मौसम गर्म
हुआ,
बेतरतीब हवा चली और आम टपके। दिल्ली की गलियों को पता होता है कि
हवा चलेगी तो कुछ आम टपकेंगे जरूर। हवा का रुख देखते ही आम बिरादरी में टपक पड़ने
की परम्परा है। दिल्ली के आम बहुत हिसाब लगा कर टपकते हैं। कुछ को लगता है कि वे
हैं इसलिए पेड़ आम का है, अगर वे इमली होते तो पेड़ इमली का
होता । वे मानते हैं कि आम महत्वपूर्ण है पेड़ नहीं। कईं आम जी लटके लटके ऊब जाते
हैं। कई को लटके रहना अपमानजनक लगता है, इसलिए आत्महत्या के
इरादे से टपक जाते हैं। अपमान से भरे आदमी को टपकना हो तो वह लटकता है। इधर लटका
हुआ अच्छी भली जिंदगी छोड़ कर टपक लेता है। जैसे लोग अच्छी भली नौकरी से अचानक
विआरएस ले कर टपक जाते हैं।
टपक पड़े आम अपने को बहुत महान मानते हैं। जब
सारे चिड्डी हों तो उनके बीच चिड्डा पहुंचे तो उसके लिए गर्व की बात है। जैसे
लाठियों के बीच लट्ठ चिकना सा । टपके आमों को लगता है कि टपकने से वे कोलंबस हो
जाएंगे । अब नई पुरानी दुनिया देखेंगे, अमेरिका
को खोजने के लिए खुदाई करेंगे और एक दिन ढूंढ़ निकालेंगे। काली काली कोयलें पार्श्व
गान करेंगी कू हू - कू हू । देवता स्वर्ग
से बाहर निकल कर पुष्प वर्षा करेंगे। असंख्य नारद
इंटरनेट पर 'आए आम आए - आए आम आए ' का सन्देश फैलाएंगे। चौतरफ एक नए सूरज का प्रकाश फैलेगा। गली गली प्रभात
फेरियां निकलेंगी। रेडियो टीवी पर बिस्मिल्ला खां की शहनाई बजेगी। लोग एक दूसरे के
अभिवादन में 'आम आम ' बोलेंगे। और क्या
क्या बताएं आपको ! एक टपकन और अफसाने हजार।
अमराई में
गर्मी का यह मौसम टपके हुए आमों को बीनने का मौसम भी हुआ करता है। इधर कोई टपका
उधर किसी ने उठा कर अपनी थैली में डाल लिया। जो पहले पेड़ के थे अब थैली के हो गए।
थैली समझ रहे हैं ना आप ? थैली वाला जल्द से जल्द टपके आमों का अचार डाल लेगा।
पहले जो टपके थे अब अचार हैं। आम से अचार होने तक की यात्रा विकास है या राजनीति
इस विद्वानों के विचार अलग अलग हो सकते हैं। लेकिन लटका आम मीठा छोड़ कर आए और उसे
चटपटा हो जाना पड़े, इसे शतरंज वाले रॉंग मूव यानी गलत चाल कहते हैं। मित्रों में
यहां केवल टपकने वाले आमों की बात कर रहा हूं।
अगर आपको कोई राजनीतिक दल, कोई घटना या
दल बदल करने वाले ईमानदार लोगों का ख्याल आ गया हो तो इसे महज एक संयोग माना जाए।
जरुरी लगे तो वाट्सअप से कोई रामबाण नुस्खा पढ़ कर आजमा लें। लेकिन कृपया आम के
आलावा कुछ और न गुलगुलाएं।
वैसे बात निकल गई है तो बता दें कि राजनीति का
जितना संबंध आम आदमी से होता है उतना आम से भी होता है। आम के मौसम में पुराने समय
में आम की टोकरियां ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर आया जाया करती थी। अगर मौका जमा कर
आम भरी टोकरियां मैनेज कर ली जाएं तो सरकार कब्जाई जा सकती है। लोग कहते हैं 'जिधर
दाम, उधर आम '। आजकल टोकरियों का नहीं बक्सों
और पेटियों का जमाना है। आम भी अब वह पुराने वाले लंगड़ा दसहरी नहीं रहे जो कभी
छोटे महकमों में लुढ़का करते थे । अब तो जिस पेटी को सूंघों हापुस निकलता है। हापुस
यानी महाराजा आमों में । हापुस भी टपकता है, मौका मिल जाए तो
या मौका नहीं मिले तो। बड़े लोग हापुस को अल्फाँसो कहते हैं। जैसे महाराज को सम्राट
कहते ही वे वजनदार हो जाते हैं । इससे उनका रुतबा बढ़ जाता है। हापुस को हर कोई चूस
नहीं सकता है। कवि कबीर इक्कीसवें ने लिखा है - मौसम आम का बावला, हर कोई पगलाए ; हापुस हापुस सरकार चाँपे, देसी खट्टा जनता को चूसवाए ।
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