गुरुवार, 26 मार्च 2026

एक सायकिल का मोक्ष


 

 

माखन सिंग के अंगम में सायकिल रखी थी । सायकिल रखने का स्थान सुनिश्चित है । जबसे आई है यानी करीब पचास सालों से वह इसी जगह पर खड़ी रहती है । इतने बरसों में न माखन सिंह की नेमप्लेट की जगह बदली और न सायकिल की । आज दोपहर की बात है, खाना खा कर माखन सिंह लेटने वाले थे कि हाजत महसूस हो गई । हाथ में लिया हुआ टावेल सायकिल पर रखा और संडास में चले गए । लौटे तो देखा सायकिल गायब है ! माखन सिंह के हाथ से तोते उड़ गए । तुरंत मुँह धोया, पानी के छींटे मारे और आँखें फाड़ कर उस जगह को देखा जहाँ कुछ क्षणों पहले तक सायकिल मौजूद थी । आँगन से सायकिल ऐसे निकाल गई जैसे शरीर से आत्मा निकाल जाती है । पता ही नहीं चला ! बाप रे ! इतना विकास हो जाएगा ये तो सोच ही नहीं था । चोरियाँ ऐसे होने लगी हैं जैसे सरकारी खजाना हो, उठाओ और चल दो ! न पुलिस का डर, न कानून का और न ही सरकार का ! हर कोई तिलक लगाए, हाथों पर धार्मिक धागा बंधे घूम रहा है तो कम से कम पाप-पुण्य का विचार होना ही चाहिए ! ज्ञानी कह गए हैं “इस दुनिया में सब चोर, कोई छोटा चोर कोई बड़ा चोर ... “  सुना  है चोरों में व्यावहारिक समाजवाद होता है । लेकिन एक सायकिल से किस किस को कितना हिस्सा मिल पाएगा । क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा !

पुराने समय में भी एक से एक चोरियाँ होती थीं । नाम चलता था चोरों का । चौपालों पर चोरियों के किस्से सुनाए जाते थे । एक कला चोर था, कहते हैं वह आँखों से काजल भी चुरा ले जाता था । राजकुमारी तक उसपे फ़िदा थी । बगदाद का चोर, अलीबाबा चालीस चोर, चतुर चोर की कहानी, चोर मचाए शोर, बाम्बे का चोर वगैरह । जानकार बताते हैं कि पुराने समय में चोरी कुछ ही लोग किया करते थे । जैसे जैसे सभ्यता का विकास हुआ चोरी की कला नीचे से ऊपर जाने लगी । अब तो बैंक से मस्त लोन लो और मजे में विदेश भाग जाओ । लोन ले कर भागना एक बड़ा उद्योग है । विदेश में बैठ कर जाम दिखते हुए मुँह चिढ़ाने का अपना ही सुख है । इन लोगों के कारण लोकल पुलिस छोटे चोरों को गंभीरता से नहीं ले पाती है । थाने में बैठे सिपाहियों को पजल गेम खेलना पड़ता है । चोर के आगे दो चोर, चोर के पीछे दो चोर, आगे चोर पीछे चोर, बताओ कुल कितने  चोर ?

यही सब देख सोच कर माखन सिंग को कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी । उनकी सायकिल कोई मामूली सायकिल नहीं थी । चालीस साल पहले उन्हें बाकायदा तब मिली थी जब वे दूल्हा बने बरातियों के साथ पहली बार ससुराल में खाना खाने बैठे थे । ससुर जी ने खवाई में घंटी डायनमा लगी सायकिल दिखते हुए हाथ जोड़ कर कहा था – खाना खाओ बेटा, ये हरकुलिस सायकिल आपके लिए है । बगल में बैठे चाचा बोले – दूल्हा नहीं खाएगा । दोनों पहियों में पचरंगी गजरे तो डाले ही नहीं हैं ! इसके बाद कैसी तो दौड़भाग मची थी । आनन फानन में गजरे लाए गए और चाचा से रंग पसंद करवा के पहियों में लगाए गए । चाचा ने धीरे से कहा – अब खाओ बेटा, गजरे लगाव दिए हैं हमने । लेकिन माखन सिंग नहीं माने, बोले -  पहले घंटी और डायनमा चेक करा दीजिए, काम कर रहे हैं या नहीं ।  चाचा ने घंटी बजाई थी तीन चार बार । माखन सिंग के अंदर कहाँ कहाँ घंटी बज उठी थी उन्हें आज भी याद है । पैदल मार कर डायनमा भी चेक किया, बराबर है । चाचा ने इस बार पीठ पर हाथ रखते हुए कहा – सब ठीक है, खाओ बेटा । और दूल्हे सहित पूरी बारात ने कहना शुरू किया । माखन सिंग का सपना पूरा हो गया । उस जमाने में इस एकमात्र मौके पर दूल्हों को बस यही चाहिए होता था ।

समय के साथ सायकिल के पुर्जे बदलते गए । जैसे हमारा शरीर सेल्स से बना होता है । सेल्स मरते रहते है, उनकी जगह नए सेल्स लेते जाते हैं । डाक्टर बताते हैं आठ दस साल में अमर शरीर पूरा बदल जाता है । समय के साथ माखन सिंग की सायकिल भी पूरी बदल गई । पाँच साल पहले फ्रेम भी बदलवा ली थी । तकनीकि रूप से देखा जाए तो अब वो सायकिल संसार में नहीं थी जो ससुराल से मिली थी । इस भावना के कारण माखन सिंग सायकिल से पहले जैसा प्रेम नहीं कर पा रहे थे । चाचा ने सुना तो बोले – बूढ़े हो गए हो पर बचपना नहीं गया तुम्हारा । अरे नेहरू जी नहीं हैं तो क्या संसद नहीं है !? चलाते रहो जैसी चले । ... और माखन सिंग ने उस दिन शाम को पत्नी से कहा – तुम बहुत दिनों से पोपला मुँह लिए हो । कल चलना नई बत्तीसी लगवा लेंगे ।

दो दिन बाद चाचा आए, बोले – का माखन ! ... ये क्या सुन रए हें हम !! सायकिल चोरी चली गई !... थाने में रपट लिखाए हो या नहीं ?

“तो कहना था ना कि ससुराल से मिली है खवाई में ।“

“कहा था .... बोलता है दहेज का केस बन सकता है ।“

“फिर !?”

“ फिर क्या .... अब दहेज का केस नहीं बनाने का पैसा माँग रहा है ... रिश्वत ।“

“ये तो लेने के देने पड़ गए !!”

“लेना किससे है, देना ही पड़ेंगे ।“

“ऐसे नहीं चलेगा, उनके पास क्या सबूत है कि दहेज लिया था ।“ चाचा वकील बने ।

“ सबूत का ही तो पेंच है । सिपाही पूछता है कि सायकिल चोरी हुई इसका क्या सबूत है !”

“अरे !! ....  फिर क्या सोचा है ?”

“ अब क्या सोचें ... ससुर सिधार गए हैं नहीं तो उनसे दूसरी माँगते ।“

“सालों से माँग लो । दे नहीं सकते क्या !”

“बात हुई थी उनसे भी । बोलते हैं वही वाली पुरानी दे जाओ और नई ले जाओ । ... चाचा फँस गए हम तो !”

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