सरकार बोलती, " अय खातून! सुनते ज़रा! ओहो, मईडम किधर को निकल गए तुम? बात सुनते नहीं, ज़रा ठहर के सुनो! तुम्हारे को अम्मा बोलूँ, आक्का बोलूँ, लाड़ली बोलूँ या के लछमी बोलूँ? तुमच भगवान हो, तुमच देवी हो! इधर लोगाँ अब तुमको बैंक बोल रे! क्या जी, तुम बैंक हो गए वोटां वाले ? बोले तो सरकारी बैंक! अक्खा मुलुक में तुमच अक्केले लेडीज़ बैंक होरे ! माने तो स्टेट बैंक का पार्ट टू ! मूल से ज़्यादा ब्याज देरे तुम! फटाफट फटाफट, नगद लेरे नगद देरे ना ! है कि नहीं ! हय शरमाओ नक्को । हे हे हे... । पोलटिक्स में पोट्टी पटाना हय फकत काम अपुन का । बोले तो खातून के खाते में कैश अपुन का ! जान, अरमान, अक्खा देस अपुन का! हय खुशी की बाताँ, ज़माने को बताओ! ट्रेन पकड़ के, जल्दी से जाओ! पड़ोसी चमन में, रोज़गार सपन का ! उधर बी सरकार अपुन की दरबार अपुन का । तुम हो तो अपुन है! तुम हो तो धरम है! थाली अपुन की गरम है! तुम हो तो काहे की शरम है? तुम्हारे क़दमों पे दिल-ओ-जान अपुन का ! खातून की खिदमत में सल्लाम अपुन का ।
हिंदुस्तानी वोटर लोगाँ अब दिल का
साफ़ और इरादों का पक्काच होरा । अब उसको कोई सिखाता-पढ़ता नहीं बैठता! वोटरां की
नई फसल तो पैदाईशी समझदार हो रए। उन्हों को दो-चार सौ रुपये बताए तो सीधा इनकार कर
देते कि, "अरे भाई, इतना कम में अपुन
वोटाँ नहीं बेचते बोलके!" अपुन अगर नाप-तौल करके देखे
तो मालूम होरा कि सियासत के मामले में सारे लोगाँ बाइबर्थ पीएच-डी. होरै। सबका दिमाग़
एकदम थक्केदार दही के माफ़िक़ सेट हय जी । किसीको बी सोच-विचार के पचड़े में पड़ने
की ज़रूरतीच नहीं होरी। दो-दो महीने से चलते आरे मसले भी, ऐन
टाइम पे जुमलों के आगे घुटने टेक देरे। ऐसे में कैसा सोच, कैसा
विचार! बस, तेज़ी-मंदी देख को, बाज़ार
भाव देख को, और जहाँ गाँठ गरम हो रई वहींच वोटा दो और छुट्टी
पाओ!
ऐसा हय कि पूरा मामला बाज़ार से ही
तय होरा तो मगज़मारी करने की ज़रूरतच कायको ? मार्केट
में रोज़ नए-नए लीडरां आते, रोज़ नए-नए वायदे फैइलाते, रोज़ नई-नई गप्पाँ सुनाते... तो किसको सूझ पड़ सकती! लेडी
वोटरां, बोले तो खातून लोगाँ आख़िरी में बाज़ार भाव कोइच देखतीं। पहले के ज़माने
में लोगाँ मीठी-चुपड़ी बाताँ सुन के देते। फिर, जान-माल का डर
देख के देते। अब रूपीय लेके देते । चुनावी चेम्पीयन लोगाँ को मालूम हय कि अपुन के बाप
का क्या जाता, रुपया तो सेठाँ और टेक्स पेयरां के हाथ का मेल
होरा । हेल्थ डिपार्टमेंट बोलता कि, "हाथ धुलवाते रओ,
तो लोगाँ इंफेक्शन से बचेंगे बोलके।" एक ज़माने में भुक्के-प्यासे
और ग़रीब लोगाँ एक दिन की दारू और दो दिन के खाने में बनाते सरकार । लेकिन अबी महंगाई
डायन से सब लोगाँ परेशान हय ! तुमको मालूम क्या, चुनावी चेम्पीयन लोगाँ को भी तकलीफ़
हय। मालिकों के आगे हाथ फ़ैला-फ़ैला के बार-बार माँगना पड़ता बोलते । वो तो अच्छाच है
कि बाज़ार में शरम का कंसेप्ट टोटल ख़तम हो हय । बीस सालाँ पहले तलक हज़ार-पाँच सौ
के नोटाँ मैदान पकड़ लेते तो जीत होजारी थी । अब तो ऑनलाईनां का ज़माना चलरा । इधर
बटन दबाओ, उधर मालाँ वोटरां के खाते में। उधर बटन दबवाया,
तो इधर चेम्पीयन सीधे सरकार में बैठता जाको ।
तुम लोगाँ पढ़ रे क्या ? अय कुरबान
... ! तो समजो अपुन को ऐसा समाज मिलरा जो फ़्री स्कीमाँ के
बदले, किसी को भी हुकूमत देरा । देस में हज़ारों स्कूल इसी वास्ते
बंद होरे कि देस को जम्हूरियत के बढ़िया बढ़िया
चेम्पीयन मिलरे बोलके । ग़रीब आदमी को दिल बड़ा हय । कुछ मिले ना मिले, मगर वो हमेशा देताच रहता! नदी दिखी तो चुपचाप सिक्का फेंकता। मंदिर दिखा
तो हाथ जोड़ के रुपया चढ़ाता। पुलिस वाला दिखा तो उसकी जेब गरम करता! गुंडे दिखे
तो उन्हें हफ़्ता देता, अफ़सर दिखा तो दलाली देता! सरकार
दिखी तो झुक के सलामी देता! उसको मालूम कि ग़रीब हय तो उसीको देनाच हय, और जो अमीर हय, ताकत वाला हय, रुतबे वाला हय, ...
उन्हों तो लेतेच लेते हय ! बोले तो किस्मत लिखा कू आए । हय कि नहीं ?
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