बुधवार, 10 दिसंबर 2025

दो केले और खुल जा सिम सिम

 




 

          फूलसिंह 'फूल' ने संत जी के चरणों को दबाते हुए प्रार्थना की -  "महाराज की जय हो, आशीर्वाद दीजिए भगवान,.... मैं राजनीति में जाकर जनता की सेवा करना चाहता हूँ । "

" राजनीति का सेवा से अब क्या लेना देना है फूलसिंह 'फूल' !? " संत जी ने कहा। 

 "जाना ही पड़ेगा संत जी, जनता गरीब है, भूखी और बीमार है। " फूलसिंह 'फूल' बोला।

" जनता को गरीब, भूखी और बीमार बनाए रखने में बड़ी युक्ति लगती है ‘फूल’ सिंह ।  लाचार जनता लोकतंत्र की जान होती है। अगर तुम इतना भी नहीं जानते हो तो राजनीति में जाकर क्या करोगे!? " 

" राजनीति में ज्ञान और समझ की क्या जरूरत है महाराज!! आप तो अपना काम कीजिए,...  आशीर्वाद दीजिए फटाफट। " 

 संत ने बिना कुछ बोले फूल सिंह 'फूल' को दो केले दे दिए, कहा - " खुल जा सिम सिम... जा शुरू हो जा....।"

 

  संत जी अंधे हैं लेकिन उन्हें सब दिखता है। उनके बारे में प्रसिद्ध है कि वह तीन:एक के अनुपात में बोलते हैं अर्थात तीन बातें बुरी और एक बहुत बुरी । अगर चोर-उचक्कों, लबार-लफंगों को आशीर्वाद दे दें तो वे खूब तरक्की करते हैं। अनेक चोर उनके आशीर्वाद से डाकू बने और जन नायक कहलाये । उन्होंने डायरेक्ट अपने आशीर्वाद से सैकडों ‘नेतू’ पैदा किए हैं। परिणाम स्वरुप नेता भी दिव्यांग निकले । हालांकि तकनीकी रूप से सबके पास दो आंखें बरामद हो सकती हैं । कुछ ही वर्षों में देश का राजनीतिक परिवेश इच्छाधारी अंधों से भर गया है। ये वही देखते हैं जो देखना चाहते हैं। अपने यहाँ एक बार गरीबों को पुचकार लो, थोड़ा पान-पत्ता कर दो, फिर पाँच साल तक देखने को पूरी दुनिया पड़ी है। बड़े-बूढ़े बताते हैं कि सत्तागिरी और संतगिरी में मौसेरे भाई जैसा रिश्ता होता है। एक जीने नहीं देता दूसरा मरने नहीं देता। दोनों में बड़ी अंडरस्टैंडिंग है। एक दूसरे की मदद करने में वह आगा-पीछा नहीं देखते हैं। इसलिए संत जी ने 'फूल' जी में संभावना देखकर आशीर्वाद दे दिया है।

 

 फूलसिंह 'फूल'  दो केले लेकर निकला तो साथ लगे चमचों ने कहा उस्ताद आधा-आधा खा लो, अभी अपन चार हैं बाद में कम पड़ जाएंगे । लेकिन फूल सिंह को आशीर्वाद प्राप्त था सो उसने कुछ और लोग जुटाए और अस्पताल में एक महादरिद्र को ताड़ा। दोनों केले उसके मुँह आगे किये और फोटो खिंचवा लिया। फिर दूसरे भूखे को देखा और केले दिखाकर फोटो खिंचवा लिए। इसी तरह एक के बाद एक पूरा वार्ड कैमरे में कैद हो गया। केले अभी भी उनके हाथ में किसी पिस्टल की तरह मौजूद थे। 

 

“ केलों का क्या करें? " फूलसिंह से चमचों ने पूछा। 

" किसी एक को देना अन्याय होगा और इसके पच्चीस टुकड़े करके बांट देना केलों के साथ अन्याय होगा। "

"फिर इनका क्या करें !?"

" ऐसा करते हैं इसको बेच देते हैं। कोई भी अमीर इन्हें ले लेगा। संगठन में शक्ति होती है...  उठाओ लाठी और चलो । "

नगर सेठ ने केले नहीं लिए... चंदा दे दिया। 

 फूलसिंह 'फूल' सारा दिन केले लिए घूमता रहा लेकिन किसी ने भी केले नहीं लिए।... चंदा सबने दे दिया। 

 चमचों ने कहा कल शहर में पोस्टर लगेंगे - ' नगर के युवा हृदय सम्राट फूलसिंह 'फूल' का पहला भव्य नागरिक अभिनंदन' आज शाम जनता चौक पर ।

 

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बुधवार, 3 दिसंबर 2025

डरा हुआ आदमी


 


 

                 डरा हुआ आदमी लोकतंत्र का सबसे मजबूत खंबा होता है। जैसे सर्कस के तंबू में बीच का खंबा होता है, बस वैसे ही। बाकी के सारे खंभे भी उसे पर निर्भर होते हैं। बीच का खंबा अगर जरा भी हिला तो समझो लोकतंत्र को खतरा हुआ। कुछ लोग इन्हें डरा हुआ आदमी कहते हैं और जो जानते हैं वे जिम्मेदार आदमी मानते हैं। डरा हुआ आदमी गुप्त मतदान करते हुए भी डरता है कि भगवान सब देख रहे हैं और मौका पड़ा तो महाआरती के बाद सरकार को सब बता देंगे। हाल के कुछ महत्वपूर्ण बयानों से देश को पता चला है कि आजादी ज्यादा पुरानी नहीं है और डरा हुआ आदमी भी। डरा हुआ आदमी सब समझता है बल्कि दूसरों से कुछ ज्यादा ही समझता है। वो टीवी देखते हुए वह भी देख लेता है जो दिखाया नहीं जा रहा है। अखबार पढ़ते हुए वह शब्द नहीं पढ़ता शब्दों के पीछे का पढ़ता है। चुनावी दल जब वादे करते हैं तो वह उन पर यकीन नहीं करता है, लेकिन यकीन नहीं करने के खतरे जानता है इसलिए फौरन कर लेता है। मीडिया जब विकास की जिंदा खबरें सुनता है तो इसके अंदर कोई ‘ओम शांति - ओम शांति’ बोलने लगता है। गुस्सा आने पर मुस्कुराने का हुनर उसने सीखा था, अब सुबह से शाम तक मुस्कुराता है।

                       वह जिनके बीच उठता बैठता है उन्हें भी संदेह से देखता है। उसे विश्वास बना रहता है कि इन  सारे लोगों की पहुँच सरकार तक हो सकती है । सरकार के पास वर्दी और बिना वर्दी वाली पुलिस होती है और पुलिस के पास डंडा। और सब जानते हैं कि पुलिस जनता की सेवक है। रात में वह सपना देखता है और चीखना चाहता है। लेकिन उसकी इतनी आवाज भी नहीं निकलती है कि बगल में सोया हुआ उठ जाए। उसको लगता है कि यदि उसने सिस्टम के खिलाफ कुछ भी बोला तो वह अभिमन्यु की तरह घिर जाएगा। उसे हर समय लगता है कि वह महाभारत के युद्ध मैदान में असुरक्षित खड़ा हुआ है। डरे हुए आदमी को अपने भी अपने से नहीं लगते हैं। वह मानता है की एक डर ही है जो उसकी सभी खतरों से रक्षा करता है। डर ही उसका जीवन है और डर नहीं होता तो वह कभी का फोटो हो गया होता।

                  डरा हुआ आदमी सोशल मीडिया पर किसी भी पोस्ट को लाइक करने से पहले बार-बार चेक करता है कि लाइक बटन का रंग कहीं 'विपक्ष' से मेल तो नहीं खाता। वह सिर्फ हार्दिक बधाई, शुभकामनाएं, बहुत सुन्दर जैसे कमेंट करता है, लेकिन हमेशा यह ध्यान रखता है कि कमेंट इतना छोटा हो कि उस पर कोई 'काउंटर कमेंट' न कर पाए। प्रोफाइल पिक्चर पर उसने खुद की नहीं, एक गैर राजनीतिक फूल की तस्वीर लगा रखी है । जब उसका बच्चा स्कूल में कोई प्रश्न पूछता है, तो वह उसे धीरे से डांटता है, "बेटा, कुछ पूछना, ज्यादा  सोचना गंदी बात होती है । टीचर जो भी बता दे वही सच है। प्रश्न नहीं करोगे तो सौ साल जियोगे, बस उत्तर याद रखो।"

                      कई बार जब डरा हुआ आदमी खाली और अकेला होता है तो विचार आते जाते रहते हैं। कभी कभी सोचता है कि देश बड़ा या जीवन! अंदर से पहली आवाज निकलती है - देश बड़ा। लेकिन तुरंत ही वह भूल सुधार भी करता है। अंदर से कोई फटकारता है कि अबे जानता नहीं क्या, 'जान है तो जहान है'। जान बचे तो समझो लाखों पाये। इनदिनों घर से बाहर निकलो तो लगता है कि जान शरीर से आगे आगे चल रही है। शरीर अगर कदम से कदम नहीं मिला पाया तो समझो जान ये गई वो गई। दूसरे दिन खबर छपेगी कि हार्ट अटैक से एक और गया । अभी जो कनिया पहलवान हैं ना, अपने चक्कू कट्टा वाले, वह भगवान तो नहीं हैं पर भगवान से कम भी नहीं हैं। जब देखो तब काले भैंसे पर सवार दिखाई देते हैं। सामने पड़ जाएं तो कमर अपने आप झुक कर दोहरा जाती है । और आदमी के मुँह नाक से अनुलोम विलोम और कपालभाँति निकलने लगती है ।  ऐसी सिचुएशन में कोई सीन तान कर खड़ा हो जाए तो अंजाम क्या होगा ! आप समझ सकते हैं । लेकिन डॉक्टर एक बात अच्छी भी कहते हैं कि डरे हुए आदमी को कब्ज की शिकायत नहीं रहती है। कब्ज न हो तो शरीर अनेक रोगों से बचा रहता है। इसलिए हर आदमी को दिमाग और पेट साफ रखना चाहिए।

 

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गुरुवार, 27 नवंबर 2025

खातून की ख़िदमत में सलाम अपुन का!


 



 

सरकार बोलती,  " अय खातून! सुनते ज़रा! ओहो, मईडम किधर को निकल गए तुम? बात सुनते नहीं, ज़रा ठहर के सुनो! तुम्हारे को अम्मा बोलूँ, आक्का बोलूँ, लाड़ली बोलूँ या के लछमी बोलूँ? तुमच भगवान हो, तुमच देवी हो! ​इधर लोगाँ अब तुमको बैंक बोल रे! क्या जी, तुम बैंक हो गए वोटां वाले ? बोले तो सरकारी बैंक! अक्खा मुलुक में तुमच अक्केले लेडीज़ बैंक होरे ! माने तो स्टेट बैंक का पार्ट टू ! मूल से ज़्यादा ब्याज देरे तुम! फटाफट फटाफट, नगद लेरे नगद देरे ना !  है कि नहीं ! हय शरमाओ नक्को । हे हे हे... । ​पोलटिक्स में पोट्टी पटाना हय फकत काम अपुन का । बोले तो खातून के खाते में कैश अपुन का ! जान, अरमान, अक्खा देस अपुन का! हय खुशी की बाताँ, ज़माने को बताओ! ट्रेन पकड़ के, जल्दी से जाओ! पड़ोसी चमन में, रोज़गार सपन का ! उधर बी  सरकार अपुन की दरबार अपुन का । तुम हो तो अपुन है! तुम हो तो धरम है! थाली अपुन की गरम है! तुम हो तो काहे की शरम है? तुम्हारे क़दमों पे दिल-ओ-जान अपुन का ! खातून की खिदमत में सल्लाम अपुन का ।  

हिंदुस्तानी वोटर लोगाँ अब दिल का साफ़ और इरादों का पक्काच होरा । अब उसको कोई सिखाता-पढ़ता नहीं बैठता! ​वोटरां की नई फसल तो पैदाईशी समझदार हो रए। उन्हों को दो-चार सौ रुपये बताए तो सीधा इनकार कर देते कि, "अरे भाई, इतना कम में अपुन वोटाँ नहीं बेचते बोलके!" अपुन अगर नाप-तौल करके देखे तो मालूम होरा कि सियासत के मामले में सारे लोगाँ बाइबर्थ पीएच-डी. होरै। सबका दिमाग़ एकदम थक्केदार दही के माफ़िक़ सेट हय जी । किसीको बी सोच-विचार के पचड़े में पड़ने की ज़रूरतीच नहीं होरी। दो-दो महीने से चलते आरे मसले भी, ऐन टाइम पे जुमलों के आगे घुटने टेक देरे। ऐसे में कैसा सोच, कैसा विचार! ​बस, तेज़ी-मंदी देख को, बाज़ार भाव देख को, और जहाँ गाँठ गरम हो रई वहींच वोटा दो और छुट्टी पाओ!

​ऐसा हय कि पूरा मामला बाज़ार से ही तय होरा तो मगज़मारी करने की ज़रूरतच कायको ? मार्केट में रोज़ नए-नए लीडरां आते, रोज़ नए-नए वायदे फैइलाते, रोज़ नई-नई गप्पाँ सुनाते... तो किसको सूझ पड़ सकती! ​लेडी वोटरां, बोले तो खातून लोगाँ आख़िरी में बाज़ार भाव कोइच देखतीं। पहले के ज़माने में लोगाँ मीठी-चुपड़ी बाताँ सुन के देते। फिर, जान-माल का डर देख के देते। अब रूपीय लेके देते । चुनावी चेम्पीयन लोगाँ को मालूम हय कि अपुन के बाप का क्या जाता, रुपया तो सेठाँ और टेक्स पेयरां के हाथ का मेल होरा । हेल्थ डिपार्टमेंट बोलता कि, "हाथ धुलवाते रओ, तो लोगाँ इंफेक्शन से बचेंगे बोलके।" एक ज़माने में भुक्के-प्यासे और ग़रीब लोगाँ एक दिन की दारू और दो दिन के खाने में बनाते सरकार । लेकिन अबी महंगाई डायन से सब लोगाँ परेशान हय  ! तुमको मालूम क्या, चुनावी चेम्पीयन लोगाँ को भी तकलीफ़ हय। मालिकों के आगे हाथ फ़ैला-फ़ैला के बार-बार माँगना पड़ता बोलते । वो तो अच्छाच है कि बाज़ार में शरम का कंसेप्ट टोटल ख़तम हो हय । बीस सालाँ पहले तलक हज़ार-पाँच सौ के नोटाँ मैदान पकड़ लेते तो जीत होजारी थी । अब तो ऑनलाईनां का ज़माना चलरा । इधर बटन दबाओ, उधर मालाँ वोटरां के खाते में। उधर बटन दबवाया, तो इधर चेम्पीयन सीधे सरकार में बैठता जाको ।

तुम लोगाँ पढ़ रे क्या ? अय कुरबान ... ! तो समजो अपुन को ऐसा समाज मिलरा जो फ़्री स्कीमाँ के बदले, किसी को भी हुकूमत देरा । देस में हज़ारों स्कूल इसी वास्ते बंद होरे कि देस को जम्हूरियत के बढ़िया  बढ़िया चेम्पीयन मिलरे बोलके ।​ ग़रीब आदमी को दिल बड़ा हय । कुछ मिले ना मिले, मगर वो हमेशा देताच रहता! ​नदी दिखी तो चुपचाप सिक्का फेंकता। मंदिर दिखा तो हाथ जोड़ के रुपया चढ़ाता। पुलिस वाला दिखा तो उसकी जेब गरम करता! गुंडे दिखे तो उन्हें हफ़्ता देता, अफ़सर दिखा तो दलाली देता! सरकार दिखी तो झुक के सलामी देता! ​उसको मालूम कि ग़रीब हय तो उसीको देनाच हय, और जो अमीर हय,  ताकत वाला हय, रुतबे वाला हय, ... उन्हों तो लेतेच लेते हय ! बोले तो किस्मत लिखा कू आए । हय कि नहीं ?

 

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गुरुवार, 20 नवंबर 2025

गोपीचंद बॉडी सप्लायर


 








इधर साहित्य के इलाके में बादल बहुत घुमड़ रहे हैं। दिन दिन भर अंधेरा छाया रहता है, रात रात भर चांद-तारे गायब रहते हैं। जितने भी लोग बादल देखते हैं उनमें से आधे दन्न से कवि हो जाते हैं। बचे हुए में से आधे लघुकथाकार और बाकी से व्यंग्यकार, कथाकार, निबंधकार वगैरह पैदा होते हैं। उम्मीद तो रहती है कि बादल से पानी बरसेगा लेकिन टपकते हैं साहित्यकार और कुछ परजीवीनुमा भी आ जाते हैं मैदान में। अब आए हैं तो गीला भी होगा, कुछ कीचड़ भी और कुछ नाले -नदी, तालाब में भी पहुंचेंगे। भाई पानी तो पानी है, जिधर ढलान मिलेगी वह चल पड़ेगा। इसमें कोई रोक तो है नहीं।
इस झरते बरसते मौसम में साहित्य की सेवा यदि कोई कर रहा है तो वह प्रकाशक है । आप साहेबान दनादन लिखिए हम धड़ाधड़ छापेंगे। बस हो गया काम, आपका भी और हमारा भी । क्यों लिखना है, किसके लिए लिखना है, पाठक क्या होता है, क्या चाहता है इसकी परवाह करने की जरूरत नहीं होना चाहिए । इस तरह के सवाल कोई कमबख्त करे तो उसे मौका मिलते ही सूखे कुवें में डाल दो । जिसके भाग्य में जो लिखा है उसे वो भुगतना ही पड़ता है । पाठक लोग कोई दूसरी दुनिया के नहीं हैं । साहित्य सेवा के लिए प्रकाशक बेचारे को खूब सारे गीले-सूखे शब्द चाहिए जिन्हें वह किताब में बदल सकें । लेखक और प्रकाशक राजस्थानी समधी की तरह होते हैं। खूब गले मिलते हैं लेकिन रियायत जरा भी नहीं करते हैं। मजे की बात यह है कि यह गलाकाट रिश्ता एक बार बनता है तो जीवन भर के लिए बन जाता है।
यहां तक कोई समस्या नहीं है। याद दिला दें कि पुस्तक प्रकाशन के बाद भी पाठक की किसी को याद नहीं आती है। अब अगर पुस्तक का विमोचन नहीं हो तो मतलब क्या है साहित्य सेवा का !! लिखी, छपी, हाथ में आ गई, अब इसका कुछ तो करना पड़ेगा। विमोचन के अलावा और किया भी क्या जा सकता है । किसी आयोजन वैज्ञानिक को साथ में ले लो तो सब काम आसान हो जाता है। मतलब अतिथि, मुख्य अतिथि वगैरह वही फिट करवा देता है। हॉल, फोटोग्राफर, प्रेस रिपोर्टर और खाने-पीने का बढ़िया इंतजाम आपकी जेब को ही करना है । लेकिन सबसे ज्यादा दिक्कत आती है आयोजन में लोगों की उपस्थिति को लेकर । लोग आते नहीं हैं आजकल, जाहिल कहीं के । चाय-समोसा खिलाओ तो भी हॉल नहीं भर पाता है। लेखक को मजबूरन गोपीचंद बॉडी सप्लायर के पास जाना पड़ता है।
गोपीचंद हर मौके के लिए “बॉडी” सप्लाई करता है। चाहे शादी हो, बारात, उठावना या पुस्तक विमोचन। वह सजी-धजी, धोई-धुलाई बॉडीज भेजता है। पॉलिश किए जूते, इस्तरीदार कपड़े और चेहरे पर साहित्यिक गहराई का भाव अलग से । विमोचन कार्यक्रम थोड़ा बोरिंग होता है, इसलिए बीच-बीच में तालियाँ भी बजानी पड़ती हैं, मौके बेमौके वाह वाह भी करना पड़ती है । यही कारण है कि इस प्रजाति की बॉडी थोड़ी महँगी मिलती है। लेकिन भैया, जब साहित्य में सिर दे ही दिया है तो सस्ता महंगा क्या देखना ! अगले दिन अखबार में इस खबर के साथ फोटो छपेगी — “लेखक महोदय का गरिमामय विमोचन समारोह संपन्न।” तो फटाक से फेमस भी तो हो जाओगे। किताबों को तो कहीं जाना नहीं है, अपने घर में ही पड़ी रहेंगी । तो भाई लोगों आगे-पीछे मत देखो.... चले चलो, बढ़े चलो ।
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शनिवार, 8 नवंबर 2025

तोतों से भरा आसमान

 






 

                 आपको पता है हमारे हाथों में लकीरें ही नहीं  तोते भी होते हैं। कहते हैं कि लोग जब फुरसत में होते हैं तो इन तोतों के साथ खेला करते हैं । दोनों में एक रिश्ता बन जाता था अनदेखा सा। पता नहीं चलता था कि आदमी तोते में है या तोते आदमी में । एक अदृश्य साथ  होता है । मतलब अगर आदमी जब दफ्तर में बॉस के सामने हो तब भी तोते साथ और प्रेमिका के साथ किसी गार्डन या ढाबे में हो तब भी, यहाँ तक कि जब घर में हो तब भी तोते । तोतों का मुख्य काम यह है कि जब भी कोई संकट सामने आता दिखे वो फ़ौरन उड़ भागें । जैसे कुछ दिन पहले चम्पक चौहान के साथ हुआ । एक मस्तानी शाम दफ्तर के बाद प्रेमिका को गोलगप्पे खिलवा रहे थे कि उसका पति आ गया। उसे देखते ही चम्पक चौहान के तोते उड़ गए। मन तो हुआ कि वे खुद उड़ जाते, तोते भले ही गोलगप्पो कि प्लेट लिए खड़े रहते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि तोते किसी के मन की बात नहीं सुनते हैं । इधर पत्नी को चम्पक के साथ देख कर उसके पति के तोते पहली किश्त में उड़ गए। दूसरी किश्त में बचे हुए भी उड़ गए, क्योंकि साथ में उनकी अपनी प्रेमिका भी थी। दोनों पुरुष तोतों के बिना भुने बैंगन की तरह काले कलूटे सलपड़े हो गए। कुछ सूझ नहीं रहा था, लगा जैसे तोते उनका दिमाग़ भी ले उड़े । करें तो क्या करें!  अचानक चम्पक की बैटरी ऑन हुई और मशीनी हलचल के साथ उसने हाथ बढ़ा कर 'ग्लेड टू मीट यू' कह डाला । आश्चर्य की बात यह रही कि प्रेमिका के पति को भी सेम मशीनी हलचल का लाभ मिला। इसका मतलब यह हुआ कि तोते होते हैं तो आदमी आदमी रहता है और उनके उड़ते ही ढ़ोल हो जाता है। चम्पक ने कहा "आज गोलगप्पे वाले का बड्डे है, इसका बड़ा आग्रह था सो भाभीजी के साथ आना पड़ गया। आप भी लीजिये, आज पैसे नहीं लेगा हम लोगों से।"  मौके की नजाकत ताड़ कर आगे की स्थिति गोलगप्पे वाले ने सम्हाल ली। बाद में जानकारों ने बताया कि तोते सिर्फ पुरुषों के हाथों में होते हैं। स्त्रियों के हाथ में तोतियाँ भी नहीं होती हैं। उनके हाथ में बुद्धू पुरुष होते हैं इसलिए बेवफा तोतों के लिए जगह नहीं बचती है। जब कभी उड़ लेने का मौका आ ही जाए तो यह काम उन्हें ही करना पडता है। 

 

                  इधर देश में माहौल ऐसा है कि जब भी देखो आसमान तोतों से भरा पड़ा है। वजह, लोग भाषण दे रहे हैं, बयान दे रहे हैं, वादे बरसा रहे हैं, तरह तरह से डरा रहे हैं और करोडों तोते उड़ रहे हैं ! मालिक जानते हैं कि लोगों के हाथ खाली होते जा रहे हैं। हर हाथ डाटा है फिर भी घाटा हो सकता है। जब जब महा-सत्यवादी मुँह खोलते हैं सवा सौ करोड़ हाथों से तोते उड़ जाते हैं। कहते हैं काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती है। चढ़ती है भाई, अगर चूल्हे में आग नहीं हो तो सौ बार चढ़ाइये। मुद्दा आग  है और जनता हांडी पर आँख गड़ाए है। कल जब हांडी की हकीकत सामने आएगी जनता के पास और और तोते उड़ा देने के आलावा क्या विकल्प होगा!खैर ...  सवाल है एक ...

भाइये एक ठो बात तो बताइयेगा जरा... भोटवा बिहार में पड़ता है तो तोतवा दिल्ली में काहे उड़ता है !!?

 

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गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

जोखिम दूसरे वाले से


 

                          देश भर के अख़बारों में जूते को लेकर हेड लाइन छप रही थी। पहली बार जूता इतने बड़े स्तर पर बदनाम हो रहा था। जूता पैरों में हो तो उसकी सार्थकता है। जब जब भी वह किसी के हाथों में आया तो बदनाम हुआ। दुकानदार जूता दिखाए तो ग्राहक कहते हैं और दिखाओ जरा। वोट के ग्राहक को दिखाओ तो हेडलाइन बन जाती है। चलने के मामले में जूते की प्रतिस्पर्धा चप्पल से है। विशेष परिस्थितियों में जूते से ज्यादा चप्पल चलती है। बल्कि यों कहना चाहिए कि आशिकों का देश है तो चलती ही रहती है । लेकिन समाज पुरुष प्रधान है, सो इतिहास जूते ही बनाते हैं। यही कारण है कि मारक महिलाएँ अब जूते पहनने लगी हैं वह भी हाई कील (हील) वाली । लड़की देख के छेड़ने वाले हाई कील देख कर इरादा बदल देते हैं ।  

जूता शास्त्र में कहीं लिखा है कि जूता अच्छे आदमी के पैर में हो तो दोनों की शोभा बढ़ती है। लेकिन किसी फैंकू के पैर में हो अवैध अस्त्र होता हैं। समझदार लोग सही कहते हैं संगती अच्छी नहीं हो तो अच्छा भला चरित्र खराब होने में देर नहीं लगती है। आदमी की हो न हो आजकल जूते की कीमत बहुत होती है । वो तो अच्छा हुआ कि जूता जप्त नहीं किया गया वरना सफ़ेद जूते का मुँह काला हो जाता।  टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज चलती अलग से कि फलां कंपनी का जूता चल गया । जो कंपनी विज्ञापन देते नहीं थकती है वही सफाई देती रहती कि हमारी कंपनी के जूते बेशक ज्यादा चलते हैं लेकिन ऐसे नहीं 'चलते' हैं। आज की डेट में मिडिया से बड़ी मजाक कोई कर सकता है ! मिडिया किसी मौके को नहीं छोड़ती है, आज भी मौका बड़ा था। प्रश्न आया - " जूताबहाद्दूर, ट्रम्प और टेरीफ की खबरों के बीच आप अचानक सुर्खियों में आ गए, कैसा लग रहा है? "


सरकार किसकी बनेगी ?







  

"देखो जजमान, बिना भगवान कि इच्छा के एक पत्ता भी नहीं हिल सकता हैजानते हो ना ?और यह भी सुन लो कि भगवान के आलावा सरकार को कोई नहीं हिला सकता है । भगवान जो हैं मंत्रों के अधीन हैं और मंत्र किसके अधीन हैं यह बताने की जरूरत नहीं है । भगवान को जब तक मंत्र वालों द्वारा कहा नहीं जाए वे खुद भी हिलते नहीं हैं। सोया हुआ कुम्भकर्ण किसी काम का नहीं होता है यह तो आप जानते ही हैं। एक हम ही हैं जो लोक कल्याण के लिए जागते हैं । ज्योतिषी त्रिकालदर्शी है, वह पिछला अगला सब जानता है लेकिन सबको बताता नहीं है । उसकी विद्या ज्ञान के सात तालों में बंद रहती है। ब्रहम्मा ने सृष्टि में सब बनाया चाबी नहीं बनाई । इसलिए ताले खुलवा लेना सबके बस की बात नहीं है।... खैर , बताओ तुम्हारा प्रश्न क्या है? " जोतिस जी नए पूछा । 

" बस इतना जानना चाहते हैं कि बिहार में किसकी सरकार बनेगी पंडी जी? " आगंतुक बोले ।

"किस पार्टी के हो?" 

"इसीलिए तो जानना चाहते हैं। सरकार का पता चाल जाए तो हम भी पार्टी डिसाइड कर लेते। अभी समझ में आ रहा है कि ऊंट किस करवट बैठेगा । "

" तुम पहले हो जो इतना सोच कर चल रहे हो।"

" आपके सामने भले ही पहले हों, लेकिन पीछे आधा बिहार बाट जोह रहा है ।... एक बार पता चल जाए तो सब उसी तरफ लुड़क जाएगा। " 

" तो लोग अपना दिमाग़ नहीं लगाते हैं क्या !"

" दिमाग लगाया तभी न आपके पास आए हैं ।  ... और हमारे दिमाग़ लगाने से पत्ता हिल जाएगा पंडी जी !? "

" नहीं हिलेगा। सारे पत्ते थ्रू प्रापर चेनल हिलते हैं । स्टार्टर बटन हमारे पास है। "

" तो बताइये किसकी सरकार बनेगी? "

" मेहनत का काम है। बहुत सारे ग्रहों को काम पर लगाना होगा। पूजा पाठ और पंडी-भोज भी जरूरी है ।  खर्चा भी बहुत होगा, क्या करें?"

"खर्चे की चिंता नहीं कीजिए। एक बार सरकार बन जाए तो इतना देंगे इतना देंगे कि आप भगवान को चौबीसों घंटा बिना रूकावट दौड़ाते रहेंगे। "

" ठीक है, कुंडलियां लाए हो? "

" हाँ लाए हैं.... ये लीजिये। "

" ये! किसकी है? "

" हमारी है पंडी जी। "

" तुम बिहार हो या बिहारी लाल? "

" दोनों नहीं हैं। "

" तो बिहार की कुंडली लाइए, आरजेड़ी की लाइए, जेडीयू कि लाइए, सीएम, पीएम की लाइए तब ही बता पाएंगे । "

" कांग्रेस की भी लगेगी? "

" नहीं, कुछ पार्टियां अपनी कुंडली से नहीं मजबूरियों से चलती रहती हैं ।" 

" उनकी पार्टी के पत्ते कैसे हिलते हैं पंडी जी !? "

" पत्ते कहाँ अब । वहाँ एक ही तो पत्ता है।... ओ हेनरी की कहानी पढ़ी है  ना 'द लास्ट लीफ'...। आखरी पत्ता । "

“ हाँ, उस कहानी में तो आखरी पत्ते ने जीवन बचा लिया था । यहाँ पार्टी बचेगी ? “

“हमें नहीं पता ।“ पंडी जी बोले ।

" आप तो कह रहे थे कि ज्योतिषी त्रिकालदर्शी होते है !!  एक माह आगे का देखने के लिए कौनो मंतर नहीं है !!  मारिए जरा और त्रिकालदर्शियों की इज्जत बचाइए । "

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मंगलवार, 30 सितंबर 2025

मजबूरी का हिन्दी प्रेम


 


 

                   पंडिजी जाहिरतौर पर हिन्दीप्रेमी हैं और छुपेतौर पर अंगे्रजी प्रेमी। ऐसा है भई मजबूरी में आदमी को सब करना पड़ता है। देश  पढ़ेलिखे और समझदार मजबूर लोगों से भरा पड़ा है। एक बार कोई मजबूरी का पल्ला पकड़ ले तो फिर उसे कुछ भी करने की छूट होती है। मजबूरी को समाज बहुत उपर का दर्जा देता है। लगभग संविधान की धारा की तरह यह माना जाता है कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है। अब आप ही बताएं कि महात्मा जी नाम जुड़ा हो तो कोई कैसे मजबूर होने से इंकार करे। मजबूरी हमारी राष्ट्रिय  अघोषित नीति है। सो पंडिजी को मजबूरी में  अपने बच्चों को अंगेजी स्कूलों में पढ़वाना पड़ रहा है तो मान लीजिए कि कुर्बानी ही कर रहे हैं देश की खातिर।

                        अब आपको क्या तो समझाना और क्या तो बताना। जब आप ये व्यंग्य पढ़ रहे हैं तो जाहिर तौर पर समझदार हैं ही । जानते ही हैं कि हर आदमी को दो स्तरों पर अपने आचरण निर्धारित करना पड़ते हैं। रीत है जी दुनिया की, शार्ट में बोलें तो दुनियादारी है। सामाजिक स्तर पर जो हिन्दी प्रेमी हैं वे निजी तथा पारिवारिक स्तर पर अंग्रेजी प्रेमी पाए जाते हैं। समझदार आदमी सार्वजनिक रूप से हिन्दी का प्रचार प्रसार करता है, मोहल्ले मोहल्ले घूम कर माता-पिताओं को समझाता है, प्रेरित करता है कि भइया रे अपने बच्चों को हिन्दी माध्यम की पाठशाला में पढने के लिए भेजो और देश को अच्छे नागरिक दो। इस बात में किसी को शक नहीं होना चाहिए कि हिन्दी को प्रेम करना वास्तव में देश को प्रेम करना है। और देश को प्रेम  करना हर आम आदमी का परम कर्तव्य है। जिसे कुछ भी करने का मौका नहीं मिलता हो उसे देशप्रेम का मौका तो अवश्य  मिलना चाहिए। हांलाकि हिन्दी वाले जरा ढिल्लू किस्म के हैं। उनके पास जरा सा तो काम है कि देशप्रेमी बना दो, कोई बहुत प्रतिभाशाली मिल जाए तो अपने जैसा गुरूजी (शिक्षक ) बना दो, लेकिन वह भी हम से नहीं होता। सितंबर के महीने में देश भर में हिन्दी के लड्डू बंटवाए जाते हैं। सरकार के हाथ में लड्डू के अलावा कुछ होता भी नहीं है। साल में एक बार हिन्दी का लड्डू नीचे तक पहुंच जाए बस यही प्रयास होता है।

                         पंडिजी की चिंता यह है कि तमाम हिन्दी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होती जा रही है। गली गली में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल ऐसे खुल रहे हैं जैसे मोहल्ले के चेहरे पर चेचक के निशान हों। वे इस कल्पना से ही पगलाने लगते हैं कि क्या होगा अगर सारे बच्चे अंग्रेजी पढ़े निकलने लगेंगे। देश हुकूमत करने वालों से भर जाएगा तो कितनी दिककत होगी। आखिर राज करने के लिए रियाया भी चाहिए होगी। हिन्दी नहीं होगी तो प्रजा कहां से आएगी। राजाओं के लिए प्रजा और प्रजा के अस्तित्व के लिए हिन्दी को प्रेम  करना जरूरी है। सरकार में मंतरी से संतरी तक इतने सारे हिन्दी प्रेमी भरे पड़े हैं कि पूछो मत। लेकिन एक भी आदमी आपको ऐसा नहीं मिलेगा जो अपने बच्चों को मंहगे अंग्रेजी स्कूल में न पढ़ा रहा हो। ये त्याग है देश के लिए। सरकारी नौकर जनता का सेवक होता है। जनता मालिक है,  मालिक ही बनी रहे, ठाठ से अपनी सरकार चुने और ठप्पे से राज करे हिन्दी में।

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सोमवार, 29 सितंबर 2025

लव-लुहान समय में


 




 

जी हाँ आप ठीक समझ रहे हैं, अपना देश सिनेमा प्रधान है और बच्चा बच्चा लव-लंगूर । बजट छोटा हो या कि बड़ा, हीरो- हीरोइन लवलुहान होने का ही पैसा लेते हैं। सिनेमा के हिसाब से देखें तो देश में लव के आलावा कुछ होता ही नहीं है। किताबें उठाएंगे तो ज्यादातर में लव रिसता मिलेगा। धार्मिक किताबों में तो इतना लव है कि पढ़ने वाला प्रेमी हो पड़े। लेकिन ट्विस्ट ये है कि आप लव पढ़ सकते हैं, परदे पर देख सकते हैं लेकिन कर नहीं सकते हैं। किसीको भी करो, लव करते ही बवाल मच जाता है। मान्यता है कि भक्त टाइप आदमी लव नहीं करते हैं। और सच्चा भक्त वह होता है जो दूसरे को भी लव नहीं करने दे। लव करने से समाज कमजोर होता है और अपने लक्ष्य से भटक जाता है। 

‘वे’ बहुत बड़े वाले ‘वे’ हैं । आज ‘वे’ लव के वायरस से बचाव की समझाइश दें रहे हैं -- "देखिये नौजवानों ये समय बहुत चुनौती भरा है। नई पीढ़ी को पता होना चाहिए कि विकास पथ पर दौड़ रहे समाज के लिए  लव सबसे बड़ी बाधा है। लव के कारण देश और धरम खतरे में है। आप जानते ही हो लव अंधा होता है, वह विवेक हर लेता है। लोग धरम देखते हैं न जाति, न छोटा बड़ा देखते हैं न ऊँच नीच बस लव करने लगते हैं। लव से हजारों साल से चला आ रहा सिस्टम खराब हो रहा है। इसलिए कसम खाओ कि खुद लव नहीं करोगे और किसीको करने भी नहीं दोगे। इस पवित्र भूमि पर कोई लव नहीं करेगा। और तो और अपने भगवान, खुदा, गॉड जो भी हैं उनको भी लव नहीं करना है। इनकी पूजा की जाती है, इनसे प्रार्थना की जाती है, लव नहीं किया जाता। पूजा करने से माहौल बनता है और लव करने से बिगड़ता है। हमें माहौल होना बस। माहौल बनने से ही बात बनती है, सरकार भी बनती है। कुर्सी का खेल बच्चों का खेल नहीं है। औघड़ श्मशान जगाता है तब उसे शक्ति मिलती है। वह लव करता तो एक बीवी और चार बच्चों के सिवा और क्या मिलता उसे! इसलिए लव नहीं करना। यह हिदायत है गांठ बांध लो और माहौल पर फोकस करो। माहौल के लिए कुछ भी करना पड़े वह करो सिवाय लव के। "

प्रधानजी बड़ी जिम्मेदारी के साथ मौजूद हैं और पाठ पढ़ा रहे हैं। लव को समाज से पूरी तरह खत्म करने का बीड़ा उन्होंने उठाया है। वे मानते हैं कि समाज के पतन का कारण लव है। एक बार देश लवहीन हो जाए तो उनकी टीम चैन की सांस ले। उनके सत्ता में आने के बाद भी लोग अगर लवलीन हैं तो शरम की बात है। वे बड़ा लक्ष्य ले कर चल रहे हैं और उन्हें सफलता भी मिल रही है। किसी शायर ने कहा है "मैं अकेला ही चला था जानिब ए मंजिल, लोग जुड़ते गए कारवाँ बनता गया "। 

 इधर आई लव फलाँ से लेकर आई लव ढ़िकाँ तक के ढ़ोल बज रहे हैं। अरे भई सब अपने अपने वाले को लव करें तो किसी को क्या दिक्कत हो सकती है! कल को कोई आकर आपका दरवाजा पीटने लगे कि तुम अपने बाप से लव करते हो यह बंद करो।  तुम अपने बाप को इसलिए लव नहीं कर सकते क्योंकि मैं अपने बाप को लव करता हूँ। एक मोहल्ले में दो बाप लवर नहीं हो सकते क्या!! तो मुद्दा लव का है लेकिन लोग नफरत और गुस्से से भरे हुए हैं। पुलिस तो लव के नाम से वैसे ही भड़कती है। इसलिए मौका मिलते ही वह लव लफंगों को अच्छी तरह बजा रही है। असलियत जानने वाले मानते हैं की यहां लव का मतलब लव नहीं पॉलिटिक्स है। ऊपर वाला भी जानता है की लव-अव कुछ नहीं है, बस माहौल बिगाड़ा जा रहा है। दावे किए जा रहे हैं कि तेरे लव से मेरा लव बड़ा है। लव नहीं हुआ टीवीतोड़ किरकिट मैच हो गया! हम करेंगे पर तुझे नहीं करने देंगे चाहे सब लवलुहान क्यों न हो जाएं ।

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रविवार, 28 सितंबर 2025

गधे का मांस


 






 पूजा कराने वाले आदमी ने विधि विधान से सारी क्रिया की।

 अंत में वह भोजन की थाली पर बैठे। भोजन परोसा गया।

 पूजा कराने वाले आदमी ने कहा -- अरे यह क्या है!?!

" गधे का मांस है महाराज, भोग लगाइए।" जजमान ने कहा। 

" गधे का मांस!! मैं गधे का मांस नहीं खाता।"

" हमारी परम्परा है। हमने तो यही पकाया है महाराज। " 

" आपको विकल्प भी रखना चाहिए था, विकल्प जरूरी है। "

" विकल्प तो नहीं है महाराज,  आप कृपा कर भोग लगाइए। "

" अबे विकल्प नहीं होगा तो क्या हम गधे का मांस खा लेंगे!!!" 

" विकल्प नहीं होने के नाम पर भी लोग जो सामने पड़ा है उसे ही खाते रहते हैं महाराज। आप  भी खाइए। "

" हम मूर्ख नहीं हैं जजमान।" 

" मजबूरी है महाराज । " जजमान ने हाथ जोड़े।

" बकरे का नहीं है क्या? " 

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बाहर गाँधी, भीतर रावण


 



 

"ना ना ना... ऐसा नहीं हैं कि चुनाव के टाइम पर ही हम गाँधी को आगे रखते हैं । जब भी जनता के सामने जाना होता है तो गाँधी का मुखौटा लगाए रखने का राजनीतिक शिष्टाचार हैं। इसमें छुपाने का कुछ नहीं है। अब तो किसी को शरम भी नहीं आती है। लोग भी मानने लगे हैं कि जब वोट मांगने आया है तो उप्पर से हाथ जोड़गा और चेहरे से जानीवाकर भी लगेगा ही । " नेता ने अपने को गाँधीवादी बताने ले लिए सच बोलने का रास्ता पकड़ा ।

" और रावण ! ... वो किधर है ? "

" रावण जी तो नस नस में हैं । उनका कोई मुखौटा थोड़ी लगाएगा !! देश अपने गौरवशाली अतीत की ओर उम्मीद से देख रहा है । ऐसे में बिना रावण हुए कोई नेता बन  सकता हैं क्या ? नेता के अंदर रावण रॉ-मटेरियल की तरह है और गाँधी पोस्टर मटेरियल। जिसमें रावण है वही राजनीति में आगे जाता है । ये बात आप मानते हो कि नहीं ? " 

" मानेंगे क्यों नहीं ! आप सरकार हैं, आपके झूठ पर कोई सवाल नहीं कर सकता है, फिर ये तो सच बोल रहे हैं आप । ... अच्छा रावण में क्या पसंद हैं आपको? " 

" ये पूछिए क्या पसंद नहीं हैं। दस सिर, दस मुँह, बीस आँखें, बीस कान !! इतना जिसके पास हो वो आज की राजनीति में गैंडे से कम नहीं है । " 

" एक मिनिट, गैंडा तो जानवर होता है ना ?!" 

"तो क्या हममे आप में जान नहीं है !! जिसमें भी जान होती है वो जानवर होता है। आप भी किसी गलतफहमी में मत रहो, जानवर ही हो । " उन्होंने ऐसे कहा मानों जीवविज्ञान का कोई बड़ा सिद्धांत उद्घाटित कर दिया हो ।

"जी सहमत हैं , ठीक कह रहे हैं। ... रावण को लेकर कुछ बता रहे थे।" 

"देखो ऐसा है, जिसको दस मुँह मिल जाएं वो राजनीति में मीर है आज की डेट में। एक मुँह को वादों की मशीनगन बना दो और दूसरे को वादों से मुकरने की तोप । तीसरा मुँह बढ़िया झूठ बोले और चौथा मस्त बेशरमी से दाँत दिखाए । आजकल रोने का ट्रेंड भी है राजनीति में सो पाँचवा वक्त जरूरत रोता रहे, छठ्ठा ठठा कर हँसने का काम सम्हाले । सातवाँ बच्चे देखते ही लाड़ जताए और आठवाँ भीड़ देखते ही भाइयों और बहनों बोले । नौवा मतलब के लोगों से यारी करे और दसवाँ अपने पुरखों को आँखें दिखाए । हो गए सब बीजी । रावण के तो दस ही थे, दस और होते तो वापर लेते सबको ।"

“इस बार गांधीजी जयंती और दशहरा एक ही दिन हैं । दिक्कत तो होने वाली है ।”

“कोई दिक्कत नहीं होगी । व्यवस्था ऐसी रखेंगे कि दोनों में कोई टकराहट नहीं होगी ।... देखिए शराब की दुकानों का बाहरी शटर बकायदे बंद रहेगा, जनभावना और परंपरा को देखते हुए पीछे की खिड़की खुली रखी जाएगी । माँस की दुकानों पर इससे अच्छी व्यवस्था रहेगी । उस दिन बारह बजे तक कोई हिंसा नहीं होगी । उसके बाद जीवों को मुक्ति और मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ाया जाएगा । ... मीडिया से हो ना ?”

“जी हाँ ।“

“तो जाओ फटाफट, चलाओ ब्रेकिंग न्यूज ।“

 

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