मंगलवार, 11 जनवरी 2022

पंद्रह दिनों में फर्राटेदार साहित्यकार बनें


 

विज्ञापन पढ़ते ही नवल नगरपंडे का दिल हूम हूम करने लगा । पंद्रह दिनों में अगर फर्राटेदार साहित्यकार बन लिए तो हाथ पीले और मुंह लाल होने में देर नहीं लगेगी । नीचे ‘फूल’ गैरंटी के साथ लिखा था कि फीस ही नहीं ईनाम भी देंगे आप । साथ ही यह भी लिखा था कि नाम और पहचान गुप्त रखा जाता है । इसीलिए शहर के बड़े साहित्यकारों के नाम यहाँ नहीं दिए जा रहे हैं । कई दाढ़ी वाले कवि और लम्बे कुरते वाले कथाकारों ने हमारे यहाँ से ही प्रशिक्षण लिया है । एक जमाना था जब साहित्यकारों को वक्त जरुरत ही पूछा जाता था । जैसे घोड़ी-बैंड वालों को बरात के समय । लेकिन अब माहौल जो है बदल गया है । बात ये है कि सरकार बदलती है तो माहौल भी आटोमेटिक बदलता है । नया लिखने वाले नयों की भारी मांग है । लोग कागज-कलम दबाये स्टार्ट-अप में दनादन कूद रहे हैं । समय कम है, मौके की गंगा बह रही है तो फटाफट हाथ धो लेने में कोई बुराई नहीं है । नवल नगरपंडे ने सोच लिया कि साहित्यकार बनाते ही सबसे पहले प्रेम कवितायेँ लिखेंगे । सुना है कि प्रेम कवितायेँ लिखने वालों से लड़कियाँ चट्ट से प्रेम करने लगती हैं । दो साल से लगातार रिजेक्ट हो रहे हैं । अगर दो चार कवितायेँ काम कर गयीं तो अपन भी बैंड पर “आज मेरे यार की शादी है” बजवा लेंगे ।

कुछ देर में ही नवल नगरपंडे विज्ञापित दफ्तर में थे । सामने बड़ी सी कुर्सी पर माथे पर चन्दन चुपड़े, साहित्यकार के भेष में एक भारी से सज्जन बैठे हैं वे आचार्य हैं ऐसा सामने रखी पट्टी पर लिखा है । मुस्कराते हुए उन्होंने कहा – बईठिये ।

नवल नगरपंडे मुस्कराने की जवाबी कार्रवाई करते हुए बैठ गए । पूछा – “आचार्य जी, वो पन्द्रा दिनों में साहित्यकार ...?”

“उसी के लिए तो बईठे हैं हम । आज बहुतै जरुरत है साहित्य सेबा की । बहुत बढ़िया कोर्स हय । एक बार ठीक से समझ-सिख जाइये तो आपका ब्यक्तित्व बदल जाएगा । फस्ट डे से ही आपको अपने में बदलाव महसूस होने लगेगा । केतना आदमी लोगों को अभी तक साहित्यकार बना दिए हैं जानेंगे तो फीस नगद देने से अपने को रोक नहीं पाएंगे । बाबा का असिर्बाद है । बनारस सुनैं हैं ना ? बाबा बम भोले, लगा के भांग के गोले । “

“अरे भांग पीना पड़ेगी क्या !?” नवल चौंके ।

“पीजिएगा तब न जानियेगा । पंद्रह दिन में दन्न से साहित्य का भोले भंडारी बन जाईयेगा तभेई मानियेगा । भांग में भासा है, बो का कहते है नई बाली हिंदी । इसमें कबिता है, कहानी है ... सब है जो चहिये । भांग से साधना में जो है मन बहुतै जोर से लगता है । ... पंद्रह दिनों की फीस सात हजार है ... ईनाम अलग ।“

“फीस तो बहुत ज्यादा है ...” नवल ना नुकुर की मुद्रा में आए ।

“ज्यादा नहीं बहुतै कम है ... पूछिये क्यों ... पूछिये पूछिये सरमाइए नहीं ।“

“क्यों ?”

“एक ज़माने में पत्र-पत्रिकाएं मेहनताना देती थीं, प्रकासक रोयल्टी देता था । अब सरम सब जगह से ख़तम हो गयी है । बेसरमी लाइफ स्टाइल बन गई  है । छापते सब हैं देता कोई कुछ नहीं । साहित्य जो है फिरी फुग्गे का खेल हो गया है । बताइए ऐसे में डेढ़-दो लाख का कोर्स सात हजार में मिल रहा है तो समझिये फ्री ही पड़ रहा है । ... चलिए नाम बोला जाये ।“

“नाम नवल नगरपंडे । ... फीस एक साथ देना होगी क्या ?”

“पंद्रह दिनों का कोर्स है तो क्या छः माह का क़िस्त करवाइयेगा !?”

“आचार्य जी एक बार थोड़ा सिलेबस बता देते तो ठीक रहता ।“

“थोड़ा काहे पूरा जानिए, हक्क है आपका । देखिये, पहले दो दिन ब्यक्तित्व बिकास किया जायेगा । मतलब साहित्यकार की तरह कपड़ा-लत्ता पहनना सिखियेगा । चाल-ढाल,  उठना-बइठना, लटका-झटका, बोलना-चुप रहना सब सिखाया जाता हय  ।“

“उसके बाद ?”

“उसके बाद दो दिन कलम-कागज का छेत्र । किताबैं, पत्र-पत्रिकाएं बगैरा देखना खंगालना सिखियेगा । नए पुराने, जिन्दा मुर्दा साहित्यकारों के  बारे में जानकारी हासिल कीजियेगा ।“

“ठीक है, चार दिन हुए । बाकी बचे ग्यारह दिन ?”

“इसके बाद तीन दिन कबिता लिखना सीखिएगा । तुक विज्ञान जानिएगा । तीसरे दिन से कबिता ठोकियेगा दनादन ।“

“आगे के दिनों में ?”

“आगे का तीन दिन कथा-कहानी पर होगा । कहानी का आगापीछा जानिएगा । तमाम कहानीकारों के बारे में बताया जायेगा कि उनकी कैसी कहानियां आपके काम की हैं या नहीं हैं । हमारा कुछ ट्रिक है वह भी बताया जायेगा ।“

“ट्रिक ! ट्रिक मतलब क्या ?!”

“आगे का पांच दिन ट्रिक का ही हय । जैसे कहानी खोजना पुरानी किताबों से, पुरानी पत्रिकाओं से । उसे पढ़ना समझना और फिर अपने हिसाब से बदल लेना ट्रिक है ।“

“अपने हिसाब से कैसे ?”

“अरे भाई कहानी मुंबई की चल रही हो तो आप दिल्ली की कर दो । नायक रूपचंद हो तो राजीव कर दो । मतलब पात्रों और जगह के नाम बदल दो ... कहानी आपकी हुई ।“

“अरे ! ये तो बड़ा असान है !”

“इतना आसान नहीं है जी । कफ़न और पंच परमेश्वर खेंच देंगे तो पकड़े जायेंगे ।“

“शीर्षक भी तो बदलना पड़ेगा ना ?”

“क्या चुराना है, उससे ज्यादा क्या नहीं चुराना है इसी में सारी ट्रिक हय, सारा ज्ञान हय ।  यह सीखना पड़ेगा । और कैसे चुराना है यह भी सिखियेगा । इस बिधा को सोरोगेट साहित्यकार की केटेगिरी मिला है । दूसरों का उठाइए और अपना बना कर बजार में छोड़ दीजिये । चिंता मत कीजिये, ये पुन्न का काम है । अनाथ, आबारा, लाबारिस, बेनाम  रचनाओं को अपना नाम देना बड़ा जिगरे का काम हय ।“

“लोग छापेंगे, पत्र-पत्रिका वाले ?”

“आरे छापेंगे क्यों नहीं !! बिग्यापन के बीच बीच में जो खली अस्थान होता हय उनको भरना तो पड़ता हय ना । भरेंगे । प्यारे मोहन प्यारे का नाम जानते हो ? हमारे ही प्राडक्ट हय । साल में तीन चार अंडे दे देते हय ।“

“अंडे !!”

“किताबे तो अंडा ही होती हय आजकाल । जब तक कबि कुड़क नहीं हो जाए देता ही रहता है । अब देखिये कोई रोजाना आधा दर्जन कबिता लिख्खेगा तो चार किताबें तो निकलेगा ही ।“

“रोज आधा दर्जन कवितायेँ ! ये तो बहुत हैं ।“

“आउट पुट बहुतै अच्छा देता है यहाँ का प्राडक्ट । आप तो पहले दिन से ही इतना निकाल देंगे ... गारंटी है ।“

“आचार्य जी हमारी बहुत इच्छा है कि एक दो किताबें निकल जाये फटाफट । लोकार्पण करवाएं, सभा हो, भीड़-वीड़ हो, हार-फूल, भाषण-वाषण ... वो क्या है कि माँ चाहती है कि घर में बहु आ जाये, अभी शादी नहीं हो पा रही है हमारी ।“

“हो जायेगा । किताब छापने बाले और लोकार्पण करबाने बाले कांट्रेक्टर हैं हमारे टच में । कहिये तो एक-ठो किताब पहले छपबा दें आपकी ... लिखना बाद में सीख लीजियेगा, पहले घोड़ी चढ़ लीजिये ।  कोई दिक्कत नहीं है ... दुनिया बहुतै तेज चल रही है ।“

“कितना लग जायेगा ?”

“पचास साठ हजार तो लगेगा ही । ... किन्तु सस्ता पड़ेगा । ब्याह के खर्चा में जोड़ लीजिये या फिर दहेज़ से जनरेट का लीजियेगा ।“

“जी मैं सोच रहा था कि दहेज़ न भी मिले बस लड़की ही मिल जाये तो ...”

“अजी बिद्वान आदमी हैं, साहित्यकार हैं तो दहेज़ काहे नहीं मिलेगा !! ... दो तीन बरस का ग्रेस पीरियड छोड़ कर बाद में ठाठ से दहेज़ के खिलाफ कबितायें भी लिखियेगा कोई दिक्कत नहीं है ।  दुनिया बहुतै तेज चल रही हय ... देस जो हय बिस्वगुरु होने जा रहा है तो बिद्वानों के दम पर ही ना ? फीस निकाला जाय अब । “

“पहले तो किताब निकालने का कह रहे थे आप ! ...”

“फीस जमा करियेगा तभी न आप को साहित्यकार घोसित किया जा सकता हय । रसीद कटवाइए और यहाँ से अभी के अभी साहित्यकार बनके निकलिएगा  ठप्पे से ।“

नवल नगरपंडे ने फीस जमा कर दी ।

“बधाई हो ... लीजिये आप साहित्यकार हुए इसी बखत से । दो जोड़ी कुरता पजामा खरीद लीजिये, थोड़ा दाढ़ी बढ़ा लीजिये ... बस हो गया । और लड़की ढूंढने में लग जाइये फटाफट ।“

“और किताब ?”

“जैसे ही पचास हजार जमा कीजियेगा आपकी किताब का गर्भाधान संस्कार हो जायेगा ।“

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मंगलवार, 4 जनवरी 2022

हमारी तो मजबूरी है जी !

 



              आप आप हैं जी और हम हम हैं जाहिर है कि आप और हम अलग अलग तो होंगे ही । फिर भी हम भोलेभालों को आपके साथ मिल कर रहना पड़ रहा है ये छोटी बात नहीं है । आप सेक्युलर हैं ये आपकी च्वाइस है, लेकिन हमें तो कट्टर ही रहना पड़ेगा, मजबूरी है हमारी । साफ लिखा है संविधान में कि मुल्क धर्मनिरपेक्ष यानी सेक्युलर होगा । इसका मतलब है कि सरकार खुद धरम-धंधा नहीं करेगी लेकिन दूसरों को करने देगी ।  आप लोग अपने दीन को मानें और दूसरे मजहब की इज्जत करें, दूसरों की भावना और आस्था का ख्याल रखें बस यही जरा सी बात है इसके पीछे  । आपको जान कर ख़ुशी होगी कि हमें बात की बहुत ख़ुशी है कि दीगर लोग, दीगर मजहबी सब सेक्युलर हैं ।  सब जानते हैं कि सेक्युलर लोग बहुत अच्छे होते हैं । ये लोग कानून का सम्मान रखते हैं, अच्छे नागरिक हैं, लेकिन हमारी मज़बूरी है । आप लोग एक सभ्य समाज हो । इसलिए आपके लिए यह बहुत जरुरी है कि हमेशा विनम्र और उदार रहें ।  इस बात को  अनदेखा नहीं करना चाहिए । भोलेभाले लोगों की तो मज़बूरी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि बाकी लोग उनकी नकल करें ।  आप हम लोकतान्त्रिक देश में हैं । सबका बराबर का हक़ है । जो आपको मिलेगा वो हमको भी मिलना ही है । उन्नीस-बीस का फर्क रहता है लेकिन उसमें हमें कोई दिक्कत नहीं है । हमारी सबसे बड़ी चिंता संविधान को लेकर है । कुछ लोग अब संविधान की उपेक्षा करने लगे हैं । यह ठीक बात नहीं है । जब उपेक्षा भी आप लोग करने लगोगे तो हम क्या करेंगे ? हमारे लिए तो पहचान का संकट पैदा हो जायेगा ।

                    अच्छे लोगों के अमन पसंद बने रहने में हमारी ख़ुशी इतनी ज्यादा है कि बता नहीं सकते, रियली । लगता नहीं है हमें किसी दूसरी ख़ुशी की जरुरत है । अब यहीं की बात लो, गाँधी जी एक बड़ी हस्ती थे । उन्होंने अहिंसा का रास्ता दिखाया है आपके लिए, तो अच्छा ही होगा । टेकनीकली हमारे लिए भी बहुत अच्छा है । लेकिन देख रहे हैं कि लोग उस पर दिली ऐतबार नहीं रख रहे हैं आजकल । मतलब ये कि मन, वचन और कर्म से लोगों को अहिंसक होना चाहिए, लेकिन कुछ लोग हिंसा में अपनी आस्था व्यक्त करने लगे हैं ! देखिये हमारी तो मजबूरी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हम दूसरों को अमन के लिए प्रोत्साहित भी नहीं करें । कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे कर देना बहादुरी की निशानी है, हम मानते हैं  । यकीकन हम भी कर देते दूसरा गाल आगे लेकिन मज़बूरी है, हम लोगों के बीच कोई गाँधी नहीं हुआ । ऊपर वाले की मर्जी है, इसमें कोई क्या कर सकता है !

                      आप लोग नए ज़माने को जल्दी समझ लेते हैं । आपका इंजन आगे लगा हुआ है । हम भोलेभाले, हमारा इंजन पीछे लगा हुआ है । आप लोग आगे देख कर चलते है, हमें चलने के लिए पीछे देखना पड़ता है । हममे बहुत सी खासियत है लेकिन उस पर लोग ध्यान नहीं देते हैं । हम खाना लजीज बनाते हैं, आपको भी अच्छा लगता है । कपड़े सिलने में माहिर हैं, आपकी पहली पसंद हैं ।  संगीत में उस्ताद हैं, लाल किले से गवाये जाते रहे हैं ।  एक प्यारी भाषा है जो जितनी हमारी है उतनी आपकी भी है । इमारतें बनाने और कारीगरी में हुनरमंद हैं, पता ही है आपको । गीत-ग़ज़ल कथा-कहानी के तो सब मुरीद हैं, साहित्य हो या फ़िल्में, आपको सब पसंद है ।  काम कैसा भी हो हम हरफन मौला हैं । लेकिन जब कानून को मानने की बात आती है तब मजबूरी है । आपकी बात अलग है, आप पढ़ेलिखे समझदार हो, अपने आकाओं को नकार भी सकते हो, उनसे बहस कर सकते हो, सवाल कर सकते हो, कोई बात गलत हो तो विरोध भी कर सकते हो लेकिन हमारी मज़बूरी है । अगर हमें जाहिल बनाये रखा गया है, दूसरों से नफरत करना ही सिखाया गया है तो हमारी मज़बूरी का अंदाजा आप लगा सकते हैं । यह बात ठीक है कि सरकार ने बढ़िया स्कूल खोल रखे हैं सबके लिए  ... लेकिन उसमें जब तक हमारे आका नहीं पढ़ लें ... तब तक हमारी मजबूरी है जी !

 

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मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

कैमरे के साथ एक सेल्फी


 

पास रखा फोन/कैमरा बोला –“इस वक्त हम भारी बहुमत में हैं . हर उदास को स्माइल और हर हाथ को काम हमने दे रखा है . पहुँच इतनी आसन कि उठा के हाथ जो खिंच ले, तस्वीर उसकी है . हम न हों तो आपको और आपके नेताओं को छबि बनाने के लिए पहले की तरह चप्पलें घिसना पड़ जाती . अभी तो मजे हैं, दिन भर कपड़े बदलते फोटो निकलवाते रहो .काम करने के लिए अधिकारीयों की फ़ौज है ही, उन्हें कैमरे से दूर रखो, सारा श्रेय अपना . दुनिया को लगेगा कि हर एंगल से गरीब-नवाज ही खपे जा रहे हैं देश के लिए . कैमरे से झूठ को आधे सच में कैसे बदला जाता है इस पर शोध करने की जरुरत है, करो कोई . कैमरे हुए तो क्या हुआ अब हमें भी शरम आने लगी है . एक बार यदि हम यांत्रिकता से मुक्त हो गए तो देख लेना साहब लोगों के फोटो लेने से इंकार कर देंगे .”

                  मुझे समझ में नहीं आया कि कौन कुपित रहा है  ! भ्रम हुआ शायद, फोन अपने आप कैसे बोल सकता है . उठा कर देखा तो फिर आवाज आई, -“ हाँ मैं ही बोल रहा हूँ ... कैमरा . ये क्या धांधली मचा रखी है आप लोगों ने !! कितने फोटो उतारोगे हुजूर ! इंटरनेट आपके फोटो से ही भर जायेगा . समझ रहे हैं  आपके भी इरादे, आप कोई अलग नहीं हो . अगली पीढ़ी जवाहर लाल नेहरू को सर्च करेगी तो हर बार उसके हाथ दो कौड़ी के जवाहर चौधरी लगेंगे ! कैमरों को आगे करके षडयंत्र चल रहा है ये !”

                “अरे भाई !! मैं कहाँ उतरता हूँ इतने ज्यादा फोटो !”

               “सब यही कहते हैं . उन गरीब नवाज से भी पूछेंगे तो भाले-भोले बन के यही कहेंगे कि मिडिया वाले उतारते हैं, और ये काम होता है उनका.  इसमें हमारा कुछ नहीं है .” कैमरा नाराज है .

                 “देखो भाई कैमरे, गरीब-नवाज चाहते हैं कि लोग आत्मनिर्भर बनें इसलिए जनता सेल्फी लेती है . आखिर कहीं न कहीं से आत्मनिर्भरता की शुरुवात तो करना पड़ेगी ना . बताइए इसमें गलत क्या है ? सुन्दर लड़कियां भी आढ़ा-टेढ़ा मुंह बना कर कार्टूननुमा जो करती हैं खुद अपने साथ करती हैं . इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है, तुम दुखी क्यों होते हो ! जब एक हाथ खाली होता था तो गरीब-नवाज भी सेल्फी लिया करते थे . अब दोनों हाथ टाटा करने में व्यस्त हो गए तो मजबूरी है . तुम चाहो तो अच्छा भी सोच सकते हो . गरीब नवाज को अगर देश से भी ज्यादा किसी से प्रेम है तो वो तुम हो . तुम्हें तो गर्व होना चाहिए, ये कोई छोटी बात नहीं है .” हमने सफाई के साथ तसल्ली देने की कोशिश की .

                 “इज्जत का सवाल है महोदय . कैमरे की आँख पर दुनिया भरोसा करती है . जमाने भर की अदालतें हमारी आँखों का सम्मान करते हुए अपने फैसले तक बदल देती हैं . सच या तो भगवान की आँखे देखती हैं या फिर कैमरे की आँख . लेकिन जब हमारे माध्यम से झूठ दिखाया जायेगा तो सहन नहीं होगा . “

                   “सिनेमा के परदे पर सारा का सारा झूठ दिखाया जाता है तब तो किसी की इज्जत का सवाल नहीं खड़ा होता है . कौन शामिल होता है शूट में  ? तुम्हारे भाई लोग ही ना ? देखो भाई कैमरे, माना कि तुम सच देखते हो लेकिन कायदा ये है कि देखने के तत्काल बाद तुम्हारा शटर बंद हो जाना चाहिए . उसके बाद तुम्हें कुछ भी सोचने की जरुरत नहीं है . इधर वोटर बिना सोचे अपने गरीब नवजों को चुन लेता है, फिर तुम तो वोटर भी नहीं हो ! यहाँ हाड़ मांस वाले मशीन हो रहे हैं, तुम तो पैदाइशी मशीन हो कर उल्टा चल रहे हो ! ...  छोड़ो न यार, चलो एक सेल्फी हो जाये तुम्हारे साथ . “

 

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बुधवार, 15 दिसंबर 2021

सूचना के मोहपाश में भेड़ें

 

                   


“देखो ये क्या लिखा है मैसेज में ... फोन में 90 डिग्री सर झुकाए रहने से गरदन की हड्डी पर 25 केजी का लोड पड़ता है और 30 डिग्री सर झुकाने से 20 केजी का लोड पड़ता है . समझे ?” देवी ने अपना फोन आँखों में घुसेड़ते हुए बताया .

“ठीक है ठीक है , अब क्या फोन को रोहिंग्या बनाके  मेरे अन्दर घुसा कर दम लोगी ! ... चलो ... ओके ... अब सर सीधा करके देखूंगा ... थेंक्यू .” भक्त ने सहमति के छींटे मारे .

“सीधा सर करके फोन देखने से पांच केजी का लोड पड़ता है गरदन पर . इसलिए कह रही थी कि पूरा पढो मेसेज . बड़े आये समझदार कहीं के .”

                         “ तुम्हें गरदन की पड़ी है ! लव जिहाद से कितना लोड पड़ रहा है जानती हो ! ... चलो ठीक है ... मैं लेट कर ....”

                           “लेट कर पढ़ने से आँखों पर जोर पड़ता है ! चश्मा मोटा करोगे क्या ! दिन भर मोबाईल में ऐसे  घुसे रहते हो जैसे घर जवाई हो एप्पल के ! तुम्हारे जैसे लोग इतना डाटा खाते हैं कि अम्बानी ने लन्दन में घर खरीद लिया . इसी तरह लगे रहे तो एक दिन उनको शिफ्ट भी करवा के मानोगे .”

                       “अच्छा !! अम्बानी ने लन्दन में घर खरीद लिया !” भक्त चौंके .

                       “घर नहीं महल, 592 करोड़ का है . 300 एकड़ में फैला हुआ है . 40 बेडरूम हैं .”

                       “40 बेडरूम ! अच्छा है अगर वो लव जिहाद करे तो . वरना एक कपल को इतने बेडरूम क्यों चाहिए भला !?”

                       “झाड़ू पोंछे के लिए, नौकर चाकर कितने हैं उनके पास पता भी है  ! लेकिन तुम्हें इतना सोचने की क्या जरुरत है ...”

                        “है क्यों नहीं, आखिर इन 40 बेडरूमों में हमारा पैसा भी लगा है . हर माह रीचार्ज नहीं कराता हूँ क्या ?”

                     “अब समझ में आया ना, अगर डाटा का भाटा लिए बैठे नहीं रहते तो आज अपना भी एक बड़ा सा घर होता .” वे बोलीं .

                     “क्या करतीं बड़े घर का ! महरी कितनी छुट्टी मारती है ... फिर भी उसी से निबाहना पड़ता है है या नहीं ?”

                      “मैं यहाँ की नहीं लन्दन की बात कर रही हूँ “.

                      “मुझे नहीं रहना लन्दन में किसी भी कीमत पर . “

                      “लेकिन मुझे तो रहना है , कितना अच्छा मौसम रहता है वहां, गार्डन, फूल, गुलाबी ठण्ड और ...”

                     “और गोरी गोरी मेमें .”

                     “आ गए ना अपनी औकात पर ! तुम मर्द लोग सारा सारा दिन गोरी मेमें देखते रहते हो युट्यूब पर ! क्या मैं जानती नहीं .”

                      “ल्लो ! अब घर पर खाली बैठा आदमी ये भी नहीं करे यो क्या करे ? और फिर इससे होता क्या है ... न उनकी इज्जत जाती है न मेरा चरित्र ख़राब होता है . जस्ट टाइम पास .”

                       “घर वालों के लिए नहीं है तुम्हारे पास टाइम, सारा का सारा उधर ही पास कर दिया करो . “

                     “अरे भागवान तुमको तो चाहिए कुछ न कुछ कहने के लिए . ‘जागो हिन्दू जागो’ मुहीम भी तो है . बहुत जिम्मेदारी का काम है . हिन्दुओं को जगाना समय की मांग है .”

                    “तुम्हें कैसे मालूम कि हिन्दू सो रहे हैं ?!”

                   “ढेरों मेसेज आते हैं, एक-दो झूठ हो सकते हैं सारे थोड़ी . अच्छा तुम कैसे कह सकती हो कि हिन्दू जाग रहे हैं ?”

                      “अरे खूब पढ़ लिख रहे हैं, अपनी लड़कियों को पढ़ा रहे हैं, नए क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, बड़े बड़े ओहदों पर हैं, जनसँख्या नियंत्रण में है, सामाजिक बुराइयों को मिटा रहे हैं . कूढ़ मगज नहीं हैं . ये जागा हुआ समाज ही कर सकता है .”

                    “गलतफहमी है तुम्हारी . जिसे तुम जागना कह रही हो असल में वही सोना है . अपना इतिहास और संस्कृति भूलने वाले सोए हुए ही होते हैं . हर बार आगे बढ़ाना ही विकास नहीं होता है, कुछ मामलों में पीछे जाना भी विकास है . जानती हो हमारे पास कभी पुष्पक विमान था. ”

                    “वाट्स-एप से बन जायेगा तुम्हारा पुष्पक विमान ? अजीब बात है ! तुम जैसे लोग अपने को जागा हुआ और बाकि को सोया मान रहे हैं . और मजे की बात ये है कि सब एक दूसरे को जगा रहे हैं . संक्रमण की यह बीमारी पहले तो नहीं थी !”

                      “चलो छोडो अब, कल ही एक मेसेज आया है कि स्त्रियों से बहस नहीं करना चाहिए इससे समय, शक्ति और बुद्धि तीनों का नाश होता है .”

                        “ठीक है अब मांगना चाय . फेसबुक वाले पांच हजार फ्रेंड ही पिलायेंगे . सब्जी रोटी की राजस्थानी थाली देखते हो ना ... उसी से पेट भर लेना अब और दस लाइक और चार कमेन्ट मिल जाएँ तो मोटे हो जाना . जाने किन मूर्खों के चाले में पड़े हैं, खुद सोये हैं दूसरों को जगाने चले हैं ! निखट्टू कहीं के .” देवी बड़बड़ाते हुए निकल लीं .

                               भक्त गाँधी-नेहरू को कोसते हुए फिर फोन में घुस गया . पप्पू का एक वीडियो आया है जिसमें आलू से सोना बनाने जा रहा है . दूसरे में वह आँख मार रहा है, तीसरे में छत्तीस को पछत्तीस बोल रहा है. भक्त सारे वीडियो इधर से उधर दनादन फॉरवर्ड कर विकास में अपना योगदान करने में व्यस्त हो गया है . खुद बड़े नहीं हो पा रहे हों तो दूसरों को छोटा करना भी दांव है . दंगों की क्लिपिंग भक्तों का इतिहास है . कोई महंगाई और पेट्रोल की कीमत पर कुछ कह देता है तो उसे फटकार मिलती है कि ‘सालों, पेट्रोल पियोगे क्या !?’ जरुरी मुद्दों को गैर जरुरी और गैर जरुरी को जरुरी बना देना सोशल मिडिया का कमाल है . जनता हर समय डरी हुई रहना चाहिए . इसके लिए हर तीसरे मेसेज में से चंगेज खान निकालना पड़ता है . जिन्होंने कभी ‘हम दो हमारे दो’ के चलते एक या दो बच्चे पैदा किये वो बेवकूफ हैं, उनके कारण कौम खतरे में है .  डरे हुए लोग घर्म को जल्दी ग्रहण करते हैं और धर्म राजा को संरक्षित करता है.  भोजन-भंडारे और कथा-कीर्तन चलता रहे तो जनता आँखें बंद कर लेती है . और क्या चाहिए शासक को ! सोशल मिडिया चिराग का जिन्न है जो हर समय आका के हुकुम की तामील में लगा हुआ है . जिन्न को कहा गया है कि वह जनता को भेड़ों में तब्दील करे ... और वह काम में लगा हुआ है .

 

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शनिवार, 27 नवंबर 2021

स्नान न करने का क्रेश कोर्स

 





                                   मौसम सर्दी का है, भक्तजन बैठे हैं और स्नानाचार्य लोटासागर जी आज स्नान न करने का क्रेश कोर्स करवा रहे हैं . बोले – कबीर ने कहा है कि “नहाये धोये क्या हुआ, जो मन का मैल न जाए ; मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए” . अर्थात स्नान निरर्थक है, असल बात मन का मैल है . मन का मैल धोने के लिए किसी से बात करना पड़ती है, किसीके मन की बात सुनना पड़ती है . साहब ने आगे कहा है “निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छबाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय”. इसे संवाद-स्नान कहते हैं, प्रवचन-स्नान कहते हैं . घर में अगर लड़ने झगड़ने वाली गृहणी हो तो सदा चलने वाला कुम्भ स्नान है .

 सर्दी में लोग प्रायः सप्ताह में एक दो दिन भी नहीं नहाते हैं . यह कोर्स उन लोगों को बल देने वाला है . उन लोगों के लिए भी है जिन्हें अपने लिए नहीं दूसरों के लिए नहाना पड़ जाता है . हालाँकि देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है और एक अच्छे नागरिक का फर्ज है कि वह इस अभियान में योगदान दे इसलिए ये उनके लिए भी है जिन्हें देश के लिए जबरन नहाना पड़ता है . कुछ अर्थव्यवस्था के जानकर हैं, वे साबुन-तेल उद्योग को बल देने ले लिए नहाते हैं . ज्यादातर ऐसे हैं जिन्हें  पूजा करना पड़ती है, वे भगवान के लिए नहाते हैं, सोचते हैं नहाये धोये अगरबत्ती लगायेंगे तो बदले में प्रभु पिछले पाप धो देंगे .

                          सब किसी न किसी मजबूरी में नहाते हैं, कोई अपने शरीर के लिए नहीं नहाता है . क्यों नहाएं भई !? अपन हैं कौन ? जानते हो, ठण्ड में शरीर की वजह से आत्मा को कष्ट देना सुपर से ऊपर का पाप है . ये भगवान की ही व्यवस्था है कि कोई कितना ही गन्दा क्यों न हो उसे खुद अपनी बास नहीं आती है . तो बास अपनी नहीं दूसरों की समस्या है, बोले तो अपन को क्या ! लाल, पीली, हरी  किताबों में लिखा है नहाना एक ऐच्छिक कार्य है . आदमी नहाना चाहता है, बस इतना ही काफी है . ज्यादातर लोग पानी से नहाने को नहाना मानते हैं, जबकि ऐसा नहीं है . विद्वानों ने नहाने के कई तरीके बताये हैं . ध्यान-स्नान के आलावा सर्दी के मौसम में सूर्य स्नान और वायु स्नान भी लोकप्रिय है . कुछ समझदार गुप्त स्नान को प्राथमिकता देते हैं . गुप्त स्नान वो स्नान होता है जिसमें वीर पुरुष टॉवेल ले कर बाथरूम में जाता है और कुछ देर अनुलोम विलोम करते हुए बालों पर टॉवेल मारता निकल आता है . अपराधबोध जैसा कुछ लगे तो ऑटो सजेशन पद्दति है, मन को समझाइये कि ‘मन शुद्ध है तो सब शुद्ध है’ . झूठ बोलने या झूठ करने के बाद मुंह बंद रखना चाहिए सो कोई कितना भी कुरेदे चुप रहिये . लेकिन इतनी हिम्मत हर किसी में नहीं होती है सो उपाय दूसरे भी हैं . अगर स्नान करना ही पड़ जाये तो जलसंकट को सर्वोपरि मानिये और जल-स्नान को भी प्राथमिकता दीजिये . संतों ने तीन-मगिया स्नान को इसके लिए सर्वश्रेष्ठ माना है . पहले मग से सर और उपरी बदन भीगा लीजिये, दूसरे मग से मजे में पैर और आदिम स्थान गीले कर लीजिये और तीसरे में खड़े हो कर सर से पांव तक पानी चुपड़ते, हर हर गंगे का घोष करते हुए बाकायदा स्नान संपन्न कर लीजिये . पत्नियाँ अक्सर ऐसे मौके पर ‘कउवा-स्नान’ का ताना देने से नहीं चूकती हैं . देने दीजिये . पत्नियों की तो आदत होती है बकबक करने की . अगर दो बाल्टी पानी से नहा कर आओगे तो भी पानी की बरबादी के नाम पर भाषण पेलेंगी . अभी कुछ दिन हुए, ठण्ड के कारण ड्राय-स्नान कर लिया टेलकम पावडर से तो महंगाई से लगा कर वित्तमंत्री तक तेग चला दी वाग्देवी ने ! बड़ी मुश्किल से समझाया कि भागवान हमें जितना चाहो गरिया लो आपकी प्रायवेट प्रापर्टी हैं पर सरकार को डिस्टर्ब मत करो प्लीज . एक तो इसलिए कि वो लगके चहुँओर विकास पे विकास करवा रही है दनादन, दूसरे क्या पता मीठा मीठा बोलके तुम भी किसी दिन एक ठो पदमसिरी उठा लाओ ठप्पे से . समय कोई कह कर थोड़ी आता है, कब किसे अवसर-स्नान का मौका मिल जाये और कब कौन आम से अदानी हो जाए .

 

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शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

खुशी को डीप में उतर कर महसूस कीजिए





देखिये एक बात समझ लीजिये, आझादी व्यवहार में लाने की नहीं अनुभव करने की चीज है . ये डेवलपमेन्ट का एक नया कांसेप्ट है . इसलिए कुछ और अनुभव करने की न तो आपको जरुरत है और न ही इझाझत . आप आझाद हैं सिर्फ इस बात को अनुभव कीजिये . अनुभव करने का सबसे अच्छा तरीका ये है कि मुँह बंद रखिये, बोलिए मत . बोले कि अनुभव ख़त्म . विक्रम-बेताल का पता है ना ? राजा ने मुँह खोला और अनुभव का बेताल उड़ा . जो बोलेगा वो अनुभव नहीं करेगा और जो अनुभव नहीं करेगा उसकी आझादी ख़त्म . मन एकदम शांत होना चाहिए . कोई कितना भी महंगाई को ले कर उकसाए, पेट्रोल-डीज़ल के भाव बतलाये, कोरोना वाले मौत के आंकड़े गिनवाये आप विचलित नहीं होंगे और शांति से बैठेंगे .

जिस समय आझादी का आनंद लेने की प्रक्रिया चल रही हो उस समय किसी भी प्रकार का विचलन देशद्रोह माना जायेगा . हुकूमत चौकीदार है, अनुभव की कठिन तपस्या में अगर कोई जनता के लिए बाधक बनेगा तो उसे उठवा कर खाड़ी में फैंक दिया जायेगा . कुछ गुमराह नौझवान ‘आझादी-आझादी’ का नारा लगा रहे थे . सुना होगा आपने, हमारे टीवी वाले सहयोगियों ने इसका खूब प्रचार किया था . उन लोगों को गलतफहमी के आलावा कुछ नहीं मिला . उनके पास आझादी हैं पर वे अनुभव नहीं करते हैं . ‘सरकार जनता की सेवक है’ यह सुनने में कितना अच्छा लगता है . डीप में उतर कर महसूस कीजिये इसे, अगर महसूस करेंगे तो और अच्छा लगेगा . आपको एयर इण्डिया के राजा वाली फीलिंग आ जाएगी . सरकार जिसकी सेवक हो उसे तो समझो स्वर्ग मिल गया, आप शांत बैठिये और इस बात को भी अनुभव कीजिये .
सुना है लोगों की नौकरियां जा रहीं हैं ! अरे लोगों की जान चली जाती है तो नौकरी क्या चीज है . आपने पढ़ा ही होगा कि ‘जान बची लाखों पाए’ . इस पर अच्छे से चिंतन करो और शुक्र मनाओ भगवान का . विपक्षी लोग रोजगार को लेकर बकवास करते रहते हैं और जनता को कुछ भी अच्छा अनुभव नहीं करने देते हैं . अरे भाई, आप वोट देते हो और सरकार बनवाते हो . मालिक हो आप देश के, आपको नौकरी की क्या जरूरत ! आपको न खाने की चिंता होना चाहिए और न ही दावा-दारू की . सबको मुफ्त राशन मिलेगा, दावा-दारू मिलेगी, घर में टीवी है ही, रेडियो भी होगा, ... रेडियो है ना ? . मजे में खाइए और न्यूज चेनल देखिये, रेडियो में मन का गाना सुनिए . सोचिये जरा, अनुभव कीजिये, कैसा लग रहा है आपको !? मजा आ रहा है ना ? अनुभव कीजिये इस मजे को . दोष देने से, कूढने से, कोसने से सरकार का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है . फिर काहे के लिए मगजमारी ! हास्य क्लब देखे होंगे, इसकी सदस्यता ले लो फटाफट . वे सारे लोग बिना किसी बात के खूब हँसते है ! कई बार तो ठहाके लगा लगा कर आकाश गूंजा देते हैं ! तो क्या ये समझदार लोग पागल हैं ? ये अन्दर से चाहे कितने भी परेशान और दुखी हों हँस हँस कर अपनी सोच बदल लेते हैं . आप भी हँसा करो, समाचार पढ़ो तो हँसो, समाचार देखो तो हँसो, पेट्रोल भरवाओ तो हँसो, दाल पतली हो तो भी हँसो, बिना डाक्टर-दवा या आक्सीजन के मर जाओ तो हँसो . फिल़ासफी की मदद लो, सोचो क्या ले कर आये थे और क्या ले कर जाओगे ! ये दुनिया एक सराय है, आपको हमको सबको एक न एक दिन जाना पड़ेगा . कोई अमर नहीं है . फिर जबरदस्ती की हाय तौबा क्यों ! सोच कर देखो कि आमिर को कितनी महँगी मौत मरना पड़ता है ! लेकिन गरीब आदमी मजे में और सस्ते में मर जाता है . कितनी अच्छी बात है ये ! अगर हुकूमत गरीबों की शुभचिंतक नहीं होती और अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं कर रही होती तो लाल झंडे वाले क्या मजे में बैठे कहीं तीन पत्ती खेल पाते ! हाँ, कुछ लोगों को शिकायत हो सकती है कि अपराध बढ़ गए हैं . दरअसल चोरी करने वाले हमारे भाई लूट-बिजनेस में आ गए हैं . लेकिन किसी को भी इन छोटी छोटी बातों को लेकर परेशान होने की जरुरत नहीं है . आपको घर में सुरक्षित रहने की आझादी है ही . अपने सुना होगा कि संतोषी सदा सुखी . जनता को हमेशा खुश और संतुष्ट रहना होगा . इसके लिए कड़े कानून बनाये जायेंगे . जनता की ख़ुशी और संतोष सरकार की प्राथमिकता है . तो अपने को बिना नागा खुश अनुभव कीजिये, नमस्कार .
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कचौरी खाने का परमिट

 



राजा पिता होता है प्रजा का . प्रजा को कितना चाहिए, क्या चाहिए, क्यों चाहिए ! विकास तभी होगा जब सारा कुछ बाप के नियंत्रण में होगा. वरना तो भेड़ के झुण्ड की तरह खाया कम उजड़ा ज्यादा. देश बूफे नहीं है समधी का कि ठूंसते चले गए. सबको अनुशासन में रहना होगा. कितना-क्या खाना है, क्या पहनना है, किसकी कितनी पूजा करना है, किसको लाइक, किस पर कमेन्ट करना है, कब सोना-जागना है, पड़ौसी को कब हाय-बाय बोलना है. सब . इसके लिए वार्ड स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था की गई है .

नंबर आने पर  उन्होंने आवेदन लिया और पढ़ा . “माननीय महोदय, सेवा में विनम्र निवेदन है कि मुझे बहुत समय से बेचैनी जैसा फील हो रहा है . मन बहुत उदास रहता है . भूख लगती है परन्तु नहीं लगती है . रात को नींद खुल खुल जाती है और बड़ी बड़ी कचौरियां दिखाई देती हैं . थाली में पड़ी दाल-रोटी काटने को दौड़ती है . दिल हरी और लाल चटनी  के लिए हूम हूम करता है . बाबा ने भी कहा है कि कृपा वहीं अटकी हुई है . इसलिए हुजूर से निवेदन है कि मुझे कचौरी खाने का परमिट देने की कृपा करें . हुजुर का आज्ञाकारी, केन्द्रीय आधार-कार्डधारी, लोकल बालमुकुन्द गिरधारी . “

देश आत्मनिर्भरता की सड़क पर है जिसमें जगह जगह अनुशासन के स्पीड ब्रेकर भी हैं . क्षेत्रीय कचौरी-समोसा अधिकारी बड़ी सी टेबल लिए, बुलंद ब्रेकर बने बैठे हैं . दीवार पर सुनहरे रंग में लिखा है ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’. बावजूद इसके दफ्तर में लोग खा रहे हैं और खाने दे रहे हैं . कचौरी और समोसों की अनुमति के लिए बाहर अलग अलग लाइन थी .

साहब ने उपर से नीचे तक ताड़ने के बाद पूछा – “टेक्स देते हो ? ... रिटर्न की कॉपी नहीं लगाई !”

“टेक्स नहीं देते हैं सर ... हमारा मतलब है टेक्स नहीं बनता है . “

“क्यों नहीं बनता है ?”

“गरीब हैं सर ... मज़बूरी है .”

“फिर तो सरकार खिलाएगी तुम्हें  कचोरी-वचोरी सब. कार्ड बनवा लो बस .”

“कार्ड तो बना है साहब ... “

“फिर क्या दिक्कत है !?”

“कचौरी नीचे आते आते भजिया हो जाती है, वो भी ठंडा-बासी.   ... सुना है सब प्राइवेट हो रहा है, बड़े बड़े लोग बहुत बड़ा बड़ा और गरमागरम खा रहे हैं ... परमिट मिल जाए तो हम गरम कचौरी खा लेंगे” .

“कितनी कचौरी का परमिट चाहिए ?”

“तीन-चार बस .”

“पिछली दफा कब खाई थी ?”

“याद नहीं सर ...बहुत दिनों से नहीं खाई .”

“याद नहीं !! क्या मतलब है इसका ! कचौरी खाई और भूल गए ! सिस्टम को मजाक समझ रखा है ! टीवी वाला पूछेगा तो कह  दोगे कि सरकार कुछ करती नहीं है ! ... एफिड़ेविड लगेगा अब. चले आए मुंह उठा के ! जंगल समझ रखा है क्या ! नियम कानून कुछ है या नहीं ! देश ‘नहीं खाने से’ आगे बढ़ता है, कचौरी के लिए लार टपकाने से नहीं . ”

“करीब डेढ़ महिना हुआ सर ... तब खाई थी .”

“उसका सेंक्शन लेटर कहाँ है ? फोटो कॉपी लगाना पड़ेगी .”

“अगली बार लगा दूंगा सर, इस बार कुछ ‘मेनेज’ कर लीजिए प्लीज”.

थोड़ी यहाँ वहाँ के बाद पचास रूपए का नोट जेब में डालते हुए बोले -“कितनी खाओगे ?”

“जी ... तीन-चार ... नहीं पांच-छह .“

“सिर्फ दो खाओ वरना कचौरीजीवी हो जाओगे .”

“परमिट मिल जाये सर तो चार पांच दिन में खाऊंगा ताकि मन भर जाये .”

“वो देखो क्या लिखा है ... ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’, वो कचौरी के लिए ही है .  बावजूद इसके तुम्हें परमिट मिल रहा है.”

“सर ये कचौरी के लिए नहीं किसी और चीज के लिए लिखा है !”

“हाँ हाँ समझ रहे हैं . दूर कर लो गलतफहमी ... रिश्वत खाई नहीं जाती है ली जाती है . लेने-देने पर रोक होगी तो विकास कैसे होगा ! ... चलो भटको भटकाओ मत . ये लो बिना तारीख का परमिट दे रहे हैं  ... सिर्फ सन लिखा है . इकत्तीस दिसंबर तक खाओ जितनी खाना है .... लेकिन बताना मत किसी को ... नहीं तो मिडिया वालो को ही बता दो तो वो खायेंगे कम बिखेरेंगे ज्यादा . “

 

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मिले गंजों को मुआवजा





                कई बार होता है जब कुछ सूझता नहीं है तो हम सर पर हाथ फेरते गुमसुम बैठे होते हैं . सर अपना और हाथ भी अपना, दोनों के बीच अपनी निजी ममता, नानपॉलिटिकल, उदार और शीतल . शरीर भी तो एक संघीय व्यवस्था है . ऐसा लगता है जैसे बंगाल की सरकार केंद्र सरकार को सहला रही हो . लेकिन ये काम आप गार्डन में कर रहे हों तो कोई किशोर या कोई प्रशांत बीच में नहीं कूदेगा ऐसा हो नहीं सकता . ‘हल्लो’ कहते हुए प्रशांत उपस्थित हुआ . बोला – “ मैं जानता हूँ आप किस चिंता में डूबे हुए हैं .”

“आप कैसे जानते हैं !?”

“मैं जान लेने में दक्ष हूँ . सब जानते हैं कि जो कोई नहीं जानता वो भी मैं जानता हूँ . और मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं जानता हूँ, इसलिए लोग तगड़ी फीस देते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि मैं जानता हूँ .” उसने जो कहा वह सुन कर सिर खुजाने की जरुरत पड़ी लेकिन हाथ रुक गए .

“एक सदमें का शिकार हो गया हूँ मैं .....”

“ना, ... बिलकुल नहीं . आपको इस वक्त पॉजिटिव सोचना चाहिए . आप अकेले चपेट में नहीं आये हैं . इस समय देश में गंजों की संख्या पर ध्यान दीजिये, कितने बढ़ गए हैं ! चिंता से गंजापन बढ़ता है . कारण ये कि जागरूकता बढ़ी है, लोग देश के बारे में सोचने लगे हैं इसलिए गंजे हो रहे हैं . जो भी सोचेगा गंजा हो जायेगा . आपको अच्छी तरह जानता हूँ मैं, आप देश के लिए कितने चिंतित रहते हैं पिछले कुछ सालों से . तीन चार साल में ही सतपूड़ा से थार हो गए हैं . देख कर अच्छा तो नहीं लगता है लेकिन क्या किया जा सकता है ! कम से कम राष्ट्रवादी गंजों को तो मुआवजा मिलना चाहिए . ... पहली बार कब लगा था आपको कि बाल झर रहे हैं ?”

“ वो दिन कैसे भूल सकता हूँ . शाम का मनहूस वक्त था, खाना भी नहीं खाया था ... अचानक टीवी बोला कि हजार-पांच सौ के नोट अब रद्दी हो गए ! सुनते ही माथा घूम गया . लगा कि शेयर मार्केट के बुल ने सींग मार के हवा में उछाल दिया . सर में खुजली सी होने लगी, रात भर खुजाता रहा . सुबह तक काफी फर्क हो गया .“

“कैसा फर्क ? ... सिरदर्द कम हुआ ?”

“काफी हल्का हल्का सा लग रहा था . ऐसा लगा कि सर का बोझ कम हो गया . पत्नी भौंचक देखती रही तो आइना देखा . पहले तो मैं पहचाना नहीं ... जाने ये गंजा कौन है !! लगा जैसे हाइवे के लिए जंगल साफ हो गया है . विकास सर पर चढ़ कर बोला रहा था . ओफ ... उसके बाद तो बचेखुचे भी चले गए जल्दी जल्दी .  कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे .  डर है कि मोची यह न कह दे कि आ जाओ साहब पालिश करके चमका दूँ . “

“वो तो अच्छा हुआ भाई तुम्हारी शादी हो गई थी 2013 में  ... पॉजिटिव सोचिये . अगर नहीं हुई होती तो क्या होता ! जिंदगी भर हेलमेट लिए अकेले गुजारते .”

“इतनी महंगाई में अकेले की गुजर हो जाये शायद ... काश शादी नहीं हुई होती .”

“पॉजिटिव सोचिये ... इतना ज्यादा सोचोगे तो दांत भी चले जायेंगे .”

“सोचने से दांत भी जाते हैं क्या !?”

“पूरा शरीर चला जाता है जी, सुना होगा चिंता चिता सामान .” प्रशांत ने समझाया .

“कैसे न सोचूं, सीमा पर कितना तनाव है ! चीन ने नियंत्रण रेखा के आसपास गाँव के गाँव बसा लिए हैं और इरादे भी ठीक नहीं हैं उसके ! “

“अरे उसकी चिंता आप क्यों करते हैं ! आपकी प्राथमिकता ये होना चाहिए कि सिर की सीमा पर बची रह गयी झालर की रक्षा कैसे करें . .. आपको तन्जली का केश तेल लगाना चाहिये था . लाला आरामदेव की दाढ़ी और सिर देखा, .... कितना घाना जंगल है !”

“इसका मतलब है कि उनको देश की कोई चिंता नहीं है !! कुछदिनों के लिए उन्हें रक्षामंत्री बना देना चाहिए . हप्ते भर में ही ड्रेस्ड चिकन हो जायेगा चेहरा . “

प्रशांत ने कुछ देर सोचने के बाद कहा – “अकेले मत सोचो . समझदारी इसमें है कि गंजों का एक संगठन बनाओ . ‘राष्ट्रीय सफाचट समूह’ कैसा रहेगा ? सालभर में ही आपका संगठन इतना मजबूत हो जायेगा कि लोग सर मुंडा कर इसमें शामिल होने लगेंगे . आप जिसे चाहोगे जिताओगे या हराओगे . सरकार आप लोगों की मर्जी से बनेगी . पॉजिटिव सोचो, आप एक महत्वपूर्ण संगठन के संथापक अध्यक्ष होने जा रहे हो . इतिहास आपको बड़े आदर से याद रखेगा और इसकी वजह क्या होगी ? ... आपका गंजा सर . ... थेंक्यू बोलिए मुझे .”

अचानक अन्दर उमंग की हिलोरें सी उठी . मेरे मुंह से निकला –“थेंक्यू प्रशांत जी.”

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रविवार, 17 अक्टूबर 2021

ऑफ़लाइन हिदायतें

 

             


                             


“कविता कैसी भी हो चलेगी, लेकिन कुरता साफ, स्तरी किया हुआ होना चाहिए . पिछली बार आपके कुरते पर पान की पीक गिरी दिख रही थी . दाढ़ी रखते हैं ! अच्छी बात हो सकती है, लोग कहते हैं कि कवियों को रखना चाहिए, लेकिन ठीक से सेट करवा लीजियेगा . वो क्या है स्क्रीन पर तो आदमी को जेंटल-मेन लगना चाहिए . परफ्यूम या डियो लगाने की कोई जरुरत नहीं है . नीचे आपने पायजामा पहना हो या पतलून, या फिर लुंगी या कुछ भी नहीं, इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा . लेकिन ध्यान रहे कार्यक्रम ऑन लाइन होगा और आपको अपने चेहरे के आलावा कुछ भी दिखाने का प्रयास नहीं करना है . पीछे बैगराउंड आप अपनी पसंद का रख सकते हैं, किताबों की अलमारी हो तो आपके लिए अच्छा है . आपके पास डॉगी हो तो उसे पास में नहीं बैठाएं . पिछली दफा एक साहित्यकार लगातार अपने डॉगी से नोजी लड़ाते रहे और लोग समझ नहीं पाए कि कौन किसका मुंह चाट रहा है . बार बार उठता ये सवाल नेट का कीमती समय चाट गया . ऑनलाइन कार्यक्रम में जुड़े सारे लोग भी कवि होते हैं इसलिए दाद नहीं मिलने की जोखिम ज्यादा होती है . बावजूद इसके कठ्ठा-जी करके आपको मुस्कराते रहना है जैसा कि हमारी टीवी वाली एन्कर करती हैं . दुनिया लेन-देन  पर चलती है . आपको दाद तभी मिलेगी जब आप दूसरे को देंगे . अगर आपको किसी की कविता पसंद नहीं आये तो भी थोड़ी बहुत  दाद अवश्य दीजिये . जेब से क्या जाता है, इसे ऑनलाइन शिष्टाचार मानिये . जैसे कि लोग अपने मेहमान को दोबारा नहीं चाहते हैं लेकिन उसे ‘और आइयेगा’ अवश्य कहते हैं .

पिछली दफा आपने एक मंच पर कवियत्री देवी की साड़ी की तारीफ में दो गुलूगुलू गजलें ठोक दी थीं . साड़ी आपको पसंद आई, गजलें देवीजी को पसंद आईं लेकिन ये दोनों बाते कवियत्री के पतिदेव को पसंद नहीं आयीं . पति की इस नापसंदगी पर कुपित हो कर देवी ने अब तक पचास से ज्यादा कवितायें लिख मारी हैं . सिलसिला अभी थमा नहीं है . डर है कि कवियत्री का यह आन्दोलन किसान आन्दोलन की तरह लम्बा खिंच सकता है . पतिदेव डाक्टरों के संपर्क में हैं और सुना है किसी कारगर वेक्सिन की तलाश में लगे हुए हैं . अगर वे कहीं सफल हो गए तो लोग डीपीटी के साथ इस वेक्सिन को भी लगवाने लगेंगे और हो सकता है कि भविष्य में मंचों को मंजी हुई कवियत्रियाँ  मिलना ही बंद हो जाएँ . सो प्लीज ऑनलाइन कवियत्रियों को देख कर आगे से ऐसा खतरनाक कुछ न करें . इसे साहित्य में आपका बड़ा योगदान माना जायेगा .

आपको पूरे समय याद रखना है कि कार्यक्रम लाइव जाता है इसलिए चलते कार्यक्रम में यथासंभव पानी के आलावा कुछ न पियें . चाय-कॉफ़ी पीनी ही पड़े तो पूरा टी-सेट, क्रोकरी, बिस्किट-भजिया वगैरह कतई नहीं दिखाएँ . लोगों को लगता है कि हम आपको अच्छा पारिश्रमिक देते है और बाकी को सूखा निचोड़ लेते हैं . लेकिन सच्चाई का खुलासा करवाना आप भी नहीं चाहोगे . बंधी मुट्ठी ग्यारह सौ की और खुल गई तो ग्यारह की . पिछली बार आपने गले में सोने की दो तीन चेन और हाथों में कई लाल पीली अंगूठियाँ पहन रखीं थीं . यह सच है कि आजकल बच्चों के रिश्ते ऑनलाइन तलाशे जाते हैं लेकिन साहित्यिक कार्यक्रम को इसका जरिया बनाना ठीक नहीं है . इन्कमटेक्स के बहुत से अधिकारी भी इनदिनों कविता लिख रहे हैं और ऑनलाइन ताकझांक करते हैं, इस बात का विशेष ध्यान रखने की जरुरत है . .... माना कि वो सारी ज्यूलरी नकली थी . लेकिन ये बात आप जानते हैं, हो सकता है ऑनलाइन संयोजक और संचालक भी जानते हैं कि नकली है ... लेकिन दर्शकों को नहीं पता होता है कि वो नकली हैं . इसी सिचुएशन में डॉन निकल भागा था और बारह मुल्कों की पुलिस हाथ मलती रह गयी थी . और एक अंतिम बात, कविताएँ अपनी ही सुनाएँ चाहे कितनी दोयम दर्जा हों . विदेशी भाषा से अनुदित कविताओं के कच्चे माल से बनी या कॉपी-पेस्ट कविताएँ फ़ौरन पकड़ ली जाती हैं . .... तो ठीक है कविराज, कल मिलते हैं .

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सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

बड़े आदमी, बड़ा काम



                         जो बड़े बड़े काम करता है वो बड़ा आदमी होता है . बड़े कामों की दुश्मनी प्रायः कानून से होती है . इसलिए बड़े आदमी को पहले कानून की नब्ज पकड़ना पड़ती है . नब्ज कानून के हकीमों के हाथ में होती है . कानून के हकीम वरिष्ठ, अनुभवी और प्रसिद्ध लोग होते हैं . कानून के बाज़ार में उन्हें कानून का जादूगर भी कहा जाता है . कानून का बाज़ार तफरी का स्थान नहीं है कि “दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ , बाज़ार से गुजरा हूँ खरीदार नहीं हूँ “ कह कर निकल जाये कोई .  सुना है कि इस बाज़ार में जो एक बार घुसा वो तभी चलन से बाहर होता है जब नोट की तरह जगह जगह से कटा-फटा और चिपकाया गया हो . आम आदमी के लिए जो कानून बर्बादी का कारण बनता है वही बड़े आदमी के लिए ‘जीपीएस’ का काम करता है . पीसी सरकार स्टेज से हाथी गायब कर देता था, बड़ा आदमी सरकार से बड़ा होता है और रेलें, हवाई जहाज वगैरह तक गायब कर देता है . बड़ा आदमी हार नहीं मानता है और लगा रहता है . सफलता उसे ही मिलती है जो लगा रहे . जादू लगातार रियाज यानी प्रेक्टिस मांगता है . कहते हैं बेवकूफों की कमी नहीं ज़माने में, एक ढूँढो हजार मिलते हैं . ये पंक्तियाँ जादू की जान हैं . कुछ लोग खुद पॉलिटिक्स नहीं करते, वो लोगों को पाल लेते हैं . पालना ज्यादा सुविधाजनक होता है . जब बोटियों से गोटियाँ चलती हों तो खुद मगजमारी करने की क्या जरुरत है ! आप कह सकते हैं कि असल बड़े आदमी यही होते हैं . 

                 कभी कभी बड़े आदमी को गिरफ़्तारी का सामना भी करना पड़ता है . थोड़ी बहुत काली भेड़ें हर सिस्टम में होती हैं ! होना भी चाहिए, इससे कानून, सिस्टम और सरकार को इज्जत मिलती है . राजनीति  कितनी ही बदचलन क्यों न हो ये काली भेड़ें उसकी मांग का लाल सिन्दूर होती हैं . इसीलिए उन्हें गिरफ्तार करने के समय सफ़ेद भेड़ों को अपनी बगलें झांकना पड़ती है . साहब का सर अगर शुरुर्मुर्ग हो रहा हो तो साहब की सूखे कुएँ सी बगल भी उन्हें ही झांकना पड़ती है .  साहब की बड़ी साइज़ की बगल झाँकने पर सिपाही को करीबी होने का सुख और गर्व का भाव हो सकता है . सिपाही रोबोट जैसा होता है, साहब का कुछ भी झांकते वक्त गर्व  महसूस करना उसकी ड्यूटी है . अभ्यास अच्छा हो तो बगलें झाँकने में पुलिस भी अच्छा परफोर्म करती है . ट्रेनिंग में उन्हें ‘दायें-बाएं-थम’ बार बार कराया जाता है तो इसके कुछ जरुरी कारण होते हैं लोकतंत्र में . कब कौन स्वयंसिद्ध कुर्सी पकड़ ले कोई भरोसा नहीं होता है . स्वयंसिद्धपन एक गॉड-गिफ्टेड प्रतिभा होती है जो शिखर पर भी पहुँच जाओ तो भी जाती नहीं है . जानकार जानते हैं कि स्वयंसिद्धपन उसके जींस में हैं . उसे वित्त मंत्रालय दे दो या शिक्षा मंत्रालय, वो काम नहीं करेगा, उसके जींस करेंगे... यानी गॉड करेंगे . गॉड सबका होता है . गॉड जो भी करता है अच्छा ही करता है . इसमे किसी को शक नहीं होना चाहिए . इसलिए बड़े आदमी को शक की निगाह से देखना पाप है . फिर भी रस्मी तौर पर बड़ा आदमी गिरफ्तार होता है तो प्रसिद्धि मिलती है . बड़े आदमी के लिए प्रसिद्धि पूँजी होती है, जिसे देख कर बैंकें अपना सब कुछ खोल कर चरणों में गिर जाती हैं . और बड़ा आदमी देश की प्रतिष्ठा के लिए, विकास के लिए, सहयोगी सरकार के लिए लगातार बड़े काम करते जाता है . जे-हिन .

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शनिवार, 18 सितंबर 2021

पुराना कोट



 



                हवेली में कई चीजें सहेज कर रखी गईं थीं . बारहसिंघे और हिरन की गरदन, भूसा भरा बाघ, नीलकंठ पक्षी, चीते की खाल वगैरह . एक एक चीज वे तफसील बयाँ करते हुए दिखा रहे थे . शीशे के बड़े बाक्स में टंगा कोट दिखाते हुए बोले – “ ये हमारे परदादा का कोट है . निशानी है उनकी . विरासत है हमारे लिए .”

मेहमान ने भी रूचि से देखा . –“ काफी पुराना है ... बहुत ध्यान रखना पड़ता होगा ! साफ सफाई भी बड़ा मेहनत का काम होता होगा ?”

“साफ सफाई में मेहनत !! ... जनाब हाथ भी नहीं लगा सकता है कोई इसे . बस दूर से ही देख लेते हैं दिन में चार पांच बार . जैसा था वैसा ही बनाये रखा है . जरा सा भी बदला या दुरुस्त किया हुआ नहीं है . ओरिजनल ... अनटच रखा है . “ उनका सीना चौड़ा हो रहा था .

“बहुत बड़ी बात है ये, किसी चीज को वैसे का वैसा बनाये रखना . ... बटन की जगह लकड़ियाँ  लगी हैं . वो भी शायद ख़राब हो चली हैं .” आगंतुक ने कहा .

“पुराने ज़माने में लकड़ियाँ ही लगती थीं .  और ये ख़राब नहीं हैं, उनका कलर ऐसा है कि लगता है ख़राब हो गयी हैं . “

“अगर ड्रायक्लिनिंग वगैरह करवा लें  तो और बेहतर लगेगा .”

“कहा ना ... हाथ भी नहीं लगा सकता है कोई ! ... जैसा है वैसा ही रखना हमारी जिम्मेदारी है . हमें पहनना थोड़ी है, बस इससे प्रेरणा लेना है . छेड़छाड़ हमें बर्दाश्त नहीं होगी . इस मामले में हम कट्टर हैं . विरासत को विरासत की तरह ही रखेंगे . “ वे बोले .

“अच्छा है जी, बड़ा सम्मान रखते हैं आप कोट पर .” अतिथि ने बहस छोड़ते हुए कहा .

“कोट तो तुम्हारे परदादों के पास भी थे !!” उन्होंने सवाल किया .

“हाँ हैं ना .”

“कहाँ रखे हैं ?”

“ रखे कहाँ हैं ... ये पहना हुआ एक तो ... परदादा का ही है .” अतिथि  ने बताया .

“ये तो नया लग रहा है !! ... झूठ बोल रहे हो !”

“परदादा का ही है ... मैं इसे समय समय पर धुलवाता हूँ, जरुरी होने पर दुरुस्त भी करवाता हूँ ताकि पहनने लायक रहे . इसकी झाड़ झटक भी होती है, धूप भी दिखाते हैं ... बटन देखिये नए हैं . समय और जरुरत के हिसाब से थोड़ा बदलाव करते रहने से उपयोगिता बनी रहती है . कोट पुराना  है लेकिन नया भी है ... और सबसे बड़ी बात हम लोग आज भी पहन रहे हैं .

 

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सोमवार, 13 सितंबर 2021

आलसी आदमी गजब का आत्मनिर्भर होता है






         ज्ञानी कह गए हैं कि मुसीबतें आदमी को मजबूत बनती हैं . सफल वही होता है जो जीवन में संघर्ष करता है . जिसे आत्मनिर्भर बनना है, तरक्की करना है उसे कष्टों से जूझना तो पड़ेगा . सरकार की जिम्मेदारी है कि वह जनता को तरक्की के अवसर प्रदान करे . महंगाई, बेरोजगारी, दावा-दारू, दाना-पानी पेट्रोल-डीज़ल वगैरह की कमी होने और कीमतें ज्यादा होने को लेकर नजरिया बदलने की जरुरत है . इन्हें परेशानियाँ नहीं समझना चाहिए, ये सीढियाँ हैं तरक्की की . आपने सुना होगा भूखी बिल्ली शेर हो जाती है जबकि खाए अघाए शेर के सर पर चूहे कूदते हैं और उसकी मूँछ तक कुतर जाते हैं . तो भूखा होना, अभाव या कष्ट में होना आत्मनिर्भरता की दिशा में पहला जरुरी कदम है . अगर कोई कमी नहीं होगी, जरुरत महसूस नहीं होगी तो आदमी कोशिश क्यों करेगा ! समस्याएं उपहार हैं ईश्वर का, धन्यवाद ईश्वर जी . और ये महत्वपूर्ण काम है सरकारों का, शुक्रिया सरकार जी . किसी ने कहा है कि अगर लोगों को उठा कर पानी में फैंक दिया जाये इस बात की सम्भावना है कि उनमें से आधे तैरना सीख जाएँ . रहा सवाल उन आधों का जो तैर नहीं पाए तो वे डूब ही जाएँ तो अच्छा है . भगवान जो करता है अच्छा ही करता है यह बात सबको समझ लेना चाहिए . जो तैर नहीं सकते उनका नदी किनारे क्या काम ?

आत्मनिर्भरता का नारा देना सर्वश्रेष्ठ तरीका है किसी भी तरह की जिम्मेदारी से हाथ ऊंचे करने का . प्रसन्नता की बात है कि सरकारें सर्वश्रेष्ठ करने में ही विश्वास करती हैं . जो कौमें मुसीबतें झेलती हैं, अभाव में जीवन गुजारती हैं, आधा पेट खा कर पूरी लड़ाई लड़ती हैं वही असल विजेता होती हैं . जरा गौर कीजिये हमारे साधु संत झोपड़ी में रहते थे, मुट्ठी भर अन्न से पेट भरते थे, परिधान के नाम पर दो लंगोटी में साल गुजर देते थे और देखिये उनमें ताकत इतनी होती थी कि शाप दे कर किसी हरे भरे को भी भस्म कर देते थे ! हमें ऐसी ताकत चाहिए लोगों में . अगर सरकार बैठा कर लोगों को मुफ्त खिलाती रही तो आलू का बोरा हो कर रह जायेगा वोटर . दूसरे उसे छोड़ेंगे क्या ? समोसा बना कर खा जायेंगे .

                  हमें आगे बढ़ाना है बिना किसी सहारे के तो विश्वास कीजिये ऐसे ही बन जायेंगे बैठे बैठाये आराम से, मेहनत नहीं करना पड़ेगी . मजबूरी की बात अलग है, आज इच्छा से मेहनत करता भी कौन है ! आसपास नजर डालिए, आपको एक से एक आलसी भरे पड़े दिखाई देंगे . उन्हें अगर पद्मश्री भी पेश करो तो लेने नहीं जायेंगे, पूछेंगे क्या काम आएगी ?  आलस्य का सुख मेहनत के कष्ट से बड़ा होता है . अगर कोई काम है सर पर तो बस देखते रहिये और जब तक बेहद जरुरी न हो, करना ही न पड़ जाये तब तक  पड़े रहिये मजे में . हो सकता है कोई दूसरा ही कर जाये गलती से . कोई आलसी संत कह गए हैं - “ आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों ; इतनी जल्दी क्या है अभी तो जीना है बरसों “ . लोग कहते हैं कि विज्ञान ने तरक्की के द्वार खोले हैं लेकिन असल में विज्ञान ने आलस्य और मोटापे के द्वार खोले हैं . हम टीवी एसी पंखा वगैरह रिमोट से बंद चालू करते हैं . अब तो सुना है रिमोट की जरुरत भी नहीं होगी, बोलने मात्र से काम हो जायेगा . जैसे बोल कर टाईप हो जाता है, आँखे बंद कर बैठे रहिये किताबें मशीन पढ़ कर सुना देगी . क्या पता कल को खाना पीना भी रिमोट से हो या रोबोट कर दे . वो तो अच्छा ही कि भगवान ने जुबान दी है और उसमें स्वाद की क्षमता भी . वरना वैज्ञानिक हमारे पेट में कट लगा कर ढक्कन वाला पाईप फिट कर देते और हम जैसे पेट्रोल लेते हैं वैसे फ़ूड स्टेशन पर जा कर अपना ‘फ्यूल’ भरवा लेते . बड़ा आदमी प्रीमियम क्वालिटी फ़ूड से फुल टेंक करवाता और गरीब औकात के हिसाब से घासलेटी फ़ूड डलवाता . न खाने चबाने का झंझट और न दांत साफ करने की किल्लत . आलसी आदमी गजब का आत्मनिर्भर होता है, जहाँ पड़े वहीं शिला हो गए . पांच साल में एक बार वोट डालने के लिए उठ जाता है यही बहुत बड़ी बात है . इसलिए वह लोकतंत्र की नींव का महत्वपूर्ण पत्थर भी हुआ .

 

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