हवाई इंडिया के पूर्व
महाराजा एयरपोर्ट पर तफ़रीह के लिए निकले थे। कहीं न कहीं हवाई यात्रियों से मिलने
की इच्छा भी थी। एयरपोर्ट के पाँचवें गेट पर यात्रियों की एक भीड़ ने उन्हें घेर
लिया।
रिवाज़ तो यह है कि
जब कोई महाराजा सामने पड़ जाए तो भीड़ को अपने-आप प्रजा हो जाना चाहिए। लेकिन आप तो
जानते हैं, एयरपोर्ट की यात्री-भीड़ बहुत ‘वैसी टाइप’ की होती
है। इन लोगों को पता है कि बारूद कब का खत्म हो चुका है, सलामी
वाली तीन तोपें भी अटाले में पड़ी हैं और अर्सा हुआ प्रिवी पर्स भी बंद हो चुका है।
फिर भी विशिष्ट नागरिक बनने तक की उनकी कोई मंशा नहीं है। सिंहासन को कुर्सी में ढूँढने
की कसरत रुक नहीं रही है । वे कभी वोट देने नहीं जाते हैं । जो चुनकर आ जाता है,
उसी को अपना कबूतर बना लेते हैं। अब कबूतर उनकी सेना हैं ।
सो इस समय महाराजा को
भरोसा था कि जय-जयकार होगी। इसी भरोसे के चलते उन्होंने एक बार मुस्करा भी दिया।
लेकिन भीड़ में से आवाज़ आई— “हवाई इंडिया की सर्विस अच्छी नहीं है। हवाई यात्राओं में लेटलतीफ़ी बहुत
होती है। पहले जैसा नाश्ता नहीं मिलता। व्योमबालाएँ भी टका-सा जवाब देने लगी हैं।
अगर इन शिकायतों को दूर नहीं किया गया तो हम आइंदा हवाई इंडिया का बहिष्कार कर
देंगे।”
महाराजा लाल शेरवानी
और लाल-सफ़ेद पट्टेदार पगड़ी में थे। इतने सारे लाल के बावजूद उन्होंने कभी किसी खयाली
कामरेड को भी अपने नज़दीक नहीं आने दिया था। उनकी काली-कुट्ट मूँछें विक्ट्री साइन
की तरह ऊपर की ओर तनी हुई थीं। नुकीली सुनहरी जूतियाँ उनकी अदा में कुछ और पैनापन
जोड़ रही थीं। लेकिन भीड़ का बात करने का यह अंदाज़ उन्हें पसंद नहीं आया। उनके
अंदर एक उबाल-सा आया। लगा, जैसे किसी चायवाले ने छानने से पहले तपेली को बर्नर
की आग पर रख दिया हो। वे बोले— “इस
अंदाज़ में मुझसे बात मत करो। ये कोई तरीका है बात करने का! न सजदा, न सलाम! किसी बैरे से खाने की शिकायत कर रहे हो क्या? कायदे से गुज़ारिश करो, इल्तिज़ा करो, दरख़्वास्त दो। ये नहीं चलेगा, समझे आप लोग?”
“लोकतंत्र है,
सर। कुछ भी ग़लत नहीं कहा हमने। अपनी बात रखी है बस।”। भीड़ ने जवाब दिया।
“और सजदा-सलाम?
लोकतंत्र है तो क्या इन्हें हम भूल जाएं ? लोकतंत्र
तहज़ीब से ऊपर है क्या?” महाराजा और नाराज़ हो गए।
चुनाव के समय की बात
और है। अच्छे-अच्छों को ऐरे-ग़ैरों तक के हाथ जोड़ने पड़ते हैं। टक्कर अगर काँटे
की हो तो पैर छूने में भी प्रतिस्पर्धा हो जाती है। उस समय राजा-महाराजा,
धनी-साहूकार, गुंडे-महागुंडे, झूठे-महाझूठे, लुच्चे-लबार, सबकी एक ही प्यार भरी भाषा होती है— “ आप लोग जनता जनार्दन यानी भगवान हो । मालिक हो हमारे
और हम सेवक हैं। कहीं “भाइयों और बहनों” जैसी मीठी गोली होती है, कहीं बात “मेरे प्यारे भाइयों” से शुरू होती है। जनता पर लाड़
ऐसा बरसता है मानो चुनाव न हो, सावन हो। भावुक आदमी सोचता है—आज के ज़माने में गरीब आदमी को कौन “भाइयों” कहता है? महाराजा ने भाई बोला, यह क्या कम है! लोकतंत्र में आम आदमी को इससे ज़्यादा और चाहिए भी क्या? जनता को हरा हरा दिखने लगता है ।
भाई हो गए इनके, अब प्रॉपर्टी में हिस्सा माँग लेंगे किसी दिन ।
जानने वालों को पता
है—चुनाव के हर मंच पर चढ़ता जनसेवक है, लेकिन उतरता महाराजा ही है।
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