शनिवार, 13 जून 2026

पुचका पुचका लिखा करो


 


 " देखो, आप एक समझदार आदमी हो। कई बार लोग समझदार होते हैं लेकिन उनको पता नहीं होता कि वो हैं। आप भी हैं, लेकिन आपको पता नहीं हैं। " परम जी ने हमदर्दी जताते हुए कहा। मेरे जीवन के वे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने मुझे समझदार कहा है । जीवन संगिनी से मुझे हमेशा उम्मीद रहती है लेकिन उनका कहना है कि फालतू बकवास मैं नहीं करती हूँ । शुरू में समझाया कि भइ तुमसे शादी की है,  इसी बात पर एक बार कह दो । लेकिन उनका मानना है कि वह तुम्हारी समझदारी नहीं, मेरी नासमझी थी। यही वजह है कि जब परम जी ने समझदार कहा तो मुझे उनकी ही समझदारी पर शंका हो गई। बावजूद इसके शराफत का तकाजा है कि मुझे उनका आभारी हो जाना चाहिए। आज के इस गलाकाट जमाने में किसी दूसरे को समझदार मान लेना और कह देना बहुत गैर मामूली घटना है। लोकतंत्र में हर पाँच साल में जनता को समझदार कहकर मूर्ख बनाने की आदर्श परंपरा रही है। मुझे लग रहा है कि हो ना हो परम जी किसी राजनीतिक दल के दबे छुपे कार्यकर्ता हैं। वोट का समय होता तो समझदार कहने के बाद मुझे वोट मांग लेते,  लेकिन अभी ऐसा कुछ नहीं है। फिर भी कुछ ना कुछ तो मांगेंगे। आज के जमाने में यूं ही कोई किसी को फिरी फुग्गे में समझदार नहीं कह देता है। 

" जी साहेब, हौसला अफजाई के लिये आपका आभारी हूँ। वैसे मुझे मालूम है कि मैं समझदार हूँ। वाइफ भी कहती हैं, लोग भी कहते ही रहते हैं। फिर भी धन्यवाद आपका। " हमने अपने हिसाब से गरिमावर्धक उत्तर दिया। 

"साहेब नहीं श्रीमान कह सकते हैं।... आप लेखक हैं ना ? " 

" हाँ श्रीमान हम लेखक हैं.... और आप? " 

" हम मार्गदर्शक हैं। "

" आप तो जवान हैं! फिर मार्गदर्शक कैसे!? "

" हम साहित्यिक मोर्चा के मार्गदर्शक हैं। आप लोगों को कैसे और क्या लिखना चाहिए इसकी दिशा देना हमारा काम है ।" 

" साहित्यिक मोर्चा! मतलब साहित्य में गहरी रूचि होगी आपकी? "

" रूचि वुची कुछ नहीं, काम करना है हमें तो... देश सेवा। किसी भी मोर्चे पर खड़ा कर दो हम सब सम्हाल लेते हैं।... आज आपको दिशा देने के लिये आए हैं। " कहते हुए उन्होंने सामने रखी कुर्सी पकड़ी। बोले -- "देखिए आपका लिखा देखते हैं हम। आपको सुधरना होगा।" 

" सुधरना होगा!! कैसे !? " 

" दुनिया में कितना कुछ हो रहा है उस पर नजर रखते हो!?... नहीं ना। फिर ये क्या, कभी महंगाई, कभी बेरोजगारी, कभी भ्रष्टाचार!! लोग पढ़ते हैं तो बहुत दुःखी होते हैं। पाठकों को दुःखी करने के लिये लिखना अच्छी बात नहीं है। साहित्य ऐसा होना चाहिए जिससे लोगों को ख़ुशी मिले। उनका मनोरंजन हो। लगे कि अमन चैन है चारों तरफ। कोई पढ़े तो गार्डन गार्डन हो जाए, उसे लगे कि रेगिस्तान में फूल खिल रहे हैं। कोई आदमी दिनभर मेहनत करके शाम को राहत के लिए अख़बार उठाता है और ' तुम ' गैस और पेट्रोल का भाव दिखा देते हो! सोचो उस पर क्या गुजरती होगी!!... ' तुमको ' अपने आप समझ जाना चाहिए। " परम जी ने करीब करीब नाराज होते हुए कहा। 

" जो जनहित में होता है वही लिखना होता है जी....। "

"जनहित हमारी चिंता है, ' तुमको ' करने जरूरत नहीं है।  आइंदा ठीक से लिखिये। कोई असावधानी नहीं हो।" 

" ठीक से मतलब कैसे? "

" पुचका पुचका लिखो। पुचका समझते हो?... पानीपुरी खाई है ना? पूरी को पुचका कहते हैं। कैसा दीखता है बड़ा बड़ा, उसमें होता कुछ नहीं है सिवा इमली और नमकीन पानी के। लेकिन मजा देखो कितना आता है। पुचका लेखन करो देशभक्त बनो। ... अगर कोई दिक्क़त है तो बोलो, प्रशिक्षण करवा देते हैं। " 

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