कौड़ी अब
मुहावरों में रह गई है किन्तु कुछ लोग अपनी प्रतिभा से कौड़ी बाजार के हो जाते हैं।
माना जाता है कि जो दिन भर झूठ बोले, चाटुकारिता
करे, दलाल न हो पर दलाली करे वह फूटी कौड़ी का। पहले भी यही
रेट था यही रेट आज भी है। कौड़ी ऐसी मुद्रा है जो किसी दूसरी मुद्रा के मुकाबले
उठती गिरती नहीं है। कौड़ी औकात के बाजार में चलने वाली अकेली होती है। कौड़ी का
अपना पैमाना है । किसी को पचास लाख रुपए महीना मिल रहा हो तब भी वह दो कौड़ी का हो
सकता है। कोई बहुत सुन्दर हो तब भी दो कौड़ी का हो सकता है। कोई पॉवर फुल हो तब भी
इतिहास में उसे 'दो कौड़ी का' कह कर
दर्ज किया जाता है। कोई झूठा, बेईमान, ढोंगी,
समाज में वैमनस्य फैलाने वाला हो उसे फिक्स रेट फूटी कौड़ी वाला
आईपीओ (IPO) माना जा सकता है। मशहूर माइकल जैक्सन बाल यौन शोषण
के आरोप के बाद दो कौड़ी के माने गए । कौड़ी चरित्र पर प्राइज टैग है। इस समय जो ‘नोबल
शांति’ युद्ध चल रहा है उसमें कुछ कौड़ियाँ नजर आती हैं । इसमें आमतौर पर दो ही रेट
होते हैं, फूटी कौड़ी या फिर दो कौड़ी। फूटी कौड़ी प्रायः चलन
में कम होती है। कौड़ी क्रम में सबसे नीचे फूटी कौड़ी होती है। फूटी कौड़ी को कोई कुछ
नहीं बोल सकता है। फूटी दूसरों को कुछ भी बोल सकती है।
इतिहास में
झाँक कर देखो तो पता चलता है कि वर्षों पहले तमाम लोग जो दो कौड़ी के थे वे आज भी उतने
के ही माने जा रहे हैं! संविधान के
हस्तक्षेप के बावजूद वे तीन कौड़ी के भी नहीं हो पाए। उनके हितैषी आगे आए और वोटों
का कारोबार करने लगे लेकिन इनके भाव नहीं बदले। खरीदने वाले कौड़ियों के मोल में
इनकी सहमति खरीदते आ रहे हैं। कौड़ी बाजार में महंगाई नहीं होती है,
इसलिए किसी राजनीतिक दल ने कौड़ी को मुद्दा नहीं बनाया है। इधर भक्त-भीड़
पुराने वैभव की ओर लौटने के लिए झइयम-झइयम-झा कर रहे हैं । उन्हें लगता है नया भले
ही सोने का हो पर उसमें ‘वो वाला’ वैभव नहीं है। पुराने समय में कौड़ियों से
खरीददारी की जा सकती थी। स्त्रियां गले में कौड़ी की माला पहनती थी और हाथ, कान, कमर में भी कौड़ी के ज़ेवर। तो वैभव की श्रेणी
में रखना ही पड़ेगा। सोना चाँदी बंद है, सबको पुराने वैभव की ओर लौटना है । जो लोग
लौटाना नहीं चाहेंगे उन्हें कली सूची में डाला जा सकता है । नये ज्ञान को हटा कर
पुराने के लिए जगह बनाई जाना जरूरी है । हर पुरानी चीज कीमती थी, आज और ज्यादा
कीमती है । हालाँकि कुछ उराने-पुराने फैंक देने योग्य भी हैं, जैसे पुराने बूढ़े नेता या घर में पड़े अपने माँ-बाप या इतिहास की किताबें,
या फिर इतिहास खुद। गंगा जमुना में ‘वो वाला’ वैभव है, भले ही लैब रिपोर्ट कह रही है कि गंदगी है। कहीं खोदाई में वैभव निकल रहा है
तो कहीं कथाओं में से निकल कर लाउडस्पीकर पर चीख रहा है । असल में वैभव है या नहीं
इस पर अनेक टीवी डिबेटें हो सकती हैं । टीवी वाले जानते हैं कि जनता को मूर्ख कैसे
बनाए रखा जा सकता है। और टीवी वालों से कैसे काम लिया जाए यह सरकार अच्छी तरह
जानती है। पता ही नहीं पड़ता कि टीवी कब सरकार होता है और सरकार कब टीवी ! एंकर अगर
आँखें दिखाते खऊवाने दौड़े तो पेनलिस्ट सहम जाते हैं। यह डिबेट का वैभव है। दिनरात
टीवी चल रहा है, झूठ नृत्य कर रहा है । एंकर देव कौड़ी वर्षा
कर रहे हैं । राजनीतिक किन्नर आशीर्वाद दे रहे हैं। जय जगत, लगे रहो भगत ।
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