जो नहीं जानते हैं वो जान लें कि हम राजनीतिक टेक्नोलोजी से समृद्ध हैं । जो कुछ भी ब्लेक एंड व्हाइट था अब रंगीन हो चुका है । रंग सारे ऐब छुपा लेते हैं। शिकायतें ब्यूटी पार्लर में जा कर हसीन हो जाती हैं। पहले बदनाम थी अब रंगबाजी सफलता है। दुर्घटना के बाद सड़क पर पड़े घायल का रंगीन विडिओ कमाई करता है। पुरानी सोच ने होली को गरीबों का त्योहार मान रखा था । जब दुनिया करोड़ों भारतियों को होली खेलते देखती थी तो माना जाता था कि भारत में गरीबी बहुत है
। अब तय किया गया है कि होली की ब्रांडिंग अमीरों के त्योहार के रूप में की जाएगी । टीवी मिडिया को कह दिया गया है कि बड़े बड़े उधोगपतियों, व्यापारियों, दलालों, फिल्म स्टारों, सम्मानित घूसखोरों, जेल में बंद संतों वगैरह को मस्त होली खेलते दिखाए । बैंकों को भी निर्देश दे दिए हैं कि वे करोड़ों के रंग-लोन इन्हें दनादन दें, ताकि इस तबके की रंगबाजी को सम्मानजनक उड़ान मिले । होली के जरिये विदेशों में हमारी छबि 'रिच' होना चाहिए । राजनीती में छायाचित्र ही छबि है और छबि ही सफलता है।
होली के त्योहार में एक दूसरे पर कीचड़ डालने और गोबर में घसीटने की सनातन परंपरा है । इसे उचित गरिमा प्रदान की जाएगी। इस काम के लिए छबि मैनेजरों ने देशभर की छोटी बड़ी पार्टियों को छबि निर्माण के लिए साथ आने को कहा है । इस मामले में पार्टियों का प्रदर्शन पूरे साल अच्छा रहता है । खेल कूद बंद हैं, स्कूलों में खेल के मैदान खाली पड़े हैं । सप्ताह भर पहले वहां गाय भैंसें बांध दी जाएँगी ताकि शुद्ध, विश्वसनीय और ताजा गोबर सभी पार्टियों को उपलब्ध हो सके । गौ-मूत्र और भैं(स)-मूत्र के कारण आर्गेनिक कीचड़ भी वहां तैयार हो जायेगा । सारी पार्टियाँ जब गोबर कीचड़ में सन जाएँगी तो किसी की अलग पहचान नहीं रहेगी । दुनिया लोकतंत्र की इस खूबसूरती को फटी आँखों से देखेगी । हम कह सकेंगे मतभेदों के बावजूद सारे दल एकरंग हैं । राजनीतिक एकता को प्रमाणित करने का इससे शानदर मौका दूसरा नहीं होगा।
ज्यादा सोचने से चिंता को अवसर मिलता है और चिंतित लोग सिस्टम को घूरने लगते हैं । होली मस्ती और गले मिलने का त्योहार है । नशे से आदमी की सोच-समझ, विचार व विचारधारा, चेतना वगैरह सब स्थगित हो जाते हैं । ज्ञानियों ने भांग को होली की जान बताया है। इसलिए मोहल्ला स्तर पर भांग मुफ्त उपलब्ध करवाई जाएगी । पिया हुआ आदमी हिन्दू मुसलमान नहीं केवल एक ऊंघता शरीर भर रह जाता है । हाड़ मांस के इसलिए ढेर को न महंगाई की याद रहती है न बेरोजगारी का दर्द । पंचतत्व के इस झूमते पैकेट से समाज में अमन, शांति और अध्यात्म का सन्देश जाता है ।
कुछ जगहों पर लट्ठमार होली का चलन है । महिलाएं लट्ठ से हुलियारों को प्रेम कि चरम शक्ति के साथ पीटती हैं । आदमी भांग के या किसी भी नशे में हो तो उसे पिटने में आनंद आता है । ऐसा आदमी आगे सालभर पिटते रहने के लिए मन और शरीर से तैयार रहता है। यही काम समय असमय पुलिस भी प्रेम से करती है तो उसका मकसद भी प्रदर्शकारियों को आनंद से सराबोर करने का होता है । पिसी छनी भाँग और मदिरा तन को मस्त और मन को रंगीन बनाती है । इसका कारण यह है कि बाहर जितनी रंगीनी होती है उतनी अन्दर भी होना चाहिए वरना त्योहार अधूरा है । जिम्मेदारों की सोच गहरी और सूक्ष्म है । बच्चन कवि कह गए हैं – “दुनिया वालों किन्तु किसी दिन, आ मदिरालय में देखो ; दिन को होली, रात दिवाली, रोज मनाती मधुशाला”। मदिरा की बढ़ती दुकानों के इस मर्म को समझो । राज्य में अमीर गरीब सब मस्त हों ; झोपड़ी, महल या गटर का भेद न हो ; सारे चरम आनंद को प्राप्त हों, यही सुखी राज्य का लक्ष्य है । ... तो बुरा मानो या न मानो.... होली है.....।
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