अचानक रावण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि बहुत हो गया अब 'मैं इस्तीफा दे दूंगा'। इस तरह बार बार जलाया जाना मेरा घोर अपमान है। लोग कैसी कैसी गालियाँ देते हैं, मुझ पर लानतें भेजते हैं, मेरे चित्र को पैरों से रोंदते हैं, थूकते हैं, और तो और कुत्ते भी.... । पुतला हुआ तो क्या मेरे अंदर आत्मा नहीं है!! मर चुका हूँ क्या मैं! क्या मुझमें शर्म नहीं है, लज्जाविहीन समझते हो मुझे!! लुच्चा, लफंगा, गली गली घूमने वाला आवारा हूँ क्या? नहीं नहीं बताओ,... क्या समझते हो, बताओ जरा। मैं बेगैरत नहीं हूँ, अब इस्तीफा दे ही दूंगा। इस तरह चौराहे चौराहे पर खड़ा करके जिसकी जो मर्जी में आता है वो सजा देते हो! मेरे ऊपर जलते पटाखे छोड़ते हो! भूसा भर कर जलाते और खुशियाँ मनाते हो! एक राजा को इस तरह बेइज्जत करना चाहिए क्या!? अगर मैं आप लोगों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पा रहा हूँ तो खुद मुझे डूब मरना चाहिए। आप बताओ मुझे डूब मरना चाहिए कि नहीं चाहिए।... नहीं नहीं आप बताइये कि मुझे डूब के मरना चाहिए या नहीं चाहिए ? कितनी बार सोचा कि आत्महत्या कर लूँ लेकिन लंका का ख्याल आ जाता है। उस पर मेरे भाई कुबेर की आँख लगी हुई है। वह लंका पर कब्जा कर लेगा इसलिए मैंने आत्महत्या का विचार त्याग दिया है मित्रों । लेकिन अब मैं इस्तीफा दे दूंगा, ये मेरा वादा है।
राज्य की जनता को समझ में नहीं आता है। कोई उन्हें भ्रमित करता है और उकसाता है। मैं अकेला राजा नहीं हूँ मेरे दस सिर भी बराबरी के भागीदार हैं। मेरे शारीरिक संगठन में दस मुँह हैं तो जनता को लगता है कि ज्यादा खाता हूँ, पर जाता सब एक ही पेट में है। पेट को भरते रहना दसों मुंहों की सांझी जिम्मेदारी है। ये संस्कार हैं हमारे और मैं संस्कारी इससे मुँह मोड़ नहीं सकता हूँ।
सब जानते हैं कि मेरे मंत्रीमंडल में एक से एक बड़े राक्षस हैं। उनको अगर मैं छुट्टा छोड़ दूँ तो ये लोग मुझे जलाने फूँकने कि मंशा रखने वालों की बोटी बोटी बिखेर कर रख दें। लेकिन मित्रों मेरा दिल बड़ा है। मैं किसी पर अत्याचार नहीं करना चाहता हूँ। मैंने जो भी किया है या जो भी करना पड़ा है वह सब सही है। लेकिन अब पानी मेरे दसों सरों से ऊपर जा चुका है। इसलिए मैं वादा करता हूँ कि इस्तीफा दे दूंगा।
"आपसे किस किस ने इस्तीफा मांगा रावण जी ?" एक पत्रकार ने पूछा।
कोई मांगे या ना मांगे लेकिन मैं इस्तीफा दूंगा, मेरा वादा है मित्रों!! मैं राजा हूँ, मजाक बना रखा है मेरा। मुझे जलाते हो हर साल और कहते हो की बुराई का पुतला हूं। पुतला भी तुम्हीं लोग बनाते हो और चारा भूसा सब भरते हो । तुम ही तय करो बुराई से बनाते हो या अच्छाई से।... अंधे हो क्या? मुझसे बुरा कोई नहीं दिख रहा है आज के संसार में !!!" रावण तैश में बोला।
" आप बुराई का मात्र एक प्रतीक हैं राजा जी । आप हैं तो जलाने की परंपरा चली आ रही है। अच्छा है कि पुतले में निपट गए वरना आप जैसे प्रबुद्ध को आज का संसार नक्सल की कैटेगरी में ही रख सकता है ।... " कोई बोला।
" काहे का प्रबुद्ध! मौके पर काम ना आए तो कैसी बुद्धि। दस सर हों तो एक निर्णय पर पहुंचना कितना कठिन होता है यह मुझे अच्छा कौन जान सकता है।"
"इस्तीफा दे का आप कहाँ जाएंगे राजा जी?"
" वहीं जहाँ कोई... आता जाता नहीं.... अच्छा तो तो हम चलते हैं...
"सर इस्तीफा.... इस्तीफा तो देते जाइये...।"
"दे दूंगा... फिलहाल मेरे वादे से तसल्ली कीजिए।"
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