कुत्ता एक विचार की तरह बहुत समय से कवि के साथ बना हुआ था । किसी जमाने में, यानि युवावस्था में जब उनका झुकाव वामपंथ की ओर था तब उन्हें भौंकते हुए कुत्ते अच्छे लगते थे । लेकिन अब जब जिंदगी प्लेटफॉर्म पर खड़ी ट्रेन लग रही है उनका रोम रोम दक्षिण दक्षिण लहक रहा है । बाहर जो जो बदल सकते थे बदल चुके हैं । लेकिन भीतर भौंक रहा विचार कमबख्त अपनी टेढ़ी दुम के साथ अभी भी गाहे बगाहे मुश्किल पैदा कर देता है ।
“विचार
एकदम से नहीं बदलते चाहे बाहर बहुत कुछ बादल जाए ।“ फ़ेमिली डाक्टर बोले । “आप ऐसा
कीजिए भीतर के कुत्ते को बाहर के कुत्ते से रिपलेस कीजिए । बाहर का कुत्ता बाहर से बिना दुम का होता है
लेकिन भीतर से खूब दुम हिलाता है ... हो
सकता है सफलता मिल जाए ।“
कवि ने
बारह हजार में एक दुमहीन कुलीन पिल्ला खरीदा । कुलीन महंगे बिकते हैं यह वे जानते
थे । कोशिश करते तो इस कीमत में तीन इंसानी बच्चे मिल जाते । जैसे जैसे समाज में सभ्यता का विकास हो रहा है
वैसे वैसे मनोकामना-पूर्ति प्रभु के दर्शन मात्र से हो रही है । बिन ब्याही
लड़कियों के ओवन-फ्रेश बच्चे ऑफ लाइन मार्केट में मिल रहे हैं । रहा कुलीनता का
सवाल तो वह वहीं बची दिख रही है जहाँ धन है शायद । इंसानी कुलीनता तो ड्राइंग रूम
में रखा मोर पंख रह गई है । कोई पंख ले कर उसका मोर ढूँढने निकलेगा तो ढूंढते ही
रह जाएगा । मोर ज़ेड सिक्यूरिटी में कहाँ शिलाजीत के बिखरे दाने चुग रहा है पता ही
नहीं चलेगा । बहरहाल, कुत्ता कवि की गोद
में किलोल कर रहा है और बार बार उनका मुंह
चाटने की कोशिश भी । कुत्ते को अपनी कीमत का पता है । हर कुलीन संसार के बारे में
कुछ जाने न जाने पर अपनी कीमत के बारे में जरूर जानता है । इस समय वह यानि कुत्ता
कवि को मुंह चाटना सीखा रहा है । कुत्ता मंहगा हो और आपने खुद खरीदा हो तो उसके साथ
मुंह-मिलन में कोई जान नहीं पता कि कौन किसका चाट रहा है । महंगा होने के बावजूद वह अदृश्य दुम हिला सकता
है तो खरीदने वाले को भी ईगो प्रोब्लेम नहीं होना चाहिए । आखिर उसे भी तो पैसा
वसूल करने का अधिकार है ।
कवि की
संगत से कुत्ते में संस्कार पैदा हो गए । महीना भर में कुत्ता कविता सुनने लगा । कवि
को कदरदान मिला तो अंदर से चौड़ी छाती से हुमक कर जब तब आवाज आने लगी कि ‘अब दुनिया जाए भाड़ में’ । कवि के साथ श्रोता ! वो भी
दुम हिलाता हुआ !! किसके नसीब में होता है । कवि को पद्मश्री दिलाने के लिए एक ही
कुत्ता काफी है । बारह हजार में और क्या लोगे !!
अचानक
पड़ौसी हीरा भागचंदनी आ गए और कुत्ते को देखते ही बोले - ‘माल अच्छा है, नाम क्या रखा है कुत्ते का ?’
अभी तक कुत्ते
का नामकरण नहीं हुआ था, कवि ने पूछा – क्या
रखें ?
“जिनपिग रख
दो । ... धंधा चौपट हो गया है सांई । ऐसा वाइरस छोड़ा है कमीने ने कि सारी दुनिया
ऑक्सीज़न मांग रही है ।“
कवि ने
विचार किया, बोले – जिन रख देते हैं । पिग तो ठीक नहीं लगेगा,
बारह हजार दिए हैं नगद । कुत्ते कि इज्जत का सवाल है । भागचंदानी को इज्जत कि बात
ठीक नहीं लगी तो कुत्ते पर टेढ़ी नजर डालते हुए बोले – इज्जत की बात थी तो देखभाल
कर लाते । इसका तो मुंह काला है !
“मुंह पर
मत जाइए । कलर देखिए, कितना सुनहरा पीला
है !! दूर से सोने का कुत्ता लगता है, जैसे माता सीता को
हिरण लगा था सोने का । “
“वो तो ठीक
है सांई, पर आदमी तो मुंह देखता है ना , मुंह काला तो सब
काला । देसी पिग कहीं का । “
“कैसे
पड़ौसी हो जी तुम ! बुराई किए जा रहे हो ! काले मुंह का बड़ा फायदा है । कल को तुम
कह नहीं सकोगे कि तुम्हारा कुत्ता मुंह काला करके आया है !”
“इसकी तो
दुम भी गायब है ! कुत्ता दुम नहीं हिलाए तो किस बात का कुत्ता !! बारह हजार किस
बात के दे दिए आपने !!”
“ देखो
भगचंदनी, ये बड़े से बड़े शतीर ब्लेक मार्केटियर को देख कर पहचान सकता है और पुलिस
को फोन भी लगा सकता है मोबाइल से ।“
“ अरे बाबा
! ये पुलिस को फोन कैसे लगा सकता है ! हमको बेवकूफ मत बनाओ । “
“कुलीन है
ना, इसके सारे रिश्तेदार पुलिस में हैं । एक बार ये फोन पर भौंक भर दे तो
पुलिस फाड़ खाए । “
“अरे बाप
रे ! कुत्ता है कि वाइरस है बाबा !” कहते हुए हीरा भागचंदानी भाग लिए ।
----