रविवार, 30 अगस्त 2026

प्याज सस्ता होता है तो लोग नॉनवेज ज्यादा खाते हैं !


 



देखो जी, सरकार अपने तरीके से काम करती है लेकिन उसका लक्ष्य हमेशा जनकल्याण ही होता है। लोगों की शिकायत है कि दवाएं महंगी हो गई हैं, इलाज में बहुत दिक्कत आती है। अब इसका मतलब यह नहीं कि सारे काम छोड़ कर सरकार जबरन दवाएं सस्ती करने में लग जाए। आपने सुना होगा दवाओं के साइड इफेक्ट्स बहुत होते हैं। लोग जितना बीमारी से नहीं मरते, उससे ज्यादा साइड इफेक्ट्स से मर जाते हैं। साइड इफेक्ट्स के लिए और दवाएं खानी पड़ती हैं, फिर उन दवाओं का भी साइड इफेक्ट हो जाता है। इसका कोई अंत नहीं है। दवाओं से शरीर की रेजिस्टेंस पावर (प्रतिरोधक क्षमता) कम हो जाती है। हमारा तो मानना है कि दवाएं और महंगी होनी चाहिए ताकि जनता उनसे दूर ही रहे। कोई तकलीफ हो तो योग करें, मजे में रहें! अब तो कैंसर जैसी बीमारी भी गोमूत्र से ठीक हो जाती है, कोई साइड इफेक्ट नहीं।

इधर दूध को लेकर भी बहुत हाय-तौबा मचाई जा रही है। दूध भी हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सबको पता है कि जानवरों को इंजेक्शन लगाकर दूध निकाला जाता है। नकली दूध भी खूब मिल रहा है। लाड़ले दूधवाले यूरिया और दूसरे केमिकल्स से दूध बना रहे हैं। इनको रोकना संभव नहीं है। लेकिन जब हमारे बच्चे ऐसा दूध पिएंगे तो उनका क्या हाल होगा, बताइए! दूध से बचने का कोई रास्ता नहीं है सिवाय इसके कि वह और महंगा हो जाए।

दूसरी अच्छी बात यह है कि दालें और दूसरे अनाज लगातार महंगे हो रहे हैं। आजकल खेतों में तमाम तरह के केमिकल और दवाइयां छिड़की जाती हैं जो मनुष्य के लिए हानिकारक हैं। अब तो डॉक्टर भी गेहूं खाने को मना करते हैं। ऐसे तो कोई उनकी सुनता नहीं है, लेकिन जब चीजें महंगी हो जाएंगी तो लोग कटौती करना सीखेंगे और स्वस्थ रहेंगे। आप देख ही रहे हैं, देश में मोटापे की बीमारी तेजी से बढ़ रही है। लोग खा-खाकर खुद को और देश को बेडौल बना रहे हैं। सौभाग्य से घी, पनीर, तेल वगैरह सब लगातार महंगे हो रहे हैं और आप देखेंगे कि 2035 तक देश का हर आदमी फैट-लेस हो जाएगा। कचौरी-समोसे 25 रुपये प्रति नग बेचे जा रहे हैं। संसद में भी इस पर चिंता व्यक्त की गई थी। जांच समिति की रिपोर्ट आई है कि महंगे होने के कारण लोगों ने कचौरी-समोसे खाना कम कर दिया है और इससे उनके स्वास्थ्य पर अच्छा असर पड़ रहा है। हमारा सोचना तो यह है कि कचौरी-समोसा पचास रुपये का हो जाए ताकि लोग उनकी तरफ देखें ही नहीं।

यह ‘हे राम’ वाले गांधी का देश है। हम अहिंसा के पुजारी हैं। सर्वे रिपोर्ट से पता चला है कि जब प्याज सस्ता होता है तो लोग नॉनवेज ज्यादा खाते हैं। सारी हिंसा प्याज के कारण होती है। प्याज महंगा हो रहा है तो इसके दो फायदे हैं—एक तो किसानों को अच्छी कीमत मिल रही है, दूसरा जनता को बकरों और मुर्गों की दुआएं मिल रही हैं।

अभी शक्कर की कीमतें आसमान छूने लगीं तो दिमागी नक्सली लोग इथेनॉल को दोष दे रहे हैं। लेकिन देशभक्त जानते हैं कि जनता डायबिटीज से पीड़ित है। जीवन भर गोली लेनी पड़ती है। डॉक्टरों ने हाथ टेक दिए हैं, डायबिटीज को खत्म करना उनके बस की बात नहीं है। उनकी लाचारी देखकर मास्टरस्ट्रोक के तहत शक्कर के दाम बढ़ाए गए हैं। शक्कर एक तरह से जहर है। हर कोई जनता है कि नेता लोग सब खा जाते हैं, लेकिन मीठा नहीं खाते। और देखिए, हमारे लीडर अस्सी साल में भी बूढ़े नहीं होते हैं !

...तो आँख-कान बंद रखो और मुँह भी। बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत खाओ।

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बुधवार, 26 अगस्त 2026

मेरी तरफ से फइनल है


 







टेक्सी में बैठते ही सोनू बोला - "मम्मी मुझे लड़की पसंद है। मेरी तरफ से फाइनल है ।"
सोनू दो बार लड़की से मॉल में मिल चुका था। आज सिंह साहब पत्नी और बेटे के साथ लड़की देखने आए थे। अच्छे माहौल में बातचीत हुई। मतलब माहौल अच्छा था, काम की कोई बात नहीं हुई।  दोनों पार्टियाँ एक दूसरे को तौल रही थी। हरा समंदर, गोपी चंदर, बोल मेरी मछली कितना पानी? लेकिन दोनों बंधी मुट्ठी खोल नहीं रहे थे । थोड़ा मीठा फिर थोड़ा नमकीन, फिर मीठा फिर नमकीन। चाय काफ़ी, वाह जी वाह जी। और टाइम इज ओवर! इधर बेटा मूरख, दिल भी तेरा, हम भी तेरे। मानो उनकी पकड़ में आ गया। 

इतनी आसानी से मैदान मारने दे ऐसा कौन सा सिंह पैदा किया है भगवान ने! बोले - " इन लोगों में 'वो बात नहीं है '।... मिठाई में दम नहीं था और नमकीन भी सोयाबीन के तेल वाला था। " सिंह के कहने का मतलब था कि वे अभी किसी निर्णय पर नहीं पहुँचे हैं। 

माँ समझ गईं। बेटे को और उसके बाप को भी। मौके की नजाकत को भाँप कर बोली - "थोड़ा रुक बेटा, घर चल कर बात करेंगे।"
इधर जेनजी सोनू का इरादा मजबूत है। " मिठाई तो अच्छी थी माँ। और नमकीन तो आजकल सोयाबीन तेल में ही बनता है। अपने यहाँ भी तो किचन में सोयाबीन बापरते हैं!" सोनू ने कहा जिसका मतलब था कि वह निर्णय पर पहुँच चुका है। 
माँ ने धीरे से कहा -" घर चल कर पापाजी की राय से सब तय होगा। अभी शांति रख जरा। " 
"शादी किसे करनी है? क्या पापा को!?" सोनू वाइब्रेशन मोड़ में घुड़का। 

माँ ने बेटे का हाथ दबाया, जिसका मतलब है कि चुप रह गधे, ये बाप है सरकार नहीं । सोनू फिलहाल चुप हो गया। ऐसा है कि जेनजी किसी से डरते नहीं हैं लेकिन माँ की बात सुन लेते हैं। यही बात सिंह साहब पर भी लागू है। वे भी किसी से नहीं डरते हैं लेकिन बीवी की सुनते हैं। मिसेस सिंह का मामला थोड़ा सा जुदा है। वो ना किसी से नहीं डरती हैं और ना किसी की सुनती हैं। एक विराम दें कर धीरे से बोली - मैं हूँ ना। 
सोनू बोला - कहे देता हूँ, मेरी तरफ से फाइनल है। 
घर पहुंचते ही सिंह साहब बोले - लोग तो खास नहीं हैं। बस बातें थीं बड़ी बड़ी। रिश्तेदारी वाली 'वो बात नहीं है'। 
"सब ठीक तो था पापा, आप भी बस...." सोनू ने कमर कसी। 
"मैंने कब कहा कि ठीक नहीं था!! लेकिन 'वो बात नहीं थी'।" 
" मॉल में क्या कुछ बोली लड़की?" सिंह साहब को अनसुना करते हुए माँ ने सोनू से पूछा। 
"हाँ बोली कि तुम बड़े जाँबाज हो। ब्रेव भी कहा। उसने तरीफ की मॉम ।"
"जाँबाज़ क्यों बोली!! पहाड़ों पर ले जाएगी क्या!?" सिंह साहब घुड़के।
"मीनिंग पर मत जाओ पापा । ये अर्नामेंटल वर्ड हैं । जब किसी को एप्रिशिएट करना हो तो बोला जाता है।.... पर मेरी तरफ से फाइनल है।"
"क्या फाइनल फाइनल लगा रखा है!! कह रहा हूँ 'वो बात नहीं है' कि रिश्ता कर लें।" सिंह नाराज हुए।
"कोई ब्वाय फ्रेंड तो नहीं है उसका?" माँ ने फिर पूछा।
"आजकल अच्छी लड़कियों के बॉय फ्रेंड तो होते ही हैं मॉम । उससे क्या फर्क पड़ता है। अब जमाना बोहोत आगे बढ़ चुका है। शादी अलग चीज है बॉयफ्रेंड अलग चीज है। दोनों का कोई कनेक्शन नहीं है।"
"लड़की अपनी सहेली के साथ आईं थी या माँ के साथ?" सिंह ने पूछा।
"बॉयफ्रेंड के साथ आईं थी पापा।... भाई जैसा है वो तो।...  बॉयफ्रेंड ने भी ओके कर दिया है।... मेरी तरफ से भी फइनल है।... जल्दी शादी करने को बोल रहे हैं।"
"जल्दी शादी!! लेकिन लड़की के माँ बाप ने तो कुछ नहीं कहा!"
" एट्टीन ईयर्स के बाद पेरेंट्स कुछ नहीं कह सकते हैं। यू नो, कुछ पेरेंट्स समझदार भी होते हैं। " सोनू ने लक्ष्मण रेखा खेंची। 
"तो जल्दी शादी का कौन बोल रहा है!? " 
"बॉयफ्रेंड लोगों ने कहा है मॉम । लड़की का भी डिसीजन है।... ये फाइनल है। " 
" सोनू जल्दबाजी मत करो। अभी तुम नए नए बालिग़ हुए हो। हमें सोच समझ कर निर्णय लेना चाहिए।"
" क्या सोच समझ कर निर्णय लेना चाहिए!! आज तक आपने सोच समझ के वोट तो 
दिया नहीं, सही आदमी चुना नहीं, फिर आपके निर्णय पर भरोसा कौन करेगा!! " 
"रिश्तेदारी एक बार होती है। सरकारें तो आती जाती रहती हैं। " सिंह बोले।
"किस दुनिया में हो!! सरकार एक बार चढ़ जाती है तो उतरती नहीं है। सावधानी की जरूरत उधर होती है। ... अब कोई बहस नहीं, मेरी तरफ से फाइनल है।" 


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रविवार, 23 अगस्त 2026

जमाना पूँछ का!!


 



सुबह सुबह अचानक खबर फैली कि  कतिया फटाक से महान हो गया । पार्टी कार्यालय में शोक की लहर दौड़ गई । जो जहाँ था वहीं सन्न से खड़ा रह गया । कुछ ने अपने को चिमटी काटी और जाँचा कि वे नींद में तो नहीं हैं । पार्टी में पद-बाँट चल रही थी, बड़े बड़े चतुर, चकोर हुए जा रहे थे। कतिया के नाम की घोषणा हुई तो किसी को विश्वास नहीं हुआ। ऐसा कैसे हो गया यार !! कल तक तो कार्यालय में कुर्सीयाँ जमा रहा था, भाई जी का पान पत्ता ला रहा था आज अचानक पार्टी का प्रदेश उपसंचालक हो गया !!  मैं खुद अभी पिछले हप्ते ही उससे मिला था। तब तक वह बिलकुल ठीक था । कपड़े वपड़े वैसे ही आर्डिनरी पहने था। अच्छी बुरी बातें कर रहा था, यहाँ तक कि मेरा हाल भी नहीं पूछा। बिल्कुल नार्मल था । हमने साथ में चाय पी एक एक बिस्कुट भी खाया। हमेशा की तरह पैसा वो देना चाहता था लेकिन फोन में नेटवर्क काम नहीं कर रहा था। वो छटपटा कर रह गया बेचारा । ऐसे मौकों पर सरकार की लानत मलामत नहीं करो तो लोगों का ध्यान फोन पर ही टिक जाता है। लिहाजा उसने दबी आवाज़ में शुरुवात केंद्र सरकार से की और नगर निगम पर आ कर दम लिया। इस बीच भुगतान कर दिया गया और उसने लम्बी सांस खींच कर मुझे सशर्त धन्यवाद दिया कि अगली बार मैं ही दूंगा। बिल्कुल नार्मल था । जमीन से जुड़ा प्रेक्टिकल आदमी हैं, मुझे मालूम है कि वो भूल जाएगा । हमारी जनता चुनाव परिणाम आने के बाद तुरंत वादे भूल जाती है। जनता की इज्जत कितनी भी बार लुट जाए उसे कुछ याद नहीं रहता है । इसी बात को लेकर वो जनता का जबरा फैन है।  उनका सपना है कि जिस दिन कभी सम्भव हो गया तो वो जनता का अभिनंदन करने के लिए एमजी रोड़ पर एक रैली निकालेगा। उसे मालूम है कि ऐसा मुमकिन नहीं है । लेकिन वो पार्टी लाइन की समझ रखता है इसलिए छाती ठोक के झूठ बोलता है। जब उसके नाम की घोषणा हुई तो दूसरों की क्या बताएं वो खुद भौंचक रह गया । पत्नी ने कहा ख़ुशी की बात है जी ऊपरवाला सब देखता है । कतिया ने सुबह से चौथी बार आईने में शक्ल देखी, समझ में नहीं आया कि पार्टी ने इसमें क्या देख लिया। प्रदेश उपसंचालक की उम्मीद तो भाई जी लगाए बैठे थे!! बूंदी के लड्डू का उनका ऑर्डर वही लिखवा कर आया था । अब उनको कैसे मुँह दिखाएगा!


इधर भाई जी को भी समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें । बार बार जूता उठा कर दीवार पर लगी एक तस्वीर को घूर रहे हैं । मन तो बहुत कर रहा है कि एक्शन मोड में आ जाएं लेकिन हिम्मत नहीं हो रही है । कतिया से कई बार जूतों के फीते बंधवाए, मालिश करवाई और आज हाथ जोड़ना पड़ेंगे! हद्द है यार !! लोग देखेंगे तो कैसा लगेगा! अभी तक 'अबेओ कत्तू' कह कर आवाज लगाते थे, अब 'कतिया जी' कहना पड़ेगा! साला पोलटिक्स चल रहा है या मजाक समझ में नहीं आता है।  पहले पता होता कि यह मौका आ जाएगा तो कतिया को दलित मान कर गरियाते नहीं रहते। मन नहीं माना तो उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष को फोन चिपकाया -" अरे भइया जी ये क्या कर दिये हो आप!! हम यहाँ तोप चमकाए बैठे थे और आपने कारतूस लोड कर दिया!! हमको नहीं बनाना था तो ना बनाते किसी अच्छे को बनाते। कतिया तो हमारा चपरासी है। हम इतनी बड़ी बड़ी मूँछें रखे हुए हैं, इनकी क्या इज्जत रह जाएगी अब ?


“तो कटवा दो मूँछों को । इतना नहीं समझते हो कि अब मूँछ का नहीं पूँछ जमाना है । राजनीति करना है तो समय के साथ चलना सीखो । एक दिन तुम भी प्रदेश संचालक बन जाओगे ।“ जवाब सुन कर भिया जी बिन पानी डूबने लगे । तभी पत्नी ने कहा – बाहर कार्यकर्ता आए हैं । बोले हैं कि कतिया जी मिलने आ रहे हैं !




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रविवार, 9 अगस्त 2026

सहमति का संगीत


 




          आज के इस स्वर्णयुग में अच्छा नागरिक वही है जो मन, वचन और कर्म से सहमत हो। किससे और क्यों सहमत हों, यह ध्यान रखने की ज़रूरत नहीं है। जो सामने सीना तान कर खड़ा हो जाए, सहमत हो जाओ। आप दुनिया में पूरी ज़िंदगी जीने के लिए आए हैं। माँएं बच्चों को बुड्ढा-डोकरा होने का आशीर्वाद देती हैं तो उनकी दुआओं की हिफ़ाज़त भी ज़रूरी है। सब जानते हैं कि जो सहमत हैं वे सुरक्षित भी हैं, उन्हें नींद चैन की आ जाती है। सहमत होना ही सुखी होना है। घर के अंदर हों या देश के, जो लोग ज़्यादातर सहमत रहते हैं वे ज़्यादातर सुखी रहते हैं। सहमति एक सरगम है जिसकी साधना करनी पड़ती है। कुछ लोग हमेशा सहमत रहते हैं, उन पर बायोलॉजिकल देवता आकाश मार्ग से पुष्प वर्षा करते हैं। धरती पर पुष्प खिल उठते हैं और सुंदर पक्षी चहचहाने लगते हैं। सहमत श्रेष्ठीजन होते हैं, उनके लिए स्वर्ग पृथ्वी पर उतर आता है। सहमति के घाट पर अनेक अप्सराएं किलोल करने लगती हैं। राजा के वर्दी वाले और बिना वर्दी वाले सिपाही अपने लठ पीछे रख कर आदरपूर्वक प्रणाम करते हैं। जो सहमत हैं, उन्हीं का मनुष्य-जन्म धन्य है। कथाओं में कहा गया है कि ये श्रद्धालु बारंबार जन्म लेते रहेंगे और सहमति-सुख के अधिकारी होंगे।

            एक कहावत है — "जाट कहे सुन जाटनी, याही गाँव में रहना; ऊँट बिलईया ले गई, हाँ जी हाँ जी कहना"। असहमति जता कर गाँव से बैर लेना कोई बुद्धिमानी नहीं है। वैसे भी सहमत होने में अपनी गाँठ से कुछ जाता तो है नहीं! ज़रा सा 'हाँ जी' या 'वाह जी' कह दो, सिर हिला दो, सब सहमति के रूप हैं। मौन रह जाना बौद्धिक सहमति है। सहमत कबीर के इस कहे को आदर्श मानते हैं — "काल करे सो आज कर, आज करे सो अब; पल में परलय होएगी, बहुरी करेगा कब!" तात्पर्य यह कि सहमत होने में देर नहीं लगानी चाहिए, क्योंकि देर होने पर प्रलय हो सकती है। मतलब साफ़ है कि किसी भी प्रकार के विनाश से बचना हो तो सहमत रहिए। किस बात पर सहमत होना है, इस पर वक़्त बर्बाद करना मूर्खता है। समझदार लोग बिना सोचे-विचारे सहमत रहते हैं। चमन-चतुर कहते हैं सामने वाला मुँह खोले तो तुरंत उसके मुँह में सहमति का लड्डू ठूँस दो और बेफ़िक्र हो जाओ।

            यों देखा जाए तो सहमत होना बच्चों का खेल नहीं है। बच्चों को पंखों से आकाश में उड़ने वाली लालपरी की कहानी सुना दो और वे सब सच मान लेते हैं। यह एक कला है। अगर पूरे कॉन्फिडेंस से झूठ बोला जाए तो सुनने वाले भले ही करोड़ों हों, सब उसे सच मान लेंगे। लगातार झूठ बोला जाए तो सुनने वाले दोनों कानों के बीच एक टनल शुरू कर देते हैं। किसी शायर ने कहा है — "एक कान से सुन के दूसरे कान से निकाल दिया करो; कुछ इसी तरह अपने आप को सम्हाल लिया करो"। कवि, शायर बड़े तजुर्बेकार होते हैं, यूँ ही कोई मशविरा नहीं दिया करते हैं। लेकिन टनलबाज़ी में असहमति का ख़तरा होता है। इसलिए व्यावहारिक चेतावनी यह है कि टनल को सुरंग की तरह गुप्त रखा जाए।

          जो तमाम कोशिशों के बावजूद असहमत हैं, उनके लिए दुआ है। उठाने के लिए बहुत कुछ था लेकिन उन्होंने सर को उठाना पसंद किया। सर उठाया लेकिन सहमति-सुख नहीं उठा पाए! मतलब सुख ज़्यादा भारी होता है, उठाने में कमर झुक जाती है। अपनी-अपनी समझ है जी, कोई सर का ध्यान रखता है कोई पेट का। मौका निकाल कर थोड़ा खुश भी रहा कीजिए। कोशिश करोगे तो बात समझ में आ जाएगी।

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