैं— "तुम मेरे यहाँ कुतरो, मैं तुम्हारे यहाँ कुतरूँगा।" ये समझौते और सहमतियाँ फाइलों में दर्ज होती हैं, क्योंकि जहाँ कुतरने की डील होती है, वहाँ फाइलें अनिवार्य होती हैं।

फाइलों से चूहों का नाता बहुत पुराना है। चूहों के असली नाम कभी सार्वजनिक नहीं होते; बस फाइलें ही उनका 'आधार' जानती हैं। यही फाइलों की असली ताकत है। कुछ फाइलें तो 'नगरवधू' की तरह होती हैं, जिनको  सूंघते हुए चूहे सात समंदर पार से गाते हुए खिंचे चले आते हैं "सलामे इश्क मेरी जान जरा कबूल कर लो, तुम हमको प्यार करवाने की जरा सी भूल कर लो।"  फाइल के करीब आने के बाद देसी और विदेशी चूहों को अहसास होता है कि वे तो 'ब्रदर-इन-आर्म्स' हैं। फाइल के हमाम में सारे नंगू चूहे और नंगू होते हैं। बिल्ली के डर से चूहे फाइलों को इस कदर कुतर देते हैं कि सबूत की  'अस्थियाँ' भी न बचे। जब कभी कोई फाइल बाहर आती है, तो देखने वाले समझ जाते हैं कि चूहों ने अपना मुंह काला कर लिया है। जो मामला वर्षों से टल रहा होता है, वह कुतरी फाइलों के कारण मजे में दबा रह जाता है।

इधर बिल्लियाँ खा-खाकर 'मोटापे' और 'आलस' का शिकार हैं। वे ज्यादातर समय आँखें बंद किए 'सिस्टम' की गोद गरम किये रहती हैं। लोग गोदी मीडिया का आरोप लगाते हैं उन्हें जान कर खुशी होगी कि गोदी सिस्टम भी मौजूद है । बावजूद इसके चूहे अब बिल्ली से नहीं बल्कि फाइलों से डरते हैं। एक चूहा दूसरे को फाइल के हवाले से डराता है, और कुछ बुद्धिजीवी इसी 'डराने-धमकाने' के खेल को राजनीति कह देते हैं। जिसे हम 'दफ्तर' कहते हैं, वह असल में चूहों का 'बैटलफील्ड' है। यहाँ चूहे 'ऑर्गनाइज्ड गैंग' बनाकर कुतरते हैं।

चतुर चूहे बहुत फुर्तीले होते हैं। जब कोई अलमारी खोलता है, तो उसे फाइलें कम और करतूतों की कुतरन ज्यादा मिलती है। फाइलों में कारोबार और लेन-देन का ब्यौरा होता है। ज्यादातर चूहे कारोबार में कम, लेन-देन में ज्यादा यकीन रखते हैं। यदि किसी जहाज में ये चूहे लग जाएँ, तो उसे डुबोकर ही दम लेते हैं। पिछले दिनों एक राज्य में करोड़ों का भारी-भरकम पुल चूहे खा गए और बिल्लियाँ सोती रहीं। हद तो तब हो गई जब जप्त की गई लाखों शराब की बोतलों के ढक्कन कुतरकर चूहे सारी शराब गटक गए और बिल्लियाँ सोती रहीं। अस्पतालों से करोड़ों की दवाएं बॉक्स समेत खा गए और तब भी बिल्लियाँ सोते हुए सबका साथ सबका विकास नामक सपना देखती रहीं । चूहे अब जादूगर हो गए हैं; वे कभी सूट पहनकर, कभी टाई लगा कर तो कभी गलें में दुपट्टे डाल कर आते-जाते हैं। बिल्लियाँ सो रही हैं, इसलिए चूहों को लगता है कि राज उनका ही है। वे मानते हैं कि 'संगठन ही शक्ति' है। अगर वे शक्ति प्रदर्शन पर आ जाएं, तो पूरा शहर कुतर सकते हैं । किसी दिन संगठित चूहे कानून की पूरी किताब को ही कुतरकर कूड़ा कर सकते हैं। जब मेहनती मूषक जमीन खोदेंगे, एक गाँव नहीं, एक शहर नहीं, एक देश नहीं, पूरी दुनिया खोदेंगे ।

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बुधवार, 1 अप्रैल 2026

आउटर पर जिंदगी


 



वीर विक्रम सिंह को लोग 'वीवीएस' के नाम से पुकारते हैं। 65 पार कर रहे वीवीएस को रह-रहकर लगता है कि न जाने इस रात की सुबह होगी या नहीं। 'जिंदगी पानी का बुलबुला है'—अब वे यह जानते हैं। और यह भी कि बुलबुला तो बुलबुला है, बुलबुले का क्या! आजकल काले कपड़े पहनना फैशन है, किंतु काला सूट पहना हर आदमी उन्हें 'यमराज' का दूत मालूम पड़ता है। काले लिबास वालों से निगाहें मिल जाएं, तो उनकी रूह कांप जाती है। मोटी बीमा पॉलिसी अब उन्हें निरर्थक लग रही है। वे जानते हैं कि मरना एक दिन अटल है, पर मन है कि मानता नहीं। जीने की जिद इतनी है कि वह जिंदगी से आगे निकली जा रही है।

उन्होंने अपने लिए कुछ कड़े अनुशासन तय कर लिए हैं; मसलन, कोई काले स्कूटर या बाइक वाला लिफ्ट दे, तो किसी भी सूरत में नहीं बैठना है। फुटपाथ कितना भी चौड़ा और खाली क्यों न हो, हमेशा किनारे-किनारे ही चलना है। एक दिन मुकेश का गाया वह गीत कान में पड़ गया"न हाथी है न घोड़ा है, वहां पैदल ही जाना है..." बस, हफ्ता भर हो गया, वीवीएस मॉर्निंग वॉक पर नहीं निकले।

एक दिन खबर मिली कि पहली गली वाले चंद्रकांत तीसमारे बाथरूम में फिसलकर 'सिधार' गए। कमबख्त बाथरूम न हुआ, दूसरी दुनिया का 'वेलकम गेट' हो गया! तब से छोटी-मोटी हाजत को भी वे तब तक दबाए बैठे रहते हैं, जब तक कि वह दबाव मौत के डर के बराबर न हो जाए। वे अक्सर सोचते हैं कि पुराने लोग जो लोटा लेकर जंगल की ओर दौड़ते थे, वही ठीक था। पाँच-दस मच्छर जरूर काटते होंगे, पर कम से कम जान का खतरा तो नहीं था। पास में नगर निगम का पार्क है, वहाँ गुंजाइश निकल सकती है, लेकिन मजबूरी है— 'कमोड' की आदत जो है। उनके भीतर यह विचार गहराता जा रहा है कि आधुनिक सुविधाएं और विकास ही आदमी को यमराज के करीब ले जा रहे हैं।

अखबार खोलते ही वीवीएस फ्रंट पेज की हेडलाइन्स छोड़कर सबसे पहले 'शोक समाचार' वाला पृष्ठ पढ़ते हैंकौन-कौन गया! आसपास के साठ-पैंसठ पार वालों को अब वे बड़ी गौर से देखते हैं कि पता नहीं, ये कल मिलेंगे या नहीं? मन ही मन अटकलें लगाते— "लगता तो ठीक है, जरूर शिलाजीत खाता होगा। लेकिन कमबख्त हार्ट-अटैक तो आजकल किसी को भी आए जा रहा है!" जवानी के दिनों से ही वे अपने दिल को काबू नहीं कर पाए, अब उसमें दो 'स्प्रिंग' (स्टेंट) डली हुई हैं। उन्हें लगता है कि इस दिल से बड़ा धोखेबाज कोई दूसरा संसार में नहीं है।

आज वे सोच रहे हैं कि उन्हें भी कुछ करना चाहिए। शिलाजीत न सही, च्यवनप्राश लेने में क्या हर्ज है? सुना है दिल के मामलों में हकीमी नुस्खे भी बड़े कारगर होते हैं, पर सनातनी मन नहीं मानता। आयुर्वेदिक रसायन जो कभी राजा-रजवाड़े लिया करते थे, अब संत-महात्मा, तांत्रिक और मंत्री-वंत्री ले रहे हैं। सच तो यह है कि अय्याशियाँ केवल हाड़-मांस के बल पर संभव नहीं! फिर सोचते हैं— "छोड़ो यार, अपने से नहीं होगा। इतने महंगे रसायन मेहनत की कमाई से तो खरीदे नहीं जा सकते।" कहीं पढ़ा था कि खाली पेट लहसुन की दो कलियाँ खाने से दिल मजबूत होता है। वही ठीक है, दवाओं के पचड़े में कौन पड़े? जिंदगी कीमती है, पर इस महंगाई में 'बजट' भी तो देखना पड़ता है। कबीर कह गए हैं'पीर मरीहैं पैगम्बर मरीहैं, मरिहैं जिन्दा जोगी; राजा मरीहैं परजा मरिहैं, मरिहैं बैध और रोगी।'  लेकिन उनके भीतर बैठा कोई जिद्दी जीव कहता है— "भले सब मरें, बस हम बचे रहें।"

जैसे-जैसे स्टेशन करीब आता है, बोगी के सवार अपना फैला हुआ सामान समेटने लगते हैं। कोई कहता है— "आ गया", दूसरा टोकता है— "अभी देर है", तीसरा ज्ञान देता है— "ट्रेन आउटर पर बहुत देर खड़ी रहती है।" वीवीएस की नींद भी बिना किसी अलार्म के सुबह 5:30 बजे खुल जाती है। सुबह का सपना अभी भी दिमाग में गूँज रहा है— "ट्रेन आउटर पर खड़ी रहती है, उसके बाद स्टेशन आएगा।" मॉर्निंग वॉक तो कर रहे हैं, पर लग रहा है जैसे 'आउटर' पर टहल रहे हों। दुनिया में आने वाला बच्चा भी नौ महीने आउटर पर ही होता है, शायद जाने वाले के लिए भी यह 'आउटर सिस्टम' हो। इस रिसती हुई जिंदगी को थामे रखना भी तो पुरुषार्थ है! अंदर से आवाज आती है— "वॉक से कुछ नहीं होगा, डॉक्टर कहते हैं तेज चलो।" अब वे तेज चल रहे हैं, साँसें खींच-खींच कर ले रहे हैं, मानो पीछे यमराज का भैंसा रस्सी तुड़ाकर दौड़ा आ रहा हो। जरा धीमे हुए नहीं कि उसने दबोचा!

जान सबको प्यारी है, भले ही पता हो कि अब जिंदा रहकर कौन से झंडे गाड़ लेंगे? राजनीति में होते तो समझ आता कि 'कुछ' कर लेंगे। वहाँ तो पिचहत्तर पार वाला भी फावड़े से 'माल' खींच लेता है। लेकिन साधारण नौकरी से रिटायर होने वाला व्यक्ति महज एक 'बॉडी' बनकर रह जाता है। खाने की प्लेट छोटी होती जा रही है; भोजन कम, दवाएँ ज्यादा हो रही हैं। कल की उम्मीद में आज सजा पा रहा है। जानकार कहते हैं— "कम खाओ, आधा पेट खाओ।" यह सुनकर घरवाले प्रसन्न होते हैं, लेकिन बुढ़ापे की चटोरी जुबान अक्सर विद्रोह कर देती है।

अब उन्हें खाना 'रातिब' की तरह मिलने लगा है। (रातिब समझते हैं न? बँधा-बँधाया नपा-तुला भोजन)। हिदायत है कि— "लंबा जीना है तो प्यारेलाल, खिचड़ी खाओ। नमक कम, तेल-घी बंद, मीठा वर्जित, तला-भुना जहर है।" उन्हें लगता है कि जब इतनी पाबंदियाँ हैं, तो जीने का हासिल क्या है? इस चटोरे संसार में भला खिचड़ी खा-खा कर कौन जीना चाहेगा? मौका पाकर जब वे किचन में घुसते हैं, तो हवाएँ मुखबिरी करने लगती हैं, दीवारें चीख पड़ती हैं— "क्या चाहिए? क्यों आए हो?" अगर भूल से कह दिया कि "जरा सा घी-गुड़ लेना था", तो समझो मुफ्त की नसीहतों की बौछार शुरू। ऐसे में वीवीएस अनुभवी की तरह बात पलट देते हैं— "कुछ नहीं जी, बस दो लौंग लेनी थी, जरा आप ही दे दो।"

एक पांडे जी हैं, डरे-डरे से। हाल ही में पैंसठ पार हुए, तो खास दोस्तों ने पट्टी पढ़ाई— "गोश्त खाओगे तो सेहत बनी रहेगी। जान है तो जहान है।" पांडे जी और डर गए। उन्हें 'घास-फूस' की तरह फुर्र से जल मरने की कल्पना से ही डर लगने लगा। सोचने लगे— "जान ही नहीं रही तो धर्म का क्या करेंगे? और अब यह धर्म है भी कितने दिन का? अगले जन्म में क्या पता किस धर्म में पैदा हों, क्या पता कसाई के घर ही जन्म हो जाए!" जैसे सब्जी वाला शाम को घर लौटते समय दाम की परवाह नहीं करता, वैसे ही जब हमें भी 'घर' ही जाना है, तो मीठा-फीका क्या और वेज-नॉनवेज क्या!

लेकिन 'गोश्त' से पहले 'होश' पर पहरे बिठाने होंगे। पीने और खाने का मामला इतना आसान नहीं कि मुँह खोला और गटक लिया। पांडे जी अभी भी इसी द्वंद्व में हैं। सच है, आखिरी किस्तें अक्सर थकाऊ हो जाती हैंचाहे बैंक की हों या जिंदगी की।

इधर खाकसार के हाल जुदा नहीं हैं। सनातनी रिवाज के अनुसार तो संन्यास आश्रम में चले जाना चाहिए। सोचता हूँ तो पता चलता है कि जिंदगी के अलावा सब छोड़ते चले जाना ही संन्यास है। बड़ा कठिन है, जिन चीजों से जिंदगी है उन्हें कौन छोड़ेगा! पुराने लोगों के पास जिम्मेदारियों के अलावा कुछ खास था नहीं छोड़ने के लिए, तो वे छोड़ देते थे। लता मंगेशकर गा रही हैंसंसार से भागे फिरते हो, भगवान को क्या पाओगे। इस लोक को अपना न सके, उस लोक में भी पछताओगे।

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