शनिवार, 16 मई 2026

सही कौन, कौन गलत!!




चाय से ज्यादा केतली गरम। ऊपर से खड़क हुई तो नीचे तक उसकी धमक बननी चाहिए। लोकल सेनापति अपने सिपाहियों के साथ निकले, जिम्मेदारियां को जमीनी स्तर तक पहुंचने के लिए। बड़े तो बड़ों की सुनते हैं। इधर तो वे हैं जिनसे 'क्यों बे' के साथ बात की शुरुवात की जा सकती है। पहली पकड़ में एक 'क्यों बे' केटेगरी का नागरिक और वेरीफाइड वोटर बुधवारिया सामने आया तो बोले,  - "देखो बे,  प्रेम बड़ी चीज होती है। प्रेम के गहरे अर्थ को समझो। प्रेम से कह रहे हैं कि सोना नहीं खरीदना है तो मत खरीदो। साल भर नहीं खरीदोगे तो घरवाली भाग नहीं जाएगी। वरना हमें और ज्यादा प्रेम करना पड़ेगा, सोच लो। जनता हमेशा प्रेम की भूखी होती है। यह बात अंग्रेज जानते थे या हम जानते हैं। जनता टीवी देख कर मान जाए, रेडियो सुनकर मान जाए, अखबार पढ़ कर मान जाए,  इतने सारे विज्ञापन छपवाते हैं उन्हें देखकर मान जाए तो अच्छी बात है। वरना प्रेम से समझाएँगे तो तुम लोगों के पास कोई और चारा नहीं रहेगा । " 


"अरे नहीं मालिक!! सब करियेगा बस प्रेम मत करियेगा हुजूर । प्रेम से धाप गए हम तो। हम गरीब, जो भी आता है प्रेम कर जाता है। पुलिस तो हैं ही प्रेमी, अब दबंग देशभक्त भी आए दिन प्रेम कर जाते हैं। अब आप कह रहे हैं कि समझाने के लिये प्रेम पर उतर आएंगे! तो जान लेओ महाराज हम तो समझे समझाये बैठे हैं। सोना चांदी से हमारा दूर का नाता नहीं है। एक बार घरवाली ने बड़े शौक से कान के टाप्स क्या पहन लिये चोरों को न्योता मिल गया। हुजूर चोर बड़े प्रेम से घर में झाडू मार गए, तब से हमने मान लिया है कि सोना रखना पाप है, सोने कि तरफ देखना भी पाप है । जाने कब सोने पर किस माई बाप की नजर पड़ जाए या फिर चोर उचक्कों की, हम तो गए बारा के भाव में। सोना कोई खाने के काम तो आता नहीं है कि नहीं होगा तो भूखे मर जाएंगे।... सही कह रहे हैं ना हुजूर? " बुधवारिया ने हाथ जोड़ दिये। 


"चलो ठीक है। समझदार हो यह पक्का हो गया। एक बात और, छुट्टी मनाने के लिये विदेश यात्रा नहीं करना है। बिलकुल नहीं। शादी ब्याह, हनीमून, जो भी करना है यहीं करो। समझ गए, कोई यात्रा नहीं ।" सेनापति दूसरे पॉइंट पर आए।


" महाराज हम तो कहीं जाते ही नहीं यात्रा पर। गांव से आए थे खटारा बस में बैठकर और मौका पड़ गया तो जान बचा कर यहां से पैदल निकल गए। हमें तो यह भी पता नहीं की विदेस कहां है। हमारा गांव हमारी माटी, हमारा देस है हुजूर। यात्रा हमारे नसीब में नहीं है। "


"गाँव में रहते हो! तो यहाँ क्यों आ गए! वर्क फ्रॉम होम करना चाहिए था । "


"ये क्या होता है हुजूर!!?"


" गाँव में तुम्हारा घर है ना। वहीं से काम करो। सबको वर्क फ्रॉम होम करना है। अच्छे अच्छे पढ़े लिखों को करना है तो तुम कैसे बच सकते हो! नहीं नहीं,.... मना नहीं करना, ठीक है।  ... और तेल कितना खाते हो? "


"खाते नहीं हैं हजूर। छोँक लगाते हैं बस । "


"बिना छोँक के खाया करो, देशभक्त बनो। इससे अच्छा मौका फिर नहीं मिलेगा। अभी ऑफ़ सीजन में बन लो। अंग्रेजों के जमाने में तो जान तक देना पड़ती थी।  पता है!?" 


"ठीक है हजूर, छोँक भी नहीं लगाएंगे। " बुधवारिया मुंडी हिलाई।


 सेनापति ने फुसफुसा कर सिपाही से पूछा  - " क्यों रे ऐसा क्यों लग रहा है कि हम गलत आदमी से बात कर रहे हैं। "


" हमारी हर बात मान रहा है,  आदमी तो सही है। " सिपाही बोला।


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