गुरुवार, 27 नवंबर 2025

खातून की ख़िदमत में सलाम अपुन का!


 



 

सरकार बोलती,  " अय खातून! सुनते ज़रा! ओहो, मईडम किधर को निकल गए तुम? बात सुनते नहीं, ज़रा ठहर के सुनो! तुम्हारे को अम्मा बोलूँ, आक्का बोलूँ, लाड़ली बोलूँ या के लछमी बोलूँ? तुमच भगवान हो, तुमच देवी हो! ​इधर लोगाँ अब तुमको बैंक बोल रे! क्या जी, तुम बैंक हो गए वोटां वाले ? बोले तो सरकारी बैंक! अक्खा मुलुक में तुमच अक्केले लेडीज़ बैंक होरे ! माने तो स्टेट बैंक का पार्ट टू ! मूल से ज़्यादा ब्याज देरे तुम! फटाफट फटाफट, नगद लेरे नगद देरे ना !  है कि नहीं ! हय शरमाओ नक्को । हे हे हे... । ​पोलटिक्स में पोट्टी पटाना हय फकत काम अपुन का । बोले तो खातून के खाते में कैश अपुन का ! जान, अरमान, अक्खा देस अपुन का! हय खुशी की बाताँ, ज़माने को बताओ! ट्रेन पकड़ के, जल्दी से जाओ! पड़ोसी चमन में, रोज़गार सपन का ! उधर बी  सरकार अपुन की दरबार अपुन का । तुम हो तो अपुन है! तुम हो तो धरम है! थाली अपुन की गरम है! तुम हो तो काहे की शरम है? तुम्हारे क़दमों पे दिल-ओ-जान अपुन का ! खातून की खिदमत में सल्लाम अपुन का ।  

हिंदुस्तानी वोटर लोगाँ अब दिल का साफ़ और इरादों का पक्काच होरा । अब उसको कोई सिखाता-पढ़ता नहीं बैठता! ​वोटरां की नई फसल तो पैदाईशी समझदार हो रए। उन्हों को दो-चार सौ रुपये बताए तो सीधा इनकार कर देते कि, "अरे भाई, इतना कम में अपुन वोटाँ नहीं बेचते बोलके!" अपुन अगर नाप-तौल करके देखे तो मालूम होरा कि सियासत के मामले में सारे लोगाँ बाइबर्थ पीएच-डी. होरै। सबका दिमाग़ एकदम थक्केदार दही के माफ़िक़ सेट हय जी । किसीको बी सोच-विचार के पचड़े में पड़ने की ज़रूरतीच नहीं होरी। दो-दो महीने से चलते आरे मसले भी, ऐन टाइम पे जुमलों के आगे घुटने टेक देरे। ऐसे में कैसा सोच, कैसा विचार! ​बस, तेज़ी-मंदी देख को, बाज़ार भाव देख को, और जहाँ गाँठ गरम हो रई वहींच वोटा दो और छुट्टी पाओ!

​ऐसा हय कि पूरा मामला बाज़ार से ही तय होरा तो मगज़मारी करने की ज़रूरतच कायको ? मार्केट में रोज़ नए-नए लीडरां आते, रोज़ नए-नए वायदे फैइलाते, रोज़ नई-नई गप्पाँ सुनाते... तो किसको सूझ पड़ सकती! ​लेडी वोटरां, बोले तो खातून लोगाँ आख़िरी में बाज़ार भाव कोइच देखतीं। पहले के ज़माने में लोगाँ मीठी-चुपड़ी बाताँ सुन के देते। फिर, जान-माल का डर देख के देते। अब रूपीय लेके देते । चुनावी चेम्पीयन लोगाँ को मालूम हय कि अपुन के बाप का क्या जाता, रुपया तो सेठाँ और टेक्स पेयरां के हाथ का मेल होरा । हेल्थ डिपार्टमेंट बोलता कि, "हाथ धुलवाते रओ, तो लोगाँ इंफेक्शन से बचेंगे बोलके।" एक ज़माने में भुक्के-प्यासे और ग़रीब लोगाँ एक दिन की दारू और दो दिन के खाने में बनाते सरकार । लेकिन अबी महंगाई डायन से सब लोगाँ परेशान हय  ! तुमको मालूम क्या, चुनावी चेम्पीयन लोगाँ को भी तकलीफ़ हय। मालिकों के आगे हाथ फ़ैला-फ़ैला के बार-बार माँगना पड़ता बोलते । वो तो अच्छाच है कि बाज़ार में शरम का कंसेप्ट टोटल ख़तम हो हय । बीस सालाँ पहले तलक हज़ार-पाँच सौ के नोटाँ मैदान पकड़ लेते तो जीत होजारी थी । अब तो ऑनलाईनां का ज़माना चलरा । इधर बटन दबाओ, उधर मालाँ वोटरां के खाते में। उधर बटन दबवाया, तो इधर चेम्पीयन सीधे सरकार में बैठता जाको ।

तुम लोगाँ पढ़ रे क्या ? अय कुरबान ... ! तो समजो अपुन को ऐसा समाज मिलरा जो फ़्री स्कीमाँ के बदले, किसी को भी हुकूमत देरा । देस में हज़ारों स्कूल इसी वास्ते बंद होरे कि देस को जम्हूरियत के बढ़िया  बढ़िया चेम्पीयन मिलरे बोलके ।​ ग़रीब आदमी को दिल बड़ा हय । कुछ मिले ना मिले, मगर वो हमेशा देताच रहता! ​नदी दिखी तो चुपचाप सिक्का फेंकता। मंदिर दिखा तो हाथ जोड़ के रुपया चढ़ाता। पुलिस वाला दिखा तो उसकी जेब गरम करता! गुंडे दिखे तो उन्हें हफ़्ता देता, अफ़सर दिखा तो दलाली देता! सरकार दिखी तो झुक के सलामी देता! ​उसको मालूम कि ग़रीब हय तो उसीको देनाच हय, और जो अमीर हय,  ताकत वाला हय, रुतबे वाला हय, ... उन्हों तो लेतेच लेते हय ! बोले तो किस्मत लिखा कू आए । हय कि नहीं ?

 

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गुरुवार, 20 नवंबर 2025

गोपीचंद बॉडी सप्लायर


 








इधर साहित्य के इलाके में बादल बहुत घुमड़ रहे हैं। दिन दिन भर अंधेरा छाया रहता है, रात रात भर चांद-तारे गायब रहते हैं। जितने भी लोग बादल देखते हैं उनमें से आधे दन्न से कवि हो जाते हैं। बचे हुए में से आधे लघुकथाकार और बाकी से व्यंग्यकार, कथाकार, निबंधकार वगैरह पैदा होते हैं। उम्मीद तो रहती है कि बादल से पानी बरसेगा लेकिन टपकते हैं साहित्यकार और कुछ परजीवीनुमा भी आ जाते हैं मैदान में। अब आए हैं तो गीला भी होगा, कुछ कीचड़ भी और कुछ नाले -नदी, तालाब में भी पहुंचेंगे। भाई पानी तो पानी है, जिधर ढलान मिलेगी वह चल पड़ेगा। इसमें कोई रोक तो है नहीं।
इस झरते बरसते मौसम में साहित्य की सेवा यदि कोई कर रहा है तो वह प्रकाशक है । आप साहेबान दनादन लिखिए हम धड़ाधड़ छापेंगे। बस हो गया काम, आपका भी और हमारा भी । क्यों लिखना है, किसके लिए लिखना है, पाठक क्या होता है, क्या चाहता है इसकी परवाह करने की जरूरत नहीं होना चाहिए । इस तरह के सवाल कोई कमबख्त करे तो उसे मौका मिलते ही सूखे कुवें में डाल दो । जिसके भाग्य में जो लिखा है उसे वो भुगतना ही पड़ता है । पाठक लोग कोई दूसरी दुनिया के नहीं हैं । साहित्य सेवा के लिए प्रकाशक बेचारे को खूब सारे गीले-सूखे शब्द चाहिए जिन्हें वह किताब में बदल सकें । लेखक और प्रकाशक राजस्थानी समधी की तरह होते हैं। खूब गले मिलते हैं लेकिन रियायत जरा भी नहीं करते हैं। मजे की बात यह है कि यह गलाकाट रिश्ता एक बार बनता है तो जीवन भर के लिए बन जाता है।
यहां तक कोई समस्या नहीं है। याद दिला दें कि पुस्तक प्रकाशन के बाद भी पाठक की किसी को याद नहीं आती है। अब अगर पुस्तक का विमोचन नहीं हो तो मतलब क्या है साहित्य सेवा का !! लिखी, छपी, हाथ में आ गई, अब इसका कुछ तो करना पड़ेगा। विमोचन के अलावा और किया भी क्या जा सकता है । किसी आयोजन वैज्ञानिक को साथ में ले लो तो सब काम आसान हो जाता है। मतलब अतिथि, मुख्य अतिथि वगैरह वही फिट करवा देता है। हॉल, फोटोग्राफर, प्रेस रिपोर्टर और खाने-पीने का बढ़िया इंतजाम आपकी जेब को ही करना है । लेकिन सबसे ज्यादा दिक्कत आती है आयोजन में लोगों की उपस्थिति को लेकर । लोग आते नहीं हैं आजकल, जाहिल कहीं के । चाय-समोसा खिलाओ तो भी हॉल नहीं भर पाता है। लेखक को मजबूरन गोपीचंद बॉडी सप्लायर के पास जाना पड़ता है।
गोपीचंद हर मौके के लिए “बॉडी” सप्लाई करता है। चाहे शादी हो, बारात, उठावना या पुस्तक विमोचन। वह सजी-धजी, धोई-धुलाई बॉडीज भेजता है। पॉलिश किए जूते, इस्तरीदार कपड़े और चेहरे पर साहित्यिक गहराई का भाव अलग से । विमोचन कार्यक्रम थोड़ा बोरिंग होता है, इसलिए बीच-बीच में तालियाँ भी बजानी पड़ती हैं, मौके बेमौके वाह वाह भी करना पड़ती है । यही कारण है कि इस प्रजाति की बॉडी थोड़ी महँगी मिलती है। लेकिन भैया, जब साहित्य में सिर दे ही दिया है तो सस्ता महंगा क्या देखना ! अगले दिन अखबार में इस खबर के साथ फोटो छपेगी — “लेखक महोदय का गरिमामय विमोचन समारोह संपन्न।” तो फटाक से फेमस भी तो हो जाओगे। किताबों को तो कहीं जाना नहीं है, अपने घर में ही पड़ी रहेंगी । तो भाई लोगों आगे-पीछे मत देखो.... चले चलो, बढ़े चलो ।
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शनिवार, 8 नवंबर 2025

तोतों से भरा आसमान

 






 

                 आपको पता है हमारे हाथों में लकीरें ही नहीं  तोते भी होते हैं। कहते हैं कि लोग जब फुरसत में होते हैं तो इन तोतों के साथ खेला करते हैं । दोनों में एक रिश्ता बन जाता था अनदेखा सा। पता नहीं चलता था कि आदमी तोते में है या तोते आदमी में । एक अदृश्य साथ  होता है । मतलब अगर आदमी जब दफ्तर में बॉस के सामने हो तब भी तोते साथ और प्रेमिका के साथ किसी गार्डन या ढाबे में हो तब भी, यहाँ तक कि जब घर में हो तब भी तोते । तोतों का मुख्य काम यह है कि जब भी कोई संकट सामने आता दिखे वो फ़ौरन उड़ भागें । जैसे कुछ दिन पहले चम्पक चौहान के साथ हुआ । एक मस्तानी शाम दफ्तर के बाद प्रेमिका को गोलगप्पे खिलवा रहे थे कि उसका पति आ गया। उसे देखते ही चम्पक चौहान के तोते उड़ गए। मन तो हुआ कि वे खुद उड़ जाते, तोते भले ही गोलगप्पो कि प्लेट लिए खड़े रहते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि तोते किसी के मन की बात नहीं सुनते हैं । इधर पत्नी को चम्पक के साथ देख कर उसके पति के तोते पहली किश्त में उड़ गए। दूसरी किश्त में बचे हुए भी उड़ गए, क्योंकि साथ में उनकी अपनी प्रेमिका भी थी। दोनों पुरुष तोतों के बिना भुने बैंगन की तरह काले कलूटे सलपड़े हो गए। कुछ सूझ नहीं रहा था, लगा जैसे तोते उनका दिमाग़ भी ले उड़े । करें तो क्या करें!  अचानक चम्पक की बैटरी ऑन हुई और मशीनी हलचल के साथ उसने हाथ बढ़ा कर 'ग्लेड टू मीट यू' कह डाला । आश्चर्य की बात यह रही कि प्रेमिका के पति को भी सेम मशीनी हलचल का लाभ मिला। इसका मतलब यह हुआ कि तोते होते हैं तो आदमी आदमी रहता है और उनके उड़ते ही ढ़ोल हो जाता है। चम्पक ने कहा "आज गोलगप्पे वाले का बड्डे है, इसका बड़ा आग्रह था सो भाभीजी के साथ आना पड़ गया। आप भी लीजिये, आज पैसे नहीं लेगा हम लोगों से।"  मौके की नजाकत ताड़ कर आगे की स्थिति गोलगप्पे वाले ने सम्हाल ली। बाद में जानकारों ने बताया कि तोते सिर्फ पुरुषों के हाथों में होते हैं। स्त्रियों के हाथ में तोतियाँ भी नहीं होती हैं। उनके हाथ में बुद्धू पुरुष होते हैं इसलिए बेवफा तोतों के लिए जगह नहीं बचती है। जब कभी उड़ लेने का मौका आ ही जाए तो यह काम उन्हें ही करना पडता है। 

 

                  इधर देश में माहौल ऐसा है कि जब भी देखो आसमान तोतों से भरा पड़ा है। वजह, लोग भाषण दे रहे हैं, बयान दे रहे हैं, वादे बरसा रहे हैं, तरह तरह से डरा रहे हैं और करोडों तोते उड़ रहे हैं ! मालिक जानते हैं कि लोगों के हाथ खाली होते जा रहे हैं। हर हाथ डाटा है फिर भी घाटा हो सकता है। जब जब महा-सत्यवादी मुँह खोलते हैं सवा सौ करोड़ हाथों से तोते उड़ जाते हैं। कहते हैं काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती है। चढ़ती है भाई, अगर चूल्हे में आग नहीं हो तो सौ बार चढ़ाइये। मुद्दा आग  है और जनता हांडी पर आँख गड़ाए है। कल जब हांडी की हकीकत सामने आएगी जनता के पास और और तोते उड़ा देने के आलावा क्या विकल्प होगा!खैर ...  सवाल है एक ...

भाइये एक ठो बात तो बताइयेगा जरा... भोटवा बिहार में पड़ता है तो तोतवा दिल्ली में काहे उड़ता है !!?

 

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