सोमवार, 20 जुलाई 2026

हग, हगिस्ट और हगेरियंस




 





          चुनाव के चार दिन किसी के लिए कुछ भी हों राजनीति वालों के लिए मानो बेटी का ससुराल होता है। जैसे ही कोई व्यक्ति सामने पड़े फ़ट्ट से झुक जाओ, चट्ट से चरण छू लो या फिर बनता हो तो लपक के हग कर लो। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर योग ज्यादा प्रसिद्ध हुआ या हग यह देखने वाली बात है । हग दो तरफा क्रिया होती है इसलिए इज्जत भी रह जाती है। पता ही नहीं पड़ता कि कौन किसको कर रहा है। दोनों सीना भिड़ाए एक दूसरे कि पीठ थपकारते हैं, मानो आशीर्वाद दे रहे हों । दोनों अपना बड़प्पन क्लेम कर लेते हैं। इसलिए जब भी जरूरत महसूस हो तो झपट कर हग करें और ससम्मान खुश रहें। यह चुनाव के समय की स्थिति है। सामान्य वक्तों में बशीर बद्र का कहना सही है -- "कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से ; ये नये मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो। "

माना जाता है कि लोकतंत्र में चुना हुआ व्यक्ति जनता के प्रति जवाबदार होता है लेकिन हकीकत यह है कि वह किसीको जवाब नहीं देता है। अघोषित सूत्र यह है कि जो सबके प्रति जवाबदार हो वह किसी के प्रति जवाबदार नहीं होता। अगर वह ठान ले कि जवाब नहीं देना है तो कोई भले ही अनशन पर बैठ जाए, उसका मुंह नहीं खुलवा सकता है । जनसंख्या जब करोड़ों में हो तो वादे करना चाहिए। पिछले वादों पर नए वादों की धूल डालना आसान होता है। तमाम वादे हों तो लोग भ्रमित रहते हैं। नए वादों के नीचे पुराने वादे दफन हो जाते हैं। धीरे-धीरे जनता वादों और नेताओं से ऊब कर भजन कीर्तन में लग जाती है। धर्म को अफीम भी कहा गया है। अफीम का नशा सात्विक होता है। इसमें आदमी संसार में रह कर भी संसार का नहीं होता है। राजनीति वाले इस बात की गहराई को समझते हैं ।

                  दुनियादारी का ज्ञान रखने वाले हमारे मित्र सरदार पहाड़सिंह एक ही बात कहते हैं कि - ' राजनीति बड़ी कुत्ती-चीज होती है जी '। अवश्य होती होगी, अभी तक किसी शहरी-गैरशहरी कुत्ती-चीज ने आपत्ति दर्ज नहीं करवाई है। आज की राजनीति का ऐसा है कि वह पट्टे और प्राइज टैग वाली होती जा रही है। जिन्हें आपत्ति दर्ज कराना होती है वे अक्सर  दुम हिलाने लग जाते हैं । लोग उनके नक्शेकदम अपनी पार्टियाँ व निष्ठाएँ तक बदलने में देर नहीं करते हैं। वैश्विक राजनीति में भी इसी प्रकार की कुत्ती-अदाएं दिखाई देती है। कौन कब गुर्राने लगेगा, कब किस पर झपट पड़ेगा कुछ कहा जा सकता है ? दुनिया देख रही है कि शांति का पुरस्कार नहीं मिले तो माय-फ्रेंड किस तरह सफ़ेद कबूतर कि गर्दन मरोड़ कर मिसाइल दागने लगता है।

                 असल बात यह है कि दुनिया में शांति कायम रखना है तो बारूद-युद्ध नहीं हग-युद्ध की जरूरी है । जिसने आगे बढ़ कर हग किया उसे फट्ट से  उतना ही हग मिला। सोचिए अमेरिकी और ईरानी लड़ाके दनादन हग करें तो अखबारों की हेडलाइन इत्र से छपने लगेंगी । देसी राजनीतिक संबंधों में भी हग एक शोध का विषय हो सकता है। जो हग के कीड़े हैं वे हग की ताकत जानते हैं।  अपना देसी वाला हग थोड़ा अलग होता है । बाजार को हग का मुनाफा मालूम है। सुन है एक लाफ्टर शो वाला हग हग के अरबपति और नंबर वन हो गया है । समय का संकेत है कि गले पड़ केधंधा करो । कंपटीशन बहुत है। संस्थान सोच रहे हैं कि अब रिसेप्शनिस्ट के साथ-साथ हगीस्ट भी रखना पड़ेंगे । रिसर्च वाले कह रहे हैं कि मेल-फीमेल दोनों हगेरियंस की मांग में जबरदस्त उछाल आने वाला है । बाजार और राजनीति के उसूलों में ज्यादा अंतर नहीं है। धंधों में काम अलग-अलग हो सकता है लेकिन नियत एक ही होती है। तो चलिए, निकलिए बाहर, हग-मार्केट की ओर चलते हैं।

 

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