गुरुवार, 26 मार्च 2026

ईमानदारी से बचो


 


जैसे ही पता चलता है कि कोई आदमी सच्चा और ईमानदार है तो लोग ऐसे आँखें फाड़ कर देखते हैं मानो किसी एलियन की बात हो रही हो । जो सैकड़ों जुमलों और हजारों झूठ पर पर भरोसा कर लेते हैं उन्हें एक छोटे से सच को पचाने में स्कूल के दिन याद आ जाते हैं । हाँ साहब, हमारे एक टीचर थे कालूराम मालवी । बड़े ईमानदार थे । ज्ञान बहुत था, पढ़ाते अच्छा थे । फटी चप्पल पहन कर स्कूल आते थे । कपड़े इतने सलीके से पहनते थे कि फटा या रफ़ू किसी को दिखता नहीं था । सुना था कि काली चाय में नामक डाल कर पीते थे । उन्हें  कभी टिफिन लाते नहीं देखा, चूना-तंबाकू की डिब्बी जरूर रखते थे । जब कभी भूख लगती थी तो तंबाकू मसल कर दबा लेते थे । मुँह को चबाने का सुख मिल जाता था, भूख लजा कर रह जाती थी । अब न वो समय है और ना वैसे लोग । सरकार ने भी मुफ़्त अनाज दे दे कर किसी को ईमानदार नहीं रहने दिया । भगवान तो ऊपर से हर आदमी को कालूराम बना कर ही भेजता है, लेकिन सिस्टम उसे चालूराम बना देता है ।

कल्पना कीजिए अगर देश में सारे लोग सच्चे और ईमानदार हो जाएं तो !? चालूराम बोले - राजनीति में कौन जाएगा ! सरकार कैसे बनेगी ! सोचिए जरा इस बुरी अवस्था में कोई ईमानदार प्रधानमंत्री लाल किले से कितने सेकेंड सच बोल पाएगा ! तमाम मंत्री जनता को अपना और सरकार का सच बताएंगे तो क्या वो जीत पाएंगे ! ऊपर से नीचे तक सच्चे और ईमानदार लोग भरे होंगे तो मंत्रालयों और दूसरे दफ्तरों का क्या होगा ! पुलिस थानों में तो ईमानदारी मानो कुर्सी पर रखे अंगारे होंगे । जो बैठेगा उसकी जल जाएगी । ईमानदारी से न अस्पताल चल पाएंगे ना ही प्रायवेट स्कूल । अभी तो टीवी और अखबार जमाने भर के विज्ञापनों से भरे रहते हैं । अगर विज्ञापनों में प्रोडक्ट का सच बताएंगे तो बिक पाएंगे क्या ! बाजार की जान झूठ में बसती है । सदी के नायक अभी जो समान बेच रहे हैं, ईमानदारी और सच के साथ खुद ठंडे और कूल नहीं हो जाएंगे ! सुबह सुबह ग्रहणियों को ताजी सब्जियों का सच बरदाश्त हो पाएगा ? देर से लौटे मियाँ सच के साथ घर में घुस पाएंगे ! हर सवाल जवाब है नहीं ।

बात साफ है कि सभ्य समाज में सच्चाई और ईमानदारी सबसे बड़ा अवगुण है । देश के स्तर पर देखें तो ईमानदारी विकास में बाधक है । लोगों से ही पूछा जाए कि उन्हें विकास चाहिए या ईमानदारी ? तुरंत मुख्यधारा का पता चल जाएगा । यही कारण है कि हमारे यहाँ कोई कालूराम किसी का आदर्श नहीं है । कालूराम हापुस आम की तरह सीजन पर आते हैं और हम उन्हें चूस कर फैंक देते हैं ।

बेईमानी शब्द किसे अच्छा लगेगा ! हम चाहे न हों पर ईमानदार ही कहलाना चाहेंगे । अच्छे शब्दों का बड़ा महत्व होता है, ईमानदारी का भी है ही । शुद्ध सोने से गहने नहीं बनते हैं । उसमें तांबा मिलाना जरूरी होता है, पचासों टांके लगाना भी जरूरी होता है । मिलावट के साथ ईमानदारी भी गहना है । पानी में यूरिया और केमिकल डाल बना दो तो वह दूध के नाम पर ही बिकता है । दूध वाला कहता है – भले ही पानी मिला है पर मैं ईमानदारी से भैंस का दूध दे रहा हूँ । ये नए जमाने की ईमानदारी है । दफ़तर में अफसर बाबू पैसा ले कर यदि काम कर दें तो यह ईमानदारी है । चुनाव के समय वोटर जिस पार्टी से दारू और नगदी ले ले और उसी को वोट दे दे तो वह ईमानदार है । पुल या सड़क बनाने वाला ठेकेदार तीस प्रतिशत मंत्री को दे दे तो पुल टूटने के बावजूद वह सच्चा और ईमानदार है । क्या सभ्यता को इस बात की जरूरत है कि अब झूठ को मुख विलास और बेईमानी को चरित्र विलास कहते हुए गरिमा का सृजन किया जाए !

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