वीर विक्रम सिंह को लोग 'वीवीएस' के नाम से पुकारते हैं। 65 पार कर रहे वीवीएस को रह-रहकर लगता है कि न जाने इस रात की सुबह होगी या
नहीं। 'जिंदगी पानी का बुलबुला है'—अब
वे यह जानते हैं। और यह भी कि बुलबुला तो बुलबुला है, बुलबुले
का क्या! आजकल काले कपड़े पहनना फैशन है, किंतु काला सूट
पहना हर आदमी उन्हें 'यमराज' का दूत
मालूम पड़ता है। काले लिबास वालों से निगाहें मिल जाएं, तो
उनकी रूह कांप जाती है। मोटी बीमा पॉलिसी अब उन्हें निरर्थक लग रही है। वे जानते
हैं कि मरना एक दिन अटल है, पर मन है कि मानता नहीं। जीने की
जिद इतनी है कि वह जिंदगी से आगे निकली जा रही है।
उन्होंने अपने लिए कुछ कड़े अनुशासन
तय कर लिए हैं;
मसलन, कोई काले स्कूटर या बाइक वाला लिफ्ट दे,
तो किसी भी सूरत में नहीं बैठना है। फुटपाथ कितना भी चौड़ा और खाली
क्यों न हो, हमेशा किनारे-किनारे ही चलना है। एक दिन मुकेश
का गाया वह गीत कान में पड़ गया— "न हाथी है न घोड़ा
है, वहां पैदल ही जाना है..."
बस, हफ्ता भर हो गया, वीवीएस मॉर्निंग
वॉक पर नहीं निकले।
एक दिन खबर मिली कि पहली गली वाले
चंद्रकांत तीसमारे बाथरूम में फिसलकर 'सिधार' गए। कमबख्त बाथरूम न हुआ, दूसरी दुनिया का 'वेलकम गेट' हो गया! तब से छोटी-मोटी हाजत को भी वे
तब तक दबाए बैठे रहते हैं, जब तक कि वह दबाव मौत के डर के
बराबर न हो जाए। वे अक्सर सोचते हैं कि पुराने लोग जो लोटा लेकर जंगल की ओर दौड़ते
थे, वही ठीक था। पाँच-दस मच्छर जरूर काटते होंगे, पर कम से कम जान का खतरा तो नहीं था। पास में नगर निगम का पार्क है,
वहाँ गुंजाइश निकल सकती है, लेकिन मजबूरी है—
'कमोड' की आदत जो है। उनके भीतर यह विचार
गहराता जा रहा है कि आधुनिक सुविधाएं और विकास ही आदमी को यमराज के करीब ले जा रहे
हैं।
अखबार खोलते ही वीवीएस फ्रंट पेज की
हेडलाइन्स छोड़कर सबसे पहले 'शोक समाचार' वाला पृष्ठ पढ़ते हैं— कौन-कौन गया! आसपास के
साठ-पैंसठ पार वालों को अब वे बड़ी गौर से देखते हैं कि पता नहीं, ये कल मिलेंगे या नहीं? मन ही मन अटकलें लगाते—
"लगता तो ठीक है, जरूर शिलाजीत खाता
होगा। लेकिन कमबख्त हार्ट-अटैक तो आजकल किसी को भी आए जा रहा है!" जवानी के
दिनों से ही वे अपने दिल को काबू नहीं कर पाए, अब उसमें दो 'स्प्रिंग' (स्टेंट) डली हुई हैं। उन्हें लगता है कि
इस दिल से बड़ा धोखेबाज कोई दूसरा संसार में नहीं है।
आज वे सोच रहे हैं कि उन्हें भी कुछ
करना चाहिए। शिलाजीत न सही,
च्यवनप्राश लेने में क्या हर्ज है? सुना है
दिल के मामलों में हकीमी नुस्खे भी बड़े कारगर होते हैं, पर
सनातनी मन नहीं मानता। आयुर्वेदिक रसायन जो कभी राजा-रजवाड़े लिया करते थे,
अब संत-महात्मा, तांत्रिक और मंत्री-वंत्री ले
रहे हैं। सच तो यह है कि अय्याशियाँ केवल हाड़-मांस के बल पर संभव नहीं! फिर सोचते
हैं— "छोड़ो यार, अपने से नहीं
होगा। इतने महंगे रसायन मेहनत की कमाई से तो खरीदे नहीं जा सकते।" कहीं पढ़ा
था कि खाली पेट लहसुन की दो कलियाँ खाने से दिल मजबूत होता है। वही ठीक है,
दवाओं के पचड़े में कौन पड़े? जिंदगी कीमती है,
पर इस महंगाई में 'बजट' भी
तो देखना पड़ता है। कबीर कह गए हैं—'पीर मरीहैं पैगम्बर
मरीहैं, मरिहैं जिन्दा जोगी; राजा
मरीहैं परजा मरिहैं, मरिहैं बैध और रोगी।' लेकिन
उनके भीतर बैठा कोई जिद्दी जीव कहता है— "भले सब मरें,
बस हम बचे रहें।"
जैसे-जैसे स्टेशन करीब आता है, बोगी के सवार अपना फैला हुआ सामान समेटने लगते हैं। कोई कहता है—
"आ गया", दूसरा टोकता है—
"अभी देर है", तीसरा ज्ञान देता है—
"ट्रेन आउटर पर बहुत देर खड़ी रहती है।" वीवीएस की नींद
भी बिना किसी अलार्म के सुबह 5:30 बजे खुल जाती है। सुबह का
सपना अभी भी दिमाग में गूँज रहा है— "ट्रेन आउटर पर
खड़ी रहती है, उसके बाद स्टेशन आएगा।" मॉर्निंग वॉक तो
कर रहे हैं, पर लग रहा है जैसे 'आउटर'
पर टहल रहे हों। दुनिया में आने वाला बच्चा भी नौ महीने आउटर पर ही
होता है, शायद जाने वाले के लिए भी यह 'आउटर सिस्टम' हो। इस रिसती हुई जिंदगी को थामे रखना
भी तो पुरुषार्थ है! अंदर से आवाज आती है— "वॉक से कुछ
नहीं होगा, डॉक्टर कहते हैं तेज चलो।" अब वे तेज चल रहे
हैं, साँसें खींच-खींच कर ले रहे हैं, मानो
पीछे यमराज का भैंसा रस्सी तुड़ाकर दौड़ा आ रहा हो। जरा धीमे हुए नहीं कि उसने
दबोचा!
जान सबको प्यारी है, भले ही पता हो कि अब जिंदा रहकर कौन से झंडे गाड़ लेंगे? राजनीति में होते तो समझ आता कि 'कुछ' कर लेंगे। वहाँ तो पिचहत्तर पार वाला भी फावड़े से 'माल'
खींच लेता है। लेकिन साधारण नौकरी से रिटायर होने वाला व्यक्ति महज
एक 'बॉडी' बनकर रह जाता है। खाने की
प्लेट छोटी होती जा रही है; भोजन कम, दवाएँ
ज्यादा हो रही हैं। कल की उम्मीद में आज सजा पा रहा है। जानकार कहते हैं—
"कम खाओ, आधा पेट खाओ।" यह सुनकर
घरवाले प्रसन्न होते हैं, लेकिन बुढ़ापे की चटोरी जुबान
अक्सर विद्रोह कर देती है।
अब उन्हें खाना 'रातिब' की तरह मिलने लगा है। (रातिब समझते हैं न?
बँधा-बँधाया नपा-तुला भोजन)। हिदायत है कि— "लंबा जीना है तो प्यारेलाल, खिचड़ी खाओ। नमक कम,
तेल-घी बंद, मीठा वर्जित, तला-भुना जहर है।" उन्हें लगता है कि जब इतनी पाबंदियाँ हैं, तो जीने का हासिल क्या है? इस चटोरे संसार में भला
खिचड़ी खा-खा कर कौन जीना चाहेगा? मौका पाकर जब वे किचन में
घुसते हैं, तो हवाएँ मुखबिरी करने लगती हैं, दीवारें चीख पड़ती हैं— "क्या चाहिए? क्यों आए हो?" अगर भूल से कह दिया कि "जरा
सा घी-गुड़ लेना था", तो समझो मुफ्त की नसीहतों की
बौछार शुरू। ऐसे में वीवीएस अनुभवी की तरह बात पलट देते हैं— "कुछ नहीं जी, बस दो लौंग लेनी थी, जरा आप ही दे दो।"
एक पांडे जी हैं, डरे-डरे से। हाल ही में पैंसठ पार हुए, तो खास
दोस्तों ने पट्टी पढ़ाई— "गोश्त खाओगे तो सेहत बनी
रहेगी। जान है तो जहान है।" पांडे जी और डर गए। उन्हें 'घास-फूस' की तरह फुर्र से जल मरने की कल्पना से ही
डर लगने लगा। सोचने लगे— "जान ही नहीं रही तो धर्म का
क्या करेंगे? और अब यह धर्म है भी कितने दिन का? अगले जन्म में क्या पता किस धर्म में पैदा हों, क्या
पता कसाई के घर ही जन्म हो जाए!" जैसे सब्जी वाला शाम को घर लौटते समय दाम की
परवाह नहीं करता, वैसे ही जब हमें भी 'घर'
ही जाना है, तो मीठा-फीका क्या और वेज-नॉनवेज
क्या!
लेकिन 'गोश्त' से पहले 'होश' पर पहरे बिठाने होंगे। पीने और खाने का मामला इतना आसान नहीं कि मुँह खोला
और गटक लिया। पांडे जी अभी भी इसी द्वंद्व में हैं। सच है, आखिरी
किस्तें अक्सर थकाऊ हो जाती हैं— चाहे बैंक की हों या जिंदगी
की।
इधर खाकसार के हाल जुदा नहीं हैं।
सनातनी रिवाज के अनुसार तो संन्यास आश्रम में चले जाना चाहिए। सोचता हूँ तो पता
चलता है कि जिंदगी के अलावा सब छोड़ते चले जाना ही संन्यास है। बड़ा कठिन है, जिन चीजों से जिंदगी है उन्हें कौन छोड़ेगा! पुराने लोगों के पास
जिम्मेदारियों के अलावा कुछ खास था नहीं छोड़ने के लिए, तो
वे छोड़ देते थे। लता मंगेशकर गा रही हैं— “संसार से भागे
फिरते हो, भगवान को क्या पाओगे। इस लोक को अपना न सके,
उस लोक में भी पछताओगे।”
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