शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

कुछ भी हो जाए जागने का नहीं


 



नाम, उम्र, शिक्षा, जाति वगैरह लिखने के बाद जनगणना अधिकारी ने पूछा  – “ आप सोये हुए हैं या जागे हुए हैं ?”

“जी मैं रात में ही सोता हूँ ।” भाऊ के कहा ।  

“रात से आपका क्या मतलब है ?“

“रात यानी रात ! रोज होती है । आप नहीं जानते हैं कि रात क्या होती है ?!”

“देखिए हम सरकारी नौकर हैं और इस समय ड्यूटी पर हैं । हम जानते हैं लेकिन नहीं जानते हैं, हम सोचते हैं लेकिन नहीं सोचते हैं, हम नहीं मानते हैं लेकिन मानते हैं, हम दो पाए हैं लेकिन नहीं भी हैं । आपको ही बताना पड़ेगा कि रात क्या है ?”

“जब चारों ओर अंधेरा हो, चूल्हे ठंडे और रसोईघर बंद हो, नौजवान नशे में लुढ़के पड़े हों, जब मोबाइल पर ‘बच्चे चार अच्छे’ के मैसेज आ रहे हों, जब सारा देश सो रहा हो, सिर्फ सरकार और उसकी मंडली जाग रही हो । तो समझिए कि रात  है ।“

“क्या ये इसी देश की रात है !?”

“जी आपने अभी कहा ना कि हम जानते है लेकिन नहीं जानते हैं ।“

“अच्छा ! तो आप रात में सो जाते है ?” क्या आपके घर में सब सो जाते हैं ?”

“हाँ, पूरा मोहल्ला सो जाता है इसलिए हम भी सो जाते हैं । जब सब सो रहे हों तो अकेले जागने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है ।“ भाऊ ने कारण सहित जवाब दिया ।

“इसका मतलब सबको नींद आ जाती है । सब सुखी हैं । यह नया स्टार्ट-अप है । “

“सुख-वुख कुछ नहीं, आँखें बंद करके पड़े रहो तो नींद भी आ ही जाती है ।“

“आपको जान कर खुशी होगी कि जल्द ही निंद्रा सुख-टेक्स लगाया जा सकता है ।“ 

“निंद्रा सुख-टेक्स क्यों !?”

“सरकार का काम है टेक्स लगाना । आपको लाडले-भाऊ टेक्स-पेयर भी बनाना है ।“

“मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं सो रहा हूँ या जाग रहा हूँ !! “

“आप सो रहे हैं । आँख खुली होने से केवल आँख खुली होती है । तमाम देश भक्त आँख खुली रखते है लेकिन असल में सोये हुए होते हैं । आप भी देश भक्त हो ।“

“अगर मैं इस बात से इंकार करूँ तो ?”  भाऊ डर सा गया ।

“अपनी रिस्क पर आप कुछ भी कर सकते हैं । (ईश्वर आपकी रक्षा करे )।“

सच बात यह है कि भाऊ ने लगातार इतना ‘जागो जागो’ सुन लिया कि अब जागना जोखिम का हो गया है । उसे जगाने वालों का षड्यन्त्र समझ में आ गया है । वो जागने को कहते हैं लेकिन चाहते हैं कि लोग आँखे बंद रखें । अधिकारी ठीक कह रहे हैं । हर बात में रिस्क दिखाई देती है । दस ग्राम सोना दो लाख तक पहुँच गया, भाऊ जरा सा चौंका और फिर सो गया । सोने के भाव से उसे क्या मतलब ! शंकराचार्य ने आवाज लगाई ‘आओ बचाओ’ । उसने एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया । शंकराचार्य से उसे क्या लेना देना ! बनारस के घाट पर तोड़फोड़ हुई वह नहीं जागा । अपुन को क्या ! चित्रकूट के मंदिर पर बुलडोजरों ने सेवा की, वह सोया रहा । अब भगवान ही निबटें । मलमूत्र वाला पानी पी कर तमाम लोग मर गए, भाऊ आँखें बंद किये लेटा रहा । सोचा ‘आया है सो जाएगा, राजा रंक फकीर’ ... । मानो उसने तय कर लिया है कि कुछ भी हो जाए वह नहीं जागेगा ।

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रविवार, 25 जनवरी 2026

पार्क में जिम्मेदार बकरियाँ






जिम्मेदारी इन दिनों एक छूत की बीमारी है। जो लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं, वे प्रायः ठीक नहीं हो पाते हैं । डॉक्टरनुमा लोगों का मत है कि जिम्मेदारों को पकड़कर 'जिम्मेदार-खाने' में बंद कर देना चाहिए। लेकिन दिक्कत यह है कि देश में पागलखाने तो बहुत हैं, पर जिम्मेदार-खाने अभी तक बने नहीं हैं। डर यह है कि मौजूदा जिम्मेदार, दूसरे भले-चंगे लोगों में भी इन्फेक्शन फैला रहे हैं। अभी तक जिम्मेदारी की कोई वैक्सीन भी नहीं बन पाई है। गली-गली में जिम्मेदारी के 'मरीज' घूरते मिल रहे हैं। ज्यादातर तो देश और धर्म की जिम्मेदारी से पीड़ित हैं । बूढ़े कंधों पर चूल्हे की आग का दायित्व है; वे गृहस्थी में पहले से ज्यादा खट रहे हैं। मेराज फैजाबादी ने लिखा है- मुझको थकने नहीं देता यह ज़रूरतों का पहाड़, मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते । जिम्मेदारों का दर्शन है ‘हमसे है जमाना, जमाने से हम नहीं।' वे जानते हैं दुनिया में आदमी मात्र चार दिनों के लिए आता है, सो काम-धंधे में कुछ नहीं रखा है । मैं बाप का, दादा का, परदादा का, लकड़ दादा का, सब का बदल लेगा । संत कहते हैंसंसार मिथ्या है, सो इसको तोड़ो मरोड़ पावडर बना डालो कोई फर्क नहीं पड़ेगा । परिस्थितियाँ कैसी भी हों, मनमानी का मजा कुछ और है।अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम...पीछे क्यों रहें मस्तराम । मालवा की माटी में तो गजब की मस्ती है। आदमी दाल-बाटी खाकर 'कुंभकरण' का सगा भाई हो जाता है। भगवान ने मालवी आदमी का 'डिजाइन' ही ऐसा बनाया है कि डटकर खा ले और मस्त फैल जाए। ऐसे में जिम्मेदारी पास फटकती ही नहीं; अगर पहले से सिर चढ़ी हो, तो फौरन रफा-दफा हो जाती है।

अब मुझे ही लीजिए, मुझे खुद नहीं पता कि भर भर के टेक्स देने के अलावा मेरी जिम्मेदारी क्या है। महंगाई कम हो या ज्यादा, इसमें मेरा क्या जोर? रुपया गिर रहा है तो मैं क्या कर सकता हूँ ! लाठी लेकर उसे सहारा देने तो जाऊंगा नहीं ! वैसे तो मेरी कोई खास गरिमा नहीं है लेकिन रुपया जब गिरता है तो मेरी जरा सी भी गरिमा नहीं गिरती है । सुना है रुपये के गिरने से अब किसी कि गरिमा नहीं गिरती है । जानकार बताते हैं कि अब गरिमा कहीं बची ही नहीं है । मैं तो जेब में गांधीजी वाला रुपया लेकर चलता हूं, डॉलर नहीं। सच तो यह है कि मैंने डॉलर देखा तक नहीं है । अगर वह चढ़ता है तो चढ़ जाए, अपने गाँधी का क्या जाता है? देखो भाई, अपन तो 'संख्या' को जानते हैं और लोकतंत्र को आत्मा में बसा रखा है। इधर एक डॉलर, उधर नब्बे रुपए। लोकतंत्र के हिसाब से बताइए कौन बड़ा है? एक या नब्बे! जिसकी संख्या भारी, उसकी जीत पक्की। अब बात को ज्यादा साफ करने की जरूरत नहीं, आपकी समझ पर मुझे यकीन है।

गणपत राव के बेटे की शादी नहीं हो पा रही है। कल वह पीछे पड़ गए— 'करवाओ यार!' हमने कहाकोशिश करेंगे, लेकिन हमारी जिम्मेदारी नहीं है। वह बोलेजिम्मेदारी की चिंता मत करो, आजकल यह किसी की नहीं है। बेटे मां-बाप के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, नेता जनता के लिए नहीं, डॉक्टर मरीज के लिए नहीं और भगवान अंधभक्तों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। आजकल तो लोग बिना शादी के, यानी बिना जिम्मेदारी के जीना पसंद करते हैं। दिक्कत यह है कि औरत के बिना जिंदगी कितनी सुकून भरी है, यह आदमी को शादी के बाद ही समझ आता है। सब कुछ लूट के होश में आए तो क्या किया ! हरकोई  इतना हिम्मतवाला भी नहीं होता है । मेरी शादी को चालीस साल होने वाले हैं। 'कैद में है बुलबुल और सैयाद मुस्कुराए।' चौदह साल में तो हत्यारों की सजा पूरी हो जाती है और वे शान से बाहर आ जाते हैं, पर हमारे लिए कोई 'पैरोल' की व्यवस्था तक नहीं है ।

गणपत अपने बेटों के रोजगार के लिए भी सबको घूरता रहता है। कहता है जनता मालिक है, सरकार बनाती है । देश में बेरोजगारी का जो माहौल है उसके लिए जनता जिम्मेदार है ! उसके तीनों बेटे उसे फटकारते हैं— 'हमें पैदा ही क्यों किया?' बेरोजगारी की जिम्मेदारी अब पैदाइश तक जा पहुंची है। आजकल बच्चे बात बात पर जन दे देते हैं । गणपत को डर है कि कहीं लड़के आत्महत्या न कर लें। अगर कर ली, तो जिम्मेदारी किसकी? सरकार दो लाख का मुआवजा देगी, लेकिन जिम्मेदारी का क्या? गणपत के तीन लड़के हैं, मतलब कुल छह लाख के हाथी । जिम्मेदारों के पास नौकरी नहीं है, चेक है; वह लेकर दफा हो जाओ। आखिर कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है।

इधर एक सार्वजनिक उद्यान है नेहरू पार्क। लाठीधारी कुछ बंदे पूरी जिम्मेदारी के साथ वहां बकरियां छोड़ देते हैं। जवाब यह है कि नेहरू पार्क को अब 'गांधी पार्क' बनाया जाएगा, इसलिए बकरियां जरूरी हैं। सेकुलर बकरियां दिन भर अपना 'काम' करती हैं। महीने भर में ही फूलों के पौधे 'लेंडियों' में बदल गए। महकने वाला बाग बदबू मारने लगा। चलिए, एक और जिम्मेदारी पूरी हुई ! मजबूत इरादे से काम करो तो अंजाम तक पहुँचता ही है। बस मीडिया में खबर नहीं आई, क्योंकि बाजार की भी अपनी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं।

पार्क में सुबह-शाम कुछ बूढ़े अपने दुखडों के साथ आते हैं। बकरियों के काम में हस्तक्षेप करने की अपेक्षा उन्हें 'गांधी चर्चा' में लग जाना सुरक्षित लगता है । गांधी को याद करो तो सहनशीलता बढ़ ही जाती है। इन बूढ़ों को आश्चर्य है कि बकरी के पेट में फूल-पत्ती जाकर 'लेंडी' कैसे बन जाती है? ईश्वर चमत्कारी है कुछ भी बना सकता है । आजकल लोग गोबर खा रहे हैं, अगर जिम्मेदारों के ध्यान में यह बात लाई जाए तो यह 'सम्मान' बकरी की लेंडियों को भी मिल सकता है।

 एक जमाना था जब बाप की जूती बेटे के पैर में आने पर उसे जिम्मेदार मान लिया जाता था। तब बुजुर्गों के लिए घर में आंगन और तखत की व्यवस्था होती थी । अब जमाना बदल गया है। ज्यादातर बूढ़े 'शरशय्या' पर लेटे सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में होते हैं। पेंशनिया बूढ़ों को नवंबर आते ही धूल झाड़कर खड़ा होना होता है। उनके लिए यही एक जिम्मेदारी बची होती है । इसमें लापरवाही न घर वाले सहते हैं, न बाहर वाले। बात उनकी भी जो जिम्मेदारी की जंग से दूर हैं । वे क्या तो करें कि तस्वीर बदले । वे भी मुट्ठीभर दिन ले कर आए हैं । कैफ़ी आजमी कहते हैं – “कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले उस इंकलाब का, जो आज तक उधार सा है” ।

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आलस्य एक दिव्य गुण

 






 

आलसी आदमी भी दूसरे तमाम प्राणियों की तरह जीवित शरीर होते हैं । फर्क केवल उनके जिंदा रहने के तरीके में देखा जा सकता है। जहाँ आम लोग जीने के लिए भागते दौड़ते, खटते रहते हैं वहीं आलसी लीक से हट कर एक मिसाल पैदा करते हैं । वे जरूरी / गैरजरूरी किसी भी तरह की हलन चलन के विरुद्ध क्रांति संदेश देते हुए समाज को आराम की दिशा देते हैं । आलसीजी मानते हैं कि बैठे रहकर या पड़े रहकर भी मस्त जीवन जिया जा सकता है। आलस्य एक तरह का दिव्य गुण है । शेषनाग पर भगवान भी तो सदा सदा लेटायमान रहते हैं । आलसी अपने को ईश्वर का सच्चा पुत्र मानता है। काम या परिश्रम करके वह पालनहार परमपिता की महिमा पर बट्टा नहीं लगाना चाहता है। वह आलस्य के आनंद रस में इतना पगा होता है कि उसे निष्क्रिय जीवन वरदान लगता है । वह सर्वज्ञानी होता है । उसे नया पुराना कुछ भी करने या सीखने की जरूरत महसूस नहीं होती है। असल में वह बंद गोदाम के आखिरी कोने में सहेजा हुआ बुद्धिजीवी होता है। उसे अच्छी तरह से पता है कि जीवन चार दिनों का है, ओन्ली फॉर फ़ोर डेज़, यू नो ! ना यहां कुछ लेकर आए थे ना यहां से कुछ लेकर जाएंगे। यह दुनिया मुफ़्त सराय है जिसमें आलसी खाते पीते, आराम करते हैं और चले जाते हैं। पचास प्रतिशत दानों पर आलसियों का नाम भी लिखा होता है । वक्त से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी बिके हुए न्यायाधीश को भी नहीं मिलता है। लीडर करे न चाकरी मंत्री करे ना काम; संत सर्टिफाइड कहें सबको देता राम । ऐसे में बिना बात हाड़ तोड़ने का कोई मतलब नहीं है। बैल दिन भर काम करते हैं और बैल ही बने रहते हैं, घोड़ा नहीं हो जाते हैं। आलसी मानता है कि हमसे पहले हजारों परिश्रमी आए और तमाम काम करके चले गए लेकिन कोई उन्हें नहीं जानता। पिछले दिनों एक जिम्मेदार नेता ने बताया कि गाँधी जी तक को कोई नहीं जानता था । वो तो एटनबरो ने फिल्म बनाई तब कहीं जा कर दुनिया को पता पड़ा । इसीलिए भगवान कहते हैं कि तू मेरा हो जा और अपनी चिंताएं मुझ पर छोड़ कर सो जा । बताइए क्या आज के समय में भगवान पर विश्वास करना गलत है!? नहीं नहीं, बोलिए, गलत है तो कहिये जरा ।

एक बात और, जो लोग काम करते हैं उनसे जाने अनजाने में कानून टूटता ही है। आलसी कानून के सम्मान के लिए भी काम नहीं करता है। न रहे बांस न बजे बंसी । उसे किसी नेता या सरकार से कोई शिकायत नहीं है। कोउ साला नृप होए हमै का हानि । इसलिए वोट देकर विरोध या समर्थन दर्ज कराने की उसे कभी जरूरत महसूस नहीं हुई। ऐसा नहीं है कि आलसी कुछ सोचता विचारता नहीं है। मतदान वाले दिन सुबह से सोचता है कि वोट दूं या नहीं दूँ, नहीं दूं या दे ही दूं। किसी निर्णय पर पहुंचने से पहले शाम हो जाती है और वह भगवान को धन्यवाद कहकर वापस लुढ़क जाता है।                  

जब आप रुचि से इतना पढ़ चुके हैं तो यह भी जान लीजिए कि जन्मजात आलसी साउण्ड प्रूफ होते हैं। लोगों के कहने सुनने को, तानों को एक कान से सुनकर दूसरे कान से ‘सट्ट से’ निकाल देते हैं। इसी गुण के कारण लोग उन्हें सरकार तक कह देते हैं लेकिन इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है । कुछ आलसी संत टाइप होते हैं। वे मानते हैं कि कर्म छोड़ा है सांसारिक सुख नहीं । कुछ आलसी मौका परस्त भी होते हैं जो वक्त जरूरत और अवसर देखकर अलसाते हैं। जैसे आज संडे है तो मस्त पड़े हैं, कुछ करेंगे नहीं । या फिर काम करने वाली (पत्नी)  है आसपास तो वे खुद से साँस ले रहे है यही बड़ा काम है । ससुराल में है तो प्रति घंटा चाय-बिस्किट के बावजूद आलस्य को न टूटने देना उनका जमाई अधिकार है। आलसी प्रायः भाग्यवान होते हैं, कोई काम खुद ही उनके पास नहीं फटकता है । आलसी अचार की बरनियों की तरह कभी धूप में कभी छाँह में रखा होता है । घर-परिवार वाले इस उम्मीद से उसे सम्हाले रहते हैं कि कभी कुछ नहीं होगा तो काम आएगा । मीर लिखते हैं – “आरजुएँ  हजार रखते हैं, तो भी हम दिल को मार रखते हैं “ ।

 

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अंग्रेज बड़े दुष्ट थे !!


 


 राजनीति की दुनिया में बड़े-बड़े रहस्य छुपे हुए हैं। हम में से बहुत से लोग नहीं जानते कि अंग्रेज बड़े दुष्ट थे। व्यापारी बनकर आए थे और हुकूमत करने लगे। जब सत्ता उनके हाथ में आ गई तो उन्होंने लूट का नाम बदल कर व्यापार कर दिया । भारत का वैभव उन्हें सोने की खदान के समान दिखा तो लंबे समय तक खुदाई का इरादा हो गया। देश में मतभेदों की, ऊँच- नीच की, जाति- धर्म की नफरत की फसल लहलहा रही थी। उन्होंने लोगों में पल रही नफरत को और बड़ा किया। एक धरम के लोग दूसरे से दुश्मनी पालने लगे। लोगों को बताया गया कि उनका धरम खतरे में है । सभी धर्म वालों को उन्होंने गुपचुप मदद की। कान में फुसफुसा कर हर एक को दूसरे से अच्छा और श्रेष्ठ कहा। धरम के लोग मूर्ख बनते रहे । यही नीति जातियों को लेकर भी रही। पूरा समाज बँटते बँटते उनके सामने भेड़ बकरी की तरह हो गया। उन्होंने पुलिस बनाई, लेकिन जनता को डराने के लिए ।  अंग्रेज अपनी मर्जी से इस विशाल देश को हाँकने लगे। अंग्रेज बड़े चालाक थे। अंग्रेज जानते थे कि जब पेट खाली हो तो जनता को भव्य आयोजनों और भविष्य के सपनों में उलझा देना चाहिए ।

  राजनीति में समाज को सिर्फ बांटने लड़ाने से ही काम नहीं चलता है। कलाई खुल जाने का डर भी होता है । कुछ अच्छे काम भी इसलिए करना होते हैं कि लगे सरकार विकास करना चाहती है। अंग्रेज भेड़िये थे लेकिन उन्होंने बहुत से अच्छे काम भी किये, या यह कहना ठीक होगा कि करना पड़े । सड़के नहीं थी तो सड़के बनवाई। रेलवे शुरू की, डाक व्यवस्था बनाई, स्कूल बनाए, अस्पताल भी बनाए । कुछ अच्छे कामों का परिणाम यह हुआ कि एक दूसरे से नफरत करने वाला समाज अंग्रेजों को महान मानने लगा। लेकिन बहुत से लोग अंग्रेजों की इस चालाकी को समझ रहे थे। वे जब भी मौका मिलता सरकार की आलोचना करते और बताते कि अंग्रेज बगुला भगत हैं । अंग्रेजों ने आलोचना को राजद्रोह घोषित किया और कइयों को लाठी से पिटवा कर मरवा दिया। सरकार के खिलाफ बोलने वालों को जेल में डाल देना आम बात थी। अंग्रेज बड़े लोमड़ थे। उन्होंने देखा कि दलित और आदिवासियों की बड़ी संख्या है। वे शासन की जरूरत में काम आ सकते थे तो उनके लिए चर्च के दरवाजे, स्कूल के दरवाजे, और सेना के दरवाजे खोल दिये। महिलाओं के लिए भी उन्होंने कुछ काम किये। अंग्रेज बड़े चालू थे । उन्होंने सती प्रथा के खिलाफ कानून बनाया, उन्हें शिक्षित करने का प्रयास किया। अब अंग्रेज महिलाओं दलितों और पिछड़ों के हितैषी हो गए। लेकिन अंदर ही अंदर लोग मानते थे कि अंग्रेज बड़े कमीने हैं। अंग्रेज भी जानते थे कि लोग उन्हें कमीना मानते हैं। लेकिन कुछ वर्षों की सत्ता में वे बड़े ढीठ हो गए थे। शासन करने वालों को आमतौर पर लज्जा नहीं आती है। अंग्रेज अपनी दाढ़ी मूंछ और परिधान पर बहुत ध्यान देते थे। वे बड़ी-बड़ी कोठियों में रहते थे लेकिन उनकी अपनी निजी कोठी नहीं होती थी। वे लूट का माल विदेशों में जमा करके रखते थे ।

        देश में बहुत से राजा नवाब तब भी थे। उन्हें हैंगर की तरह अंग्रेजों ने इस्तेमाल किया। जैसे हैंगर में कपड़े टांगे जाते हैं वैसे ही उन पर बहुत कुछ लाद रखते थे । राजा नवाब भी जानते थे कि अंग्रेज बड़े कमीने हैं, लेकिन वह मजबूर थे। जमीदार, जागीरदार और बुद्धिजीवियों को उन्होंने राय बहादुर और सर जैसी उपाधियाँ देकर अपने पक्ष में किया। पुराना जमाना था उस समय पद्मश्रियाँ नहीं होती थी। पूरा देश अंग्रेजों से नफरत करता था लेकिन अब उनकी ताकत पहले से बढ़ गई थी। सरकार का खजाना खचाखच भरा हुआ था। उनके पास बड़ी सेना और लाखों मुलाजिम थे, और अपने कानून भी। इतने बड़े संगठन के साथ जमी हुई सरकार को हिलाना नामुमकिन था। लेकिन आम राय यही थी कि अंग्रेज बड़े कमीने हैं। अंग्रेजों के प्रति इस धारणा ने धीरे-धीरे अपना काम शुरू किया और देश की गरीब अनपढ़ और संगठित जनता ने एक स्वर में कहा कि अंग्रेजों भारत छोड़ो। इतिहास गवाह है, संघर्ष लंबा चला लेकिन कमीनों को भारत छोड़ना पड़ा। एक बार भागे अंग्रेज फिर कभी सत्ता में नहीं आ सके लेकिन उनका कमीनापन यहीं छूट गया । जय हिन्द ।

 

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