टेक्सी में बैठते ही सोनू बोला - "मम्मी मुझे लड़की पसंद है। मेरी तरफ से फाइनल है ।"
सोनू दो बार लड़की से मॉल में मिल चुका था। आज सिंह साहब पत्नी और बेटे के साथ लड़की देखने आए थे। अच्छे माहौल में बातचीत हुई। मतलब माहौल अच्छा था, काम की कोई बात नहीं हुई। दोनों पार्टियाँ एक दूसरे को तौल रही थी। हरा समंदर, गोपी चंदर, बोल मेरी मछली कितना पानी? लेकिन दोनों बंधी मुट्ठी खोल नहीं रहे थे । थोड़ा मीठा फिर थोड़ा नमकीन, फिर मीठा फिर नमकीन। चाय काफ़ी, वाह जी वाह जी। और टाइम इज ओवर! इधर बेटा मूरख, दिल भी तेरा, हम भी तेरे। मानो उनकी पकड़ में आ गया।
इतनी आसानी से मैदान मारने दे ऐसा कौन सा सिंह पैदा किया है भगवान ने! बोले - " इन लोगों में 'वो बात नहीं है '।... मिठाई में दम नहीं था और नमकीन भी सोयाबीन के तेल वाला था। " सिंह के कहने का मतलब था कि वे अभी किसी निर्णय पर नहीं पहुँचे हैं।
माँ समझ गईं। बेटे को और उसके बाप को भी। मौके की नजाकत को भाँप कर बोली - "थोड़ा रुक बेटा, घर चल कर बात करेंगे।"
इधर जेनजी सोनू का इरादा मजबूत है। " मिठाई तो अच्छी थी माँ। और नमकीन तो आजकल सोयाबीन तेल में ही बनता है। अपने यहाँ भी तो किचन में सोयाबीन बापरते हैं!" सोनू ने कहा जिसका मतलब था कि वह निर्णय पर पहुँच चुका है।
माँ ने धीरे से कहा -" घर चल कर पापाजी की राय से सब तय होगा। अभी शांति रख जरा। "
"शादी किसे करनी है? क्या पापा को!?" सोनू वाइब्रेशन मोड़ में घुड़का।
माँ ने बेटे का हाथ दबाया, जिसका मतलब है कि चुप रह गधे, ये बाप है सरकार नहीं । सोनू फिलहाल चुप हो गया। ऐसा है कि जेनजी किसी से डरते नहीं हैं लेकिन माँ की बात सुन लेते हैं। यही बात सिंह साहब पर भी लागू है। वे भी किसी से नहीं डरते हैं लेकिन बीवी की सुनते हैं। मिसेस सिंह का मामला थोड़ा सा जुदा है। वो ना किसी से नहीं डरती हैं और ना किसी की सुनती हैं। एक विराम दें कर धीरे से बोली - मैं हूँ ना।
सोनू बोला - कहे देता हूँ, मेरी तरफ से फाइनल है।
घर पहुंचते ही सिंह साहब बोले - लोग तो खास नहीं हैं। बस बातें थीं बड़ी बड़ी। रिश्तेदारी वाली 'वो बात नहीं है'।
"सब ठीक तो था पापा, आप भी बस...." सोनू ने कमर कसी।
"मैंने कब कहा कि ठीक नहीं था!! लेकिन 'वो बात नहीं थी'।"
" मॉल में क्या कुछ बोली लड़की?" सिंह साहब को अनसुना करते हुए माँ ने सोनू से पूछा।
"हाँ बोली कि तुम बड़े जाँबाज हो। ब्रेव भी कहा। उसने तरीफ की मॉम ।"
"जाँबाज़ क्यों बोली!! पहाड़ों पर ले जाएगी क्या!?" सिंह साहब घुड़के।
"मीनिंग पर मत जाओ पापा । ये अर्नामेंटल वर्ड हैं । जब किसी को एप्रिशिएट करना हो तो बोला जाता है।.... पर मेरी तरफ से फाइनल है।"
"क्या फाइनल फाइनल लगा रखा है!! कह रहा हूँ 'वो बात नहीं है' कि रिश्ता कर लें।" सिंह नाराज हुए।
"कोई ब्वाय फ्रेंड तो नहीं है उसका?" माँ ने फिर पूछा।
"आजकल अच्छी लड़कियों के बॉय फ्रेंड तो होते ही हैं मॉम । उससे क्या फर्क पड़ता है। अब जमाना बोहोत आगे बढ़ चुका है। शादी अलग चीज है बॉयफ्रेंड अलग चीज है। दोनों का कोई कनेक्शन नहीं है।"
"लड़की अपनी सहेली के साथ आईं थी या माँ के साथ?" सिंह ने पूछा।
"बॉयफ्रेंड के साथ आईं थी पापा।... भाई जैसा है वो तो।... बॉयफ्रेंड ने भी ओके कर दिया है।... मेरी तरफ से भी फइनल है।... जल्दी शादी करने को बोल रहे हैं।"
"जल्दी शादी!! लेकिन लड़की के माँ बाप ने तो कुछ नहीं कहा!"
" एट्टीन ईयर्स के बाद पेरेंट्स कुछ नहीं कह सकते हैं। यू नो, कुछ पेरेंट्स समझदार भी होते हैं। " सोनू ने लक्ष्मण रेखा खेंची।
"तो जल्दी शादी का कौन बोल रहा है!? "
"बॉयफ्रेंड लोगों ने कहा है मॉम । लड़की का भी डिसीजन है।... ये फाइनल है। "
" सोनू जल्दबाजी मत करो। अभी तुम नए नए बालिग़ हुए हो। हमें सोच समझ कर निर्णय लेना चाहिए।"
" क्या सोच समझ कर निर्णय लेना चाहिए!! आज तक आपने सोच समझ के वोट तो
दिया नहीं, सही आदमी चुना नहीं, फिर आपके निर्णय पर भरोसा कौन करेगा!! "
"रिश्तेदारी एक बार होती है। सरकारें तो आती जाती रहती हैं। " सिंह बोले।
"किस दुनिया में हो!! सरकार एक बार चढ़ जाती है तो उतरती नहीं है। सावधानी की जरूरत उधर होती है। ... अब कोई बहस नहीं, मेरी तरफ से फाइनल है।"
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