लगातार झूठ पढ़ने सुनने की आदत हो जाए तो आदमी
सच को संदेह से देखने लगता है। यह बात सुनते ही दयाराम टकले,
जो इस समय सोलह पेजी अख़बार लिये बैठे थे, बोले
- " ऐसा नहीं है भाऊ, आज के मुश्किल टाइम में आदमी को जीना
सीखना पड़ता है। सच रामजी के जमाने से कड़वा होता था, लेकिन आज का सच पहले से
ज्यादा कड़वा है । व्यावहारिकता कहती है कि 'कड़वा कड़वा थू
मीठा-मीठा गप'। कितनी तो तकलीफें हैं आज के टैम में। कहीं
पेपर लीक के बाद बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं और कहीं कोचिंग सेंटर में जिंदा जल कर
मर रहे हैं। कहीं मंगेतर-मार लड़कियाँ सुर्खियों में हैं तो कहीं भगवान के घर में
चोर घुसे बैठे हैं!! बताओ इस सच से आंख मिलाना कितना कठिन है। जो लोग महंगाई और
बेरोजगारी के सच से दोहरे हुए जा रहे हैं वे इस सच को कैसे बर्दाश्त करेंगे!! हर
कोई कवि तो होता नहीं कि कुछ लिख लिखा कर अपना गुस्सा निकाल दे ! इन जानलेवा सच के
बीच झूठ पैरासेटमाल है, दर्द कम करता है। जरा सोचिये जब आप
पढ़ते हैं कि सरकार चिंतित है तो मन को कितनी तसल्ली होती है! लगता है कोई है हमारा
अपना । वे कहते हैं जाँच करवाएंगे, दोषियों को बक्षा नहीं
जाएगा तो खौलते खून को फ़ट्ट-से स्टे मिल जाता है। समय रहते शीतल झूठ सामने आ जाए
तो सच के फफोले कम दुखते हैं। उसके बाद हप्ते पंद्रह दिनों में नया कुछ हो जाता है
और लोग पुराना भूल जाते हैं। हो गया काम, जय श्रीराम । ये रिवाज़ है लोकतंत्र का। और अपना ये जो मिडिया
है ना... मरहम है, ये
न हो तो जनता का हितैषी कौन है बताइये !! संवेदनशील लोग बेचारे सच की कढ़ाही में
डीप फ्राई हो कर किस पार्टी में परोस दिये जाएं पता नहीं चलेगा। जब लोगों के कानों
में "भाइयो और बहनो " शब्द पड़ते हैं तो कितना प्यारा लगता है! भले ही यह
लोकप्रिय झूठ हो, पर सबको अच्छा लगता है। इसके बाद शब्दों का
शेफ झूठ का बूफ़े लगा देता है और जनता स्वरुचि भोज का आनंद लेने लगती है। अगर चारों
तरफ सच ही सच होता तो गरीब आदमी पहली समझ पैदा होते ही मर जाता।" रामजी टकले
ने ब्रेक लेते हुए हमारी तरफ देखा।
हमें कुछ बोलना ही है, वरना उन्हें लगेगा हम ठूंठ
हैं । कहा - " आपकी बात ठीक है। लेकिन
संसार में सब झूठ झूठ थोड़ी चलता है थोड़ा बहुत सच तो कहना ही है पड़ता है । जैसा
कि अभी आपने कहा वह सब सच है। "
" कड़वा था ना? लोकतंत्र में सवाल कड़वे-मीठे का है। राजनीति कड़वे सच को मीठे झूठ में बदल
देने की कला है। जो खमखाह थे वे वतनपरस्त हो गए । मान न मान, मैं तो महान! अशिक्षित लोग पाठ पढ़ा रहे हैं, कभी
पुलिस ढूंढा करती थी जिन्हें अब सुरक्षा दे रही है, सलाम भी
ठोक रही है। उनकी आत्मा कड़वे घूंट पी पी कर मर गई बेचारी । व्यवस्था की इस मजबूरी
को महसूस करके देखिये हैरान हो जाएंगे।" टकले दुखी हो गए ।
" जागरूकता आएगी तब लोग समझेंगे। "
"कैसे समझेंगे!? आजकल कितने मैसेज, वीडियो और रीलें आ रही है फोन
में! सब जानते हैं कि झूठ हैं, लेकिन दनादन फरवर्ड करने में
मजा आता है । ये झूठ न हो तो विद्रोह हो सकता है । झूठ पैर से नहीं डाटा से चलता
है अब। समझ के रास्तों पर पहरे हैं। .... अरे !! तुम तो चिंतित हो रहे हो !! लो ,
अखबार पढ़ लो , मजा आ जाएगा ।“
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