बंगले के बाहर जहां नेमप्लेट वगैरह
लगी होती है, एक छोटा सा विज्ञापननुमा बोर्ड
लगा था “कोपभवन सुविधा उपलब्ध है “ ।
माया प्रसाद इसे देख कर ठिठक गए । बात को
समझने के लिए कालबेल बजाई । मालिक मकान भण्डारी प्रकट हुए और बोले मैं एडवोकेट
भण्डारी हूँ, कहिए । मायाप्रसाद ने देखा कि नेमप्लेट पर उनके
भण्डारी और एडवोकेट होने की सूचना है पर कोपभवन के आगे उस पर ध्यान ही नहीं गया ।
“जी मैं कोपभवन के बारे में ......
“
“अभी तो खाली नहीं है । “ उन्होने
टका सा जवाब दिया ।
“जानना चाहता हूँ, क्या है कोपभवन में... किसे देते हैं । “
“देखिये, ऐसा है कि महीने में एक दो बार कुपित होने के ऐसे मौके आ जाते हैं जब
पुरुषों को, खास कर पतियों को एकांत की जरूरत पड़ जाया करती
है । .... इसलिए यह सुविधा बनाई गयी है । “
“पुरुषों को !! ... स्त्रियों को भी
तो कुपित होने का जन्मसिद्ध अधिकार है । उन्हें नहीं देते हैं क्या ?”
“स्त्रियों की बात अलग है । वे जब
कुपित होती हैं तो पूरे घर को कोपभवन बना सकती हैं । यह योग्यता और क्षमता पुरुषों
में नहीं है । वे मुंह फुलाए ड्राइंग रूम में बैठें या बेडरूम में पड़े रहें, न कोई पूछता है और न किसी को कोई
फर्क पड़ता है । अक्सर झक मार कर उसे ही आपना ‘राम नाम सत’ करना पड़ता है । अगर वे अपना मारक और निर्णायक समय हमारे कोपभवन में
बिताएँ तो न केवल उनका मान बचा रहेगा बल्कि उनकी सम्मानजनक घर वापसी भी होती है ।
एक फायदा यह भी होता है कि दूसरी बार अपमानजनक स्थिति जल्दी नहीं आती है । ‘सामने वाली पार्टी’ सुबह शाम की मोर्चाबंदी में थोड़ी
ढ़ील देने लगती है ।
“मैं तो वरांडे में बैठ जाता हूँ और
आते जाते लोगों को देखता रहता हूँ । मेरा तो टाइम पास हो जाता है मजे में । “
“आपका टाइम पास हो जाता है लेकिन ‘सामने वाली पार्टी’ क्या करती है ये सोचा है ? दरअसल होता यह है कि किसी असहमति या अपमान के चलते जब आप रूठे बैठे हैं
तो ‘सामने वाली पार्टी’ इसका मजा लेने
लगती है । वो समझौता वार्ता के लिए कोई पहल नहीं कर के आग में घी डालने का काम
करती रहती है । आपको धीमी आंच में लगातार इतना पकाती है कि आपका बोनमेरो तक अपनी
जगह छोड़ने लगता है । कोपभवन इस अपमानजनक स्थिति से आपको बचाता है । सही बात तो यह
है कि हम इस जटिल एकांत को गरिमा प्रदान करते हैं । “
“भण्डारी जी, यह जो आप मर्द-मान की रक्षा कर रहे हैं, सचमुच
अद्भुत है । लेकिन एक कमरे में एकांत काटना कितना मुश्किल होता होगा ! अगर कोई
मनाने नहीं आया तो बेचारा कूद कर जान दे देगा ! कौन सी मंजिल पर है आपका कोपभवन ?”
“तीसरी मंजिल पर । लेकिन ऐसा होगा
नहीं जैसा आप सोच रहे हैं, क्योंकि इसके लिए
हिम्मत चाहिए, यू नो वो बेचारा पीड़ित,
प्रताड़ित ‘पति’ होता है । उसमें किसी
किस्म की हिम्मत नहीं होती है ।“
“फिर भी एक कमरे में बंद उसका मनोबल
टूट जाएगा । “
“यहाँ आने वाले को लगता है कि उसके
स्वाभिमान की रक्षा हो गई है, सो निराशा तो
समझिए कि पूरी समाप्त हो जाती है । रहा सुविधा का सवाल तो सब दिया जाता है । रूम
अटैच्ड टाइलेट है, बेड विथ बत्तीस ईंची टीवी है, फ्रिज विथ सोडा-विस्की है, सीडी प्लेयर और दो सौ
अच्छी बुरी फिल्मों की लाइब्रेरी है । अखबार, पत्रिकाएँ और
किताबें भी हैं । फ्री वाइफाइ भी है । सबसे बड़ी बात आज़ादी है कुछ भी करने या न
करने की । और क्या चाहिए आदमी को !?
--------
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें