शुक्रवार, 29 मई 2026

झोलाछाप बुद्धिजीवी






 


पुराने समय में बुद्धिजीवी प्रायः बुद्धिमान होते थे । वे उतना ही मुँह खोलते थे जितना जरूरी होता था। कम बोलते थे लेकिन उनका एक एक शब्द पत्थर की लकीर था।  उस जमाने में भी बंधी मुट्ठी लाख की होती थी। धीरे धीरे बुद्धिजीवी वाचाल हुआ। उन्हें पता नहीं था कि ज्यादा मुँह खोलने से बुद्धि का रायता फैल जाता है। दूसरे रायते समेटे जा सकते हैं लेकिन बुध्दि का रायता बरसाती नालों की तरह बढ़ता ही जाता है। बुद्धिजीवीयों की कुछ परम्परागत नस्लें होती थीं। परम्पराओं की अपनी धाक होती है। इसमें किन्तु, परन्तु या प्रश्न पूछने की मनाही है। जिसके कारण बुद्धिजीवी बाप के बुद्धिहीन बच्चे भी बुद्धिजीवी माने जाने लगे । फिर बुद्धिजीवियों की संकर नस्लें आईं तो घालमेल और बढ़ा ।  एक एक बुद्धिजीवी के आठ बच्चों में से पाँच छः बुद्धिहीन निकलने लगे। फसलें तो खूब उतरने लगीं, लेकिन गुणवत्ता जाती रही। बहुत शीघ्र उन्हें समझते में आ गया कि जैसा मजा विचार में है वैसा बुद्धि में नहीं है। मौका देख कर बुद्धिजीवी उपलब्ध विचारधाराओं से जुड़ने लगे। परिणाम यह हुआ की जो बुद्धि के लिए जाने जाते थे वे अब विचारधारा के लिए पहचाने जाने लगे।

जल्द ही बुद्धिजीवियों का बाजार तैयार हो गया, दाम मिलने लगे । बाजार ने सबसे पहले उनकी स्वतंत्रता रखवा ली। स्वतंत्रता के बिना विवेक का कोई उपयोग नहीं था इसलिए उन्हें विवेक भी छोड़ना देना पड़ा । बदले में उन्हें लक्ष दिखाए गए, आज की भाषा में कहें तो 'टारगेट' । कहा इन्हें हासिल करो इनाम मिलेगा। अच्छा करोगे तो पद भी मिल सकते हैं। बुद्धिजीवी बुद्धि को ताख में रख कर काम में भिड़ गए। कुछ टीवी एंकर बने,  कुछ अखबार के संपादक हुए, कुछ को पार्टी प्रवक्ता बनाया गया, बहुत से अनुवादक बने, कुछ दनादन भाषण और लेख लिखने लगे। बहुत सारे युवा कम्प्यूटरजीवी थे उन्हें फेक-न्यूज़ और हेट-रील बनाने की जिम्मेदारी मिली। सम्भावनाओं के द्वार इतनी तेजी से खुले कि आठवीं फेल प्रतिभाओं को भी झोलाछाप बुद्धिजीवी का दर्जा मिल गया ।  इधर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी को मान्यता मिलने से घर-घर झोलाछाप  बुद्धिजीवी हो गए। लोग इतना संक्रमित हुए कि पान वाला भी अपने को बुद्धिजीवी मानने लगा। दिन भर कत्था-चूना लगाते हुए ज्ञान बाँटने वाला अब बुद्धिजीवी है । केश कतरने वाले तो बुद्धिजीवी की श्रेणी में आते ही थे। कुछ ने रैदास और कबीर को आगे करके बुद्धिजीवी होने का दावा ठोक दिया । बुद्धिजीवी किसी प्रधान सेवक की फोटो की तरह हर जगह दिखाई देने लगे। कोई माने न माने समाज के हर घर में बुद्धि के बीमार मिलने लगे । हालात ये हुए कि कोई आँख मीँच कर भी माला फेंके तो वह किसी बुद्धिजीवी के गले में ही पड़ेगी इसकी गारंटी है । माहौल बढ़िया था लेकिन किसी नजर लग गई। जल्द ही रुपए के साथ बुद्धिजीवियों की कीमत भी गिरी, लेकिन कहीं चर्चा नहीं हुई। 

  बुद्धिजीवियों का स्नेहल स्वाभाव है कि वो दूसरे बुद्धिजीवी को पसंद नहीं करते। चूंकि बुद्धिजीवी तेजी से बढ़े, समाज में नफ़रत और प्रतिस्पर्धा भी फैलने लगी। चढ़ते हुओं को नीचे गिराना जरूरी लगने लगा। बुद्धिजीवियों को धर्म, जाति और गोत्र याद आने लगे। धर्म की किताबें और इतिहास खंगालना रोज का काम हो गया ।  हर दिन लोगों को पता चलने लगा कि कौन बुद्धिजीवी नीच और कौन अधम हैं। जवाब में पता चला कि नीच और अधम बताने वाले कितने पापी हैं और नरक के द्वार के कितने निकट खड़े हैं। कोई किसी को कूढ़-मगज बता रहा है तो किसी को सड़ी-सोच वाला। पहले कहा गया कि फलां के साथ रोटी बेटी का व्यवहार नहीं करेंगे बाद में छूने या पास बैठाने से मना कर दिया। कुछ ने समय की चाल को देख कर लाठी थाम ली तो कुछ ने गुंडे पाल लिये। बुद्धिजीवियों के कारण समज कई खेमों में बँट गया ।

हुकूमत-ए-रवानी खुश है, उसे यही चाहिए था।

 

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मुद्दा मतलब मछली के पेट में अंगूठी !


 


 नकली का जमाना है साहब। चमक नहीं हो तो सोना भी सोना नहीं माना जाए । नकली में चमक ज्यादा होती है। चमक के कारण ही लोग अब सोना भी नकली पसंद कर रहे हैं।  जब सबके पास नकली हो तो नकली ही सुपाच्य है । कहते हैं असली पचता नहीं है किसीको । दूध, घी, अंडा, मिठाई, दवाई, दोस्ती, रिश्ते, देशभक्ति, साधु संत, वोटर - लीडर सब नकली चल रहे हैं, और लोकप्रिय चल रहे हैं । असली वाला जमाना अलग था। जब असली आंदोलन, असली देशभक्त और असली क्रांतिकारियों से हार कर अंग्रेज भाग गए थे। अब वो असली वाले राजा-वजीर और प्यादे नहीं रहे, न पुरानी वाली शतरंज की बिसात । इसका कारण यह कि असली पर एक्सपायरी डेट होती है, नकली के लिए कोई समय सीमा नहीं, जब तक चलती रहे चलाते जाओ । असली फूल मुरझाते हैं, नकली माला दशकों तक फोटो पर लटकी श्रद्धा के गीत गाती रहती है। किन्तु मुद्दों के साथ ऐसा नहीं है। असली मुद्दे भले ही इतिहास हो जाएं पर मौजूद रहते हैं ।

चुनाव के शुरुआती दिनों में मांगने वालों को मुद्दे लपेट कर खड़ा होना पड़ता है । बाद में भले ही पानी-पुरी दिखाकर चुनाव जीत लें ।  असली मुद्दे असली और खानदानी होते हैं । उसमें ना कोई मिलावट हो सकती है ना कोई कमी बेसी। बल्कि यह कहना ठीक होगा की असली मुद्दे हमारी विरासत हैं । गरीबी, बेकारी और महंगाई, आज़ादी के समय से जो सीना तान के खड़े हुए तो आज भी डटे हुए हैं। सरकारें आ रही हैं सरकारें जा रही हैं लेकिन मुद्दे लालकिले कि तरह वहीं खड़े हैं।  साल में एक बार आकर कोई न कोई तालियां बटोर ले जाता है मुद्दे वहीं पड़े रह जाते हैं। असली मुद्दे घाट पर लगी नाव हैं, वादाखोर आते हैं उसके सहारे नदी पार करते हैं और फिर बेसहारा छोड़ कर चले जाते हैं। मुद्दे न हुए शकुंतला हो गए। मछली के पेट से जब तक अंगूठी नहीं निकलेगी तब तक राजा दुष्यंत को याद नहीं आएगी। संसद भवन में कोई मछली ले कर तो  पहुंचता नहीं है। तो फिर हवा में तैर रहे आज के मुद्दे क्या हैं?

आज के मुद्दे समोसा हैं, कचौरी है, कभी झालमुड़ी है तो कभी माछेरभात या मंगलसूत्र है । असली मुद्दों की और देखना नहीं,... 'मला छेडू नको' । तो आज के मुद्दे समझने से पहले आज की स्थिति को समझें। कहते हैं जीवन है तो संसार है। इसे और व्यावहारिक कर दें तो जान है तो देश है, देश है तो राजनीति है। और आप जानते ही हैं, जान जाने का ऐसा है कि कभी भी जा सकती है, पट्ट से। आम आदमी की सांसें इस पर निर्भर करती है कि गुंडेगण, बदमाशभाऊ किस मूड में है। यूँ मान के चलिए की ऊपर वाले की मर्जी के बगैर एक सांस भी आपको एक्स्ट्रा नहीं मिल सकती। ‘ऊपर वाला’ और ‘नीचे वाला’ दोनों मिलकर डबल इंजन वाले हो जाते हैं। उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है । तो असली मुद्दा जान है। जो रॉन्ग साइड चलेगा उसकी पहले जा सकती है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। इस बात का ध्यान रखें कि अस्पताल मरने का सबसे महंगा लेकिन जरुरी स्थान है। वहाँ पैसा खत्म जिंदगी खत्म। तो व्यावहारिक मुद्दा पैसा हुआ। बड़े संत कह गए हैं, पैसा खुदा तो नहीं पर खुद की कसम खुदा से काम भी नहीं। तो जिसके पास पैसा है वही सही मायने में जिंदा है और जो जिंदा है उसी के लिए राजनीति है। बाकी लोग 'भाइयों और बहनों' सुनने के लिए अभिशप्त हैं।

 

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शुक्रवार, 22 मई 2026

यूँ ही कोई मिल गया था... चलते चलते


 



पम्प पर अपनी सफ़ेद स्कार्पिओ में फुल टेंक करवा के गनसिंह गनगने बिल चेक कर रहे थे तभी उनकी नजर हम पर पड़ी। बोले - तुम इधर कैसे? 

" पेट्रोल लेने वालों से सवाल पूछ रहा हूँ, अख़बार के लिये बाइट । "

" क्या बोल रहे हैं ? "

" भाव बढ़ गए हैं इसलिए खुश नहीं हैं। "

"डीजल पेट्रोल का भाव कितना भी हो जाए किसीके मूँ से न चूँ नहीं निकलना चिये । पाँच सौ का मिलेगा तो भी कोई दिक्क़त नहीं है, पाँच हजार का मिलेगा तो भी चलेगा। देशभक्ति चीख चीख के पुकार रही है, सबको साथ देना पड़ेगा । " 

" लोग नाराज हैं। महंगाई बढ़ रही है।"

" कौन नाराज है? कोई हिम्मत कैसे कर सकता है नाराज होने की। नाम पते बताओ उनके।... क्या पुराने जमाने में रह रहे हैं लोग !! देशप्रेम पहले, पेट्रोल डीजल बाद में। ये बात हरेक के दिमाग़ में आना जरूरी है। आई समझ में? एक बात समझ लो, एकता में शक्ति होती है। सबने मिलके थाली बजाई , ताली बजाई तो करोना खतम हो गया।  खतम हुआ कि नहीं? "

" हुआ जी हुआ। "

" इसी तरह किसी दिन सबसे थाली बजवा देंगे तो महंगाई भी खतम हो जाएगी। कोई बड़ी बात थोड़ी है।" वे सीना चौड़ा करते हुए बोले। 

" तो जल्दी बजवा देना चाहिए। कहीं कांग्रेस वालों को आइडिया आ गया तो फटाफट सरकार बना लेंगे।" 

" उनको कैसे आ सकता है आइडिया!! वो क्या जमीन से जुड़े हैं! वो क्या जनता कि नब्ज पहचानते हैं। इनके पास काबिल नेतृत्व होता तो थाली बजा कर अंग्रेजों को बहुत पहले भगा देते।" उन्होंने बड़ा पॉइंट बताया। 

" गाँधी जी तो थे कांग्रेस के पास। मतलब काबिल नेतृत्व ...। " उन्हें याद दिलाया। 

" कांग्रेस के पास गाँधी कब नहीं रहे! लेकिन नए नए आइडिया तो अब आ रहे हैं जब कांग्रेस सत्ता में नहीं है। देश सोने की चड़िया था किसी जमाने में। "

" हाँ जी, प्राचीन काल में था। किताबों में लिखा है।" 

" तो अगर हमें देश को फिर से सोने की चिड़िया बनाना है तो किधर जाना पड़ेगा? वापस पीछे जाना पड़ेगा या नहीं? " 

" कोई देश वापस पीछे कैसे जा सकता है?!.. सर। "

" यही तो आइडिये कि बात है। कोशिश करने से क्या नहीं हो सकता है। हमेशा आगे बढ़ोगे तो एक दिन खाई में भी गिर सकते हो।... मान लो तुम्हारा बटुआ पार्क के गेट पर गिर जाए और तुम आगे निकल जाओ तो बटुआ लेने वापस यानी पीछे जाओगे या नहीं? " 

" हाँ जी, ठीक बात है। लेकिन दुनिया तो आगे बढ़ रही है!"

" दुनिया में हरेक के पास बटुआ नहीं है। हमारे पास था, इसलिए हमें उसकी फ़िक्र है। " 

" लेकिन बटुए में पुरानी करंसी होगी। आज कि जरूरत अलग है। समय के साथ चीजों में बदलाव होता जाता है। इसी को विकास भी कहते हैं। " 

" लगता है तुम वामपंथी हो!!"

"  वामपंथी !! ये क्या होता है सर जी?!! " 

" पता तो मेरे को भी नहीं है। पर होता है कुछ कोरोना जैसा, जिसको खतम करना जरूरी है। कोई वामपंथी मिले तो बताना। " उन्होंने ऊँगली दिखाते हुए हिदायत दी। 

" बिलकुल बताऊंगा सर। आप तो ताली बजवा देना, सब साफ हो जाएंगे दन्न से।"

"  तुम जबरन अपना दिमाग़ मत लगाओ ! अपना समय खराब कर रहे हो! जगह जगह भटक कर बाइट ले रहे हो! इतनी मगजमारी किसलिए!! गोदी में आ जाओ सब झंझट खतम। .... और ये भी देशभक्ति है..... आज कि डेट में। " 


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शनिवार, 16 मई 2026

सही कौन, कौन गलत!!




चाय से ज्यादा केतली गरम। ऊपर से खड़क हुई तो नीचे तक उसकी धमक बननी चाहिए। लोकल सेनापति अपने सिपाहियों के साथ निकले, जिम्मेदारियां को जमीनी स्तर तक पहुंचने के लिए। बड़े तो बड़ों की सुनते हैं। इधर तो वे हैं जिनसे 'क्यों बे' के साथ बात की शुरुवात की जा सकती है। पहली पकड़ में एक 'क्यों बे' केटेगरी का नागरिक और वेरीफाइड वोटर बुधवारिया सामने आया तो बोले,  - "देखो बे,  प्रेम बड़ी चीज होती है। प्रेम के गहरे अर्थ को समझो। प्रेम से कह रहे हैं कि सोना नहीं खरीदना है तो मत खरीदो। साल भर नहीं खरीदोगे तो घरवाली भाग नहीं जाएगी। वरना हमें और ज्यादा प्रेम करना पड़ेगा, सोच लो। जनता हमेशा प्रेम की भूखी होती है। यह बात अंग्रेज जानते थे या हम जानते हैं। जनता टीवी देख कर मान जाए, रेडियो सुनकर मान जाए, अखबार पढ़ कर मान जाए,  इतने सारे विज्ञापन छपवाते हैं उन्हें देखकर मान जाए तो अच्छी बात है। वरना प्रेम से समझाएँगे तो तुम लोगों के पास कोई और चारा नहीं रहेगा । " 


"अरे नहीं मालिक!! सब करियेगा बस प्रेम मत करियेगा हुजूर । प्रेम से धाप गए हम तो। हम गरीब, जो भी आता है प्रेम कर जाता है। पुलिस तो हैं ही प्रेमी, अब दबंग देशभक्त भी आए दिन प्रेम कर जाते हैं। अब आप कह रहे हैं कि समझाने के लिये प्रेम पर उतर आएंगे! तो जान लेओ महाराज हम तो समझे समझाये बैठे हैं। सोना चांदी से हमारा दूर का नाता नहीं है। एक बार घरवाली ने बड़े शौक से कान के टाप्स क्या पहन लिये चोरों को न्योता मिल गया। हुजूर चोर बड़े प्रेम से घर में झाडू मार गए, तब से हमने मान लिया है कि सोना रखना पाप है, सोने कि तरफ देखना भी पाप है । जाने कब सोने पर किस माई बाप की नजर पड़ जाए या फिर चोर उचक्कों की, हम तो गए बारा के भाव में। सोना कोई खाने के काम तो आता नहीं है कि नहीं होगा तो भूखे मर जाएंगे।... सही कह रहे हैं ना हुजूर? " बुधवारिया ने हाथ जोड़ दिये। 


"चलो ठीक है। समझदार हो यह पक्का हो गया। एक बात और, छुट्टी मनाने के लिये विदेश यात्रा नहीं करना है। बिलकुल नहीं। शादी ब्याह, हनीमून, जो भी करना है यहीं करो। समझ गए, कोई यात्रा नहीं ।" सेनापति दूसरे पॉइंट पर आए।


" महाराज हम तो कहीं जाते ही नहीं यात्रा पर। गांव से आए थे खटारा बस में बैठकर और मौका पड़ गया तो जान बचा कर यहां से पैदल निकल गए। हमें तो यह भी पता नहीं की विदेस कहां है। हमारा गांव हमारी माटी, हमारा देस है हुजूर। यात्रा हमारे नसीब में नहीं है। "


"गाँव में रहते हो! तो यहाँ क्यों आ गए! वर्क फ्रॉम होम करना चाहिए था । "


"ये क्या होता है हुजूर!!?"


" गाँव में तुम्हारा घर है ना। वहीं से काम करो। सबको वर्क फ्रॉम होम करना है। अच्छे अच्छे पढ़े लिखों को करना है तो तुम कैसे बच सकते हो! नहीं नहीं,.... मना नहीं करना, ठीक है।  ... और तेल कितना खाते हो? "


"खाते नहीं हैं हजूर। छोँक लगाते हैं बस । "


"बिना छोँक के खाया करो, देशभक्त बनो। इससे अच्छा मौका फिर नहीं मिलेगा। अभी ऑफ़ सीजन में बन लो। अंग्रेजों के जमाने में तो जान तक देना पड़ती थी।  पता है!?" 


"ठीक है हजूर, छोँक भी नहीं लगाएंगे। " बुधवारिया मुंडी हिलाई।


 सेनापति ने फुसफुसा कर सिपाही से पूछा  - " क्यों रे ऐसा क्यों लग रहा है कि हम गलत आदमी से बात कर रहे हैं। "


" हमारी हर बात मान रहा है,  आदमी तो सही है। " सिपाही बोला।


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गुरुवार, 7 मई 2026

झालमुड़ी डेज


 


घोष बाबू रोज की तरह टीवी ताने बैठे हैं। टीवी तो मंथली रिचार्ज से चलता है। घोष बाबू किस रिचार्ज से चल रहे हैं पता नहीं। बंगाल से बाहर बैठा बंगाली बंगाल में ही होता है। बोलते हैं टीवी मुझे नहीं छोड़ता है। लेकिन मिसेस घोष का कहना है ये टीवी को नहीं छोड़ रहे हैं। माछेर झोल और राशोगुल्ला भी अब असरदार नहीं है।

"और क्या चल रहा है घोष बाबू? " सुखवीन्दर ने आते ही पूछा।

"आपको मालूम नहीं!! सब तरफ झलमुड़ी चल रहा है।" सुखवीन्दर पर एक नजर डालते हुए जवाब दिया।

" ओ बादशाओ मैं आपका हाल-चाल पूछ रहा हूं। "

 "हाल-चाल भी झालमुड़ी हैं। मतलब झालम झाल है, टीवी पर खबरें कम झाल ज्यादा चल रही है।"

 "फुर्सत में हो क्या? चलो।" सुखवीन्दर से सोचा थोड़ा टहला जाए साथ साथ।

 "फुर्सत कहाँ है, टीवी देख रहा हूं। "

" टीवी देखना भी कोई काम है!... क्या देख रहे हो?

"झालमुड़ी।... हर चैनल पर झालमुड़ी ही है। "

"अरे क्या झालमुड़ी झालमुड़ी!! चुनाव हो गए, सरकारें करीब करीब बन गई। अब क्या बचा  है देखने को!"

" झालमुड़ी बची है ना।... चुनाव से ज्यादा धमा धम अब हो रही है। बंगाल का झालमुड़ी में बड़ा जोर हैं।"

" छोड़ो प्राजी, चल्लो आपको लस्सी वस्सी पिलवाते हैं। दिमाग़ ठंडा हो जाएगा जी।  अब खबरों से क्या हासिल होना है। " सुखवीन्दर ने दबाव डाला।

" पहले एक बात बताओ, चुनाव का हासिल क्या है? "

" चुनाव का हासिल तो सरकार है घोष बाबू।"

"अरे सरकार तो पहले भी थी। थी या नहीं?... देश को नया क्या हासिल हुआ?...

"आप ही बताओ।"

  " झालमुड़ी। "

" पहले तो आप बाद  महंगाई के आलावा कोई बात नहीं करते थे घोष बाबू !!"

 " अरे समझते नहीं हो!! महंगाई इसमें कवर हो गया ना। झालमुड़ी का रेट दस रुपया फिक्स है प्याज़ के साथ । दस में गरीब भी खा सकता है। अब महंगाई कहाँ है! एक ही झटके में महंगाई खतम ।..."

"फिर भी दो रोटी की समस्या तो है ही। कोई रोज-रोज झालमुड़ी थोड़ी खा सकता है। रोटी तो चाहिए ही। "

" अब झालमुड़ी आ गई, रोटी का क्या काम। ब्रेक फ़ास्ट झालमुड़ी, लंच झालमुड़ी, डिनर झालमुड़ी। शादी सगाई झालमुड़ी, तीसरा तेरही झालमुड़ी। चाट बाजार झालमुड़ी, होटल फाइव स्टार झालमुड़ी ।... उसके बाद भी किसी को रोटी चाहिए तो... मेक एफर्ट एंड इन्जवाय... कोई रोकेगा नहीं। फ्रीडम है... पक्का वाला लोकतंत्र... यू नो। "

" और रोजगार का क्या!? जवान बच्चे पढ़ लिख कर खाली हाथ बैठे हैं!!"

" क्यों बैठे हैं! चाय पकौड़ी बनाते बेचते। अब झालमुड़ी बेच सकते हैं। ऑप्शन है, फिर कहोगे विकास नहीं हुआ! लोग अपनी इच्छा से बेरोजगार रहना चाहे तो उसके लिए कांग्रेस के आलावा कोई भी सरकार जिम्मेदार नहीं है। "

" कैसी बातें कर रहे हो दादा आप! अस्पताल, स्कूल कालेज... इनको भूल गए! "

" झालमुड़ी खाने से कोई बीमार नहीं होता है। सरसों का तेल सेहत के लिए अच्छा  है। हमारा माछेर झोल सरसों के तेल में ही बनता है। झालमुड़ी खाओ स्वस्थ रहो, मस्त रहो।... तुमको एलर्जी है क्या झालमुड़ी से? "

" ना जी ना, हमारी देशभक्ति पर शक न लाओ। मैं तो पहले दिन से ही खा रहा हूं झालमुड़ी, प्याज़ डाल के।... आप ऐसी बात ना किया करो दादा,  दीवारों के भी कान हुआ करते हैं।" सुखविंदर ने उठते हुए धीमी आवाज में कहा।

 

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रविवार, 3 मई 2026

चली हवा चली, टपके आम


 


 

मौसम गर्म हुआ, बेतरतीब हवा चली और आम टपके। दिल्ली की गलियों को पता होता है कि हवा चलेगी तो कुछ आम टपकेंगे जरूर। हवा का रुख देखते ही आम बिरादरी में टपक पड़ने की परम्परा है। दिल्ली के आम बहुत हिसाब लगा कर टपकते हैं। कुछ को लगता है कि वे हैं इसलिए पेड़ आम का है, अगर वे इमली होते तो पेड़ इमली का होता । वे मानते हैं कि आम महत्वपूर्ण है पेड़ नहीं। कईं आम जी लटके लटके ऊब जाते हैं। कई को लटके रहना अपमानजनक लगता है, इसलिए आत्महत्या के इरादे से टपक जाते हैं। अपमान से भरे आदमी को टपकना हो तो वह लटकता है। इधर लटका हुआ अच्छी भली जिंदगी छोड़ कर टपक लेता है। जैसे लोग अच्छी भली नौकरी से अचानक विआरएस ले कर टपक जाते हैं।

 टपक पड़े आम अपने को बहुत महान मानते हैं। जब सारे चिड्डी हों तो उनके बीच चिड्डा पहुंचे तो उसके लिए गर्व की बात है। जैसे लाठियों के बीच लट्ठ चिकना सा । टपके आमों को लगता है कि टपकने से वे कोलंबस हो जाएंगे । अब नई पुरानी दुनिया देखेंगे, अमेरिका को खोजने के लिए खुदाई करेंगे और एक दिन ढूंढ़ निकालेंगे। काली काली कोयलें पार्श्व गान करेंगी कू हू  - कू हू । देवता स्वर्ग से बाहर निकल कर पुष्प वर्षा करेंगे। असंख्य नारद  इंटरनेट पर 'आए आम आए - आए आम आए ' का सन्देश फैलाएंगे। चौतरफ एक नए सूरज का प्रकाश फैलेगा। गली गली प्रभात फेरियां निकलेंगी। रेडियो टीवी पर बिस्मिल्ला खां की शहनाई बजेगी। लोग एक दूसरे के अभिवादन में 'आम आम ' बोलेंगे। और क्या क्या बताएं आपको ! एक टपकन और अफसाने हजार।

अमराई में गर्मी का यह मौसम टपके हुए आमों को बीनने का मौसम भी हुआ करता है। इधर कोई टपका उधर किसी ने उठा कर अपनी थैली में डाल लिया। जो पहले पेड़ के थे अब थैली के हो गए। थैली समझ रहे हैं ना आप ? थैली वाला जल्द से जल्द टपके आमों का अचार डाल लेगा। पहले जो टपके थे अब अचार हैं। आम से अचार होने तक की यात्रा विकास है या राजनीति इस विद्वानों के विचार अलग अलग हो सकते हैं। लेकिन लटका आम मीठा छोड़ कर आए और उसे चटपटा हो जाना पड़े, इसे शतरंज वाले रॉंग मूव यानी गलत चाल कहते हैं। मित्रों में यहां केवल टपकने वाले आमों की बात कर रहा हूं।  अगर आपको कोई राजनीतिक दल, कोई घटना या दल बदल करने वाले ईमानदार लोगों का ख्याल आ गया हो तो इसे महज एक संयोग माना जाए। जरुरी लगे तो वाट्सअप से कोई रामबाण नुस्खा पढ़ कर आजमा लें। लेकिन कृपया आम के आलावा कुछ और न गुलगुलाएं।

 वैसे बात निकल गई है तो बता दें कि राजनीति का जितना संबंध आम आदमी से होता है उतना आम से भी होता है। आम के मौसम में पुराने समय में आम की टोकरियां ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर आया जाया करती थी। अगर मौका जमा कर आम भरी टोकरियां मैनेज कर ली जाएं तो सरकार कब्जाई जा सकती है। लोग कहते हैं  'जिधर दाम, उधर आम '। आजकल टोकरियों का नहीं बक्सों और पेटियों का जमाना है। आम भी अब वह पुराने वाले लंगड़ा दसहरी नहीं रहे जो कभी छोटे महकमों में लुढ़का करते थे । अब तो जिस पेटी को सूंघों हापुस निकलता है। हापुस यानी महाराजा आमों में । हापुस भी टपकता है, मौका मिल जाए तो या मौका नहीं मिले तो। बड़े लोग हापुस को अल्फाँसो कहते हैं। जैसे महाराज को सम्राट कहते ही वे वजनदार हो जाते हैं । इससे उनका रुतबा बढ़ जाता है। हापुस को हर कोई चूस नहीं सकता है। कवि कबीर इक्कीसवें ने लिखा है - मौसम आम का बावला, हर कोई पगलाए ; हापुस हापुस सरकार चाँपे,  देसी खट्टा जनता को चूसवाए ।

 

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अभी जिन्न सो रहा है !


 



 

राजनीति के तांत्रिक जानते हैं कि चुनाव लड़ना असल में जिन्न जगाना है। जिन्न समझते ही होंगे, क्या होता है? हाँ तो महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दे विपक्ष के छाती कुटवा कार्यक्रम होते हैं। चुनावी जिन्न जो है मुर्गा मछली खाने और परोसने की रील देख कर प्रसन्न हो जाता है। जी हाँ, जिन्न के पास मोबाईल फोन होता है। वह भी रोज तीन जीबी डाटा खाता है। वोटर कभी झालमुड़ी के नाम पर खुश हो जाता है कभी अंडा मच्छी देख कर। आपके मन में सवाल आप रहा है कि कैसे !! जिन्न आज के वोटर में घुस जाता है और उससे गवाता रहता है - हम भी तेरे, दिल भी तेरा, वोट भी तेरा ।

वक़्त आने पर सबको पता चल जाएगा कि असल में इवीएम एक चिराग है। सब जानते हैं चिराग जिसके हाथ में होता है जिन्न उसका होता है। आप देखिएगा जब मतगणना वाले दिनभर चिराग रगड़ेंगे तो शाम को जिन्न निकल कर कहेगा  "क्या हुक्म है मेरे आका "। जहाँ जहाँ भी हमने चिराग दबा कर रगड़ा है वहाँ वहाँ जिन्न बाअदब हमारे कदमों में आ कर बैठा है। इसे जादुई चिराग कहा जाता है। लेकिन चिराग का जादू हमारे आलावा कोई नहीं जानता है। किताबें उठा कर देख लो, जिन्न हमेशा अपने आका का हुक्म मानता है।

 हमारा जिन्न अभी कड़ी सुरक्षा में सांसे ले रहा है। बाहर सरकारी पहरा है। सरकारी पहरे के ऊपर हमारा पहरा है। हमारे पहरों पर और दूसरे लोगों के पहरे हैं। इन लोगों के पहरे पर फिर हमारा पहरा है। ऊँची ऊँची बिल्डिंगों से दूरबीनें तान रखी हैं, और बंदूकें भी। हवाएं खामोश हैं, अंधेरे सहमें हुए हैं। सात तलों में सोया है जिन्न और जिन्न में बसी है हमारी जान । जब वो उठेगा तो मिडिया ढ़ोल बजाएगा, अखबारों में हेड लाइन सजेंगी। जगह जगह मछलियाँ और मीट बंटेगा, और हाँ झालमुड़ी भी।

भूल गए हो तो आपको बता दें कि चिराग के जिन्नों से हमारी पार्टी का पुराना नाता है। आप लोगों को जानकारी नहीं होगी कि ज्यादातर जिन्न अकेले होते हैं । उनकी कोई बीबी-वीबी नहीं होती है। वो फुल टाइम सेवक होते हैं । उसके जीवन का लक्ष्य ही हम सब लोगों की सेवा करने का है। चुनावों में हम जब भी  चिराग को रगड़ते थे वह सर झुकाए हाजिर हो जाता था और जो कह देते थे वो कर डालता था । जिन्न जो हैं बहुत आज्ञाकारी होते हैं, मालिक के प्रति वफादार होते हैं और इसलिए देशभक्त भी होते हैं। जिन्न के कामों की कोई सीमा नहीं होती है। उससे कुछ भी करा लो वो कभी मना नहीं करता है। लोग कहते हैं कि जिन्न बुरे होते हैं। खासकर विपक्ष में बैठे लोग पानी पी पी कर जिन्नों की आलोचना करते हैं। लेकिन इन लोगों को नहीं पता है कि जिन्न आलोचना नहीं समझते हैं। सच बात तो ये है कि वे कुछ भी नहीं समझते हैं। उनका दिमाग़ प्राकृतिक नहीं प्रोग्रामिंग किया हुआ होता है। अंदर ही अंदर विपक्षी दल चाहते हैं कि उनके पास भी अपना चिराग हो, वो भी रगड़ें तो फटाक से उनका जिन्न निकल आए। लेकिन उनके पुराने नेताओं ने धर्म की बजाए विज्ञान को पकड़ा। इसमें हमारी क्या गलती है भाई! जो रास्ता आपने चुना है उसका खामियाजा तो भुगतना पड़ेगा। जिन्नों को विज्ञान कतई पसंद नहीं है। सुना है अब रोबोट को जिन्न कि तरह इस्तेमाल करने का विचार चल रहा है !! लेकिन उन्हें मालूम नहीं है कि रोबोट जिन्नों की बराबरी नहीं कर सकते हैं। रोबोट पर 'हेंडल विथ केयर ' लिखा होता है, रगड़ोगे तो मेकेनिक आएगा जिन्न नहीं।.... खैर, आप लोग फ्री बैठे हैं, काम धंधा है नहीं, तो एग्जिट पोल देखिये। यहाँ प्रेम और भक्ति के साथ जिन्न चलीसा का पाठ हो रहा होगा ।

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