देखो जी, सरकार अपने तरीके से काम करती है लेकिन उसका लक्ष्य हमेशा जनकल्याण ही
होता है। लोगों की शिकायत है कि दवाएं महंगी हो गई हैं, इलाज
में बहुत दिक्कत आती है। अब इसका मतलब यह नहीं कि सारे काम छोड़ कर सरकार जबरन
दवाएं सस्ती करने में लग जाए। आपने सुना होगा दवाओं के साइड इफेक्ट्स बहुत होते
हैं। लोग जितना बीमारी से नहीं मरते, उससे ज्यादा साइड
इफेक्ट्स से मर जाते हैं। साइड इफेक्ट्स के लिए और दवाएं खानी पड़ती हैं, फिर उन दवाओं का भी साइड इफेक्ट हो जाता है। इसका कोई अंत नहीं है। दवाओं
से शरीर की रेजिस्टेंस पावर (प्रतिरोधक क्षमता) कम हो जाती है। हमारा तो मानना है
कि दवाएं और महंगी होनी चाहिए ताकि जनता उनसे दूर ही रहे। कोई तकलीफ हो तो योग
करें, मजे में रहें! अब तो कैंसर जैसी बीमारी भी गोमूत्र से
ठीक हो जाती है, कोई साइड इफेक्ट नहीं।
इधर दूध को लेकर भी बहुत हाय-तौबा
मचाई जा रही है। दूध भी हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सबको पता है कि
जानवरों को इंजेक्शन लगाकर दूध निकाला जाता है। नकली दूध भी खूब मिल रहा है।
लाड़ले दूधवाले यूरिया और दूसरे केमिकल्स से दूध बना रहे हैं। इनको रोकना संभव
नहीं है। लेकिन जब हमारे बच्चे ऐसा दूध पिएंगे तो उनका क्या हाल होगा, बताइए! दूध से बचने का कोई रास्ता नहीं है सिवाय इसके कि वह और महंगा हो
जाए।
दूसरी अच्छी बात यह है कि दालें और
दूसरे अनाज लगातार महंगे हो रहे हैं। आजकल खेतों में तमाम तरह के केमिकल और
दवाइयां छिड़की जाती हैं जो मनुष्य के लिए हानिकारक हैं। अब तो डॉक्टर भी गेहूं
खाने को मना करते हैं। ऐसे तो कोई उनकी सुनता नहीं है, लेकिन जब चीजें महंगी हो जाएंगी तो लोग कटौती करना सीखेंगे और स्वस्थ
रहेंगे। आप देख ही रहे हैं, देश में मोटापे की बीमारी तेजी
से बढ़ रही है। लोग खा-खाकर खुद को और देश को बेडौल बना रहे हैं। सौभाग्य से घी,
पनीर, तेल वगैरह सब लगातार महंगे हो रहे हैं
और आप देखेंगे कि 2035 तक देश का हर आदमी फैट-लेस हो जाएगा। कचौरी-समोसे
25 रुपये प्रति नग बेचे जा रहे हैं। संसद में भी इस पर चिंता
व्यक्त की गई थी। जांच समिति की रिपोर्ट आई है कि महंगे होने के कारण लोगों ने
कचौरी-समोसे खाना कम कर दिया है और इससे उनके स्वास्थ्य पर अच्छा असर पड़ रहा है।
हमारा सोचना तो यह है कि कचौरी-समोसा पचास रुपये का हो जाए ताकि लोग उनकी तरफ
देखें ही नहीं।
यह ‘हे राम’
वाले गांधी का देश है। हम अहिंसा के पुजारी हैं। सर्वे रिपोर्ट से
पता चला है कि जब प्याज सस्ता होता है तो लोग नॉनवेज ज्यादा खाते हैं। सारी हिंसा
प्याज के कारण होती है। प्याज महंगा हो रहा है तो इसके दो फायदे हैं—एक तो किसानों को अच्छी कीमत मिल रही है, दूसरा जनता
को बकरों और मुर्गों की दुआएं मिल रही हैं।
अभी शक्कर की कीमतें आसमान छूने
लगीं तो दिमागी नक्सली लोग इथेनॉल को दोष दे रहे हैं। लेकिन देशभक्त जानते हैं कि
जनता डायबिटीज से पीड़ित है। जीवन भर गोली लेनी पड़ती है। डॉक्टरों ने हाथ टेक दिए
हैं,
डायबिटीज को खत्म करना उनके बस की बात नहीं है। उनकी लाचारी देखकर
मास्टरस्ट्रोक के तहत शक्कर के दाम बढ़ाए गए हैं। शक्कर एक तरह से जहर है। हर कोई
जनता है कि नेता लोग सब खा जाते हैं, लेकिन मीठा नहीं खाते।
और देखिए, हमारे लीडर अस्सी साल में भी बूढ़े नहीं होते हैं !
...तो आँख-कान बंद
रखो और मुँह भी। बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत खाओ।
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