शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

कुछ भी हो जाए जागने का नहीं


 



नाम, उम्र, शिक्षा, जाति वगैरह लिखने के बाद जनगणना अधिकारी ने पूछा  – “ आप सोये हुए हैं या जागे हुए हैं ?”

“जी मैं रात में ही सोता हूँ ।” भाऊ के कहा ।  

“रात से आपका क्या मतलब है ?“

“रात यानी रात ! रोज होती है । आप नहीं जानते हैं कि रात क्या होती है ?!”

“देखिए हम सरकारी नौकर हैं और इस समय ड्यूटी पर हैं । हम जानते हैं लेकिन नहीं जानते हैं, हम सोचते हैं लेकिन नहीं सोचते हैं, हम नहीं मानते हैं लेकिन मानते हैं, हम दो पाए हैं लेकिन नहीं भी हैं । आपको ही बताना पड़ेगा कि रात क्या है ?”

“जब चारों ओर अंधेरा हो, चूल्हे ठंडे और रसोईघर बंद हो, नौजवान नशे में लुढ़के पड़े हों, जब मोबाइल पर ‘बच्चे चार अच्छे’ के मैसेज आ रहे हों, जब सारा देश सो रहा हो, सिर्फ सरकार और उसकी मंडली जाग रही हो । तो समझिए कि रात  है ।“

“क्या ये इसी देश की रात है !?”

“जी आपने अभी कहा ना कि हम जानते है लेकिन नहीं जानते हैं ।“

“अच्छा ! तो आप रात में सो जाते है ?” क्या आपके घर में सब सो जाते हैं ?”

“हाँ, पूरा मोहल्ला सो जाता है इसलिए हम भी सो जाते हैं । जब सब सो रहे हों तो अकेले जागने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है ।“ भाऊ ने कारण सहित जवाब दिया ।

“इसका मतलब सबको नींद आ जाती है । सब सुखी हैं । यह नया स्टार्ट-अप है । “

“सुख-वुख कुछ नहीं, आँखें बंद करके पड़े रहो तो नींद भी आ ही जाती है ।“

“आपको जान कर खुशी होगी कि जल्द ही निंद्रा सुख-टेक्स लगाया जा सकता है ।“ 

“निंद्रा सुख-टेक्स क्यों !?”

“सरकार का काम है टेक्स लगाना । आपको लाडले-भाऊ टेक्स-पेयर भी बनाना है ।“

“मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं सो रहा हूँ या जाग रहा हूँ !! “

“आप सो रहे हैं । आँख खुली होने से केवल आँख खुली होती है । तमाम देश भक्त आँख खुली रखते है लेकिन असल में सोये हुए होते हैं । आप भी देश भक्त हो ।“

“अगर मैं इस बात से इंकार करूँ तो ?”  भाऊ डर सा गया ।

“अपनी रिस्क पर आप कुछ भी कर सकते हैं । (ईश्वर आपकी रक्षा करे )।“

सच बात यह है कि भाऊ ने लगातार इतना ‘जागो जागो’ सुन लिया कि अब जागना जोखिम का हो गया है । उसे जगाने वालों का षड्यन्त्र समझ में आ गया है । वो जागने को कहते हैं लेकिन चाहते हैं कि लोग आँखे बंद रखें । अधिकारी ठीक कह रहे हैं । हर बात में रिस्क दिखाई देती है । दस ग्राम सोना दो लाख तक पहुँच गया, भाऊ जरा सा चौंका और फिर सो गया । सोने के भाव से उसे क्या मतलब ! शंकराचार्य ने आवाज लगाई ‘आओ बचाओ’ । उसने एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया । शंकराचार्य से उसे क्या लेना देना ! बनारस के घाट पर तोड़फोड़ हुई वह नहीं जागा । अपुन को क्या ! चित्रकूट के मंदिर पर बुलडोजरों ने सेवा की, वह सोया रहा । अब भगवान ही निबटें । मलमूत्र वाला पानी पी कर तमाम लोग मर गए, भाऊ आँखें बंद किये लेटा रहा । सोचा ‘आया है सो जाएगा, राजा रंक फकीर’ ... । मानो उसने तय कर लिया है कि कुछ भी हो जाए वह नहीं जागेगा ।

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रविवार, 25 जनवरी 2026

पार्क में जिम्मेदार बकरियाँ






जिम्मेदारी इन दिनों एक छूत की बीमारी है। जो लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं, वे प्रायः ठीक नहीं हो पाते हैं । डॉक्टरनुमा लोगों का मत है कि जिम्मेदारों को पकड़कर 'जिम्मेदार-खाने' में बंद कर देना चाहिए। लेकिन दिक्कत यह है कि देश में पागलखाने तो बहुत हैं, पर जिम्मेदार-खाने अभी तक बने नहीं हैं। डर यह है कि मौजूदा जिम्मेदार, दूसरे भले-चंगे लोगों में भी इन्फेक्शन फैला रहे हैं। अभी तक जिम्मेदारी की कोई वैक्सीन भी नहीं बन पाई है। गली-गली में जिम्मेदारी के 'मरीज' घूरते मिल रहे हैं। ज्यादातर तो देश और धर्म की जिम्मेदारी से पीड़ित हैं । बूढ़े कंधों पर चूल्हे की आग का दायित्व है; वे गृहस्थी में पहले से ज्यादा खट रहे हैं। मेराज फैजाबादी ने लिखा है- मुझको थकने नहीं देता यह ज़रूरतों का पहाड़, मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते । जिम्मेदारों का दर्शन है ‘हमसे है जमाना, जमाने से हम नहीं।' वे जानते हैं दुनिया में आदमी मात्र चार दिनों के लिए आता है, सो काम-धंधे में कुछ नहीं रखा है । मैं बाप का, दादा का, परदादा का, लकड़ दादा का, सब का बदल लेगा । संत कहते हैंसंसार मिथ्या है, सो इसको तोड़ो मरोड़ पावडर बना डालो कोई फर्क नहीं पड़ेगा । परिस्थितियाँ कैसी भी हों, मनमानी का मजा कुछ और है।अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम...पीछे क्यों रहें मस्तराम । मालवा की माटी में तो गजब की मस्ती है। आदमी दाल-बाटी खाकर 'कुंभकरण' का सगा भाई हो जाता है। भगवान ने मालवी आदमी का 'डिजाइन' ही ऐसा बनाया है कि डटकर खा ले और मस्त फैल जाए। ऐसे में जिम्मेदारी पास फटकती ही नहीं; अगर पहले से सिर चढ़ी हो, तो फौरन रफा-दफा हो जाती है।

अब मुझे ही लीजिए, मुझे खुद नहीं पता कि भर भर के टेक्स देने के अलावा मेरी जिम्मेदारी क्या है। महंगाई कम हो या ज्यादा, इसमें मेरा क्या जोर? रुपया गिर रहा है तो मैं क्या कर सकता हूँ ! लाठी लेकर उसे सहारा देने तो जाऊंगा नहीं ! वैसे तो मेरी कोई खास गरिमा नहीं है लेकिन रुपया जब गिरता है तो मेरी जरा सी भी गरिमा नहीं गिरती है । सुना है रुपये के गिरने से अब किसी कि गरिमा नहीं गिरती है । जानकार बताते हैं कि अब गरिमा कहीं बची ही नहीं है । मैं तो जेब में गांधीजी वाला रुपया लेकर चलता हूं, डॉलर नहीं। सच तो यह है कि मैंने डॉलर देखा तक नहीं है । अगर वह चढ़ता है तो चढ़ जाए, अपने गाँधी का क्या जाता है? देखो भाई, अपन तो 'संख्या' को जानते हैं और लोकतंत्र को आत्मा में बसा रखा है। इधर एक डॉलर, उधर नब्बे रुपए। लोकतंत्र के हिसाब से बताइए कौन बड़ा है? एक या नब्बे! जिसकी संख्या भारी, उसकी जीत पक्की। अब बात को ज्यादा साफ करने की जरूरत नहीं, आपकी समझ पर मुझे यकीन है।

गणपत राव के बेटे की शादी नहीं हो पा रही है। कल वह पीछे पड़ गए— 'करवाओ यार!' हमने कहाकोशिश करेंगे, लेकिन हमारी जिम्मेदारी नहीं है। वह बोलेजिम्मेदारी की चिंता मत करो, आजकल यह किसी की नहीं है। बेटे मां-बाप के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, नेता जनता के लिए नहीं, डॉक्टर मरीज के लिए नहीं और भगवान अंधभक्तों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। आजकल तो लोग बिना शादी के, यानी बिना जिम्मेदारी के जीना पसंद करते हैं। दिक्कत यह है कि औरत के बिना जिंदगी कितनी सुकून भरी है, यह आदमी को शादी के बाद ही समझ आता है। सब कुछ लूट के होश में आए तो क्या किया ! हरकोई  इतना हिम्मतवाला भी नहीं होता है । मेरी शादी को चालीस साल होने वाले हैं। 'कैद में है बुलबुल और सैयाद मुस्कुराए।' चौदह साल में तो हत्यारों की सजा पूरी हो जाती है और वे शान से बाहर आ जाते हैं, पर हमारे लिए कोई 'पैरोल' की व्यवस्था तक नहीं है ।

गणपत अपने बेटों के रोजगार के लिए भी सबको घूरता रहता है। कहता है जनता मालिक है, सरकार बनाती है । देश में बेरोजगारी का जो माहौल है उसके लिए जनता जिम्मेदार है ! उसके तीनों बेटे उसे फटकारते हैं— 'हमें पैदा ही क्यों किया?' बेरोजगारी की जिम्मेदारी अब पैदाइश तक जा पहुंची है। आजकल बच्चे बात बात पर जन दे देते हैं । गणपत को डर है कि कहीं लड़के आत्महत्या न कर लें। अगर कर ली, तो जिम्मेदारी किसकी? सरकार दो लाख का मुआवजा देगी, लेकिन जिम्मेदारी का क्या? गणपत के तीन लड़के हैं, मतलब कुल छह लाख के हाथी । जिम्मेदारों के पास नौकरी नहीं है, चेक है; वह लेकर दफा हो जाओ। आखिर कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है।

इधर एक सार्वजनिक उद्यान है नेहरू पार्क। लाठीधारी कुछ बंदे पूरी जिम्मेदारी के साथ वहां बकरियां छोड़ देते हैं। जवाब यह है कि नेहरू पार्क को अब 'गांधी पार्क' बनाया जाएगा, इसलिए बकरियां जरूरी हैं। सेकुलर बकरियां दिन भर अपना 'काम' करती हैं। महीने भर में ही फूलों के पौधे 'लेंडियों' में बदल गए। महकने वाला बाग बदबू मारने लगा। चलिए, एक और जिम्मेदारी पूरी हुई ! मजबूत इरादे से काम करो तो अंजाम तक पहुँचता ही है। बस मीडिया में खबर नहीं आई, क्योंकि बाजार की भी अपनी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं।

पार्क में सुबह-शाम कुछ बूढ़े अपने दुखडों के साथ आते हैं। बकरियों के काम में हस्तक्षेप करने की अपेक्षा उन्हें 'गांधी चर्चा' में लग जाना सुरक्षित लगता है । गांधी को याद करो तो सहनशीलता बढ़ ही जाती है। इन बूढ़ों को आश्चर्य है कि बकरी के पेट में फूल-पत्ती जाकर 'लेंडी' कैसे बन जाती है? ईश्वर चमत्कारी है कुछ भी बना सकता है । आजकल लोग गोबर खा रहे हैं, अगर जिम्मेदारों के ध्यान में यह बात लाई जाए तो यह 'सम्मान' बकरी की लेंडियों को भी मिल सकता है।

 एक जमाना था जब बाप की जूती बेटे के पैर में आने पर उसे जिम्मेदार मान लिया जाता था। तब बुजुर्गों के लिए घर में आंगन और तखत की व्यवस्था होती थी । अब जमाना बदल गया है। ज्यादातर बूढ़े 'शरशय्या' पर लेटे सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में होते हैं। पेंशनिया बूढ़ों को नवंबर आते ही धूल झाड़कर खड़ा होना होता है। उनके लिए यही एक जिम्मेदारी बची होती है । इसमें लापरवाही न घर वाले सहते हैं, न बाहर वाले। बात उनकी भी जो जिम्मेदारी की जंग से दूर हैं । वे क्या तो करें कि तस्वीर बदले । वे भी मुट्ठीभर दिन ले कर आए हैं । कैफ़ी आजमी कहते हैं – “कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले उस इंकलाब का, जो आज तक उधार सा है” ।

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आलस्य एक दिव्य गुण

 






 

आलसी आदमी भी दूसरे तमाम प्राणियों की तरह जीवित शरीर होते हैं । फर्क केवल उनके जिंदा रहने के तरीके में देखा जा सकता है। जहाँ आम लोग जीने के लिए भागते दौड़ते, खटते रहते हैं वहीं आलसी लीक से हट कर एक मिसाल पैदा करते हैं । वे जरूरी / गैरजरूरी किसी भी तरह की हलन चलन के विरुद्ध क्रांति संदेश देते हुए समाज को आराम की दिशा देते हैं । आलसीजी मानते हैं कि बैठे रहकर या पड़े रहकर भी मस्त जीवन जिया जा सकता है। आलस्य एक तरह का दिव्य गुण है । शेषनाग पर भगवान भी तो सदा सदा लेटायमान रहते हैं । आलसी अपने को ईश्वर का सच्चा पुत्र मानता है। काम या परिश्रम करके वह पालनहार परमपिता की महिमा पर बट्टा नहीं लगाना चाहता है। वह आलस्य के आनंद रस में इतना पगा होता है कि उसे निष्क्रिय जीवन वरदान लगता है । वह सर्वज्ञानी होता है । उसे नया पुराना कुछ भी करने या सीखने की जरूरत महसूस नहीं होती है। असल में वह बंद गोदाम के आखिरी कोने में सहेजा हुआ बुद्धिजीवी होता है। उसे अच्छी तरह से पता है कि जीवन चार दिनों का है, ओन्ली फॉर फ़ोर डेज़, यू नो ! ना यहां कुछ लेकर आए थे ना यहां से कुछ लेकर जाएंगे। यह दुनिया मुफ़्त सराय है जिसमें आलसी खाते पीते, आराम करते हैं और चले जाते हैं। पचास प्रतिशत दानों पर आलसियों का नाम भी लिखा होता है । वक्त से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी बिके हुए न्यायाधीश को भी नहीं मिलता है। लीडर करे न चाकरी मंत्री करे ना काम; संत सर्टिफाइड कहें सबको देता राम । ऐसे में बिना बात हाड़ तोड़ने का कोई मतलब नहीं है। बैल दिन भर काम करते हैं और बैल ही बने रहते हैं, घोड़ा नहीं हो जाते हैं। आलसी मानता है कि हमसे पहले हजारों परिश्रमी आए और तमाम काम करके चले गए लेकिन कोई उन्हें नहीं जानता। पिछले दिनों एक जिम्मेदार नेता ने बताया कि गाँधी जी तक को कोई नहीं जानता था । वो तो एटनबरो ने फिल्म बनाई तब कहीं जा कर दुनिया को पता पड़ा । इसीलिए भगवान कहते हैं कि तू मेरा हो जा और अपनी चिंताएं मुझ पर छोड़ कर सो जा । बताइए क्या आज के समय में भगवान पर विश्वास करना गलत है!? नहीं नहीं, बोलिए, गलत है तो कहिये जरा ।

एक बात और, जो लोग काम करते हैं उनसे जाने अनजाने में कानून टूटता ही है। आलसी कानून के सम्मान के लिए भी काम नहीं करता है। न रहे बांस न बजे बंसी । उसे किसी नेता या सरकार से कोई शिकायत नहीं है। कोउ साला नृप होए हमै का हानि । इसलिए वोट देकर विरोध या समर्थन दर्ज कराने की उसे कभी जरूरत महसूस नहीं हुई। ऐसा नहीं है कि आलसी कुछ सोचता विचारता नहीं है। मतदान वाले दिन सुबह से सोचता है कि वोट दूं या नहीं दूँ, नहीं दूं या दे ही दूं। किसी निर्णय पर पहुंचने से पहले शाम हो जाती है और वह भगवान को धन्यवाद कहकर वापस लुढ़क जाता है।                  

जब आप रुचि से इतना पढ़ चुके हैं तो यह भी जान लीजिए कि जन्मजात आलसी साउण्ड प्रूफ होते हैं। लोगों के कहने सुनने को, तानों को एक कान से सुनकर दूसरे कान से ‘सट्ट से’ निकाल देते हैं। इसी गुण के कारण लोग उन्हें सरकार तक कह देते हैं लेकिन इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है । कुछ आलसी संत टाइप होते हैं। वे मानते हैं कि कर्म छोड़ा है सांसारिक सुख नहीं । कुछ आलसी मौका परस्त भी होते हैं जो वक्त जरूरत और अवसर देखकर अलसाते हैं। जैसे आज संडे है तो मस्त पड़े हैं, कुछ करेंगे नहीं । या फिर काम करने वाली (पत्नी)  है आसपास तो वे खुद से साँस ले रहे है यही बड़ा काम है । ससुराल में है तो प्रति घंटा चाय-बिस्किट के बावजूद आलस्य को न टूटने देना उनका जमाई अधिकार है। आलसी प्रायः भाग्यवान होते हैं, कोई काम खुद ही उनके पास नहीं फटकता है । आलसी अचार की बरनियों की तरह कभी धूप में कभी छाँह में रखा होता है । घर-परिवार वाले इस उम्मीद से उसे सम्हाले रहते हैं कि कभी कुछ नहीं होगा तो काम आएगा । मीर लिखते हैं – “आरजुएँ  हजार रखते हैं, तो भी हम दिल को मार रखते हैं “ ।

 

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अंग्रेज बड़े दुष्ट थे !!


 


 राजनीति की दुनिया में बड़े-बड़े रहस्य छुपे हुए हैं। हम में से बहुत से लोग नहीं जानते कि अंग्रेज बड़े दुष्ट थे। व्यापारी बनकर आए थे और हुकूमत करने लगे। जब सत्ता उनके हाथ में आ गई तो उन्होंने लूट का नाम बदल कर व्यापार कर दिया । भारत का वैभव उन्हें सोने की खदान के समान दिखा तो लंबे समय तक खुदाई का इरादा हो गया। देश में मतभेदों की, ऊँच- नीच की, जाति- धर्म की नफरत की फसल लहलहा रही थी। उन्होंने लोगों में पल रही नफरत को और बड़ा किया। एक धरम के लोग दूसरे से दुश्मनी पालने लगे। लोगों को बताया गया कि उनका धरम खतरे में है । सभी धर्म वालों को उन्होंने गुपचुप मदद की। कान में फुसफुसा कर हर एक को दूसरे से अच्छा और श्रेष्ठ कहा। धरम के लोग मूर्ख बनते रहे । यही नीति जातियों को लेकर भी रही। पूरा समाज बँटते बँटते उनके सामने भेड़ बकरी की तरह हो गया। उन्होंने पुलिस बनाई, लेकिन जनता को डराने के लिए ।  अंग्रेज अपनी मर्जी से इस विशाल देश को हाँकने लगे। अंग्रेज बड़े चालाक थे। अंग्रेज जानते थे कि जब पेट खाली हो तो जनता को भव्य आयोजनों और भविष्य के सपनों में उलझा देना चाहिए ।

  राजनीति में समाज को सिर्फ बांटने लड़ाने से ही काम नहीं चलता है। कलाई खुल जाने का डर भी होता है । कुछ अच्छे काम भी इसलिए करना होते हैं कि लगे सरकार विकास करना चाहती है। अंग्रेज भेड़िये थे लेकिन उन्होंने बहुत से अच्छे काम भी किये, या यह कहना ठीक होगा कि करना पड़े । सड़के नहीं थी तो सड़के बनवाई। रेलवे शुरू की, डाक व्यवस्था बनाई, स्कूल बनाए, अस्पताल भी बनाए । कुछ अच्छे कामों का परिणाम यह हुआ कि एक दूसरे से नफरत करने वाला समाज अंग्रेजों को महान मानने लगा। लेकिन बहुत से लोग अंग्रेजों की इस चालाकी को समझ रहे थे। वे जब भी मौका मिलता सरकार की आलोचना करते और बताते कि अंग्रेज बगुला भगत हैं । अंग्रेजों ने आलोचना को राजद्रोह घोषित किया और कइयों को लाठी से पिटवा कर मरवा दिया। सरकार के खिलाफ बोलने वालों को जेल में डाल देना आम बात थी। अंग्रेज बड़े लोमड़ थे। उन्होंने देखा कि दलित और आदिवासियों की बड़ी संख्या है। वे शासन की जरूरत में काम आ सकते थे तो उनके लिए चर्च के दरवाजे, स्कूल के दरवाजे, और सेना के दरवाजे खोल दिये। महिलाओं के लिए भी उन्होंने कुछ काम किये। अंग्रेज बड़े चालू थे । उन्होंने सती प्रथा के खिलाफ कानून बनाया, उन्हें शिक्षित करने का प्रयास किया। अब अंग्रेज महिलाओं दलितों और पिछड़ों के हितैषी हो गए। लेकिन अंदर ही अंदर लोग मानते थे कि अंग्रेज बड़े कमीने हैं। अंग्रेज भी जानते थे कि लोग उन्हें कमीना मानते हैं। लेकिन कुछ वर्षों की सत्ता में वे बड़े ढीठ हो गए थे। शासन करने वालों को आमतौर पर लज्जा नहीं आती है। अंग्रेज अपनी दाढ़ी मूंछ और परिधान पर बहुत ध्यान देते थे। वे बड़ी-बड़ी कोठियों में रहते थे लेकिन उनकी अपनी निजी कोठी नहीं होती थी। वे लूट का माल विदेशों में जमा करके रखते थे ।

        देश में बहुत से राजा नवाब तब भी थे। उन्हें हैंगर की तरह अंग्रेजों ने इस्तेमाल किया। जैसे हैंगर में कपड़े टांगे जाते हैं वैसे ही उन पर बहुत कुछ लाद रखते थे । राजा नवाब भी जानते थे कि अंग्रेज बड़े कमीने हैं, लेकिन वह मजबूर थे। जमीदार, जागीरदार और बुद्धिजीवियों को उन्होंने राय बहादुर और सर जैसी उपाधियाँ देकर अपने पक्ष में किया। पुराना जमाना था उस समय पद्मश्रियाँ नहीं होती थी। पूरा देश अंग्रेजों से नफरत करता था लेकिन अब उनकी ताकत पहले से बढ़ गई थी। सरकार का खजाना खचाखच भरा हुआ था। उनके पास बड़ी सेना और लाखों मुलाजिम थे, और अपने कानून भी। इतने बड़े संगठन के साथ जमी हुई सरकार को हिलाना नामुमकिन था। लेकिन आम राय यही थी कि अंग्रेज बड़े कमीने हैं। अंग्रेजों के प्रति इस धारणा ने धीरे-धीरे अपना काम शुरू किया और देश की गरीब अनपढ़ और संगठित जनता ने एक स्वर में कहा कि अंग्रेजों भारत छोड़ो। इतिहास गवाह है, संघर्ष लंबा चला लेकिन कमीनों को भारत छोड़ना पड़ा। एक बार भागे अंग्रेज फिर कभी सत्ता में नहीं आ सके लेकिन उनका कमीनापन यहीं छूट गया । जय हिन्द ।

 

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बुधवार, 10 दिसंबर 2025

दो केले और खुल जा सिम सिम

 




 

          फूलसिंह 'फूल' ने संत जी के चरणों को दबाते हुए प्रार्थना की -  "महाराज की जय हो, आशीर्वाद दीजिए भगवान,.... मैं राजनीति में जाकर जनता की सेवा करना चाहता हूँ । "

" राजनीति का सेवा से अब क्या लेना देना है फूलसिंह 'फूल' !? " संत जी ने कहा। 

 "जाना ही पड़ेगा संत जी, जनता गरीब है, भूखी और बीमार है। " फूलसिंह 'फूल' बोला।

" जनता को गरीब, भूखी और बीमार बनाए रखने में बड़ी युक्ति लगती है ‘फूल’ सिंह ।  लाचार जनता लोकतंत्र की जान होती है। अगर तुम इतना भी नहीं जानते हो तो राजनीति में जाकर क्या करोगे!? " 

" राजनीति में ज्ञान और समझ की क्या जरूरत है महाराज!! आप तो अपना काम कीजिए,...  आशीर्वाद दीजिए फटाफट। " 

 संत ने बिना कुछ बोले फूल सिंह 'फूल' को दो केले दे दिए, कहा - " खुल जा सिम सिम... जा शुरू हो जा....।"

 

  संत जी अंधे हैं लेकिन उन्हें सब दिखता है। उनके बारे में प्रसिद्ध है कि वह तीन:एक के अनुपात में बोलते हैं अर्थात तीन बातें बुरी और एक बहुत बुरी । अगर चोर-उचक्कों, लबार-लफंगों को आशीर्वाद दे दें तो वे खूब तरक्की करते हैं। अनेक चोर उनके आशीर्वाद से डाकू बने और जन नायक कहलाये । उन्होंने डायरेक्ट अपने आशीर्वाद से सैकडों ‘नेतू’ पैदा किए हैं। परिणाम स्वरुप नेता भी दिव्यांग निकले । हालांकि तकनीकी रूप से सबके पास दो आंखें बरामद हो सकती हैं । कुछ ही वर्षों में देश का राजनीतिक परिवेश इच्छाधारी अंधों से भर गया है। ये वही देखते हैं जो देखना चाहते हैं। अपने यहाँ एक बार गरीबों को पुचकार लो, थोड़ा पान-पत्ता कर दो, फिर पाँच साल तक देखने को पूरी दुनिया पड़ी है। बड़े-बूढ़े बताते हैं कि सत्तागिरी और संतगिरी में मौसेरे भाई जैसा रिश्ता होता है। एक जीने नहीं देता दूसरा मरने नहीं देता। दोनों में बड़ी अंडरस्टैंडिंग है। एक दूसरे की मदद करने में वह आगा-पीछा नहीं देखते हैं। इसलिए संत जी ने 'फूल' जी में संभावना देखकर आशीर्वाद दे दिया है।

 

 फूलसिंह 'फूल'  दो केले लेकर निकला तो साथ लगे चमचों ने कहा उस्ताद आधा-आधा खा लो, अभी अपन चार हैं बाद में कम पड़ जाएंगे । लेकिन फूल सिंह को आशीर्वाद प्राप्त था सो उसने कुछ और लोग जुटाए और अस्पताल में एक महादरिद्र को ताड़ा। दोनों केले उसके मुँह आगे किये और फोटो खिंचवा लिया। फिर दूसरे भूखे को देखा और केले दिखाकर फोटो खिंचवा लिए। इसी तरह एक के बाद एक पूरा वार्ड कैमरे में कैद हो गया। केले अभी भी उनके हाथ में किसी पिस्टल की तरह मौजूद थे। 

 

“ केलों का क्या करें? " फूलसिंह से चमचों ने पूछा। 

" किसी एक को देना अन्याय होगा और इसके पच्चीस टुकड़े करके बांट देना केलों के साथ अन्याय होगा। "

"फिर इनका क्या करें !?"

" ऐसा करते हैं इसको बेच देते हैं। कोई भी अमीर इन्हें ले लेगा। संगठन में शक्ति होती है...  उठाओ लाठी और चलो । "

नगर सेठ ने केले नहीं लिए... चंदा दे दिया। 

 फूलसिंह 'फूल' सारा दिन केले लिए घूमता रहा लेकिन किसी ने भी केले नहीं लिए।... चंदा सबने दे दिया। 

 चमचों ने कहा कल शहर में पोस्टर लगेंगे - ' नगर के युवा हृदय सम्राट फूलसिंह 'फूल' का पहला भव्य नागरिक अभिनंदन' आज शाम जनता चौक पर ।

 

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बुधवार, 3 दिसंबर 2025

डरा हुआ आदमी


 


 

                 डरा हुआ आदमी लोकतंत्र का सबसे मजबूत खंबा होता है। जैसे सर्कस के तंबू में बीच का खंबा होता है, बस वैसे ही। बाकी के सारे खंभे भी उसे पर निर्भर होते हैं। बीच का खंबा अगर जरा भी हिला तो समझो लोकतंत्र को खतरा हुआ। कुछ लोग इन्हें डरा हुआ आदमी कहते हैं और जो जानते हैं वे जिम्मेदार आदमी मानते हैं। डरा हुआ आदमी गुप्त मतदान करते हुए भी डरता है कि भगवान सब देख रहे हैं और मौका पड़ा तो महाआरती के बाद सरकार को सब बता देंगे। हाल के कुछ महत्वपूर्ण बयानों से देश को पता चला है कि आजादी ज्यादा पुरानी नहीं है और डरा हुआ आदमी भी। डरा हुआ आदमी सब समझता है बल्कि दूसरों से कुछ ज्यादा ही समझता है। वो टीवी देखते हुए वह भी देख लेता है जो दिखाया नहीं जा रहा है। अखबार पढ़ते हुए वह शब्द नहीं पढ़ता शब्दों के पीछे का पढ़ता है। चुनावी दल जब वादे करते हैं तो वह उन पर यकीन नहीं करता है, लेकिन यकीन नहीं करने के खतरे जानता है इसलिए फौरन कर लेता है। मीडिया जब विकास की जिंदा खबरें सुनता है तो इसके अंदर कोई ‘ओम शांति - ओम शांति’ बोलने लगता है। गुस्सा आने पर मुस्कुराने का हुनर उसने सीखा था, अब सुबह से शाम तक मुस्कुराता है।

                       वह जिनके बीच उठता बैठता है उन्हें भी संदेह से देखता है। उसे विश्वास बना रहता है कि इन  सारे लोगों की पहुँच सरकार तक हो सकती है । सरकार के पास वर्दी और बिना वर्दी वाली पुलिस होती है और पुलिस के पास डंडा। और सब जानते हैं कि पुलिस जनता की सेवक है। रात में वह सपना देखता है और चीखना चाहता है। लेकिन उसकी इतनी आवाज भी नहीं निकलती है कि बगल में सोया हुआ उठ जाए। उसको लगता है कि यदि उसने सिस्टम के खिलाफ कुछ भी बोला तो वह अभिमन्यु की तरह घिर जाएगा। उसे हर समय लगता है कि वह महाभारत के युद्ध मैदान में असुरक्षित खड़ा हुआ है। डरे हुए आदमी को अपने भी अपने से नहीं लगते हैं। वह मानता है की एक डर ही है जो उसकी सभी खतरों से रक्षा करता है। डर ही उसका जीवन है और डर नहीं होता तो वह कभी का फोटो हो गया होता।

                  डरा हुआ आदमी सोशल मीडिया पर किसी भी पोस्ट को लाइक करने से पहले बार-बार चेक करता है कि लाइक बटन का रंग कहीं 'विपक्ष' से मेल तो नहीं खाता। वह सिर्फ हार्दिक बधाई, शुभकामनाएं, बहुत सुन्दर जैसे कमेंट करता है, लेकिन हमेशा यह ध्यान रखता है कि कमेंट इतना छोटा हो कि उस पर कोई 'काउंटर कमेंट' न कर पाए। प्रोफाइल पिक्चर पर उसने खुद की नहीं, एक गैर राजनीतिक फूल की तस्वीर लगा रखी है । जब उसका बच्चा स्कूल में कोई प्रश्न पूछता है, तो वह उसे धीरे से डांटता है, "बेटा, कुछ पूछना, ज्यादा  सोचना गंदी बात होती है । टीचर जो भी बता दे वही सच है। प्रश्न नहीं करोगे तो सौ साल जियोगे, बस उत्तर याद रखो।"

                      कई बार जब डरा हुआ आदमी खाली और अकेला होता है तो विचार आते जाते रहते हैं। कभी कभी सोचता है कि देश बड़ा या जीवन! अंदर से पहली आवाज निकलती है - देश बड़ा। लेकिन तुरंत ही वह भूल सुधार भी करता है। अंदर से कोई फटकारता है कि अबे जानता नहीं क्या, 'जान है तो जहान है'। जान बचे तो समझो लाखों पाये। इनदिनों घर से बाहर निकलो तो लगता है कि जान शरीर से आगे आगे चल रही है। शरीर अगर कदम से कदम नहीं मिला पाया तो समझो जान ये गई वो गई। दूसरे दिन खबर छपेगी कि हार्ट अटैक से एक और गया । अभी जो कनिया पहलवान हैं ना, अपने चक्कू कट्टा वाले, वह भगवान तो नहीं हैं पर भगवान से कम भी नहीं हैं। जब देखो तब काले भैंसे पर सवार दिखाई देते हैं। सामने पड़ जाएं तो कमर अपने आप झुक कर दोहरा जाती है । और आदमी के मुँह नाक से अनुलोम विलोम और कपालभाँति निकलने लगती है ।  ऐसी सिचुएशन में कोई सीन तान कर खड़ा हो जाए तो अंजाम क्या होगा ! आप समझ सकते हैं । लेकिन डॉक्टर एक बात अच्छी भी कहते हैं कि डरे हुए आदमी को कब्ज की शिकायत नहीं रहती है। कब्ज न हो तो शरीर अनेक रोगों से बचा रहता है। इसलिए हर आदमी को दिमाग और पेट साफ रखना चाहिए।

 

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गुरुवार, 27 नवंबर 2025

खातून की ख़िदमत में सलाम अपुन का!


 



 

सरकार बोलती,  " अय खातून! सुनते ज़रा! ओहो, मईडम किधर को निकल गए तुम? बात सुनते नहीं, ज़रा ठहर के सुनो! तुम्हारे को अम्मा बोलूँ, आक्का बोलूँ, लाड़ली बोलूँ या के लछमी बोलूँ? तुमच भगवान हो, तुमच देवी हो! ​इधर लोगाँ अब तुमको बैंक बोल रे! क्या जी, तुम बैंक हो गए वोटां वाले ? बोले तो सरकारी बैंक! अक्खा मुलुक में तुमच अक्केले लेडीज़ बैंक होरे ! माने तो स्टेट बैंक का पार्ट टू ! मूल से ज़्यादा ब्याज देरे तुम! फटाफट फटाफट, नगद लेरे नगद देरे ना !  है कि नहीं ! हय शरमाओ नक्को । हे हे हे... । ​पोलटिक्स में पोट्टी पटाना हय फकत काम अपुन का । बोले तो खातून के खाते में कैश अपुन का ! जान, अरमान, अक्खा देस अपुन का! हय खुशी की बाताँ, ज़माने को बताओ! ट्रेन पकड़ के, जल्दी से जाओ! पड़ोसी चमन में, रोज़गार सपन का ! उधर बी  सरकार अपुन की दरबार अपुन का । तुम हो तो अपुन है! तुम हो तो धरम है! थाली अपुन की गरम है! तुम हो तो काहे की शरम है? तुम्हारे क़दमों पे दिल-ओ-जान अपुन का ! खातून की खिदमत में सल्लाम अपुन का ।  

हिंदुस्तानी वोटर लोगाँ अब दिल का साफ़ और इरादों का पक्काच होरा । अब उसको कोई सिखाता-पढ़ता नहीं बैठता! ​वोटरां की नई फसल तो पैदाईशी समझदार हो रए। उन्हों को दो-चार सौ रुपये बताए तो सीधा इनकार कर देते कि, "अरे भाई, इतना कम में अपुन वोटाँ नहीं बेचते बोलके!" अपुन अगर नाप-तौल करके देखे तो मालूम होरा कि सियासत के मामले में सारे लोगाँ बाइबर्थ पीएच-डी. होरै। सबका दिमाग़ एकदम थक्केदार दही के माफ़िक़ सेट हय जी । किसीको बी सोच-विचार के पचड़े में पड़ने की ज़रूरतीच नहीं होरी। दो-दो महीने से चलते आरे मसले भी, ऐन टाइम पे जुमलों के आगे घुटने टेक देरे। ऐसे में कैसा सोच, कैसा विचार! ​बस, तेज़ी-मंदी देख को, बाज़ार भाव देख को, और जहाँ गाँठ गरम हो रई वहींच वोटा दो और छुट्टी पाओ!

​ऐसा हय कि पूरा मामला बाज़ार से ही तय होरा तो मगज़मारी करने की ज़रूरतच कायको ? मार्केट में रोज़ नए-नए लीडरां आते, रोज़ नए-नए वायदे फैइलाते, रोज़ नई-नई गप्पाँ सुनाते... तो किसको सूझ पड़ सकती! ​लेडी वोटरां, बोले तो खातून लोगाँ आख़िरी में बाज़ार भाव कोइच देखतीं। पहले के ज़माने में लोगाँ मीठी-चुपड़ी बाताँ सुन के देते। फिर, जान-माल का डर देख के देते। अब रूपीय लेके देते । चुनावी चेम्पीयन लोगाँ को मालूम हय कि अपुन के बाप का क्या जाता, रुपया तो सेठाँ और टेक्स पेयरां के हाथ का मेल होरा । हेल्थ डिपार्टमेंट बोलता कि, "हाथ धुलवाते रओ, तो लोगाँ इंफेक्शन से बचेंगे बोलके।" एक ज़माने में भुक्के-प्यासे और ग़रीब लोगाँ एक दिन की दारू और दो दिन के खाने में बनाते सरकार । लेकिन अबी महंगाई डायन से सब लोगाँ परेशान हय  ! तुमको मालूम क्या, चुनावी चेम्पीयन लोगाँ को भी तकलीफ़ हय। मालिकों के आगे हाथ फ़ैला-फ़ैला के बार-बार माँगना पड़ता बोलते । वो तो अच्छाच है कि बाज़ार में शरम का कंसेप्ट टोटल ख़तम हो हय । बीस सालाँ पहले तलक हज़ार-पाँच सौ के नोटाँ मैदान पकड़ लेते तो जीत होजारी थी । अब तो ऑनलाईनां का ज़माना चलरा । इधर बटन दबाओ, उधर मालाँ वोटरां के खाते में। उधर बटन दबवाया, तो इधर चेम्पीयन सीधे सरकार में बैठता जाको ।

तुम लोगाँ पढ़ रे क्या ? अय कुरबान ... ! तो समजो अपुन को ऐसा समाज मिलरा जो फ़्री स्कीमाँ के बदले, किसी को भी हुकूमत देरा । देस में हज़ारों स्कूल इसी वास्ते बंद होरे कि देस को जम्हूरियत के बढ़िया  बढ़िया चेम्पीयन मिलरे बोलके ।​ ग़रीब आदमी को दिल बड़ा हय । कुछ मिले ना मिले, मगर वो हमेशा देताच रहता! ​नदी दिखी तो चुपचाप सिक्का फेंकता। मंदिर दिखा तो हाथ जोड़ के रुपया चढ़ाता। पुलिस वाला दिखा तो उसकी जेब गरम करता! गुंडे दिखे तो उन्हें हफ़्ता देता, अफ़सर दिखा तो दलाली देता! सरकार दिखी तो झुक के सलामी देता! ​उसको मालूम कि ग़रीब हय तो उसीको देनाच हय, और जो अमीर हय,  ताकत वाला हय, रुतबे वाला हय, ... उन्हों तो लेतेच लेते हय ! बोले तो किस्मत लिखा कू आए । हय कि नहीं ?

 

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गुरुवार, 20 नवंबर 2025

गोपीचंद बॉडी सप्लायर


 








इधर साहित्य के इलाके में बादल बहुत घुमड़ रहे हैं। दिन दिन भर अंधेरा छाया रहता है, रात रात भर चांद-तारे गायब रहते हैं। जितने भी लोग बादल देखते हैं उनमें से आधे दन्न से कवि हो जाते हैं। बचे हुए में से आधे लघुकथाकार और बाकी से व्यंग्यकार, कथाकार, निबंधकार वगैरह पैदा होते हैं। उम्मीद तो रहती है कि बादल से पानी बरसेगा लेकिन टपकते हैं साहित्यकार और कुछ परजीवीनुमा भी आ जाते हैं मैदान में। अब आए हैं तो गीला भी होगा, कुछ कीचड़ भी और कुछ नाले -नदी, तालाब में भी पहुंचेंगे। भाई पानी तो पानी है, जिधर ढलान मिलेगी वह चल पड़ेगा। इसमें कोई रोक तो है नहीं।
इस झरते बरसते मौसम में साहित्य की सेवा यदि कोई कर रहा है तो वह प्रकाशक है । आप साहेबान दनादन लिखिए हम धड़ाधड़ छापेंगे। बस हो गया काम, आपका भी और हमारा भी । क्यों लिखना है, किसके लिए लिखना है, पाठक क्या होता है, क्या चाहता है इसकी परवाह करने की जरूरत नहीं होना चाहिए । इस तरह के सवाल कोई कमबख्त करे तो उसे मौका मिलते ही सूखे कुवें में डाल दो । जिसके भाग्य में जो लिखा है उसे वो भुगतना ही पड़ता है । पाठक लोग कोई दूसरी दुनिया के नहीं हैं । साहित्य सेवा के लिए प्रकाशक बेचारे को खूब सारे गीले-सूखे शब्द चाहिए जिन्हें वह किताब में बदल सकें । लेखक और प्रकाशक राजस्थानी समधी की तरह होते हैं। खूब गले मिलते हैं लेकिन रियायत जरा भी नहीं करते हैं। मजे की बात यह है कि यह गलाकाट रिश्ता एक बार बनता है तो जीवन भर के लिए बन जाता है।
यहां तक कोई समस्या नहीं है। याद दिला दें कि पुस्तक प्रकाशन के बाद भी पाठक की किसी को याद नहीं आती है। अब अगर पुस्तक का विमोचन नहीं हो तो मतलब क्या है साहित्य सेवा का !! लिखी, छपी, हाथ में आ गई, अब इसका कुछ तो करना पड़ेगा। विमोचन के अलावा और किया भी क्या जा सकता है । किसी आयोजन वैज्ञानिक को साथ में ले लो तो सब काम आसान हो जाता है। मतलब अतिथि, मुख्य अतिथि वगैरह वही फिट करवा देता है। हॉल, फोटोग्राफर, प्रेस रिपोर्टर और खाने-पीने का बढ़िया इंतजाम आपकी जेब को ही करना है । लेकिन सबसे ज्यादा दिक्कत आती है आयोजन में लोगों की उपस्थिति को लेकर । लोग आते नहीं हैं आजकल, जाहिल कहीं के । चाय-समोसा खिलाओ तो भी हॉल नहीं भर पाता है। लेखक को मजबूरन गोपीचंद बॉडी सप्लायर के पास जाना पड़ता है।
गोपीचंद हर मौके के लिए “बॉडी” सप्लाई करता है। चाहे शादी हो, बारात, उठावना या पुस्तक विमोचन। वह सजी-धजी, धोई-धुलाई बॉडीज भेजता है। पॉलिश किए जूते, इस्तरीदार कपड़े और चेहरे पर साहित्यिक गहराई का भाव अलग से । विमोचन कार्यक्रम थोड़ा बोरिंग होता है, इसलिए बीच-बीच में तालियाँ भी बजानी पड़ती हैं, मौके बेमौके वाह वाह भी करना पड़ती है । यही कारण है कि इस प्रजाति की बॉडी थोड़ी महँगी मिलती है। लेकिन भैया, जब साहित्य में सिर दे ही दिया है तो सस्ता महंगा क्या देखना ! अगले दिन अखबार में इस खबर के साथ फोटो छपेगी — “लेखक महोदय का गरिमामय विमोचन समारोह संपन्न।” तो फटाक से फेमस भी तो हो जाओगे। किताबों को तो कहीं जाना नहीं है, अपने घर में ही पड़ी रहेंगी । तो भाई लोगों आगे-पीछे मत देखो.... चले चलो, बढ़े चलो ।
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शनिवार, 8 नवंबर 2025

तोतों से भरा आसमान

 






 

                 आपको पता है हमारे हाथों में लकीरें ही नहीं  तोते भी होते हैं। कहते हैं कि लोग जब फुरसत में होते हैं तो इन तोतों के साथ खेला करते हैं । दोनों में एक रिश्ता बन जाता था अनदेखा सा। पता नहीं चलता था कि आदमी तोते में है या तोते आदमी में । एक अदृश्य साथ  होता है । मतलब अगर आदमी जब दफ्तर में बॉस के सामने हो तब भी तोते साथ और प्रेमिका के साथ किसी गार्डन या ढाबे में हो तब भी, यहाँ तक कि जब घर में हो तब भी तोते । तोतों का मुख्य काम यह है कि जब भी कोई संकट सामने आता दिखे वो फ़ौरन उड़ भागें । जैसे कुछ दिन पहले चम्पक चौहान के साथ हुआ । एक मस्तानी शाम दफ्तर के बाद प्रेमिका को गोलगप्पे खिलवा रहे थे कि उसका पति आ गया। उसे देखते ही चम्पक चौहान के तोते उड़ गए। मन तो हुआ कि वे खुद उड़ जाते, तोते भले ही गोलगप्पो कि प्लेट लिए खड़े रहते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि तोते किसी के मन की बात नहीं सुनते हैं । इधर पत्नी को चम्पक के साथ देख कर उसके पति के तोते पहली किश्त में उड़ गए। दूसरी किश्त में बचे हुए भी उड़ गए, क्योंकि साथ में उनकी अपनी प्रेमिका भी थी। दोनों पुरुष तोतों के बिना भुने बैंगन की तरह काले कलूटे सलपड़े हो गए। कुछ सूझ नहीं रहा था, लगा जैसे तोते उनका दिमाग़ भी ले उड़े । करें तो क्या करें!  अचानक चम्पक की बैटरी ऑन हुई और मशीनी हलचल के साथ उसने हाथ बढ़ा कर 'ग्लेड टू मीट यू' कह डाला । आश्चर्य की बात यह रही कि प्रेमिका के पति को भी सेम मशीनी हलचल का लाभ मिला। इसका मतलब यह हुआ कि तोते होते हैं तो आदमी आदमी रहता है और उनके उड़ते ही ढ़ोल हो जाता है। चम्पक ने कहा "आज गोलगप्पे वाले का बड्डे है, इसका बड़ा आग्रह था सो भाभीजी के साथ आना पड़ गया। आप भी लीजिये, आज पैसे नहीं लेगा हम लोगों से।"  मौके की नजाकत ताड़ कर आगे की स्थिति गोलगप्पे वाले ने सम्हाल ली। बाद में जानकारों ने बताया कि तोते सिर्फ पुरुषों के हाथों में होते हैं। स्त्रियों के हाथ में तोतियाँ भी नहीं होती हैं। उनके हाथ में बुद्धू पुरुष होते हैं इसलिए बेवफा तोतों के लिए जगह नहीं बचती है। जब कभी उड़ लेने का मौका आ ही जाए तो यह काम उन्हें ही करना पडता है। 

 

                  इधर देश में माहौल ऐसा है कि जब भी देखो आसमान तोतों से भरा पड़ा है। वजह, लोग भाषण दे रहे हैं, बयान दे रहे हैं, वादे बरसा रहे हैं, तरह तरह से डरा रहे हैं और करोडों तोते उड़ रहे हैं ! मालिक जानते हैं कि लोगों के हाथ खाली होते जा रहे हैं। हर हाथ डाटा है फिर भी घाटा हो सकता है। जब जब महा-सत्यवादी मुँह खोलते हैं सवा सौ करोड़ हाथों से तोते उड़ जाते हैं। कहते हैं काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती है। चढ़ती है भाई, अगर चूल्हे में आग नहीं हो तो सौ बार चढ़ाइये। मुद्दा आग  है और जनता हांडी पर आँख गड़ाए है। कल जब हांडी की हकीकत सामने आएगी जनता के पास और और तोते उड़ा देने के आलावा क्या विकल्प होगा!खैर ...  सवाल है एक ...

भाइये एक ठो बात तो बताइयेगा जरा... भोटवा बिहार में पड़ता है तो तोतवा दिल्ली में काहे उड़ता है !!?

 

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गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

जोखिम दूसरे वाले से


 

                          देश भर के अख़बारों में जूते को लेकर हेड लाइन छप रही थी। पहली बार जूता इतने बड़े स्तर पर बदनाम हो रहा था। जूता पैरों में हो तो उसकी सार्थकता है। जब जब भी वह किसी के हाथों में आया तो बदनाम हुआ। दुकानदार जूता दिखाए तो ग्राहक कहते हैं और दिखाओ जरा। वोट के ग्राहक को दिखाओ तो हेडलाइन बन जाती है। चलने के मामले में जूते की प्रतिस्पर्धा चप्पल से है। विशेष परिस्थितियों में जूते से ज्यादा चप्पल चलती है। बल्कि यों कहना चाहिए कि आशिकों का देश है तो चलती ही रहती है । लेकिन समाज पुरुष प्रधान है, सो इतिहास जूते ही बनाते हैं। यही कारण है कि मारक महिलाएँ अब जूते पहनने लगी हैं वह भी हाई कील (हील) वाली । लड़की देख के छेड़ने वाले हाई कील देख कर इरादा बदल देते हैं ।  

जूता शास्त्र में कहीं लिखा है कि जूता अच्छे आदमी के पैर में हो तो दोनों की शोभा बढ़ती है। लेकिन किसी फैंकू के पैर में हो अवैध अस्त्र होता हैं। समझदार लोग सही कहते हैं संगती अच्छी नहीं हो तो अच्छा भला चरित्र खराब होने में देर नहीं लगती है। आदमी की हो न हो आजकल जूते की कीमत बहुत होती है । वो तो अच्छा हुआ कि जूता जप्त नहीं किया गया वरना सफ़ेद जूते का मुँह काला हो जाता।  टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज चलती अलग से कि फलां कंपनी का जूता चल गया । जो कंपनी विज्ञापन देते नहीं थकती है वही सफाई देती रहती कि हमारी कंपनी के जूते बेशक ज्यादा चलते हैं लेकिन ऐसे नहीं 'चलते' हैं। आज की डेट में मिडिया से बड़ी मजाक कोई कर सकता है ! मिडिया किसी मौके को नहीं छोड़ती है, आज भी मौका बड़ा था। प्रश्न आया - " जूताबहाद्दूर, ट्रम्प और टेरीफ की खबरों के बीच आप अचानक सुर्खियों में आ गए, कैसा लग रहा है? "


सरकार किसकी बनेगी ?







  

"देखो जजमान, बिना भगवान कि इच्छा के एक पत्ता भी नहीं हिल सकता हैजानते हो ना ?और यह भी सुन लो कि भगवान के आलावा सरकार को कोई नहीं हिला सकता है । भगवान जो हैं मंत्रों के अधीन हैं और मंत्र किसके अधीन हैं यह बताने की जरूरत नहीं है । भगवान को जब तक मंत्र वालों द्वारा कहा नहीं जाए वे खुद भी हिलते नहीं हैं। सोया हुआ कुम्भकर्ण किसी काम का नहीं होता है यह तो आप जानते ही हैं। एक हम ही हैं जो लोक कल्याण के लिए जागते हैं । ज्योतिषी त्रिकालदर्शी है, वह पिछला अगला सब जानता है लेकिन सबको बताता नहीं है । उसकी विद्या ज्ञान के सात तालों में बंद रहती है। ब्रहम्मा ने सृष्टि में सब बनाया चाबी नहीं बनाई । इसलिए ताले खुलवा लेना सबके बस की बात नहीं है।... खैर , बताओ तुम्हारा प्रश्न क्या है? " जोतिस जी नए पूछा । 

" बस इतना जानना चाहते हैं कि बिहार में किसकी सरकार बनेगी पंडी जी? " आगंतुक बोले ।

"किस पार्टी के हो?" 

"इसीलिए तो जानना चाहते हैं। सरकार का पता चाल जाए तो हम भी पार्टी डिसाइड कर लेते। अभी समझ में आ रहा है कि ऊंट किस करवट बैठेगा । "

" तुम पहले हो जो इतना सोच कर चल रहे हो।"

" आपके सामने भले ही पहले हों, लेकिन पीछे आधा बिहार बाट जोह रहा है ।... एक बार पता चल जाए तो सब उसी तरफ लुड़क जाएगा। " 

" तो लोग अपना दिमाग़ नहीं लगाते हैं क्या !"

" दिमाग लगाया तभी न आपके पास आए हैं ।  ... और हमारे दिमाग़ लगाने से पत्ता हिल जाएगा पंडी जी !? "

" नहीं हिलेगा। सारे पत्ते थ्रू प्रापर चेनल हिलते हैं । स्टार्टर बटन हमारे पास है। "

" तो बताइये किसकी सरकार बनेगी? "

" मेहनत का काम है। बहुत सारे ग्रहों को काम पर लगाना होगा। पूजा पाठ और पंडी-भोज भी जरूरी है ।  खर्चा भी बहुत होगा, क्या करें?"

"खर्चे की चिंता नहीं कीजिए। एक बार सरकार बन जाए तो इतना देंगे इतना देंगे कि आप भगवान को चौबीसों घंटा बिना रूकावट दौड़ाते रहेंगे। "

" ठीक है, कुंडलियां लाए हो? "

" हाँ लाए हैं.... ये लीजिये। "

" ये! किसकी है? "

" हमारी है पंडी जी। "

" तुम बिहार हो या बिहारी लाल? "

" दोनों नहीं हैं। "

" तो बिहार की कुंडली लाइए, आरजेड़ी की लाइए, जेडीयू कि लाइए, सीएम, पीएम की लाइए तब ही बता पाएंगे । "

" कांग्रेस की भी लगेगी? "

" नहीं, कुछ पार्टियां अपनी कुंडली से नहीं मजबूरियों से चलती रहती हैं ।" 

" उनकी पार्टी के पत्ते कैसे हिलते हैं पंडी जी !? "

" पत्ते कहाँ अब । वहाँ एक ही तो पत्ता है।... ओ हेनरी की कहानी पढ़ी है  ना 'द लास्ट लीफ'...। आखरी पत्ता । "

“ हाँ, उस कहानी में तो आखरी पत्ते ने जीवन बचा लिया था । यहाँ पार्टी बचेगी ? “

“हमें नहीं पता ।“ पंडी जी बोले ।

" आप तो कह रहे थे कि ज्योतिषी त्रिकालदर्शी होते है !!  एक माह आगे का देखने के लिए कौनो मंतर नहीं है !!  मारिए जरा और त्रिकालदर्शियों की इज्जत बचाइए । "

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