गुरुवार, 20 नवंबर 2025

गोपीचंद बॉडी सप्लायर


 








इधर साहित्य के इलाके में बादल बहुत घुमड़ रहे हैं। दिन दिन भर अंधेरा छाया रहता है, रात रात भर चांद-तारे गायब रहते हैं। जितने भी लोग बादल देखते हैं उनमें से आधे दन्न से कवि हो जाते हैं। बचे हुए में से आधे लघुकथाकार और बाकी से व्यंग्यकार, कथाकार, निबंधकार वगैरह पैदा होते हैं। उम्मीद तो रहती है कि बादल से पानी बरसेगा लेकिन टपकते हैं साहित्यकार और कुछ परजीवीनुमा भी आ जाते हैं मैदान में। अब आए हैं तो गीला भी होगा, कुछ कीचड़ भी और कुछ नाले -नदी, तालाब में भी पहुंचेंगे। भाई पानी तो पानी है, जिधर ढलान मिलेगी वह चल पड़ेगा। इसमें कोई रोक तो है नहीं।
इस झरते बरसते मौसम में साहित्य की सेवा यदि कोई कर रहा है तो वह प्रकाशक है । आप साहेबान दनादन लिखिए हम धड़ाधड़ छापेंगे। बस हो गया काम, आपका भी और हमारा भी । क्यों लिखना है, किसके लिए लिखना है, पाठक क्या होता है, क्या चाहता है इसकी परवाह करने की जरूरत नहीं होना चाहिए । इस तरह के सवाल कोई कमबख्त करे तो उसे मौका मिलते ही सूखे कुवें में डाल दो । जिसके भाग्य में जो लिखा है उसे वो भुगतना ही पड़ता है । पाठक लोग कोई दूसरी दुनिया के नहीं हैं । साहित्य सेवा के लिए प्रकाशक बेचारे को खूब सारे गीले-सूखे शब्द चाहिए जिन्हें वह किताब में बदल सकें । लेखक और प्रकाशक राजस्थानी समधी की तरह होते हैं। खूब गले मिलते हैं लेकिन रियायत जरा भी नहीं करते हैं। मजे की बात यह है कि यह गलाकाट रिश्ता एक बार बनता है तो जीवन भर के लिए बन जाता है।
यहां तक कोई समस्या नहीं है। याद दिला दें कि पुस्तक प्रकाशन के बाद भी पाठक की किसी को याद नहीं आती है। अब अगर पुस्तक का विमोचन नहीं हो तो मतलब क्या है साहित्य सेवा का !! लिखी, छपी, हाथ में आ गई, अब इसका कुछ तो करना पड़ेगा। विमोचन के अलावा और किया भी क्या जा सकता है । किसी आयोजन वैज्ञानिक को साथ में ले लो तो सब काम आसान हो जाता है। मतलब अतिथि, मुख्य अतिथि वगैरह वही फिट करवा देता है। हॉल, फोटोग्राफर, प्रेस रिपोर्टर और खाने-पीने का बढ़िया इंतजाम आपकी जेब को ही करना है । लेकिन सबसे ज्यादा दिक्कत आती है आयोजन में लोगों की उपस्थिति को लेकर । लोग आते नहीं हैं आजकल, जाहिल कहीं के । चाय-समोसा खिलाओ तो भी हॉल नहीं भर पाता है। लेखक को मजबूरन गोपीचंद बॉडी सप्लायर के पास जाना पड़ता है।
गोपीचंद हर मौके के लिए “बॉडी” सप्लाई करता है। चाहे शादी हो, बारात, उठावना या पुस्तक विमोचन। वह सजी-धजी, धोई-धुलाई बॉडीज भेजता है। पॉलिश किए जूते, इस्तरीदार कपड़े और चेहरे पर साहित्यिक गहराई का भाव अलग से । विमोचन कार्यक्रम थोड़ा बोरिंग होता है, इसलिए बीच-बीच में तालियाँ भी बजानी पड़ती हैं, मौके बेमौके वाह वाह भी करना पड़ती है । यही कारण है कि इस प्रजाति की बॉडी थोड़ी महँगी मिलती है। लेकिन भैया, जब साहित्य में सिर दे ही दिया है तो सस्ता महंगा क्या देखना ! अगले दिन अखबार में इस खबर के साथ फोटो छपेगी — “लेखक महोदय का गरिमामय विमोचन समारोह संपन्न।” तो फटाक से फेमस भी तो हो जाओगे। किताबों को तो कहीं जाना नहीं है, अपने घर में ही पड़ी रहेंगी । तो भाई लोगों आगे-पीछे मत देखो.... चले चलो, बढ़े चलो ।
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