रविवार, 28 जून 2026

सच जानलेवा और झूठ पैरासेटामाल


 



 लगातार झूठ पढ़ने सुनने की आदत हो जाए तो आदमी सच को संदेह से देखने लगता है। यह बात सुनते ही दयाराम टकले, जो इस समय सोलह पेजी अख़बार लिये बैठे थे, बोले - " ऐसा नहीं है भाऊ, आज के मुश्किल टाइम में आदमी को जीना सीखना पड़ता है। सच रामजी के जमाने से कड़वा होता था, लेकिन आज का सच पहले से ज्यादा कड़वा है । व्यावहारिकता कहती है कि 'कड़वा कड़वा थू मीठा-मीठा गप'। कितनी तो तकलीफें हैं आज के टैम में। कहीं पेपर लीक के बाद बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं और कहीं कोचिंग सेंटर में जिंदा जल कर मर रहे हैं। कहीं मंगेतर-मार लड़कियाँ सुर्खियों में हैं तो कहीं भगवान के घर में चोर घुसे बैठे हैं!! बताओ इस सच से आंख मिलाना कितना कठिन है। जो लोग महंगाई और बेरोजगारी के सच से दोहरे हुए जा रहे हैं वे इस सच को कैसे बर्दाश्त करेंगे!! हर कोई कवि तो होता नहीं कि कुछ लिख लिखा कर अपना गुस्सा निकाल दे ! इन जानलेवा सच के बीच झूठ पैरासेटमाल है, दर्द कम करता है। जरा सोचिये जब आप पढ़ते हैं कि सरकार चिंतित है तो मन को कितनी तसल्ली होती है! लगता है कोई है हमारा अपना । वे कहते हैं जाँच करवाएंगे, दोषियों को बक्षा नहीं जाएगा तो खौलते खून को फ़ट्ट-से स्टे मिल जाता है। समय रहते शीतल झूठ सामने आ जाए तो सच के फफोले कम दुखते हैं। उसके बाद हप्ते पंद्रह दिनों में नया कुछ हो जाता है और लोग पुराना भूल जाते हैं। हो गया काम, जय श्रीराम ।  ये रिवाज़ है लोकतंत्र का। और अपना ये जो मिडिया है ना...  मरहम है, ये न हो तो जनता का हितैषी कौन है बताइये !! संवेदनशील लोग बेचारे सच की कढ़ाही में डीप फ्राई हो कर किस पार्टी में परोस दिये जाएं पता नहीं चलेगा। जब लोगों के कानों में "भाइयो और बहनो " शब्द पड़ते हैं तो कितना प्यारा लगता है! भले ही यह लोकप्रिय झूठ हो, पर सबको अच्छा लगता है। इसके बाद शब्दों का शेफ झूठ का बूफ़े लगा देता है और जनता स्वरुचि भोज का आनंद लेने लगती है। अगर चारों तरफ सच ही सच होता तो गरीब आदमी पहली समझ पैदा होते ही मर जाता।" रामजी टकले ने ब्रेक लेते हुए हमारी तरफ देखा।

हमें  कुछ बोलना ही है, वरना उन्हें लगेगा हम ठूंठ हैं । कहा - " आपकी बात ठीक है। लेकिन संसार में सब झूठ झूठ थोड़ी चलता है थोड़ा बहुत सच तो कहना ही है पड़ता है । जैसा कि अभी आपने कहा वह सब सच है। "

" कड़वा था ना?  लोकतंत्र में सवाल कड़वे-मीठे का है। राजनीति कड़वे सच को मीठे झूठ में बदल देने की कला है। जो खमखाह थे वे वतनपरस्त हो गए । मान न मान, मैं तो महान! अशिक्षित लोग पाठ पढ़ा रहे हैं, कभी पुलिस ढूंढा करती थी जिन्हें अब सुरक्षा दे रही है, सलाम भी ठोक रही है। उनकी आत्मा कड़वे घूंट पी पी कर मर गई बेचारी । व्यवस्था की इस मजबूरी को महसूस करके देखिये हैरान हो जाएंगे।" टकले दुखी हो गए ।

" जागरूकता आएगी तब लोग समझेंगे। "

"कैसे समझेंगे!?  आजकल कितने मैसेज, वीडियो और रीलें आ रही है फोन में! सब जानते हैं कि झूठ हैं, लेकिन दनादन फरवर्ड करने में मजा आता है । ये झूठ न हो तो विद्रोह हो सकता है । झूठ पैर से नहीं डाटा से चलता है अब। समझ के रास्तों पर पहरे हैं। .... अरे !! तुम तो चिंतित हो रहे हो !! लो , अखबार पढ़ लो , मजा आ जाएगा ।“

-------

 

 

 


मंगलवार, 23 जून 2026

सोने से आलू, आलू से समोसे : समोसे हजम, खेल ख़तम


 



 किसी भी मंदिर में अगर चोरी हो जाए तो उसे चोरी नहीं कहा जाना चाहिए। चोरी उसे कहते हैं जिसे चोर करें। भक्तों द्वारा की गई चोरी पूजा का प्रतिफल है। अट्ठारह प्रतिशत चढ़ावा पुजारी ले सकते हैं । मंदिर चलाना देश चलाने से छोटा काम नहीं है। जहां भगवान खुद सामने खड़े हों वहां से सामान उठा लेना चुनौती पूर्ण है। लेकिन जहां चाह होती है वहां राह भी हो जाती है। कहते हैं हिम्मत ए मर्दा मदद ए खुदा। भगवान की मौजूदगी में तो महाभारत का युद्ध जीत लिया था पाण्डेवों ने। भगवान शयन को चले जाएं या भजन के आनंद में लीन हो जाएं तो उनकी चालीस किलो चांदी की पादुकाएं हों या गले का स्वर्ण हार,  गायब कर लेना कोई बड़ा काम नहीं है। 


 सब जानते हैं कि कोई भी काम भगवान की मर्जी के बगैर नहीं हो सकता है। प्रभु की इच्छा थी कि सेवक अपनी दरिद्रता दूर कर लें तो कर ली । रोजाना गाड़ी भर चढ़ावा आ रहा है तो उसमें से एक दो टोकरी कोई ले लेवे तो किसी को पता नहीं पड़ेगा। अगर खास सेवक ही करोड़पति नहीं बन सकेंगे तो भगवान की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह लग जाएंगे । भगवान को जब कुछ करवाना होता है तो वे काम के अनुरूप बुद्धि देते हैं और हिम्मत भी। भगवान की ही इच्छा है की भक्तगण प्रसाद लेते रहें तो इसमें पाप कैसा और कैसा अपराध । यह तो प्रभु कृपा है। राम की चिड़िया राम का खेत, खा ले चिड़िया भर भर पेट। विरोधी दल वाले  छाती कूट रहे हैं कि करोड़ों गायब हो गए, जलकुकड़े, नास्तिक कहीं के। क्या इन्हें पता नहीं कि जब भगवान देते हैं तो छप्पर फाड़ कर देते हैं। और जब देने वाला राजी है,  लेने वाला राजी है तो बाकी को क्या तकलीफ है भाई। मंदिर में लोग अपने स्वेच्छा से चढ़ावा चढ़ाते हैं। किसी को चढ़ने का नोटिस नहीं भेजा जाता है। और फिर यह समझ लेना चाहिए कि भगवान का घर किसी भी सत्ता या सरकार से बड़ा होता है। भगवान का निवास क्षेत्र किसी भी कानून के दायरे में भी नहीं आता है। जान लेओ कि भगवान के हाथ कानून के हाथ से ज्यादा लंबे होते हैं। उनको कुछ गलत लगेगा तो वो खुद गला पकड़ लेंगे। भगवान की अनुमति से, भगवान की उपस्थिति में, पूरी निष्ठा और विश्वास के साथ जो भी किया जाता है वह सब पूजा है। कानून चाहे उसे चोरी समझता हो तो समझे। जब संविधान बदलने या रद्द करने का समय आएगा तब इन बातों को ध्यान में रखा जाएगा, समझे! 


 याद करो विपक्ष आलू से सोना बनाने का फार्मूला बताता रह गया। नाकारा लोग जनता के सामने झूठ बोलते रहे । इधर अंदर की बात बताएं!? पता चला है कि जो  चांदी सोना लेकर गए हैं उन्होंने उसका आलू बना दिया है। ठीक है,  कहने वाले कहेंगे कि आलू से सोना बनाना था, काम उल्टा कर दिया । लेकिन सोने से आलू बनाने का चमत्कार तो हुआ है ना!? इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है । उस पर बड़प्पन देखिए की कोई ढोल नहीं पीटा, किसी ने मूंछ नहीं बलीं।  किसी को पता भी नहीं चला और सोने से आलू बना दिया!! पुराना मीडिया होता तो पीछे पड़ जाता कि "आलू कहाँ गया, आलू कहां गया" !? थेंक्यू नया मिडिया। आप सब जानते हैं कि आलू समोसे में बदल जाता है । सोने से आलू, आलू से समोसे, समोसे हजम, खेल ख़तम । चाहे तो कोई अभिनेता हाथ में माइक लेकर जनता से पूछ सकता है कि आप लोग समोसा कैसे खाते हैं? हरी चटनी से या इमली की चटनी से? कितने समोसे खाने के बाद रुकी हुई कृपा रिलीज हो जाती है ? वगैरह। कुछ लोग जांच बैठाने की मांग कर रहे हैं। ठीक है जाँच बैठा लो। भगवान कोई आपत्ति नहीं करेंगे। जांच से ही पता चलेगा कि चोरी नहीं हुई है,  सिर्फ आरोप लगे हैं। आरोपों के लिये विपक्ष जिम्मेदार है। उसका काम है वह करता रहे। देवभूमि में कुछ घटित हुआ भी होगा तो उसे हम मिल बैठकर समझ लेंगे। मामले को कानून के सामने रख कर चोरी करने वालों का सम्मान नहीं गिराया जाएगा। भक्तों को सजा देने का अधिकार केवल भगवान को है। उन्हें आज नहीं तो कल, परसों, महिनों, बरसों में सजा मिलेगी, पर मिल जाएगी। भक्तजनों तब तक अपनी आस्था कायम रखो और चढ़ावा आने दो। ज्यादा हो। 


------


शनिवार, 13 जून 2026

पुचका पुचका लिखा करो


 


 " देखो, आप एक समझदार आदमी हो। कई बार लोग समझदार होते हैं लेकिन उनको पता नहीं होता कि वो हैं। आप भी हैं, लेकिन आपको पता नहीं हैं। " परम जी ने हमदर्दी जताते हुए कहा। मेरे जीवन के वे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने मुझे समझदार कहा है । जीवन संगिनी से मुझे हमेशा उम्मीद रहती है लेकिन उनका कहना है कि फालतू बकवास मैं नहीं करती हूँ । शुरू में समझाया कि भइ तुमसे शादी की है,  इसी बात पर एक बार कह दो । लेकिन उनका मानना है कि वह तुम्हारी समझदारी नहीं, मेरी नासमझी थी। यही वजह है कि जब परम जी ने समझदार कहा तो मुझे उनकी ही समझदारी पर शंका हो गई। बावजूद इसके शराफत का तकाजा है कि मुझे उनका आभारी हो जाना चाहिए। आज के इस गलाकाट जमाने में किसी दूसरे को समझदार मान लेना और कह देना बहुत गैर मामूली घटना है। लोकतंत्र में हर पाँच साल में जनता को समझदार कहकर मूर्ख बनाने की आदर्श परंपरा रही है। मुझे लग रहा है कि हो ना हो परम जी किसी राजनीतिक दल के दबे छुपे कार्यकर्ता हैं। वोट का समय होता तो समझदार कहने के बाद मुझे वोट मांग लेते,  लेकिन अभी ऐसा कुछ नहीं है। फिर भी कुछ ना कुछ तो मांगेंगे। आज के जमाने में यूं ही कोई किसी को फिरी फुग्गे में समझदार नहीं कह देता है। 

" जी साहेब, हौसला अफजाई के लिये आपका आभारी हूँ। वैसे मुझे मालूम है कि मैं समझदार हूँ। वाइफ भी कहती हैं, लोग भी कहते ही रहते हैं। फिर भी धन्यवाद आपका। " हमने अपने हिसाब से गरिमावर्धक उत्तर दिया। 

"साहेब नहीं श्रीमान कह सकते हैं।... आप लेखक हैं ना ? " 

" हाँ श्रीमान हम लेखक हैं.... और आप? " 

" हम मार्गदर्शक हैं। "

" आप तो जवान हैं! फिर मार्गदर्शक कैसे!? "

" हम साहित्यिक मोर्चा के मार्गदर्शक हैं। आप लोगों को कैसे और क्या लिखना चाहिए इसकी दिशा देना हमारा काम है ।" 

" साहित्यिक मोर्चा! मतलब साहित्य में गहरी रूचि होगी आपकी? "

" रूचि वुची कुछ नहीं, काम करना है हमें तो... देश सेवा। किसी भी मोर्चे पर खड़ा कर दो हम सब सम्हाल लेते हैं।... आज आपको दिशा देने के लिये आए हैं। " कहते हुए उन्होंने सामने रखी कुर्सी पकड़ी। बोले -- "देखिए आपका लिखा देखते हैं हम। आपको सुधरना होगा।" 

" सुधरना होगा!! कैसे !? " 

" दुनिया में कितना कुछ हो रहा है उस पर नजर रखते हो!?... नहीं ना। फिर ये क्या, कभी महंगाई, कभी बेरोजगारी, कभी भ्रष्टाचार!! लोग पढ़ते हैं तो बहुत दुःखी होते हैं। पाठकों को दुःखी करने के लिये लिखना अच्छी बात नहीं है। साहित्य ऐसा होना चाहिए जिससे लोगों को ख़ुशी मिले। उनका मनोरंजन हो। लगे कि अमन चैन है चारों तरफ। कोई पढ़े तो गार्डन गार्डन हो जाए, उसे लगे कि रेगिस्तान में फूल खिल रहे हैं। कोई आदमी दिनभर मेहनत करके शाम को राहत के लिए अख़बार उठाता है और ' तुम ' गैस और पेट्रोल का भाव दिखा देते हो! सोचो उस पर क्या गुजरती होगी!!... ' तुमको ' अपने आप समझ जाना चाहिए। " परम जी ने करीब करीब नाराज होते हुए कहा। 

" जो जनहित में होता है वही लिखना होता है जी....। "

"जनहित हमारी चिंता है, ' तुमको ' करने जरूरत नहीं है।  आइंदा ठीक से लिखिये। कोई असावधानी नहीं हो।" 

" ठीक से मतलब कैसे? "

" पुचका पुचका लिखो। पुचका समझते हो?... पानीपुरी खाई है ना? पूरी को पुचका कहते हैं। कैसा दीखता है बड़ा बड़ा, उसमें होता कुछ नहीं है सिवा इमली और नमकीन पानी के। लेकिन मजा देखो कितना आता है। पुचका लेखन करो देशभक्त बनो। ... अगर कोई दिक्क़त है तो बोलो, प्रशिक्षण करवा देते हैं। " 

--------




गुरुवार, 4 जून 2026

कौड़ी बोले झइयम-झइयम-झा


 


कौड़ी अब मुहावरों में रह गई है किन्तु कुछ लोग अपनी प्रतिभा से कौड़ी बाजार के हो जाते हैं। माना जाता है कि जो दिन भर झूठ बोले, चाटुकारिता करे, दलाल न हो पर दलाली करे वह फूटी कौड़ी का। पहले भी यही रेट था यही रेट आज भी है। कौड़ी ऐसी मुद्रा है जो किसी दूसरी मुद्रा के मुकाबले उठती गिरती नहीं है। कौड़ी औकात के बाजार में चलने वाली अकेली होती है। कौड़ी का अपना पैमाना है । किसी को पचास लाख रुपए महीना मिल रहा हो तब भी वह दो कौड़ी का हो सकता है। कोई बहुत सुन्दर हो तब भी दो कौड़ी का हो सकता है। कोई पॉवर फुल हो तब भी इतिहास में उसे 'दो कौड़ी का' कह कर दर्ज किया जाता है। कोई झूठा, बेईमान, ढोंगी, समाज में वैमनस्य फैलाने वाला हो उसे फिक्स रेट फूटी कौड़ी वाला आईपीओ (IPO) माना जा सकता है। मशहूर माइकल जैक्सन बाल यौन शोषण के आरोप के बाद दो कौड़ी के माने गए । कौड़ी चरित्र पर प्राइज टैग है। इस समय जो ‘नोबल शांति’ युद्ध चल रहा है उसमें कुछ कौड़ियाँ नजर आती हैं । इसमें आमतौर पर दो ही रेट होते हैं, फूटी कौड़ी या फिर दो कौड़ी। फूटी कौड़ी प्रायः चलन में कम होती है। कौड़ी क्रम में सबसे नीचे फूटी कौड़ी होती है। फूटी कौड़ी को कोई कुछ नहीं बोल सकता है। फूटी दूसरों को कुछ भी बोल सकती है।

इतिहास में झाँक कर देखो तो पता चलता है कि वर्षों पहले तमाम लोग जो दो कौड़ी के थे वे आज भी उतने के ही माने जा रहे हैं!  संविधान के हस्तक्षेप के बावजूद वे तीन कौड़ी के भी नहीं हो पाए। उनके हितैषी आगे आए और वोटों का कारोबार करने लगे लेकिन इनके भाव नहीं बदले। खरीदने वाले कौड़ियों के मोल में इनकी सहमति खरीदते आ रहे हैं। कौड़ी बाजार में महंगाई नहीं होती है, इसलिए किसी राजनीतिक दल ने कौड़ी को मुद्दा नहीं बनाया है। इधर भक्त-भीड़ पुराने वैभव की ओर लौटने के लिए झइयम-झइयम-झा कर रहे हैं । उन्हें लगता है नया भले ही सोने का हो पर उसमें ‘वो वाला’ वैभव नहीं है। पुराने समय में कौड़ियों से खरीददारी की जा सकती थी। स्त्रियां गले में कौड़ी की माला पहनती थी और हाथ, कान, कमर में भी कौड़ी के ज़ेवर। तो वैभव की श्रेणी में रखना ही पड़ेगा। सोना चाँदी बंद है, सबको पुराने वैभव की ओर लौटना है । जो लोग लौटाना नहीं चाहेंगे उन्हें कली सूची में डाला जा सकता है । नये ज्ञान को हटा कर पुराने के लिए जगह बनाई जाना जरूरी है । हर पुरानी चीज कीमती थी, आज और ज्यादा कीमती है । हालाँकि कुछ उराने-पुराने फैंक देने योग्य भी हैं, जैसे पुराने बूढ़े नेता या घर में पड़े अपने माँ-बाप या इतिहास की किताबें, या फिर इतिहास खुद। गंगा जमुना में ‘वो वाला’ वैभव है, भले ही लैब रिपोर्ट कह रही है कि गंदगी है। कहीं खोदाई में वैभव निकल रहा है तो कहीं कथाओं में से निकल कर लाउडस्पीकर पर चीख रहा है । असल में वैभव है या नहीं इस पर अनेक टीवी डिबेटें हो सकती हैं । टीवी वाले जानते हैं कि जनता को मूर्ख कैसे बनाए रखा जा सकता है। और टीवी वालों से कैसे काम लिया जाए यह सरकार अच्छी तरह जानती है। पता ही नहीं पड़ता कि टीवी कब सरकार होता है और सरकार कब टीवी ! एंकर अगर आँखें दिखाते खऊवाने दौड़े तो पेनलिस्ट सहम जाते हैं। यह डिबेट का वैभव है। दिनरात टीवी चल रहा है, झूठ नृत्य कर रहा है । एंकर देव कौड़ी वर्षा कर रहे हैं । राजनीतिक किन्नर आशीर्वाद दे रहे हैं। जय जगत, लगे रहो भगत ।

 

-------