शुक्रवार, 29 मई 2026

मुद्दा मतलब मछली के पेट में अंगूठी !


 


 नकली का जमाना है साहब। चमक नहीं हो तो सोना भी सोना नहीं माना जाए । नकली में चमक ज्यादा होती है। चमक के कारण ही लोग अब सोना भी नकली पसंद कर रहे हैं।  जब सबके पास नकली हो तो नकली ही सुपाच्य है । कहते हैं असली पचता नहीं है किसीको । दूध, घी, अंडा, मिठाई, दवाई, दोस्ती, रिश्ते, देशभक्ति, साधु संत, वोटर - लीडर सब नकली चल रहे हैं, और लोकप्रिय चल रहे हैं । असली वाला जमाना अलग था। जब असली आंदोलन, असली देशभक्त और असली क्रांतिकारियों से हार कर अंग्रेज भाग गए थे। अब वो असली वाले राजा-वजीर और प्यादे नहीं रहे, न पुरानी वाली शतरंज की बिसात । इसका कारण यह कि असली पर एक्सपायरी डेट होती है, नकली के लिए कोई समय सीमा नहीं, जब तक चलती रहे चलाते जाओ । असली फूल मुरझाते हैं, नकली माला दशकों तक फोटो पर लटकी श्रद्धा के गीत गाती रहती है। किन्तु मुद्दों के साथ ऐसा नहीं है। असली मुद्दे भले ही इतिहास हो जाएं पर मौजूद रहते हैं ।

चुनाव के शुरुआती दिनों में मांगने वालों को मुद्दे लपेट कर खड़ा होना पड़ता है । बाद में भले ही पानी-पुरी दिखाकर चुनाव जीत लें ।  असली मुद्दे असली और खानदानी होते हैं । उसमें ना कोई मिलावट हो सकती है ना कोई कमी बेसी। बल्कि यह कहना ठीक होगा की असली मुद्दे हमारी विरासत हैं । गरीबी, बेकारी और महंगाई, आज़ादी के समय से जो सीना तान के खड़े हुए तो आज भी डटे हुए हैं। सरकारें आ रही हैं सरकारें जा रही हैं लेकिन मुद्दे लालकिले कि तरह वहीं खड़े हैं।  साल में एक बार आकर कोई न कोई तालियां बटोर ले जाता है मुद्दे वहीं पड़े रह जाते हैं। असली मुद्दे घाट पर लगी नाव हैं, वादाखोर आते हैं उसके सहारे नदी पार करते हैं और फिर बेसहारा छोड़ कर चले जाते हैं। मुद्दे न हुए शकुंतला हो गए। मछली के पेट से जब तक अंगूठी नहीं निकलेगी तब तक राजा दुष्यंत को याद नहीं आएगी। संसद भवन में कोई मछली ले कर तो  पहुंचता नहीं है। तो फिर हवा में तैर रहे आज के मुद्दे क्या हैं?

आज के मुद्दे समोसा हैं, कचौरी है, कभी झालमुड़ी है तो कभी माछेरभात या मंगलसूत्र है । असली मुद्दों की और देखना नहीं,... 'मला छेडू नको' । तो आज के मुद्दे समझने से पहले आज की स्थिति को समझें। कहते हैं जीवन है तो संसार है। इसे और व्यावहारिक कर दें तो जान है तो देश है, देश है तो राजनीति है। और आप जानते ही हैं, जान जाने का ऐसा है कि कभी भी जा सकती है, पट्ट से। आम आदमी की सांसें इस पर निर्भर करती है कि गुंडेगण, बदमाशभाऊ किस मूड में है। यूँ मान के चलिए की ऊपर वाले की मर्जी के बगैर एक सांस भी आपको एक्स्ट्रा नहीं मिल सकती। ‘ऊपर वाला’ और ‘नीचे वाला’ दोनों मिलकर डबल इंजन वाले हो जाते हैं। उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है । तो असली मुद्दा जान है। जो रॉन्ग साइड चलेगा उसकी पहले जा सकती है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। इस बात का ध्यान रखें कि अस्पताल मरने का सबसे महंगा लेकिन जरुरी स्थान है। वहाँ पैसा खत्म जिंदगी खत्म। तो व्यावहारिक मुद्दा पैसा हुआ। बड़े संत कह गए हैं, पैसा खुदा तो नहीं पर खुद की कसम खुदा से काम भी नहीं। तो जिसके पास पैसा है वही सही मायने में जिंदा है और जो जिंदा है उसी के लिए राजनीति है। बाकी लोग 'भाइयों और बहनों' सुनने के लिए अभिशप्त हैं।

 

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