" हम तो पहले ही कह रहे थे कि युद्ध होगा। पर किसीने हमारी बात पर ध्यान ही नहीं दिया। " उस्ताद ने बैठते ही अपने दावे को शिकायत के साथ पुनः पेश किया।
" अरे हम ये थोड़ी जानते थे कि आप जानते हैं! आप तो यह बताओ कि अब आगे क्या होगा? " चेले ने शिकायत को किनारे कर नए दावे का रास्ता साफ किया।
" आगे का भी पूरा पता है हमें। युद्ध चल रहा है चलता रहेगा, बम गिराए जाएंगे शहर बर्बाद होंगे, लोग मरेंगे, टीवी वाले चीखेंगे नेता लोग चुप्पी रखेंगे और क्या। "
" अच्छा!! युद्ध में ऐसा होता है क्या!!"
"और नहीं तो क्या! समझदार आपकी तरह हंसी नहीं उड़ाते हैं। ज्ञान मिल जाए तो खुद सावधान हो जाते हैं। "
" आप सावधान हो गए क्या उस्ताद ? "
" हां, हो गए।... हमारी गाड़ियों में पेट्रोल भरा लिया है फुल-टेंक, दो तीन केन भर भी ली हैं । घर में राशन भर लिया है छः महीने का। गैस की दो टंकी एक्स्ट्रा भर ली है। जरूरी दवाएं भर ली हैं। मिल्क पावडर और घी भर लिया है। साबुन-सोडा, मच्छर अगरबत्ती वगैरा भी भर लिए हैं।"
" बिजली-पानी भी भर लेते। "
" पानी तो भर लिया है। नगर निगम से दो टैंकर डलवा लिए हैं टंकी में। हमारी तो टंकी बड़ी है ना, फुल भर ली है। हम बहुत आगे का सोच कर चलते हैं।
"बिजली रह गई होगी?" चेले ने चटकी ली।
" बिजली की भर सकते तो भर ही लेते। फिर भी टॉर्च और सेल भर लिए हैं। दो तीन दर्जन पैकेट मोमबत्ती के भी भर लिए हैं। "
" मतलब चार-पांच महीने का इंतजाम हो गया है। "
" इतना तो चलेगा युद्ध। हमें तो पता है ट्रम्प की मानसिकता। इंग्लिस अख़बार पढ़ते हैं हम तो।"
" सुना है कि इंग्लिश अखबार में ऐसा आ रहा है कि ट्रम्प मान जाएंगे और युद्ध लम्बा नहीं करेंगे।"
" हां हां ऐसा भी हो सकता है। सामने वाला मान जाएगा तो ट्रम्प क्यों लड़ेगा। "
" कौन सामने वाला?... ईरान? "
" ईरान नहीं नोबल वाले।... एक जरा से नोबेल के लिए देख लो कितनी जानें चली गई, कितने बसे हुए शहर उजड़ गए!" उस्ताद ने करुणा से भरा डब्बा खोला।
" हां यह बात तो सही है आपकी। ट्रंप को नोबल दे देना चाहिए था। "
" दे देते तो वह दो साल तक नोबेल पहने आईने के सामने से नहीं हटता। अभी भी वक्त है, दे देना चाहिए फटाफट। रूस और चीन अगर युद्ध में उतर गए तो सालों तक चलेगा युद्ध। "
" सालों तक कैसे चलेगा!! इंग्लिस अखबार तो कह रहे हैं कि ट्रंप दोबारा चुना नहीं जाएगा। " चेले ने चमक बताई।
" चलो मान लिया, अगर दूसरा प्रेजिडेंट आया और वह भी नोबेल के लिए जिद्दी हो गया तो क्या होगा!"
" बात सही है। समय आ गया है कि हर साल दो-चार नोबेल शांति बनाए रखने के लिए सनकियों को देना चाहिए। वैसे कितने का पड़ता होगा एक नोबेल! "
" छोटा सा होता है। बड़े गोल सिक्के जैसा।... एक मशीनगन से भी कम का पड़ता होगा।"
" अरे नहीं इतना सस्ता थोड़ी होगा। "
" एक टैंक से तो सस्ता होगा ना। युद्ध में कितने टैंक, कितने फाइटर प्लेन, कितने जहाज, कितने शहर नष्ट हो जाते हैं!"
" लोग भी तो मरते हैं। "
" अरे लोगों का क्या है लोग तो मरने के लिए ही पैदा होते हैं। युद्ध नहीं हुआ तो नहीं मरेंगे क्या?! आया है सो जाएगा, राजा रंक फकीर।" उस्ताद थोड़ा निर्ममता कि ओर मुड़े।
" लोग मरने के लिए ही पैदा होते हैं तो फिर आपने इतना सारा सामान क्यों भर लिया!! जबकि अपने यहाँ तो युद्ध भी नहीं हो रहा है। "
" चेला हो चेला ही रहो समझे।... जो भी भरा है जीने के लिए भरा है। मरते तो सब है लेकिन बचते वही हैं जो सावधान रहते हैं। "
" आपने तो बहुत कुछ भर लिया है, अगर हमें जरूरत पड़ी तो थोड़ा बहुत दे दोगे ना? "
" अजीब ट्रमपिये हो यार! मांगने से नोबेल नहीं मिलता है ! हम सामान कैसे दे देंगे!!"
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