शनिवार, 26 सितंबर 2026

लोकतंत्र में सिंहासन की तलाश


 



हवाई इंडिया के पूर्व महाराजा एयरपोर्ट पर तफ़रीह के लिए निकले थे। कहीं न कहीं हवाई यात्रियों से मिलने की इच्छा भी थी। एयरपोर्ट के पाँचवें गेट पर यात्रियों की एक भीड़ ने उन्हें घेर लिया।

रिवाज़ तो यह है कि जब भी कोई महाराजा सामने पड़ जाए तो भीड़ को अपने-आप प्रजा हो जाना चाहिए। लेकिन आप तो जानते हैं, एयरपोर्ट की यात्री-भीड़ बहुत कुछ ‘वैसी टाइप’ की होती है। ये लोग जानते हैं कि बारूद कब का खत्म हो चुका है, सलामी वाली तोपें भी अटाले में पड़ी हैं और अर्सा हुआ प्रिवी पर्स भी बंद हो चुका है। फिर भी सामान्य तो क्या विशिष्ट नागरिक बनने की उनकी कोई मंशा नहीं है। सिंहासन को कुर्सी में ढूँढने की कसरत रुक नहीं रही है । वे कभी वोट देने नहीं जाते हैं । जो चुनकर आ जाता है, उसी को अपना कबूतर बना लेते हैं। अब कबूतर उनकी सेना हैं ।

सो इस समय महाराजा को भरोसा था कि जय-जयकार होगी। इसी भरोसे के चलते उन्होंने एक बार मुस्करा भी दिया। लेकिन भीड़ में से आवाज़ आई— “हवाई इंडिया की सर्विस अच्छी नहीं है। हवाई यात्राओं में लेटलतीफ़ी बहुत होती है। पहले जैसा नाश्ता नहीं मिलता। व्योमबालाएँ भी टका-सा जवाब देने लगी हैं। अगर इन शिकायतों को दूर नहीं किया गया तो हम आइंदा हवाई इंडिया का बहिष्कार कर देंगे।”

महाराजा लाल शेरवानी और लाल-सफ़ेद पट्टेदार पगड़ी में थे। इतने सारे लाल के बावजूद उन्होंने कभी किसी खयाली कामरेड को भी अपने नज़दीक नहीं आने दिया था। उनकी काली-कुट्ट मूँछें विक्ट्री साइन की तरह ऊपर की ओर तनी हुई थीं। नुकीली सुनहरी जूतियाँ उनकी अदा में कुछ और पैनापन जोड़ रही थीं। लेकिन भीड़ का बात करने का यह अंदाज़ उन्हें पसंद नहीं आया। उनके अंदर एक उबाल-सा आया। लगा, जैसे किसी चायवाले ने छानने से पहले तपेली को बर्नर की आग पर रख दिया हो। वे बोले— “इस अंदाज़ में मुझसे बात मत करो। ये कोई तरीका है बात करने का! न सजदा, न सलाम! किसी बैरे से खाने की शिकायत कर रहे हो क्या? कायदे से गुज़ारिश करो, इल्तिज़ा करो, दरख़्वास्त दो। ये नहीं चलेगा, समझे आप लोग?”

“लोकतंत्र है, सर। कुछ भी ग़लत नहीं कहा हमने। अपनी बात रखी है बस।”। भीड़ ने जवाब दिया।

“और सजदा-सलाम? लोकतंत्र है तो क्या इन्हें हम भूल जाएं ? लोकतंत्र तहज़ीब से ऊपर है क्या?” महाराजा और नाराज़ हो गए।

चुनाव के समय की बात और है। अच्छे-अच्छों को ऐरे-ग़ैरों तक के हाथ जोड़ने पड़ते हैं। टक्कर अगर काँटे की हो तो पैर छूने में भी प्रतिस्पर्धा हो जाती है। उस समय राजा-महाराजा, धनी-साहूकार, गुंडे-महागुंडे, झूठे-महाझूठे, लुच्चे-लबार, सबकी एक ही प्यार भरी भाषा होती है— “ आप लोग जनता जनार्दन यानी भगवान हो । मालिक हो हमारे और हम सेवक हैं। कहीं “भाइयों और बहनों” जैसी मीठी गोलियाँ होती है, कहीं “मेरे प्यारे भाइयों” से लॉरियाँ शुरू होती है। जनता पर लाड़ ऐसा बरसता है मानो चुनाव न हो, सावन हो। 

भावुक आदमी सोचता है—आज के ज़माने में गरीब आदमी को कौन “भाइयों” कहता है? महाराजा ने भाई बोला, यह क्या कम है! लोकतंत्र में आम आदमी को इससे ज़्यादा और चाहिए भी क्या?  जनता को हरा हरा दिखने लगता है । भाई हो गए इनके, जब चाहेंगे प्रॉपर्टी में हिस्सा माँग लेंगे किसी दिन भी ।

जानने वालों को पता है—चुनाव के हर मंच पर चढ़ता जनसेवक है, लेकिन उतरता महाराजा ही है।

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गुरुवार, 17 सितंबर 2026

हिन्दी को प्रेम करो, लड्डू मिलेगा


 



हिन्दी ने हमारे लोकतंत्र को प्रजा दी। प्रजा ने राजा दिये। राजा ने नगर सेठ बनाए। नगरसेठों ने हिन्दी दिवस पर स्कूलों में लड्डू बाँटवाए। लड्डू ले कर हिन्दी वाले खुश हुए। स्कूलों में राजा अमर रहे के नारे लगाए गए। आचार्य ने फुसफुसा कर राजा को बताया कि सात पीढ़ियों तक आपका राज चलेगा। राजा के मन में छप्पन लड्डू फूटे। राजा ने आचार्य से पूछा - इसके लिए मुझे क्या करना होगा? आचार्य ने कहा - कुछ विशेष नहीं, बस समय-असमय- कुसमय लड्डू बंटवाते रहिए। तब से देश को लड्डू मिल रहे हैं, मिलते ही जा रहे हैं । 

आचार्य जी जाहिरतौर पर हिन्दीप्रेमी हैं और छुपेतौर पर अंगे्रजी प्रेमी। ऐसा है भई मजबूरी में  सब करना पड़ता है। देश आचार्यों और समझदार मजबूर लोगों से भरा पड़ा है। एक बार कोई मजबूरी का पल्ला पकड़ ले तो फिर उसे कुछ भी करने की छूट होती है। मजबूर कितनी भी हिंसा कर ले वह अहिंसक ही माना जाएगा क्योंकि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है। अब आप ही बताएं कि महात्मा जी नाम जुड़ा हो तो कोई कैसे मजबूर होने से इंकार करे। मजबूरी हमारी राष्ट्रिय अघोषित नीति है। सो आचार्य जी को मजबूरी में  अपने बच्चों को अंगेजी स्कूलों में पढ़वाना पड़ रहा है तो मान लीजिए कि कुर्बानी ही कर रहे हैं देश की खातिर। रीत है जी दुनिया की, शार्ट में बोलें तो दुनियादारी है। सामाजिक स्तर पर जो हिन्दी प्रेमी हैं वे निजी स्तर पर अंग्रेजी प्रेमी पाए जाते हैं। समझदार आदमी सार्वजनिक रूप से हिन्दी का प्रचार प्रसार करता है, मोहल्ले मोहल्ले घूम कर माता-पिताओं को समझाता है, प्रेरित करता है कि भइया रे अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम की पाठशाला में पढने के लिए भेजो और देश को अच्छी प्रजा दो, लड्डू मिलेगा । इस बात में किसी को शक नहीं होना चाहिए कि हिन्दी को प्रेम करना वास्तव में देश को प्रेम करना है। और देश को प्रेम  करना हर आम आदमी का परम कर्तव्य है। जिसे कुछ भी करने का मौका नहीं मिलता हो उसे देशप्रेम का मौका तो अवश्य  मिलना चाहिए।  सितंबर के महीने में देश भर में हिन्दी के लड्डू बंटवाए जाते हैं। राजा के हाथ में लड्डू के अलावा कुछ होता भी नहीं है। साल में एक बार लड्डू नीचे तक पहुंच जाए तो हिन्दी की जय हो ।

                         इनदिनों आचार्य जी की चिंता यह है कि तमाम हिन्दी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होती जा रही है। गली गली में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल ऐसे खुल रहे हैं जैसे मोहल्ले के चेहरे पर चेचक के निशान हों। वे इस कल्पना से ही पगलाने लगते हैं कि क्या होगा अगर सारे बच्चे अंग्रेजी पढ़े निकलने लगेंगे। देश जेनजियों से भर जाएगा तो कितनी दिककत होगी। आखिर राज करने के लिए प्रजा भी चाहिए होगी। हिन्दी नहीं होगी तो प्रजा कहां से आएगी। राजाओं के लिए प्रजा और प्रजा के अस्तित्व के लिए हिन्दी को प्रेम  करना जरूरी है। सरकार में मंतरी से संतरी तक इतने सारे हिन्दी प्रेमी भरे पड़े हैं कि पूछो मत। लेकिन एक भी आदमी आपको ऐसा नहीं मिलेगा जो अपने बच्चों को मंहगे अंग्रेजी स्कूल में न पढ़ा रहा हो। सरकारी नौकर जनता का सेवक होता है। जनता मालिक है,  मालिक ही बनी रहे, ठाठ से अपनी सरकार चुने और ठप्पे से राज करे हिन्दी में।


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