ड्यूटी पर निकलने से पहले हेडसाब अपनी आत्मा को खूंटी पर टांगते हैं, फिर एक्स्ट्रा जेब वाली बनियान और ऊपर से सरकारी परमिट वाली वर्दी पहनते हैं। इसके बाद आले में बैठे भगवान से आज का टारगेट फिक्स करते हैं और घर से निकल पड़ते हैं। आत्मा को टाँग कर निकलना उनका रोज का काम है। वे जानते हैं कि सरकारी महकमा कोई भी हों आत्मा का वहाँ कोई काम नहीं होता है। बल्कि यह कहना ठीक होगा कि आत्मा मौजूद हो तो सरकारी काम में बाधा पड़ती है। और यह तो सबको पता है की सरकारी काम में बाधा डालने पर सजा का प्रावधान है। लेकिन आत्मा को ईश्वर का प्रोटेक्शन मिला हुआ है। गीता में ईश्वर ने कहा है कि आत्मा को कोई मार नहीं सकता, कोई शस्त्र काट नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकती, वायु सुखा नहीं सकती है । ऐसे मामलों में मजबूरी का नाम अहिंसा है। जिसका कुछ नहीं कर सकते उसे खूंटी पर टाँग कर ही बाहर निकलना अच्छा है। लेकिन आज हेडसाब ने वर्दी चढ़ाई बेल्ट बाँधा और बाहर निकल आए। जल्दी में आत्मा टांगना भूल गए।
थाने पर पहुंचते ही बड़े साहब से सामना हुआ। कायदे से एक कड़क सेल्यूट मारना जरूरी था। मार ही देते लेकिन अंदर से आवाज़ आईं - ये कमीना है, ज़ालिम भी है सेल्यूट मत मार, एक लात मार पुत्तर के मामा को। हेडसाब अचकचा गए। "ये कौन बोला बे !!... अरे! आज कमबख्त आत्मा आ गई! मरवाएगी क्या मुझे!... जानती नहीं बड़े साहब हैं, बुरा मान गए तो नौकरी खा सकते हैं।"
"तो डरते क्यों हो! तुम उनकी नौकरी खा जाना।" आत्मा ने हिम्मत दी।
"बुद्धू है क्या? वो मेरी नौकरी खा सकते हैं लेकिन मैं उनकी नहीं खा सकता हूँ।"
"पैसा तो तुम भी खाते हो वो भी खाते हैं!"
" महकमों में सारे मोती न्याय के धागे से बंधे होते हैं । बड़े छोटे सब मिल-बाँट कर खाते हैं। इससे किसीका पेट दुखता नहीं है। समझी चतुर कहीं की।"l
"तो मुझे बताना लूट बाँट । देखना चाहती हूँ तुम लोग न्याय कैसे करते हो । आज भी खाओगे क्या?"
" आज भी का क्या मतलब है!! देश भक्तों और भक्ति से भरा हुआ है। इधर अखंड भंडारा चलता है। "
अकेले बड़बड़ाता देख बड़े साहब ने डपट कर पूछा - "सिपाही चुन्नीसिंग, आज क्या बात है!? तबियत तो ठीक है ना?! "
"कुछ नहीं जनाब।... मैं ठीक हूँ जनाब।"
"तो फिर सेल्यूट क्यों नहीं मारा!?"
हेडसाब ने एक हाथ से आत्मा को दबोचा और दूसरे से साहब को सेल्यूट मार दिया ।
साहब सेल्यूट की तासीर से समझ गए कि कुछ तो गड़बड़ है। बोले - "ये हाथ में क्या दबाए हो?"
" मेरी आत्मा है जनाब।"
" अरे पुलिस वालों की आत्मा होती है क्या!? "
" हां, होती है जनाब। "
" लेकिन हमारी तो नहीं है। "
"आप तो ख़ानदानी हैं ज़नाब। आपकी कई पीढ़ीयां पुलिस महकमें में रही हैं।"
" सारे लोग प्रोबशन पीरियड में अपनी आत्मा का पिंडदान कर देते हैं। तुम अभी तक पकड़े बैठे हो !?!"
" जनाब इजाजत दें तो इसे घर छोड़ आऊँ। "
" गया जी में छोड़ना चाहिए था,.... रिमांड रूम में जाओ और इस आत्मा को इतना कूटो कि तुम्हें अपनी लापरवाही की याद हमेशा रहे। "
"जनाब ईश्वर ने कहा है कि आत्मा को कोई मार नहीं सकता... "
"मार-काट नहीं सकते लेकिन कूट तो सकते हैं,... जाओ कूटो। "
"कितना कूटूं जनाब? "
" जब तक कि तुम्हारी आत्मा 'चीं ' न बोल दे कूटते रहो । "
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