बुधवार, 3 दिसंबर 2025

डरा हुआ आदमी


 


 

                 डरा हुआ आदमी लोकतंत्र का सबसे मजबूत खंबा होता है। जैसे सर्कस के तंबू में बीच का खंबा होता है, बस वैसे ही। बाकी के सारे खंभे भी उसे पर निर्भर होते हैं। बीच का खंबा अगर जरा भी हिला तो समझो लोकतंत्र को खतरा हुआ। कुछ लोग इन्हें डरा हुआ आदमी कहते हैं और जो जानते हैं वे जिम्मेदार आदमी मानते हैं। डरा हुआ आदमी गुप्त मतदान करते हुए भी डरता है कि भगवान सब देख रहे हैं और मौका पड़ा तो महाआरती के बाद सरकार को सब बता देंगे। हाल के कुछ महत्वपूर्ण बयानों से देश को पता चला है कि आजादी ज्यादा पुरानी नहीं है और डरा हुआ आदमी भी। डरा हुआ आदमी सब समझता है बल्कि दूसरों से कुछ ज्यादा ही समझता है। वो टीवी देखते हुए वह भी देख लेता है जो दिखाया नहीं जा रहा है। अखबार पढ़ते हुए वह शब्द नहीं पढ़ता शब्दों के पीछे का पढ़ता है। चुनावी दल जब वादे करते हैं तो वह उन पर यकीन नहीं करता है, लेकिन यकीन नहीं करने के खतरे जानता है इसलिए फौरन कर लेता है। मीडिया जब विकास की जिंदा खबरें सुनता है तो इसके अंदर कोई ‘ओम शांति - ओम शांति’ बोलने लगता है। गुस्सा आने पर मुस्कुराने का हुनर उसने सीखा था, अब सुबह से शाम तक मुस्कुराता है।

                       वह जिनके बीच उठता बैठता है उन्हें भी संदेह से देखता है। उसे विश्वास बना रहता है कि इन  सारे लोगों की पहुँच सरकार तक हो सकती है । सरकार के पास वर्दी और बिना वर्दी वाली पुलिस होती है और पुलिस के पास डंडा। और सब जानते हैं कि पुलिस जनता की सेवक है। रात में वह सपना देखता है और चीखना चाहता है। लेकिन उसकी इतनी आवाज भी नहीं निकलती है कि बगल में सोया हुआ उठ जाए। उसको लगता है कि यदि उसने सिस्टम के खिलाफ कुछ भी बोला तो वह अभिमन्यु की तरह घिर जाएगा। उसे हर समय लगता है कि वह महाभारत के युद्ध मैदान में असुरक्षित खड़ा हुआ है। डरे हुए आदमी को अपने भी अपने से नहीं लगते हैं। वह मानता है की एक डर ही है जो उसकी सभी खतरों से रक्षा करता है। डर ही उसका जीवन है और डर नहीं होता तो वह कभी का फोटो हो गया होता।

                  डरा हुआ आदमी सोशल मीडिया पर किसी भी पोस्ट को लाइक करने से पहले बार-बार चेक करता है कि लाइक बटन का रंग कहीं 'विपक्ष' से मेल तो नहीं खाता। वह सिर्फ हार्दिक बधाई, शुभकामनाएं, बहुत सुन्दर जैसे कमेंट करता है, लेकिन हमेशा यह ध्यान रखता है कि कमेंट इतना छोटा हो कि उस पर कोई 'काउंटर कमेंट' न कर पाए। प्रोफाइल पिक्चर पर उसने खुद की नहीं, एक गैर राजनीतिक फूल की तस्वीर लगा रखी है । जब उसका बच्चा स्कूल में कोई प्रश्न पूछता है, तो वह उसे धीरे से डांटता है, "बेटा, कुछ पूछना, ज्यादा  सोचना गंदी बात होती है । टीचर जो भी बता दे वही सच है। प्रश्न नहीं करोगे तो सौ साल जियोगे, बस उत्तर याद रखो।"

                      कई बार जब डरा हुआ आदमी खाली और अकेला होता है तो विचार आते जाते रहते हैं। कभी कभी सोचता है कि देश बड़ा या जीवन! अंदर से पहली आवाज निकलती है - देश बड़ा। लेकिन तुरंत ही वह भूल सुधार भी करता है। अंदर से कोई फटकारता है कि अबे जानता नहीं क्या, 'जान है तो जहान है'। जान बचे तो समझो लाखों पाये। इनदिनों घर से बाहर निकलो तो लगता है कि जान शरीर से आगे आगे चल रही है। शरीर अगर कदम से कदम नहीं मिला पाया तो समझो जान ये गई वो गई। दूसरे दिन खबर छपेगी कि हार्ट अटैक से एक और गया । अभी जो कनिया पहलवान हैं ना, अपने चक्कू कट्टा वाले, वह भगवान तो नहीं हैं पर भगवान से कम भी नहीं हैं। जब देखो तब काले भैंसे पर सवार दिखाई देते हैं। सामने पड़ जाएं तो कमर अपने आप झुक कर दोहरा जाती है । और आदमी के मुँह नाक से अनुलोम विलोम और कपालभाँति निकलने लगती है ।  ऐसी सिचुएशन में कोई सीन तान कर खड़ा हो जाए तो अंजाम क्या होगा ! आप समझ सकते हैं । लेकिन डॉक्टर एक बात अच्छी भी कहते हैं कि डरे हुए आदमी को कब्ज की शिकायत नहीं रहती है। कब्ज न हो तो शरीर अनेक रोगों से बचा रहता है। इसलिए हर आदमी को दिमाग और पेट साफ रखना चाहिए।

 

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